पत्नी, पति से ज्यादा क्यों नहीं कमा सकती
तस्वीर साभारः Hope Productions
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साल 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘गाइड’ में एक सीन में वहीदा रहमान कहती हैं, “आदमी को औरत की कमाई पर नहीं रहना चाहिए।” हम में से बहुत से लोगों ने यह बात अपने आसपास के माहौल में सुनी होगी कि पति कम कमा रहा था फिर उसने मेहनत करके प्रमोशन लिया तब जाकर उसकी सैलरी पत्नी से ज्यादा हुई। इसी बात से जुड़ी एक और घटना मुझे याद आती है। मेरी एक दोस्त के माता-पिता को उसके लिए लड़का ढूढ़ने में बहुत ज्यादा समस्या इसलिए हुई क्योंकि लड़की की नौकरी और सैलरी काफी अच्छी थी।

क्या यह सच में यह एक समस्या है एक महिला पुरुष से ज्यादा नहीं कमा सकती है? ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक समाज में पहले तो महिला का बाहर जाकर काम करना अपने-आप में एक चुनौती है लेकिन अगर वह काम करती है तो उसका अपने पति से ज्यादा कमाना परिवार की संस्था के लिए खतरा माना है। इस रूढ़िवादी व्यवस्था में एक औरत एक मर्द ज्यादा ताकतवर किसी भी रूप में नहीं हो सकती है। समाज में फिल्मों, विज्ञापनों से लेकर किताबों तक में यही दिखाया जाता है कि महिलाओं का कार्यक्षेत्र घर है और बाहर जाकर पैसे कमाने का काम पुरुषों का है। इस कंडीशनिंग में बड़ी हुई महिलाएं भी इसे ही सच मानकर अपने जीवन की कल्पना करती हैं।

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दुनियाभर में हुए तमाम शोध भी इस बात की तस्दीक कर चुके हैं कि अगर पत्नी अपने पति से ज्यादा कमाती है तो पुरुषों को यह बात कतई बर्दाशत नहीं होती। पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों को हमेशा पैसा कमाने वाले और महिलाओं को गृहणी के रूप में देखा जाता है। अगर इस समीकरण से उलट महिलाएं अगर अधिक कमा रही होती हैं तो वहां रिश्तों में उथल-पुथल का दोषी महिला की कामयाबी को ही माना जाता है। इसलिए जेंडर की अवधारणा में महिला को पैसे कमाने की भूमिका में नहीं देखा जाता है। इन्हीं पूर्वाग्रहों पर चलकर वर्तमान में भी यह बात सुनने को मिलती है कि अगर महिलाएं ज्यादा कमाती हैं तो वह पुरुष और घर-परिवार दोनों के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। 

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भारतीय समाज में लैंगिक असमानता बहुत ज्यादा व्याप्त है और कार्यक्षेत्र में तो यह और भी अधिक है। इतिहास में पीछे जाकर ही यह बात सामने आती कि जेंडर के आधार पर काम को कैसे बांटा गया। महिलाओं को अलग-अलग श्रेणी में वर्गीकृत करके उनको नियंत्रित किया गया। समाज और संस्कृति के नाम पर महिलाओं की क्रियाशीलता को नियंत्रित किया गया।

दुनियाभर में काम को जेंडर के आधार पर बांटा गया। औद्योगिक क्रांति से पहले खेती प्रमुख काम था और खेती में मालिक के तौर पर पुरुष ही काम करते थे। महिलाओं के हिस्से में पारंपरिक काम थे। इससे पहले महिलाओं के काम को वेतन से भी जोड़ा नहीं गया था। 18वीं सदी में औद्योगिक क्रांति के बाद से महिलाओं ने घर से बाहर जाकर काम करना शुरू किया। इसमें भी महिलाओं ने घरेलू कामगार के अलावा, टेक्सटाइल, कपड़े बनाने, खेती-मजदूर तक सीमित थी। महिलाओं के घर से बाहर जाकर काम करने को इससे भी जोड़ा जाता है कि इससे परिवार की देखभाल सही से नहीं हो पाती है। जिन घरों की महिलाएं घर से बाहर जाकर काम करती हैं, ख़ासतौपर पर उनकी परवरिश पर प्रश्नचिह्न लगा दिए जाते हैं। 

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महिलाएं अगर अधिक कमा रही होती हैं तो वहां रिश्तों में उथल-पुथल का दोषी महिला की कामयाबी को ही माना जाता है। इसलिए जेंडर की अवधारणा में महिला को पैसे कमाने की भूमिका में नहीं देखा जाता है। इन्हीं पूर्वाग्रहों पर चलकर वर्तमान में भी यह बात सुनने को मिलती है कि अगर महिलाएं ज्यादा कमाती हैं तो वह पुरुष और घर-परिवार दोनों के लिए अच्छा नहीं माना जाता है।

बात अगर भारतीय समाज की करें तो यहां जाति और वर्ग के आधार पर महिलाओं के श्रम को बांटा गया। मनुवादी व्यवस्था ने कहा कि अच्छे घर की महिलाएं बाहर जाकर काम नहीं करती हैं। दूसरी ओर जातिगत व्यवस्था के तहत शोषित जाति और वर्ग की महिलाओं के श्रम का दोहन आज भी जारी है। ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के आधार पर महिलाओं के श्रम को सुविधा के अनुसार इस्तेमाल किया गया। इस श्रम के बदले उन्हें उचित मूल्य और सम्मान कभी नहीं दिया गया।

