जानें, भारत में क्या हैं लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े कानून
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बदलते समय और आधुनिकीकरण के साथ, भारत में सामाजिक गतिशीलता में कुछ सकारात्मक बदलाव आए हैं। पिछले एक दशक में भारत में प्रगतिशील निर्णयों की एक श्रृंखला इस बात का प्रमाण है। उदाहरण के लिए 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने NALSA बनाम भारत संघ में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की पुष्टि की। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में के एस पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ के वाद में गोपनीयता को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी। साल 2018 में नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ में भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को अपराध से मुक्त कर दिया।

साल 2018 में ही, सर्वोच्च न्यायालय की एक संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी। यह अनुमति इस आधार पर दी कि सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध ने संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार महिलाओं की धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन किया। एस.खुशबू बनाम कन्नियाम्मल के ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि लिव-इन रिलेशनशिप भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार के दायरे में आता है। लिव-इन रिलेशनशिप वैध है और एक साथ रहनेवाले दो वयस्कों को गैरकानूनी या अवैध नहीं माना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों ने भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक धारणाओं का विरोध किया है। हालांकि, कुछ सामाजिक सत्य अभी भी स्वीकृति की प्रतीक्षा कर रहे हैं और पितृसत्तात्मक नैतिकता के लेंस के माध्यम से देखे जाते हैं; जिसका एक उदाहरण लिव-इन रिलेशनशिप है।

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अक्सर जोड़े शादी के बंधन में बंधने से पहले आपसी समझ और तालमेल को जानने और समझने के लिए लिव-इन रिलेशनशिप का सहारा लेते हैं। विशेष रूप से भारत जैसे देशों में, जहां तलाक लेने वाले/वाली को बदनाम किया जाता है और उसे एक अपराधी के रूप में देखा और समझा जाता है। उसे तलाक़ लेने के कारण कलंकित किया जाता है। ऐसे में लिव-इन संबंध इन सब बातों से बचाता है क्योंकि यह राज्य के हस्तक्षेप के बिना अलगाव की अनुमति देता है।

लिव-इन रिलेशनशिप के मायने क्या हैं?

लिव-इन रिलेशनशिप शादी नहीं है बल्कि यह सुविधा का रिश्ता है जहां दो पक्ष अपनी मर्जी से एक-दूसरे के साथ रहने का फैसला करते हैं और एक-दूसरे को अपनी मर्जी से छोड़ सकते हैं। अविवाहित कपल्स के बीच लिव-इन रिलेशनशिप का कॉन्सेप्ट तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। हालांकि, यह कहा जा सकता है कि महानगरों में इसका प्रचलन अधिक है। आज के समय में युवा अलग-अलग कारणों से शादी से अधिक लिव-इन संबंध पसंद करते हैं।

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अक्सर जोड़े शादी के बंधन में बंधने से पहले आपसी समझ और तालमेल को जानने और समझने के लिए लिव-इन रिलेशनशिप का सहारा लेते हैं। यह उन्हें एक-दूसरे को समझने और शादी जैसी गंभीर प्रतिबद्धताओं में अच्छी तरह से सूचित निर्णय लेने का बेहतर अवसर देता है। विशेष रूप से भारत जैसे देशों में, जहां तलाक लेने वाले/वाली को बदनाम किया जाता है और उसे एक अपराधी के रूप में देखा और समझा जाता है। उसे तलाक़ लेने के कारण कलंकित किया जाता है। ऐसे में लिव-इन संबंध इन सब बातों से बचाता है क्योंकि यह राज्य के हस्तक्षेप के बिना अलगाव की अनुमति देता है।

हालांकि, भारतीय समाज में, शादी से पहले यौन संबंधों को बहुत ही हेय दृष्टि से देखा जाता है। इसलिए, शादी से पहले एक साथ रहने वाले जोड़ों को अक्सर सांस्कृतिक रूप से अनुचित, अनैतिक और सामाजिक मानदंडों के प्रति प्रतिकूल माना जाता है। जहां कुछ लोगों ने इस अवधारणा को खुले तौर पर अपनाया है, वहीं कुछ लोगों की रूढ़िवादी मानसिकता के कारण इसे सामाजिक घृणा का सामना करना पड़ रहा है।

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लिव-इन रिलेशनशिप और हमारी न्यायपालिका

