देवकी जैनः भारत की एक नारीवादी अर्थशास्त्री
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देवकी जैन के परिचय के लिए उनकी हासिल की गई उपलब्धियों की एक लंबी फेहरिस्त है। वह एक भारतीय अर्थशास्त्री और लेखिका हैं। उन्होंने मुख्य रूप से नारीवादी अर्थशास्त्र के क्षेत्र में काम किया है। देवकी जैन अर्थव्यवस्था में महिलाओं के छिपे हुए योगदान पर बातचीत शुरू करने वाली पहली भारतीय अर्थशास्त्रियों में से एक हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के साथ सलाहकार के रूप में काम किया है। उन्होंने युवा अमर्त्य सेन को मार्क्सवाद पर चुनौती दी। वह ब्रिटिश दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल के नेतृत्व में परमाणु निरस्त्रीकरण अभियान के विरोध-प्रदर्शन में भाग लेने के लिए मोटरसाइकिल से ऑक्सफोर्ड से लंदन तक गईं। उन्होंने सिविल राइट्स एक्टिविस्ट रोजा पार्क्स के साथ डिनर किया। भारत में उन्होंने समाज सुधारक विनोभा भावे के साथ देशभर में घूमकर, ज़मीदारों को स्वेच्छा से भूमिहीनों को जमीन देने के लिए राजी किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित अर्थशास्त्री और लेखिका देवकी जैन भारत में गरीबों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली एक प्रमुख कार्यकर्ता रही हैं। सामाजिक न्याय और महिलाओं के सशक्तिकरण में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने 2006 में तीसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण से भी सम्मानित किया था।  

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

देवकी जैन का जन्म 1933 में मैसूर, कर्नाटक में हुआ था। इनके पिता का नाम एम. ए. श्रीनिवासन था। उनके पिता मैसूर रिसायत में दीवान के पद पर तैनात थे। यह पद उस समय मुख्यमंत्री के समान था। जैन की प्रारंभिक शिक्षा कई कॉन्वेंट स्कूलों में हुई थी। साल 1953 में उन्होंने मैसूर विश्वविद्यालय में तीन स्वर्ण पदक के साथ अपनी स्नातक की डिग्री पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए वह विदेश चली गई। यहां उन्होंने सेंट ऐनी कॉलेज, ऑक्सफर्ड से दर्शनशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र में डिग्री हासिल की। वापस लौटकर साल 1969 में दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र पढ़ाया।

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देवकी के पिता उस समय में उदार और आधुनिक सोच रखने वाले थे। लेकिन वह अपने समुदाय की कुछ रूढ़िवादिता से भी बंधे हुए थे। यही कारण है कि 18 साल की उम्र में वह देवकी की शादी करना चाहते थे लेकिन उन्होंने अपने माता-पिता के द्वारा चुने लड़के से शादी करने से इनकार कर दिया था। साल 1966 में देवकी ने गांधीवादी समाज सेवक लक्ष्मी जैन के साथ अंतर्जातीय विवाह किया था।

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एक युवा महिला के तौर पर देवकी की रूचि गांधीवादी विचारधारा की तरफ हुई और वह उपनिवेशवाद विरोधी कार्यों के लिए प्रतिबंद्ध हुईं। लंदन में रहने के दौरान पूरे यूरोप में हिचहाईकिंग (लिफ्ट लेकर) से घूमी। वह एक बोर्डिंग हाउस में रहती थी। पढ़ाई के दौरान पैसे कमाने के लिए डिशवॉशर के रूप में पार्ट टाइम काम भी किया करती थी। ऑक्सफोर्ड में रस्किन कॉलेज में मजदूर और गैर-उपनिवेशवाद विचारों से जुड़कर मजदूर और ट्रेड यूनियन के साथ-साथ साम्राज्यवाद और वैश्विक राजनीति में उनकी जागरूकता बढ़ी।

