पचपन खंभे लाल दीवारेंः रीतियों और जिम्मेदारियों में फंसी एक स्त्री का दर्द
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पचपन खम्भे लाल दीवारें उषा प्रियंवदा द्वारा लिखा गया एक महिला केंद्रित उपन्यास है। यह उपन्यास एक लड़की के अपने परिवार के लिए किए गए बलिदानों को बेहद मार्मिक रूप में चित्रित करता है। यही नहीं, यह उपन्यास भारतीय महिलाओं के जीवन के अलग-अलग मुद्दों पर प्रकाश डालता है। इस कहानी की मुख्य किरदार है सुषमा। जो एक स्वावलम्बी और आत्मविश्वासी महिला है। इसके आलावा वह अपने घर की आय का एकमात्र साधन है। पूरे परिवार की ज़िम्मेदारियां उसके ऊपर हैं। सुषमा दिल्ली यूनिवर्सिटी के एक गर्ल्स कॉलेज में लेक्चरर है और बाद में अपनी काबिलियत के दम पर वार्डन भी बना दी जाती है। आर्थिक और शारीरिक रूप से आज़ादी होने के बाद भी वह कई तरह के बंधनों में है। ये अदृश्य बंधन उससे कुछ इस तरह से लिपटे हुए हैं कि वह अपनी खुशी और अपनी ज़िंदगी के फैसले भी अपने अनुसार नहीं ले पाती।

सुषमा का पूरा परिवार आर्थिक रूप से पूरी तरह उस पर आश्रित है और वह हर संभव तरह से उससे लाभ ही लेना चाहता है। हर कोई उससे बस अपने ही फायदे की बात करता है यहां तक की उसकी मां भी। वह सुषमा के माथे पर सारा क़र्ज़ मढ़कर छोटी बेटी नीरू की शादी करवाती हैं लेकिन कभी भी उसकी शादी की बात नहीं करती है। सुषमा के अंदर सूनेपन की एक टीस है। वह भी अपना संसार बसाना चाहती है। पति और बच्चे चाहती है लेकिन उसके पैसे के लालच में घरवाले उसकी शादी नहीं करना चाहते हैं। उसके अपने परिवार से कोई भी उसका दुख और अकेलापन समझना नहीं चाहता।

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इसे पढ़ते हुए यह महसूस होता है कि नए ज़माने की एक स्वावलंबी स्त्री किस तरह समाज से त्रस्त रहती है। पूरी तरह से आत्मनिर्भर होने के बाद भी समाज में वह अपने फैसले खुद नहीं ले सकती। औरतों से सिर्फ बलिदान की उम्मीद रखी जाती रही है। समय बदला, औरतों के रहने का तरीका बदला मगर समाज की सोच नहीं बदली।

बाद में सुषमा के जीवन में नील नाम का एक युवक आता है और वो उससे प्यार करने लगती है। शुरुआत में सुषमा नील को पसंद करने के बावजूद भी उसे खुद से दूर रखती है। घर की ज़िम्मेदारियां के नाम पर वह अपनी ख़ुशी नजरअंदाज कर देती है। लेकिन नील की कोशिशों के आगे उसकी भावनाएं ज्यादा दिन छिप नहीं पाती और वह घुटने टेक देती है। नील और सुषमा की नज़दीकियां बढ़ती हैं और वे दोनों एक दूसरे को बहुत पसंद करने लगते हैं। उस समय जब सुषमा अपने लिए, अपनी खुशी की खातिर फैसला लेने के लिए खुद को तैयार करती है तो एक बार फिर उसके आत्मकेंद्रित परिवारवाले अपने आराम के लिए उसकी खुशियां क़ुर्बान कर देते हैं।

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सुषमा सबके बारे मगर सोचती है और अपने बारे में नहीं। ऐसा नहीं है कि वह अपने बारे में सोचना नहीं चाहती लेकिन जिस तरह से औरतों के मानसिक ढांचे गढ़े गए हैं उसके अनुसार सुषमा का आचरण स्वाभाविक है। कहानी के इस पक्ष से किताब को पढ़ने वाला लगभग स्त्री वर्ग खुद को उससे जुड़ा हुआ पाता है।

