पीरियड्स
तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
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पीरियड्स या इससे जुड़ी समस्याओं पर बात करने से अक्सर बचा जाता है। यहां तक कि स्कूलों में भी आठवीं-नौवीं कक्षा में विज्ञान विषय में मौजूद कुछ चैप्टर, जो जेंडर, किशोरावस्था, हार्मोन परिवर्तन आदि पर आधारित होते हैं, वहां भी विद्यार्थियों के हार्मोनों में आए बदलावों पर खुलकर बातचीत नहीं की जाती। इन चैप्टर्स को या तो यूं ही पढ़ा दिया जाता है या घर पर पढ़ने की सलाह देकर छोड़ दिया जाता है। वहां हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं उन लोगों से इन समस्याओं के बारे में बात करने या जानने की, जहां आज भी पीरियड्स और पैड्स पर बात करना शर्मिंदगी का विषय माना जाता है।

पीरियड्स से जुड़ी कई समस्याएं हैं जिनके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है जिनमें प्रीमेंस्ट्रुअल अस्थमा (PMA), प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम और पीरियड्स माइग्रेन जैसी समस्याएं शामिल हैं जिस पर हम आगे बात करेंगे। अक्सर स्त्रियां अपने स्वास्थ्य को लेकर कम ही चिंतित होती हैं, ज्यादातर महिलाएं जो हमसे पहले की पीढ़ी से हैं, पैड के इस्तेमाल को गैरज़रूरी और फिजूल खर्ची मानती हैं।

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पीरियड्स माइग्रेन के बारे में जानने से पहले यह जानना जरूरी है कि माइग्रेन क्या है? माइग्रेन कम या ज्यादा वक्त तक रहनेवाला सिर दर्द है जिसके साथ अक्सर रोशनी और आवाज़ के प्रति संवेदनशीलता और मतली हो सकती है। माइग्रेन किसी को भी हो सकता है। बहुत से ऐसे कारण हो सकते हैं जो इस बीमारी के पीछे हो सकते हैं, जिनमें पारिवारिक इतिहास और उम्र हो सकती है। लगभग 40 फ़ीसद महिलाओं और 20 फ़ीसद पुरुषों को अपने जीवन में कभी न कभी माइग्रेन का सामना करना पड़ता है। पीरियड्स से संबंधित माइग्रेन 50 फ़ीसद से अधिक महिलाओं में होता है।

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क्या होता है पीरियड्स माइग्रेन

वहीं, बात करें पीरियड्स माइग्रेन की तो यह एस्ट्रोजेन और अन्य हार्मोन जैसे प्रोजेस्टेरोन के स्तर के गिरने या कम होने के कारण होता है। यह माइग्रेन बाकी माइग्रेन से ज़्यादा तेज़ हो सकता है जिसकी जानकारी हमें नहीं होती। इसे केटामेनियल माइग्रेन भी कहा जाता है। बदलते हार्मोनल वातावरण जैसे पीरियड्स की शुरुआत, गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन, गर्भधारण, हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) आदि के कारण माइग्रेन हो सकता है।

ये हार्मोनल परिवर्तन कुछ खाद्य और पेय पदार्थ, तनाव, अधिक रक्तस्राव, ठीक से भोजन न करने और गलत व्यायाम के कारण हो सकता है। पीरियड्स शुरू होने से पहले के लक्षणों में सूजन, पीठ दर्द, मितली आना, थकान, चिड़चिड़ापन और भूख में बदलाव अक्सर पीरियड्स माइग्रेन में योगदान देते हैं जिसे प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (PMS) यानी पीरियड्स से पहले के लक्षण कहा जाता है।

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वहीं, नेशनल हेडेक फाउंडेशन के अनुसार माइग्रेन से पीड़ित लगभग 60 प्रतिशत महिलाओं को पीरियड्स माइग्रेन से जूझना पड़ता है। यह पीरियड्स शुरू होने के 2 दिन पहले से लेकर पीरियड्स के खत्म होने के 3 दिन बाद तक हो सकता है। पीरियड्स माइग्रेन में इलाज के लिए अक्सर डॉक्टर की सलाह लेनी जरूरी है।