तस्वीर साभार: Writing on glass

नारीवादी विचारों की तरफ बढ़ी रूचि

देवकी जैन ने अपने हर काम में महिलाओं के अधिकारों का पक्ष रखा। अर्थशास्त्र में महिलाओं की भूमिका को बहुत विस्तार से लिखा। एक इंटरव्यू में वह खुद बताती हैं कि नारीवाद और महिला अधिकारों से पहले पूरी तरह अनजान थी। भारत में महिलाओं की स्थिति के बारे में एक किताब लिखने और संपादित करने के लिए एक प्रकाशन ने उनसे संपर्क किया, तब उन्हें देश में पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानता की खाई का एहसास हुआ। इस घटना के बाद वह महिला अधिकारों की दिशा में शामिल हो गई। अमेरिकी यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात प्रमुख नारीवादी ग्लोरिया स्टीनम से हुईं। महिला अधिकारों और नारीवाद के बारे में जानकारी हासिल करने का श्रेय वह ग्लोरिया स्टीनम को ही देती है। इसके बाद जब देविका ने खुद को नारीवादी कहा तो कई भारतीय लोगों ने इसे गैर-भारतीय बात बताकर, अमेरिकी सोच बताई।

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1973 और 1975 के बीच उन्होंने भारत सरकार के पब्लिशिंग डिवीजन के तहत भारतीय महिला पुस्तक का संपादन और प्रकाशन का काम किया। साथ ही उन्होंने दिल्ली में ‘इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज’ ट्रस्ट की स्थापना की। उन्होंने साल 1994 में निदेशक के रूप में कार्य किया। इस संस्था ने भारतीय महिलाओं और विशेषकर महिलाओं में गरीबी की स्थिति पर शोध करना शुरू किया। उन्होंने ‘इंडियन एसोसिएशन ऑफ विमेन स्टडीज’ (आईएडब्लयूएस), ‘डेवलपमेंट अल्टरनेटिव्स फॉर वुमेन फॉर ए न्यू एरा’ (डीएडब्ल्यूएन), और ‘काली’ नारीवादी पब्लिशिंग हाउस शुरू किए। इसी के साथ उन्होंने अहमदाबाद की ‘सेवा’ संस्था के संदेश को देशभर में विस्तार करने के लिए काम किया। यह 1972 में इला भट्ट के द्वारा स्थापित महिला ट्रेड यूनियन संगठन है।     

देवकी जैन के परिचय के लिए उनकी हासिल की गई उपलब्धियों की एक लंबी फेहरिस्त है। वह एक भारतीय अर्थशास्त्री और लेखिका हैं। उन्होंने मुख्य रूप से नारीवादी अर्थशास्त्र के क्षेत्र में काम किया है। देवकी जैन अर्थव्यवस्था में महिलाओं के छिपे हुए योगदान पर बातचीत शुरू करने वाली पहली भारतीय अर्थशास्त्रियों में से एक हैं।

एक इंटरव्यू में बात करते हुए देवकी जैन का कहना है कि कैसे उन्होंने देश में महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ाने के लिए अर्थशास्त्र का इस्तेमाल किया। उनका कहना है, ‘‘मैंने ध्यान दिया कि आंकड़ों में वर्कर्स को मैन, सब्सिडिअरि, सप्लिमेंट्री आदि में परिभाषित किया गया है। महिलाओं को सप्लिमेंट्री की कैटेगिरी में डाला गया है। लेकिन मैं राष्ट्रीय स्तर पर यह तर्क देने में सक्षम थी कि गरीब महिलाएं मुख्य तौर पर कमानेवाली है। तब मुझे एहसास हुआ कि मुझे देखना है कि महिलाएं आर्थिक एंजेट के रूप में क्या है। मैं केवल महिलाओं के जीवन के आर्थिक पहलू पर काम करना चाहती थी। अब पिछले चालीस सालों से यही मेरा काम है। हर बार आप कुछ नया ला सकते हैं।’’

