सिलाई के हुनर के बावजूद भी क्यों बेरोज़गार हैं ग्रामीण महिलाएं?
सिलाई के हुनर के बावजूद भी क्यों बेरोज़गार हैं ग्रामीण महिलाएं?
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ग्रामीण क्षेत्रों में जब भी महिलाओं के अपने रोज़गार की बात होती है तो उसमें सबसे पहला नाम सिलाई का आता है। सिलाई का क्षेत्र बहुत बड़ा है, घर की चादर से लेकर खिड़कियों के पर्दे तक, इंसानों के कपड़ों से लेकर सजावटी सामान तक हर जगह सिलाई काम आती है। समय के साथ अब तकनीक में काफ़ी बदलाव आया है, लेकिन सिलाई के क्षेत्र में इससे रोज़गार को बढ़ावा ही मिला है। यही वजह है कि बड़ी-बड़ी कम्पनियों से लेकर सरकार तक महिला रोज़गार की योजनाओं में सिलाई-कढ़ाई को ज़रूर शामिल करती हैं।

आज सरकार की तरह से अलग-अलग योजनाओं के माध्यम से महिलाओं को समय-समय पर सिलाई मशीन दी जाती है पर इसके बाद भी ग्रामीण क्षेत्रों में महिला बेरोज़गारी की स्थिति आज भी क़ायम है। अगर बात करें आज से दस साल पहले की तो हमारी बस्ती में एक या दो महिलाओं को ही सिलाई आती थी। इसलिए बस्ती की महिलाओं के कपड़े सिलने का ज़िम्मा उनका हुआ करता था। यह उनकी आमदनी के लिए एक अच्छा माध्यम भी था। लेकिन अब क़रीब हर दूसरे में एक महिला सिलाई करने वाली है और उसके पास कम से कम एक सिलाई मशीन तो ज़रूर होती है, लेकिन इसके बावजूद वे बेरोज़गार हैं। मैंने बनारस के आराजीलाइन और सेवापुरी ब्लॉक के कुछ गांव में जब सिलाई करनेवाली महिलाओं से बात की तो उनके अनुभवों से कई ऐसी वजहें सामने आई जो सिलाई की जानकार महिलाओं के बीच व्याप्त बेरोज़गारी के प्रमुख कारण हैं।

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महिलाओं को बचपन से ही बाज़ार से दूर रहकर पढ़ाई करने और हिसाब-किताब के बिना काम करना सिखाया जाता है। यही वजह है कि महिलाएं ख़ुद भी इस कंडीशनिंग के चलते सिलाई में उन चीजों के बारे में सोच ही नहीं पाती जो बाज़ार केंद्रित हैं, जिससे वे मुनाफ़ा कमा सकती हैं।

संख्या पर अधिक ध्यान हुनर पर नहीं

खड़ौरा गांव की चंदन पिछले आठ साल से सिलाई का काम करती हैं। उन्होंने बारहवीं की पढ़ाई के साथ-साथ सिलाई सीखनी शुरू कर दी थी। चंचला ने यह सोचकर सिलाई सीखी थी कि इस हुनर से उन्हें आमदनी होगी। लेकिन वह आज छोटे-मोटे खर्च के लिए भी मुश्किल से सिलाई करके पैसे कमा पाती हैं। इसके बारे में जब मैंने चंचला से बात कि तो उसने बताया कि अब हर घर में कोई न कोई सिलाई करने वाला मिल ही जाता है। इसलिए महिलाएं सूट-सलवार और ब्लाउज़ जैसे कपड़े अपने घर में ही सिलने को सक्षम हो गई हैं। इससे आमदनी पर प्रभाव पड़ा है। गांव में बड़ी संख्या में महिलाएं मौजूद हैं जिन्हें सिलाई आती है, जिसकी वजह से अब ये रोज़गार नहीं ज़रूरत बन गई है। चंदन ने सिलाई सीखने में काफ़ी पैसे खर्च किए थे पर वह अपने इस हुनर से नाममात्र की ही कमाई कर पाती हैं। बाज़ार का साधारण नियम है कि जब किसी भी चीज़ का उत्पादन ज़्यादा होता है तो उसकी कीमत गिर जाता है। अगर बात करें सिलाई के क्षेत्र की तो यहां भी यह बात एकदम सटीक नज़र आती है।

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सिलाई सीखतीं ग्रामीण किशोरियां व महिलाएं

