इंटरसेक्शनलजेंडर उत्तर प्रदेश की ये ग्रामीण महिलाएं कर रही हैं स्व-रोज़गार की मांग

उत्तर प्रदेश की ये ग्रामीण महिलाएं कर रही हैं स्व-रोज़गार की मांग

अधिकतर जिस परिवार के पुरुष मज़दूरी करते हैं उस परिवार की महिलाएं छोटे स्तर पर स्व-रोज़गार करके घर की आमदनी में मदद करती हैं। कई बार ये मदद घर की अर्थव्यवस्था का मज़बूत आधार होती है। इसलिए ज़रूरी है कि ग्रामीण स्तर पर महिलाओं को सिर्फ़ बचत के लिए ही नहीं बल्कि उनके कौशल-विकास के ज़रिए उनको स्व-रोज़गार से जोड़ने की दिशा में काम किया जाए

बनारस से दूर आराजी लाइन के मुस्लिमपुर गांव की रजीना बानो क़ालीन बुनाई का काम करती हैं। कोरोना महामारी की वजह से उनका काम बुरी तरह प्रभावित हुआ। छोटे-छोटे पावदान और क़ालीन बनाकर वह अपने परिवार का पेट पालती थीं पर कोरोना काल में इन सभी चीजों की मांग में भारी गिरावट आई है। रजीना बताती हैं, “पावदान और क़ालीन बनाने के इस्तेमाल में आनेवाले धागे और बाक़ी सामान महंगे हैं। हम लोगों को अब इन चीजों का सही दाम नहीं मिल पाता है, जिसकी वजह से कई बार हम घाटे में भी रहे।” इसलिए पिछले छह महीने से उन्होंने अपना काम अब कम कर दिया है और गांव के छोटे-मोटे कपड़े सिलने के ऑर्डर से अपने परिवार का पेट पाल रही हैं।

मुस्लिमपुर गांव की रजीना बानो

वहीं, करमसीपुर की राजभर में रहने वाली तीस वर्षीय शर्मीला बताती हैं कि उनके परिवार का पेट मिट्टी के कुल्हड़ और दिए बनाकर पलता है। मौजूदा सरकार ने विकास के नाम पर कुम्हारों को इलेक्ट्रॉनिक चाक दी, जिससे कम समय में ज़्यादा उत्पादन किया जा सके पर बिजली के बिल में कोई रियायत नहीं मिली। मशीन मिलने के बाद उत्पादन तो हो गया पर बाज़ार में इसकी मांग सीधे से प्रभावित हुई, क्योंकि कुम्हारों ने मशीन मिलने के बाद उत्पादन बढ़ा दिया। अब शर्मीला और उनके पति मज़दूरी करके परिवार का पेट पालने को मजबूर है। रजीना बानो और शर्मीला जैसे ऐसे कई लोग गांव में देखने को मिले जिनका स्व-रोज़गार छिन गया।

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रोज़गार के केंद्र में हमेशा पुरुष

चुनावी मौसम में आज कल हर पार्टी रोज़गार के मुद्दे पर बड़े-बड़े वादे कर रही है। लेकिन इसमें स्व-रोज़गार की बात बहुत कम और इसको लेकर प्रभावी योजना न के बराबर दिखाई दे रही है। मौजूदा बीजेपी सरकार ने विकास के नाम पर ‘स्टार्टअप इंडिया’ का नारा दिया और बक़ायदा इसके नाम पर योजना चलाई। हालांकि, अपने आस-पास के इलाके की बात करूं तो ऐसे कोई भी स्टार्टअप प्लान की शुरुआत ग्रामीण स्तर पर नहीं हो सकी।

कोरोना के संक्रमण से बचने के लिए वैक्सीन तो आ गई पर कोरोना के कारण जितने लोगों के रोज़गार गए उसका कोई उपाय नहीं हो पाया। जब बेरोज़गारी की इस पूरी समस्या को हम लोग जेंडर के लेंस से देखते हैं तो महिलाओं इस कड़ी में सबसे पीछे नज़र आती हैं। जब भी रोज़गार की बात होती है तो इसे युवाओं के लिए ज़रूरी मुद्दे के रूप में देखा जाता है। जब हम युवा की छवि देखते है तो इसमें पुरुषों की भागीदारी ही ज़्यादा दिखाई पड़ती है।