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गांधीवादी दर्शन के साथ काम

गांधीवादी दर्शन ने जैन के काम और जीवन को बहुत प्रभावित किया है। गांधीवादी दर्शन के अनुरूप उन्होने अपने अकादमिक शोध में समानता, लोकतांत्रिक, जन-केंद्रित विकास, महिलाओं के विकास और महिलाओं के अधिकारों के मुद्दो पर ध्यान केंद्रित किया है। उन्होंने इस बात पर भी बहुत ही शोध किया कि कैसे देश भर में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, भेदभाव, उत्पीड़न और शोषण किया जाता है। उन्होंने अपने जीवन में स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महिला आंदोलनों में हिस्सा लिया। उन्होंने कई पदों पर भारतीय सरकार के साथ काम किया। ग्रामीण महिलाओं को ध्यान में रखकर अनेक योजनाएं बनाई। उनके काम ने देशभर में महिलाओं की मदद की है। सरकार के साथ काम करके उन्होंने देश में लाखों महिलाओं की स्थिति में सुधार करने का काम किया है। 

अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियां     

देवकी जैन को अपने काम के माध्यम से दुनिया के 94 देशों की यात्रा करने का मौका मिला। देवकी जैन ने कई राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ मिलकर काम किया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर महिला और उनकी गरीबी पर विशेष तौर पर काम किया। हालांकि उन्होंने वुमेन, डेवलपमेंट एंड द यूएनः ए सिक्टी ईयर क्वेस्ट फॉर ईक्वालिटी एंड जस्टिस में इस बात पर प्रकाश डाला कि महिला अधिकारों की लड़ाई कैसे हुई।

वह संयुक्त राष्ट्र के एशिया पैसेफिक सेंटर की जेंडर कमेटी की सलाहकार समिति के अध्यक्ष पद पर भी रहीं। इस दौरान उन्होंने कई देशों का दौरा किया। इसमें अधिकांश प्रशांत और कैरेबियन द्वीप शामिल थे। अफ्रीका की यात्रा के दौरान तंजानिया के प्रथम राष्ट्रपति जूलियस न्येरेरे के साथ, उन्हें अफ्रीकी नेताओं के दृष्टिकोण को जानने और उन पर चर्चा करने का मौका मिला। उन्होंने न्येरेरे के द्वारा स्थापित साउथ कमीशन के सदस्य के तौर पर भी काम किया। वह संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) द्वारा स्थापित सलाहकार पैनल की सदस्य थीं।

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अकादमिक जीवन की उपलब्धियां

देवकी जैन ने अपने काम से दुनियाभर में अपनी पहचान बनाई है। महिलाओं की गरीबी पर अनेक शोध किए हैं। उन्होंने ‘फेमिनाइजेशन ऑफ पॉवर्टी’ के विचार से रूबरू करवाया। देवकी जैन को शोध के लिए कई फेलोशिप से भी सम्मानित किया गया। देवकी जैन को साल 1983 में जेंडर एंड पावर्टी के विषय पर 9 यूनिवर्सिटी में लेक्चर देने के लिए स्कैंडिनेवियाई इंस्टीट्यूट फॉर एशियन स्टडीज कोपेनहेगन में फेलोशिप से सम्मानित किया गया। साल 1999 में उन्हें डरबन-वेस्टविल यूनिवर्सिटी की ओर से मानद डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया। साल 1995 में यूएनडीपी की बीजिंग वर्ल्ड कॉफ्रेंस में ‘ब्रेडफोर्ड मोर्स मेमोरियल’ अवार्ड मिला। 1984 में वह हावर्ड यूनिवर्सिटी और बॉस्टन यूनिवर्सिटी की फुल ब्राइट सीनियर फेलो भी रह चुकी हैं। वह कर्नाटक सरकार स्टेट प्लानिंग बोर्ड की फेलो भी रह चुकी हैं। यूजीसी की वुमन स्टडीज की स्टैंडिग कमेटी की सदस्य भी रह चुकी हैं।

देवकी जैन ने महिलाओं की आर्थिक दशा को ध्यान में रखकर कई किताबें लिखी हैं। इनमें प्रमुख यह हैं- द जर्नी ऑफ ए साउथर्न फेमिनिस्ट, क्लाज एनकाउंटर ऑफ अनदर काइंड वुमन एंड डेवलवमेंट इकॉनामिक्स, वुमन डेवलपमेंट एंड द यूएन, ब्रास नोटबुक, हार्वेस्टिंग फेमिनिस्ट नॉलेज फॉर पब्लिक पॉलिसी, वुमन्स क्वेस्ट फॉर पावर आदि। 

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तस्वीर साभारः Hindustan times

स्रोत: eshe.in

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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