लिव-इन में रहनेवाले जोड़ों के खिलाफ समय-समय पर सवाल उठते रहते हैं। उनके माता-पिता, रिश्तेदार, समाज के लोग उन को कड़ी निगाहों से देखते हैं। वे इस रिश्ते को पचा नहीं पाता है। ऐसे में इन जोड़ों पर हमले होना स्वाभाविक हो जाता है। भारतीय न्यायपालिका ने बार-बार हस्तक्षेप करके लिव-इन में रहनेवाले जोड़ों को ‘व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार’ के आधार पर मान्यता देते हुए राहत दी है। कानूनी तौर पर, लिव-इन रिलेशनशिप की जड़ें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित हैं। इस तरह, अपनी मर्जी के व्यक्ति के साथ शादी करने या लिव-इन संबंध रखने का अधिकार और पसंद की स्वतंत्रता, इस अपरिहार्य मौलिक अधिकार से निकलती है। 

सुप्रीम कोर्ट ने पायल शर्मा बनाम नारी निकेतन के वाद में यह माना है कि अगर कोई पुरुष और महिला चाहें तो बिना शादी किए एक साथ रह सकते हैं। इसे समाज द्वारा अनैतिक माना जा सकता है लेकिन यह अवैध नहीं है। इंद्रा शर्मा के मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने माना कि घरेलू हिंसा अधिनियम में ‘रिलेशनशिप इन नेचर ऑफ द मैरिज’ शब्द अपने आप में लिव-इन रिलेशनशिप को परिभाषित करता है। इसके अलावा, कोर्ट ने कुछ मानदंड निर्धारित किए। कोर्ट ने कहा कि कोई भी सम्बन्ध लिव-इन संबंध है या नहीं इस सवाल के उत्तर के लिए पहले इन मानदंडों को देखना होगा। घरेलु हिंसा अधिनियम के अंतर्गत जब प्रश्न ‘रिलेशनशिप इन नेचर ऑफ द मैरिज’ अभिव्यक्ति के अंतर्गत आता है तो निम्न बातों का देखना आवश्यक है- अर्थात् रिश्ते की अवधि, साझा घर, संसाधनों और वित्तीय व्यवस्थाओं की पूलिंग, घरेलू व्यवस्था, यौन संबंध, बच्चे, साहचर्य, सार्वजनिक रूप से समाजीकरण और पार्टियों का इरादा और आचरण।

डी वेलुसामी बनाम डी.पचाईअम्मल के वाद में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि केवल वित्तीय खर्चा सहन करना और यौन इच्छाओं को पूरा करना ‘विवाह की प्रकृति के संबंध’ में नहीं आता है। इसलिए, केवल सप्ताहांत एक साथ बिताना या ‘एक रात का स्टैंड’ घरेलू संबंध नहीं बनता है। ‘रिलेशनशिप इन नेचर ऑफ द मैरिज’ को जानने के लिए कोर्ट ने इस वाद में एक टेस्ट बनाया। उस टेस्ट को पूरा करने पर ही कोई भी संबंध घरेलू सम्बन्ध माना जाएगा।

लिव-इन में रहनेवाले जोड़ों के खिलाफ समय-समय पर सवाल उठते रहते हैं। उनके माता-पिता, रिश्तेदार, समाज के लोग उन को कड़ी निगाहों से देखते हैं। वे इस रिश्ते को पचा नहीं पाता है। ऐसे में इन जोड़ों पर हमले होना स्वाभाविक हो जाता है। भारतीय न्यायपालिका ने बार-बार हस्तक्षेप करके लिव-इन में रहनेवाले जोड़ों को ‘व्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार’ के आधार पर मान्यता देते हुए राहत दी है।

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लिव-इन संबंधों को कानूनी वैधता प्रदान करने के अलावा, भारतीय न्यायपालिका ने खुद को अपने नागरिकों के संरक्षक के रूप में साबित करते हुए, लिव-इन संबंधों से उत्पन्न होने वाले संबंधों को अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान की है। अदालतों ने, कई मामलों में, संपत्ति के उत्तराधिकार के लिए महिला साथी के अधिकार को बरकरार रखा है। न्यायालयों ने ऐसे लिव-इन संबंधों से पैदा हुए बच्चों के अधिकारों की भी रक्षा की है। भारत में न्यायिक स्थिति यह है कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को कानूनी रूप से विवाहित पत्नियों के समान रखरखाव का अधिकार प्राप्त है।