महिलाओं की कमाई को कम प्राथमिकता

धीरे-धीरे जब महिलाएं पढ़ाई करने लगीं और बाहर निकलकर हर क्षेत्र में काम करने लगीं। प्रथम विश्वयुद्ध में पुरुषों की गैरमौजूदगी में महिलाओं ने उनका कार्यभार संभाला। इसके बाद महिलाएं धीरे-धीरे हर क्षेत्र में आगे बढ़कर काम करने लगीं। दुनिया में हर क्षेत्र में महिलाएं अपने कौशल पर कार्यक्षेत्र में अपनी श्रेष्ठता साबित कर रही है। भारत में भी महिलाएं पुरुष के समान हर क्षेत्र में काम कर रही हैं। लेकिन महिलाओं के काम करने को लेकर कुछ रूढ़िवादी धारणाओं का लगातार पालन किया जा रहा है।

आज ऐसे बहुत से घर हैं जहां पर महिला और पुरुष दोनों काम कर रहे हैं। लेकिन घर में पति-पत्नी के कमाने पर भी महिला की कमाई को प्राथमिकता नहीं मिलती है। परिवार के लिए रोटी कमाने वाला मुख्य पुरुष को ही माना जाता है। महिलाओं के काम करने को उनका ‘शौक’ तक करार दे दिया जाता है। जब तक बच्चे नहीं होते, उनको काम करने तक की छूट है, जैसी बातें कही जाती हैं। कुल मिलाकर महिलाओं के काम की तो मनाही है लेकिन अगर वह काम करती भी है तो उसकी कमाई को भी महत्व नहीं दिया जाता है।

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पत्नी की ज्यादा कमाई यानी पुरुषों में तनाव

परिवार के मान-सम्मान और संस्कृति के नाम पर महिलाओं को काम करने और उनको आर्थिक रूप से सशक्त होने के लिए हमेशा रोका गया है। हर रिश्ते में इसका असर नकारात्मक ही दिखाया जाता है। महिलाओं की कमाई को लेकर पति-पत्नी के बीच तनाव, अच्छा कमानेवाली लड़कियों के लिए शादी के रिश्ते ढूढ़ने में परेशानी केवल रूढ़िवादी सोच के कारण ही है। महिलाओं के ज्यादा कमाने के लेकर परेशानी केवल असमानता को ही जन्म देती है। दुनिया में हुए कई अध्ययनों में भी यह बात निकलकर आई है कि अगर महिलाएं ज्यादा कमाती हैं तो यह पुरुषों को अच्छा नहीं लगता है।

महिलाओं के काम करने को उनका शौक़ तक करार दे दिया जाता है। जब तक बच्चे नहीं होते, उनको काम करने तक की छूट है, जैसी बातें कही जाती हैं। कुल मिलाकर महिलाओं के काम की तो मनाही है लेकिन अगर वह काम करती भी है तो उसकी कमाई को भी महत्व नहीं दिया जाता है।

सीएनबीसी में छपी एक ख़बर के अनुसार बाथ यूनिवर्सिटी के द्वारा की गई एक रिसर्च कहती है कि पत्नियां अगर अपने पति से ज्यादा कमाती हैं तो पति के स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर पड़ता है। पुरुषों में इस बात से बहुत तनाव देखा जाता है। उन्होंने पाया कि पुरुषों को सबसे ज्यादा चिंता तब होती है जब वे परिवार में अकेले कमाते हैं और जब महिलाएं 40 प्रतिशत तक योगदान देती हैं तो वे कम तनाव में होते हैं। लेकिन जैसी ही पत्नियां घर के पुरुष से ज्यादा कमाती है उनमें तेजी से असहजता और तनाव बढ़ता है। पत्नी के ज्यादा कमाने से पति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों पर खराब असर पड़ता है। 

महिलाओं को बाहर जाकर खुद के पैसे नहीं कमाने चाहिए, ऐसी सोच महिला-विरोधी है। महिलाओं का आर्थिक रूप से घर के पुरुषों पर निर्भर रहना उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को कमज़ोर करना है। रिश्तों और समाज में महिलाओं का ज्यादा कमाना पितृसत्ता के नियमों के विपरीत है क्योंकि इससे महिलाओं में निर्णय लेने की क्षमता जन्म लेती है। रूढ़िवादी पारिवारिक व्यवस्था में महिला हमेशा आदेश सुनने के लिए होती है और फैसले लेने की क्षमता उसमें नहीं मानी जाती है। यही कारण है कि महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने से रोका जाता है। महिलाओं पर शासन करने के लिए उसको पीढ़ी दर पीढ़ी आर्थिक रूप से कमज़ोर रखा जाता आ रहा है। यह बिल्कुल साफ़ है किसी का भी आर्थिक पक्ष का मजबूत होता है उसे ताकत मिलती है। पितृसत्ता ने हमेशा से रीतियों के नाम पर महिलाओं के आर्थिक पक्ष को कमज़ोर बनाए रखा है।

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तस्वीर साभारः Hope Productions

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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