बात कर्नाटक में लगे हिजाब पर प्रतिबंध और धर्मनिरपेक्षता की भारतीय अवधारणा की
तस्वीर साभार: PTI
FII Hindi is now on Telegram

धर्म से जुड़ी हुई प्रथाओं को मानने का अधिकार बार-बार धर्म के अधिकार के साथ विवाद और सवालों के घेरे में रहा है। इस बार यह सवाल कर्नाटक में मुस्लिम छात्राओं का हिजाब और बुर्का पहनकर कॉलेज में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने पर खड़ा हो गया है। कर्नाटक के स्कूल-कॉलेजों में हिजाब और बुर्के पर लगा प्रतिबंध न केवल धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार से संबंधित है, बल्कि यह संस्थानों में धार्मिक मानकों के रखरखाव और धर्मनिरपेक्षता के पहलू से भी जुड़ा हुआ है।

भारत में बुर्का या हिजाब के प्रतिबंध पहली बार नहीं लगाया गया है। साल 2015 में प्रवेश परीक्षाओं में चीटिंग के बढ़ते मामलों के कारण अखिल भारतीय प्री-मेडिकल प्रवेश परीक्षा रद्द कर दी गई। सीबीएसई ने प्रवेश परिक्षा से पहले हाफ स्लीव कुर्ता पहनने और अन्य ड्रेसिंग दिशानिर्देशों के साथ-साथ हल्के कपड़े पहनने की भी अधिसूचना जारी की थी। इस अधिसूचना को नाधा रहीम ने केरल हाई कोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने कहा, “इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है कि हमारे देश में विविधता और विविध धर्मों और रीति-रिवाजों के साथ, इस बात पर जोर नहीं दिया जा सकता है कि एक विशेष ड्रेस कोड का पालन किया जाए, जिसके विफल होने पर एक छात्र को परीक्षाओं में बैठने से रोक दिया जाएगा। भारत में मौजूद धर्मों और संस्कृतियों की विविधता के आलोक में ड्रेस कोड निर्धारित करने वाले एक व्यापक आदेश की अनुमति नहीं दी जा सकती है।”

और पढ़ें : कर्नाटक: हिजाब पहनने पर रोक के ख़िलाफ़ छात्राओं का विरोध जारी

भारत में धर्म की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है जो संविधान के अनुच्छेद 25-28 में निहित है। यह एक भारतीय को अपने धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, स्वीकार करने और प्रचार करने का स्वतंत्र अधिकार प्रदान करता है। हालांकि, यह अधिकार अमेरिकी और ऑस्ट्रेलियाई संविधानों में प्रदान किए गए अप्रतिबंधित अधिकारों के विपरीत पूर्ण नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के भाग III के प्रावधानों के अधीन इस पर कुछ प्रतिबंध हैं।

Become an FII Member

अनुच्छेद 25 के अतिरिक्त अपवाद खंड 2 (बी) में दिए गए हैं, जो दो अपवादों को बताता है; पहला, सामाजिक कल्याण और सामाजिक सुधार के लिए प्रावधान करने वाले कानून, और दूसरा, हिंदुओं के सभी वर्गों और वर्गों के लिए सार्वजनिक चरित्र के सभी हिंदू धार्मिक संस्थानों को खोलना। इस खंड ने सती, देवदासी, द्विविवाह आदि के निषेध जैसे सुधारों की रक्षा की है। 

अनुच्छेद 25 न केवल धर्म पर बल्कि धार्मिक प्रथाओं पर भी लागू होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने रतिलाल के वाद में कहा है कि धर्म के अनुसरण में धार्मिक प्रथाएं उस धर्म के सिद्धांतों में विश्वास के अनुरूप हैं। यद्पि इस तरह के धार्मिक अभ्यास को प्राचीन काल से ही प्रचलित और पालन किया जाना साबित होना चाहिए, क्योंकि यह व्यक्ति के विश्वास का एक मूल सिद्धांत बनाता है। यह बहुत महत्वपूर्ण है कि इस तरह के अभ्यास को धर्म का एक अभिन्न और अनिवार्य हिस्सा बनाना चाहिए। किसी व्यक्ति विशेष की धार्मिक प्रथाओं को आंकना बाहरी व्यक्ति का दृष्टिकोण नहीं हो सकता है, प्रथाओं में विश्वास करना व्यक्ति का व्यक्तिगत अधिकार है।