भरणपोषण (रखरखाव) का अधिकार

वर्ष 2003 में मलीमठ समिति के सुझावों के बाद, शब्द ‘पत्नी’ के अर्थ को समायोजित करने और लिव-इन रिलेशनशिप में रहनेवाली महिलाओं को शामिल करने और इसे विस्तारित करने के लिए सीआरपीसी (आपराधिक प्रक्रिया संहिता) में धारा 125 को शामिल किया गया था। यह धारा गारंटी देता है कि अगर पत्नी (या वह स्त्री जो लिव-इन में रह रही है) खुद का भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है या रिश्ता अलग हो गया है, तो उसकी वित्तीय जरूरतों को उसके साथी द्वारा पूरा किया गया था। इसी तरह, विवाहित महिलाओं की तरह ही लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलायें ‘घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005‘ के तहत सभी प्रकार के दुर्व्यवहार से सुरक्षित हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने चनमुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह कुशवाहा और अन्य के वाद में यह निर्णय दिया कि जहां एक पुरुष और एक महिला ने लंबे समय तक सहवास किया है, वैध विवाह की कानूनी आवश्यकताओं के अभाव में, ऐसी महिला रखरखाव की हकदार होगी। एक व्यक्ति को इस तरह के विवाह के कर्तव्यों और दायित्वों को पूरा किए बिना, वास्तविक विवाह के लाभों का आनंद लेते हुए, कानूनी खामियों से लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। ‘पत्नी’ शब्द की एक व्यापक और विस्तृत व्याख्या दी जानी चाहिए, यहां तक ​​कि उन मामलों को भी शामिल किया जाना चाहिए जहां एक पुरुष और महिला काफी लंबे समय से पति और पत्नी के रूप में एक साथ रह रहे हैं। भरण-पोषण के अनुदान के लिए विवाह का सख्त प्रमाण पूर्व शर्त नहीं होना चाहिए’।

सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने संविधान, घरेलू हिंसा अधिनियम, सीआरपीसी, साक्ष्य अधिनियम जैसे कानूनों के दायरे में लिव-इन संबंधों की वैधता को माना है। इस प्रकार, वर्तमान कानूनी स्थिति के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाएं रखरखाव और संपत्ति की हकदार हैं।

धन्नू लाल के वाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक संपत्ति विवाद में अपने लिव-इन पार्टनर की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी का मृतक की संपत्ति में अधिकार की पुष्टि की। बालसुब्रमण्यम बनाम सुरत्तयन के वाद में लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चों को पहली बार वैधता का कानूनी दर्जा मिला। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर कोई पुरुष और महिला एक ही छत के नीचे काफी साल तक साथ रहते हैं तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114 के तहत उनकी शादी का अनुमान लगाया जाएगा। इसलिए, उनसे पैदा हुए बच्चों को वैध माना जाएगा और उनका पैतृक संपत्ति में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त होगा।

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एक अन्य वाद में कोर्ट ने कहा कि अगर रिश्ता लंबे समय तक चलता है, तो लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चों को नाजायज नहीं माना जा सकता है और वे हिंदू संयुक्त परिवार की पैतृक संपत्ति में दावा करने के हकदार नहीं हैं, लेकिन केवल अपने माता-पिता की स्वयं अर्जित संपत्ति से दावा कर सकते हैं। एक अन्य वाद में केरल उच्च न्यायालय ने लिव-इन रिलेशनशिप में पैदा हुए बच्चे को गोद लेने के लिए एक विवाहित जोड़े से पैदा हुए बच्चे के रूप में मान्यता दी।

सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने संविधान, घरेलू हिंसा अधिनियम, सीआरपीसी, साक्ष्य अधिनियम जैसे कानूनों के दायरे में लिव-इन संबंधों की वैधता को माना है। इस प्रकार, वर्तमान कानूनी स्थिति के अनुसार, लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाएं रखरखाव और संपत्ति की हकदार हैं। वहीं दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आने के बाद भी लिव-इन रिलेशनशिप की वैधता पर उच्च न्यायालयों के फैसलों में मतभेद पाया जाता है। बॉम्बे, इलाहाबाद, राजस्थान जैसे कुछ उच्च न्यायालयों ने ऐसे लिव-इन जोड़ों को सुरक्षा प्रदान करने से बार-बार इनकार किया है क्योंकि उनके अनुसार ऐसे लिव-इन संबंध अवैध है। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक कदम आगे बढ़कर इन रिश्तों को अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि ये सम्बन्ध देश के ‘सामाजिक ताने-बाने’ को नष्ट कर देते हैं। हालांकि, दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक विरोधाभासी रुख अपनाते हुए, एक महिला लिव-इन पार्टनर के अधिकारों को बरकरार रखते हुए, दोनों व्यक्तियों की वैवाहिक स्थिति की परवाह किए बिना, एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाया। 

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दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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