वह उसे घर, परिवार, समाज और ज़िम्मेदारियां जैसी बातें बताकर भावात्मक रूप से कमज़ोर कर देते हैं। इसके बाद एक बार फिर वह अपने घरवालों की खुशियों के आगे अपने प्यार का गला घोंट देती है। सुषमा के घरवालों के आलावा उसके साथी लेक्चरर और यहां तक की उनकी छात्राएं भी उनके और नील के संबंध के आधार पर उनके चरित्र पर प्रश्न उठाती हैं। सुषमा चारों ओर से लोगों से घिरी हुई तो है लेकिन वह बिलकुल अकेली है। नील, उसकी दोस्त मिनाक्षी और उसकी नौकरानी भ्रामरी के आलावा कोई ऐसा कोई नहीं है जो उसे समझता हो या समझने की कोशिश भी करता हो। न ही कोई सुषमा की ख़ुशी के बारे में सोचता है और न ही उसे खुद अपने बारे में सोचने की अनुमति देता है।

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संस्कार और सामाजिक बातें इस तरह से औरतों के मन में घर करती है कि वह खुद को ही पीछे छोड़ देती है। इस कहानी में यह पक्ष बहुत स्पष्ट रूप से नज़र आता है। जब सुषमा सबके बारे मगर सोचती है और अपने बारे में नहीं। ऐसा नहीं है कि वह अपने बारे में सोचना नहीं चाहती लेकिन जिस तरह से औरतों के मानसिक ढांचे गढ़े गए हैं उसके अनुसार सुषमा का आचरण स्वाभाविक है। कहानी के इस पक्ष से किताब को पढ़ने वाला लगभग स्त्री वर्ग खुद को उससे जुड़ा हुआ पाता है। यही नहीं इसके आलावा हमारे निजी जीवन में आसपास वाले लोगों के दखल और उसका हमारे मन मस्तिष्क पर प्रभाव वाले पक्ष से भी पाठक वर्ग एक गहरा जुड़ाव महसूस करता है।

तमाम बातों और कठिनाईयों के बावजूद भी सुषमा का आत्मविश्वाश कम नहीं होता। हिम्मत और सहजता के साथ वह सारी स्थितियां संभालती है। यह उसके किरदार की स्थिरता को सम्पूर्ण रूप से दिखाता है। यह किताब नए ज़माने को ध्यान में रखते हुए लिखी गई है। इसे पढ़ते हुए यह महसूस होता है कि नए ज़माने की एक स्वावलंबी स्त्री किस तरह समाज से त्रस्त रहती है। पूरी तरह से आत्मनिर्भर होने के बाद भी समाज में वह अपने फैसले खुद नहीं ले सकती। औरतों से सिर्फ बलिदान की उम्मीद रखी जाती रही है। समय बदला, औरतों के रहने का तरीका बदला मगर समाज की सोच नहीं बदली।

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यही नहीं औरतें कभी खुलकर अपनी शारीरिक जरूरतों के बारे में भी बात नहीं कर पाती है। कहानी की नायिका सुषमा इसका सटीक उदाहरण है। वह परिवार से दूर दिल्ली में अकेली रहती है जिसका अपना कोई जीवन नहीं है। वह अपने अकेलेपन से ऊबती है। एक साथी की कल्पना करती है, किसी का साथ चाहती है लेकिन ये बात खुलकर नहीं कह पाती है। जब उसके सगे-संबंधी उसके विवाह का जिक्र छेड़ते हैं तो वह चाहती है कि बातों पर गौर किया जाए। उसके विवाह के बारे में सोचा जाए लेकिन फिर भी वह अपने शारीरिक और मानसिक अकेलेपन का ज़िक्र किसी के आगे नहीं कर पाती।

नायिका का अकेलापन और लाचारी उपन्यास को पढ़ते हुए अंदर तक महसूस की जा सकती है। कई बार तो पाठक वर्ग भी ये समझ नहीं पाता की नायिका को कौन सी राह चुननी चाहिए। उसे नील के साथ चले जाने का प्रस्ताव मान लेना चाहिए या घर की एकलौती आय स्रोत होने के नाते अपनी ज़िम्मेदारियों का वहन करना चाहिए। सुषमा का आखिरी फैसला क्या होगा इसकी ज़द्दोज़हद  उपन्यास के आखरी पन्ने तक चलती रहती है जिससे पढ़ने वालों का आकर्षण जरा भी कम नहीं होता। शुरू से अंत तक यह किताब पाठकों को बांधकर चलती है और इसका अंत पाठकों के आंखों में नमी और मन में एक टीस छोड़ देता है।

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तस्वीर साभारः Hindustan times

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