अधिकतर जिस परिवार के पुरुष मज़दूरी करते हैं उस परिवार की महिलाएं छोटे स्तर पर स्व-रोज़गार करके घर की आमदनी में मदद करती हैं। कई बार ये मदद घर की अर्थव्यवस्था का मज़बूत आधार होती है। इसलिए ज़रूरी है कि ग्रामीण स्तर पर महिलाओं को सिर्फ़ बचत के लिए ही नहीं बल्कि उनके कौशल-विकास के ज़रिए उनको स्व-रोज़गार से जोड़ने की दिशा में काम किया जाए

सरल शब्द में कहें तो आज भी हमारे समाज के लिए रोज़गार का मतलब पुरुषों के रोज़गार से है। इसलिए सरकार जब भी किसी रोज़गार की बात करती हैं तो उसमें पुरुषों को केंद्र में रखती हैं। लेकिन गाँव में अपने घरों स्व-रोज़गार करने वाली महिलाओं को कभी भी मदद करने या उनके रोज़गार को बढ़ाने की दिशा तक कोई भी योजना नहीं पहुंच पाती है। कोरोना काल में महिलाओं के रोज़गार बुरी तरह प्रभावित हुए जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में प्रभाव पड़ा है। इसकी वजह से गांव में अपने घरों पर स्व-रोज़गार करके अपना खर्च निकालने वाली महिलाएं अब आर्थिक तंगी झेल रही हैं।

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इस मुद्दे पर महिलाओं से बातचीत के दौरान करमसीपुर गांव की पुष्पा देवी ने बताया, “सरकार ही तरह से महिला समूह की योजना चलाई गई। इसमें बताया गया कि महिलाएं बचत करके आर्थिक रूप से मज़बूत होना सीखेंगी। मेरी बस्ती की कई महिलाएं इस समूह से जुड़ी और हर हफ़्ते दस रुपए जमा करना शुरू किया। धीरे-धीरे कोरोना की वजह से घर की आर्थिक स्थिति इतनी ज़्यादा ख़राब हुई कि हम लोगों को न चाहते हुए भी बीच में ही पैसा जमा करना रोकना पड़ा। अब हम लोगों का जमा पैसा भी फंस गया। पैसा निकालने के लिए अलग-अलग प्रक्रिया और तारीख दी जाती है। सरकार ने महिलाओं को बचत करने के लिए तो योजना बना दी लेकिन इस समूह से जुड़ने वाली महिलाओं को कौशल-शिक्षा देकर उन्हें किसी रोज़गार से जोड़ने का प्रयास नहीं किया, अगर आज हम लोग कोई छोटा-मोटा काम भी कर रहे होते तो इस समूह में पैसा जमा करने के लिए सक्षम होते।” बस्ती की बाक़ी महिलाओं का भी विचार पुष्पा से मिलता है और उनका मानना है की बचत समूह से जुड़ने वाली महिलाओं को आमदनी करने के लिए आगे बढ़ाया जाए।

हम जब भी गांव की बात करते हैं तो अक्सर गांव में रहनेवाले लोगों को किसान ही समझ लेते हैं, जिनके पास अपनी ज़मीन होती है और खेती करके जो अपना पेट पालते हैं। पर वास्तविकता ये है कि गांव में एक बड़ा तबका ऐसा भी होता है जिसकी आजीविका मज़दूरी या फिर छोटे-मोटे व्यापार पर केंद्रित होती है। अधिकतर जिस परिवार के पुरुष मज़दूरी करते हैं उस परिवार की महिलाएं छोटे स्तर पर स्व-रोज़गार करके घर की आमदनी में मदद करती हैं। कई बार ये मदद घर की अर्थव्यवस्था का मज़बूत आधार होती है। इसलिए ज़रूरी है कि ग्रामीण स्तर पर महिलाओं को सिर्फ़ बचत के लिए ही नहीं बल्कि उनके कौशल-विकास के ज़रिए उनको स्व-रोज़गार से जोड़ने की दिशा में काम किया जाए, जिससे महिलाएं आर्थिक रूप से स्वावलंबी बने। यहां स्व-रोज़गार इसलिए भी ज़रूरी है जो आपने वाले समय में और भी रोज़गार के अवसर दें न कि वो रोज़गार के अवसर जो हमेशा दूसरों पर आश्रित रहे। 

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सभी तस्वीरें रेणु द्वारा उपलब्ध करवाई गई हैं

About the author(s)

रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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