वेबसाइट मायो क्लिनिक के मुताबिक डॉक्टर कई बार इन दवाओं को लेने की सलाह दे सकते हैं। ओवर द काउंटर (OTC) दर्द निवारक दवा जिसमें नॉनस्टेरॉइडल एंटी इंफ्लेमेटरी ड्रग्स (NSAIDs) जैसे नेप्रोक्सन सोडियम (एलेव) या इबुप्रोफेन(एडविल,मोट्रिन आईबी)। ट्रिप्टन दवाएं मस्तिष्क में दर्द के संकेतों को अवरूद्ध करके दो घंटे में दर्द से राहत देती हैं और उल्टी को नियंत्रित करती है। गेपेंट- यह माइग्रेन में इस्तेमाल की जाने वाली नई दवा है जो केल्सिटोनिन जीन सम्बंधित पेप्टाइड (CGRP) माइग्रेन के उपचार में काफी मददगार है। इन दवाओं को लेने से पीरियड्स माइग्रेन ठीक किया जा सकता है।

एक सर्वेक्षण के माध्यम से गैर औषधीय उपचार यानी REN (रिमोट इलेक्ट्रिकल न्यूरोमोड्यूलेशन) का प्रयोग किया गया। जहां एक ऑनलाइन सर्वे के दौरान यह परिणाम निकला कि REN पीरियड्स के माइग्रेन के रोगियों के लिए एक विकल्प के तौर पर कार्य करता है। यूरोपियन और अमेरिकन हेडेक एसोसिएशन के पिछले शोध से यह साबित होता है कि REN प्रासंगिक और पुराने माइग्रेन वाले वयस्कों के इलाज के लिए सुरक्षित और चिकित्सकीय रूप से फायदेमंद है।

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महिलाओं को पीरियड्स माइग्रेन के प्रति जागरूक करने के लिए सयुंक्त राज्य अमेरिका में एक सर्वे किया गया जिसमें 91 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इसमें थेरानिका बायो इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड के एक उपकरण नेरेवियो का इस्तेमाल किया गया। मरीज 18 से 55 की आयु के बीच थे। यह सर्वे अक्टूबर 2019 से अक्टूबर 2020 तक किया गया। परिणाम में अधिकांश 92 फ़ीसद महिलाएं थीं जो 35 वर्ष की उम्र तक की थी। उन्हें प्रति महीने 13 बार सिरदर्द की शिकायत हुई। इनमें से 88 (97.7 फ़ीसद) महिलाएं पीरियड्स माइग्रेन से पीड़ित थीं। इस अध्ययन के प्रमुख लेखक एमडी हिदा निरेनबर्ग ने कहा, “यह उन महिलाओं के लिए एक बेहतर विकल्प हो सकता है जो अन्य दवाएं ले रही हैं, और ड्रग इंटरेक्शन उनके लिए एक जोखिम हो सकता है।”

भारत में इसके बारे में शायद ही लोग जानते हो, चिकित्सकीय क्षेत्र से जुड़े लोगों को छोड़कर इन मुद्दों पर जागरूकता का बेहद अभाव है। काफ़ी देशों में इसे लेकर लोगों को जागरूक करने के साथ ही उनके उपचार पर भी काम किया गया है। लोगों, ख़ासकर महिलाओं को इसके प्रति जागरूक करना बहुत जरूरी है क्योंकि इसे वे मामूली बीमारियों की तरह ही लेती हैं जिसे कुछ दवाओं के द्वारा ठीक किया जा सकता है। वे अपनी दिनचर्या खासकर खान-पान पर ध्यान नहीं देती, अपने आपको वक्त देना उन्हें आया ही नहीं है।

इस तरह के सर्वे और जागरूकता कार्यक्रम भारत में भी होने की आवश्यकता है ताकि महिलाओं को जागरूक किया जा सके। महिलाएं अक्सर न तो अपने पोषण पर ही ध्यान देती हैं और न ही स्वास्थ्य पर ही। यही कारण है कि एनीमिया का सबसे ज्यादा शिकार महिलाएं होती हैं। पीरियड्स के दौरान होने वाले दर्द को अक्सर काम न करने का बहाना बनाकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है और उन्हें उस दर्द की हालत में भी काम करने पर मजबूर होना पड़ता है। पीरियड्स माइग्रेन जहां मेरे लिए भी नया शब्द है तो सोचना चाहिए कि वे तमाम ग्रामीण महिलाएं जो आज भी सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल नहीं कर पातीं या उसे खरीदने की उनकी क्षमता नहीं है वे इसे कैसे जानती होंगी।

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तस्वीर : रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

स्रोत :
Medical News Today
The Migraine Trust
Mayo Clinic
Healthline

मैं दिल्ली से हूँ,  दिल्ली विश्वविद्यालय से  हिंदी साहित्य में एमए किया है। साहित्य और आलोचनाएं पढ़ने के साथ-साथ, कविताएं और लेख लिखना, फिल्में देखना, गाने सुनना और किसी मुद्दे पर अपनी बात रखना बेहद पसंद है। कहने को बहुत कुछ पर लिखने के लिए शब्द नहीं।

 

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