कर्नाटक का वर्तमान मामला न केवल धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित, बल्कि यह व्यक्ति के शिक्षा के अधिकार और उसके जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार भी है। यह सुनिश्चित करना राज्य का कर्तव्य है कि कोई व्यक्ति अपने अन्य अधिकारों को बाधित किए बिना अपने धर्म को मानने और उसका पालन करने में सक्षम हो। स्कूल में कुछ निर्धारित ड्रेस फॉर्म के कारण सिर पर स्कार्फ और हिजाब पर पूरी तरह से प्रतिबंध मनमाना आदेश है।

भारत के संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा

भारतीय धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता से बुनियादी रूप से अलग है। पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता जहां धर्म और राज्य के बीच पूरी तरह संबंध विच्छेद पर आधारित है, वहीं भारतीय संदर्भ में यह अंतर-धार्मिक समानता पर आधारित है। भारत में धर्मनिरपेक्षता समग्र रूप से सभी धर्मों का सम्मान करने की संवैधानिक मान्यता पर आधारित है। यदि पश्चिम में कोई धार्मिक संस्था किसी समुदाय या महिला के लिये कोई निर्देश देती है तो सरकार और न्यायालय उस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं। जबकि भारत में मंदिरों, मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश जैसे मुद्दों पर राज्य और न्यायालय दखल दे सकते हैं। भारतीय धर्मनिरपेक्षता में राज्य समर्थित धार्मिक सुधार की गुंजाइश भी होती है और अनुकूलता भी, जो पश्चिम में देखने को नहीं मिलती है। उदाहरण के लिए भारतीय संविधान ने अस्पृश्यता पर प्रतिबंध लगाया है, वहीं सरकार ने बाल विवाह को खत्म करने के लिए कानून भी बनाए हैं।

और पढ़ें : मी लॉर्ड ! अब हम गैरबराबरी के खिलाफ किसका दरवाज़ा खटखटाएं – ‘सबरीमाला स्पेशल’

भारत की प्रचलित धर्मनिरपेक्षता की प्रकृति फ्रांस की तरह कठोर नहीं है, जहां किसी भी धार्मिक पहचान से संबंधित किसी भी संकेत का खुला प्रदर्शन स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित है, लेकिन भारत में, धर्मनिरपेक्षता अधिक समावेशी समझ है। धर्मनिरपेक्षता का यह संस्करण “सर्व-धर्म-संभव” की पुरानी भारतीय दार्शनिक अवधारणा से लिया गया है। इस प्रकार, यह न तो धर्म विरोधी है, न ही यह राज्य और धर्म को पूरी तरह से अलग करता है। पश्चिम के विपरीत, भारतीय संविधान सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक है यानि सभी धर्मों की समान रूप से रक्षा करना और सभी धर्मों को समान सम्मान देना। 

भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता को परिभाषित करते हुए 42वें सविधान संशोधन अधिनयम, 1976 द्वारा इसकी प्रस्तावना में ‘पंथ निरपेक्षता’ शब्द को जोड़ा गया। यहाँ पंथनिरपेक्ष का अर्थ है कि भारत सरकार धर्म के मामले में तटस्थ रहेगी। उसका अपना कोई धार्मिक पंथ नहीं होगा और देश में सभी नागरिकों को अपनी इच्छा के अनुसार धार्मिक उपासना का अधिकार होगा। भारत सरकार न तो किसी धार्मिक पंथ का पक्ष लेगी और न ही किसी धार्मिक पंथ का विरोध करेगी। पंथनिरपेक्ष राज्य धर्म के आधार पर किसी नागरिक से भेदभाव न कर प्रत्येक व्यक्ति के साथ समान व्यवहार करता है। भारत का संविधान किसी धर्म विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है। यह व्यक्तियों को उनकी स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार में हस्तक्षेप करने के लिए राज्य के मनमाने कार्यों के खिलाफ धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है। 

अंतर-धार्मिक हस्तक्षेप पूरी तरह से प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन न्यूनतम है और अनुच्छेद 25-28 में बताए गए अपवादों के अधीन है। हस्तक्षेप उचित है अगर यह धार्मिक हठधर्मिता प्रथाओं में सुधार के लिए बड़े पैमाने पर काम करता है। इसलिए, भारत में धर्मनिरपेक्षता एक बहुत ही स्वदेशी अवधारणा है और यह व्यक्ति को अपने धर्म का अभ्यास करने, मानने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देने के लिए है। धर्मनिरपेक्षता की बुनियादी विशेषताओं में समानता के अधिकार और लोगों का कल्याण शामिल है, चाहे वे किसी भी धर्म से सम्बंधित हों। 

और पढ़ें : बलात्कार की वजह ‘कपड़े’ नहीं ‘सोच’ है – बाक़ी आप ख़ुद ही देख लीजिए!