काशीपुर गांव की तीस वर्षीय माधुरी कई सालों से सिलाई का काम करती हैं। वह स्कूल ड्रेस सिलने के ऑर्डर भी लेती हैं, जिससे उन्हें सिलाई के ज़रिए ठीक-ठाक कमाई हो जाती है। गाँव की अन्य सिलाई करनेवाली महिलाओं की अपेक्षा माधुरी की स्थिति काफ़ी बेहतर है। माधुरी से जब मैंने सिलाई को लेकर बात की तो उन्होंने बताया कि गांव में सरकार ने और कई संस्थाओं ने ज़्यादा-ज़्यादा संख्या में महिलाओं को सिलाई सीखाने का काम शुरू किया, जो कि एक अच्छी पहल थी। हालांकि, उन्होंने केवल सिलाई के क्षेत्र में अधिक से अधिक महिलाओं की संख्या पर ध्यान दिया, न कि उनके हुनर को बेहतर करने पर। यह ऐसा था जैसे बच्चों को भरकर स्कूल शुरू हो गया और क्या पढ़ाना है पता नहीं। इसलिए खुद से ही महिलाओं ने सूट-ब्लाउज़ जैसे अपने घरेलू कपड़े सिलने सीखे, लेकिन वह चीज़ें नहीं सीखीं जिसे वे बाज़ार में बेच सकती हैं। यही वजह है कि आज भी गांव में पुरुषों के कपड़े सिलने के ज़्यादा पैसे मिलते हैं और बक़ायदा पुरुष टेलर दुकान खोलकर अपने सिलाई के हुनर का रोज़गार कर रहे हैं।

ग्रामीण स्तर पर रोज़गार के उद्देश्य से सिलाई सीखाना अपने आप में बड़ी चुनौती है। लगातार सिलाई सीखी महिलाओं की संख्या में इज़ाफ़ा तो हुआ पर आज भी पैसे कमाने वाले सारे उत्पाद और तरीकों पर सिर्फ़ पुरुषों का क़ब्ज़ा है। सालों पहले जो सिलाई का क्षेत्र महिलाओं के रोज़गार और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का मज़बूत माध्यम था वह ग्रामीण इलाकों में अब मंदा सा दिखाई देने लगा। 

अगर महिलाओं को भी सिलाई में बाज़ार केंद्रित चीजें सिखाई जाएं तो वे हुनर को रोज़गार में बदल सकती हैं। यह सच्चाई है कि गांव में अब सिलाई केंद्र तो कई खुलने लगे हैं जहां लड़कियां सिलाई सीखने जाती हैं पर उस सिलाई स्कूल में कोई सिलेबस ही नहीं होता है। सालों-साल तक लड़कियां सिर्फ़ अपने कपड़ों की ही सिलाई सीख पाती है, जैसा कि बाक़ी सैकड़ों महिलाएं भी उस समय पर सीख रही होती हैं। इसलिए महिलाओं को सिलाई का ऑर्डर मिल ही नहीं पाता, जो चीज़ वे सिलती हैं वे सभी कपड़ें दूसरी महिलाएं ख़ुद ही सिल लेती हैं।

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बाज़ार से दूर महिलाओं की शिक्षा

लड़की है तो गृहविज्ञान ही पढ़ेगी, फिर गृहविज्ञान के लिए स्कूल जाने की क्या ज़रूरत। इसके बाद लड़कियां प्राइवेट से इंटर की पढ़ाई पूरी कर लेती हैं। गांव में लड़कियों की शिक्षा का महत्व कहीं न कहीं सिर्फ़ डिग्री तक ही सीमित है। जब शिक्षा को लेकर यह धारणा है तो उनके हुनर-विकास की क्या ही बात। महिलाओं को बचपन से ही बाज़ार से दूर रहकर पढ़ाई करने और हिसाब-किताब के बिना काम करना सिखाया जाता है। यही वजह है कि महिलाएं ख़ुद भी इस कंडीशनिंग के चलते सिलाई में उन चीजों के बारे में सोच ही नहीं पाती जो बाज़ार केंद्रित हैं, जिससे वे मुनाफ़ा कमा सकती हैं।

एक संस्था में सिलाई सीखा रही चंचला बताती हैं कि गांव में महिलाओं को बाज़ार के प्रोफेशनल टेलर की तरह सिलाई नहीं सिखाई जाती। साथ जब उन्हें बाज़ार केंद्रित झोले, कम्प्यूटर कवर, शर्ट-पैंट और होम डेकोर से जुड़ी चीजें सीखाने का प्रयास किया जाता है तो कई महिलाएं केंद्र में आना ही बंद कर देती हैं। एडमिशन लेते समय ही कई महिलाएं यह कहकर आती हैं कि उन्हें सिर्फ अपने कपड़े सिलना सीखना है। ऐसा करके वे अपने इस हुनर का इस्तेमाल कभी भी रोज़गार के रूप में नहीं कर पाती हैं।

ग्रामीण स्तर पर रोज़गार के उद्देश्य से सिलाई सीखाना अपने आप में बड़ी चुनौती है। लगातार सिलाई सीखी महिलाओं की संख्या में इज़ाफ़ा तो हुआ पर आज भी पैसे कमाने वाले सारे उत्पाद और तरीकों पर सिर्फ़ पुरुषों का क़ब्ज़ा है। सालों पहले जो सिलाई का क्षेत्र महिलाओं के रोज़गार और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का मज़बूत माध्यम था वह ग्रामीण इलाकों में अब मंदा सा दिखाई देने लगा। 

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सभी तस्वीरें मुहीम के फेसबुक पेज से ली गई हैं।

लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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