सर्वोच्च न्यायालय ने कई वादों में धर्मनिरपेक्षता को संविधान की मूल विशेषता माना है। इसलिए, यह राज्य पर तटस्थ होने और किसी भी धार्मिक पहचान से संबंध नहीं होने का दायित्व लगाता है। यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है कि न केवल राज्य धार्मिक तटस्थता का अभ्यास करता है, बल्कि यह भी कि यह व्यक्ति को अपनी इच्छा के अनुसार अपने धर्म को मानने और अभ्यास करने की अनुमति देता है, जो संवैधानिक रूप से अनुमत प्रतिबंधों के अधीन है। इसके अलावा, संविधान समुदाय को समाज के क्षेत्र में पनपने और उत्कृष्टता प्राप्त करने की अनुमति देने के लिए निरंतर सुरक्षा प्रदान करता है और यह सुरक्षा बहुसंख्यकवादी ताकतों से समुदायों के समग्र विकास और संरक्षण में मदद करती है।

धर्मनिरपेक्षता के इस सिद्धांत का संविधान के सभी प्रावधानों में पालन किया जाता है, और यह केवल धर्म की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है। जुलाई 1985 में, भारत के राष्ट्रगान “जन गण मन” को गाने से इनकार करने के बाद तीन बच्चों को उनके स्कूल से निकाल दिया गया था। राष्ट्रगान को गाना उनके धार्मिक विश्वास के खिलाफ था। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि राष्ट्रगान न गाने के कारण स्कूली बच्चों का निष्कासन उनके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। 

और पढ़ें : रिप्ड जीन्स नहीं, रिप्ड पितृसत्तात्मक मानसिकता पर है काम करने की ज़रूरत

सबरीमाला के वाद में न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ​​ने कहा कि चाहे धार्मिक प्रथा तर्कसंगत हो या तार्किक, मौलिक अधिकारों का सामंजस्य भी होना चाहिए जिसमें उनके धर्म के सिद्धांतों का पालन करते हुए धर्म की स्वतंत्रता भी शामिल है। धार्मिक प्रथाओं के मामलों में तर्कसंगतता की अवधारणा को न्यायालय द्वारा लागू नहीं किया जा सकता है; एक के लिए जो विश्वास है वह दूसरे के लिए मूर्खता है, जो एक के लिए ईश्वर है, वह दूसरे के लिए एक परिकल्पना है। ये बहुत ही व्यक्तिवादी अधिकार हैं, और आस्था, एक निजी मामला है।

मुस्लिम समुदाय की विधि का प्रथम स्रोत क़ुरान और सुन्ना हैं। कुरान की कई आयतों और हदीस के विवरण से यह निष्कर्ष निकलता है कि चेहरे को छोड़कर सिर को ढांकना और शरीर को ढांकना फ़र्ज़ है, और इसका पालन न करना हराम होगा और इसीलिए हिजाब या सिर पर स्कार्फ पहनना इस्लाम का एक अनिवार्य अभ्यास है। नारीवादी विचारों का तर्क है कि पर्दा प्रथा, हिजाब, बुर्का, घूंघट, आदि पितृसत्तात्मक प्रथाएं हैं। साथ ही वे इस बात का भी समर्थन करते हैं कि पर्दा करना या न करना एक महिला का अपना निजी फैसला होना चाहिए। किसी भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों में कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए ।

वर्तमान मामला न केवल धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित, बल्कि यह व्यक्ति के शिक्षा के अधिकार और उसके जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार भी है। यह सुनिश्चित करना राज्य का कर्तव्य है कि कोई व्यक्ति अपने अन्य अधिकारों को बाधित किए बिना अपने धर्म को मानने और उसका पालन करने में सक्षम हो। स्कूल में कुछ निर्धारित ड्रेस फॉर्म के कारण सिर पर स्कार्फ और हिजाब पर पूरी तरह से प्रतिबंध मनमाना आदेश है।

और पढ़ें : अपनी पसंद के कपड़ों के कारण जान गंवाती लड़कियां, क्या यही है ‘फ्रीडम ऑफ चॉइस’


तस्वीर साभार : PTI

दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply