विकास के मॉडल की ऊँचाई के बीच इन महिलाओं के लिए ये हैंडपंप लगना ही बड़ी जीत है
तस्वीर साभार: रेणु गुप्ता
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इस तस्वीर में मुस्कुराती ये महिलाएं चित्रसेनपुर गाँव के मुसहर बस्ती की रहने वाली हैं, ये सभी बेहद खुश हैं। उन्हें ख़ुशी है कि अब उन्हें साफ़ पीने के पानी के लिए किसी की गाली या ताने नहीं सुनने होंगें और उनके बच्चे अब साफ़ पानी पी सकेंगें। हाल ही में, वाराणसी ज़िला प्रशासन की पहल से चित्रसेनपुर गाँव की इस मुसहर बस्ती में हैंडपंप लगवाया गया, लेकिन यह इतना आसान नहीं था। इसके लिए गाँव की महिलाओं को काफ़ी संघर्ष करना पड़ा, जिसका सफ़ल परिणाम है यह हैंडपंप। इन मुस्कुराती महिलाओं के चेहरे की चमक उस उम्मीद की चमक है, जिसने उन्हें उनके बुनियादी अधिकारों के प्रति जागरूक किया है।  

हैंडपंप लगने के बाद बस्ती की महिलाएं

भारत में पानी का संकट एक बड़ी समस्या है। हालांकि, भारत में पूरी दुनिया की आबादी का केवल 16 फ़ीसद हिस्सा ही है, लेकिन देश के पास दुनिया के ताजे पानी के संसाधनों का केवल चार फ़ीसद ही है। देश के कई इलाक़ों में हर साल मौसम की वजह से सूखे की समस्या होती, जिसमें पीने के पानी की दिक़्क़त और भी ज़्यादा बढ़ जाती है और इस संकट की सबसे ज़्यादा मार झेलती है महिलाएं। हाल ही में केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों (2017 से) के अनुसार, भारत के 700 में से 256 ज़िलों में गंभीर या अति शोषित भूजल स्तर है।

यह तो बात हुई राष्ट्रीय स्तर पर पानी के संकट की। लेकिन आज मैं जिस बस्ती में पानी के संकट की बात करने जा रही हूं, वह सरकारी आंकड़ों या रिसर्च के किसी भी सूखाग्रस्त प्रदेश से नहीं है। बावजूद इसके इस बस्ती के लोग पिछले कई सालों से साफ़ पीने के पानी की क़िल्लत से जूझ रहे हैं। इसकी वजह उनका क्षेत्र या कमजोर आर्थिक स्थिति नहीं बल्कि उनकी जाति है। यहां बात बनारस से पैंतीस किलोमीटर दूर बसे सेवापुरी ब्लॉक के चित्रसेनपुर गाँव की मुसहर बस्ती की हो रही है।

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हाल ही में, वाराणसी ज़िला प्रशासन की पहल से चित्रसेनपुर गाँव की इस मुसहर बस्ती में हैंडपंप लगवाया गया, लेकिन यह इतना आसान नहीं था। इसके लिए गाँव की महिलाओं को काफ़ी संघर्ष करना पड़ा, जिसका सफ़ल परिणाम है यह हैंडपंप।

बस्ती में रहने वाली 32 वर्षीय शीला अपने बेटे के इलाज को लेकर अक्सर परेशान रहती हैं। दिनभर लकड़ी चुनकर और छोटे-मोटे मज़दूरी के काम से शीला अपने घर का चूल्हा जलाने में पति की मदद करती हैं। लेकिन आए दिन परिवार में किसी न किसी की ख़राब तबीयत उन्हें अब तोड़ने लगी है। शीला बताती है कि बच्चों को अक्सर पेट से जुड़ी हुई या कभी चमड़ी से जुड़ी दिक़्क़त होती है और जब डॉक्टर के पास जाओ तो वह साफ़-सफ़ाई और साफ़ पानी के अभाव को इसका कारण बताते हैं।

वहीं, बीस वर्षीय रन्नो की छोटी बेटी भी अक्सर पेट और चमड़ी से जुड़ी समस्याओं से परेशान रहती है। आए दिन जब तकलीफ़ ज़्यादा बढ़ती है तो रन्नो को भीख मांगकर पास के डॉक्टर के यहां दवा लानी पड़ती है। रन्नो कहती हैं, “बस्ती में एक गंदा तालाब है, जिसके पास में ही गाँव के लोग मरे हुए जानवर फेंकते हैं। कुत्ते, मरे जानवर को लाकर कई बार पानी में छोड़ देते हैं और उसी तालाब के पानी से हमलोग कपड़े-बर्तन साफ़ करते हैं। पास के एक घर में हैंडपंप है जहां सौ रुपए महीना देने पर कभी-कभार पानी पीने को मिल जाता है, जिसके लिए हम लोगों को जातिसूचक गाली सुननी पड़ती है। बाक़ी बस्ती में पानी का कोई साधन नहीं है।”

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चित्रसेनपुर गाँव की मुसहर बस्ती में क़रीब पच्चीस परिवार रहते हैं, जिनकी संख्या साठ से अधिक है। बस्ती में साफ़ पीने के पानी का कोई साधन नहीं है और न कभी यहां पीने के पानी के साधन की व्यवस्था करवाने का ध्यान शासन-प्रशासन ने किया। इसकी वजह से पूरी बस्ती के पास सिर्फ़ एक गंदा तालाब पीने के पानी का साधन है। ग़ौरतलब है कि सेवापुरी ब्लॉक को नीति आयोग ने साल 2020 में ‘मॉडल ब्लॉक’ बनाने के लिए गोद लिया था, जिसमें ब्लॉक के 87 ग्राम पंचायत को शामिल किया गया है। इसके बावजूद इस गाँव की मुसहर बस्ती तक बीते दो साल में साफ़ पीने के पानी की व्यवस्था के लिए कोई साधन नहीं पहुंच सका। वह व्यवस्था जो भारतीय नागरिक का बुनियादी अधिकार है। लेकिन हर व्यवस्था और योजनाओं की तरह यह भी पास की सड़कों से इन्हें छूते हुए गुजर जाती है, जिसका मुख्य कारण है- जातिगत भेदभाव।

समाज के हाशिए पर बसने को मजबूर मुसहर जाति को आज भी गाँव के बाहरी हिस्से में बसाया जाता है। गाँव के बाहर उन्हें बसाने के साथ-साथ उनके सभी मौलिक अधिकार उनसे छीन लिए जाते हैं। लेकिन चित्रसेनपुर की महिलाओं ने अपने हक़ के लिए आवाज तब उठायी जब यूपी चुनाव के दौरान रिपोर्टिंग करने स्वतंत्र पत्रकार नीतू सिंह ने गाँव में बुरी तरह बीमार बच्ची की विडियो बनाकर सोशल मीडिया पर साझा कर मदद की अपील की। इसके बाद एक दिन के भीतर पूरा शासन-प्रशासन ऐक्टिव हुआ और सालों से वहां काम कर रही मुहीम संस्था ने प्रशासन से बुनियादी सुविधाओं की मांग को तेज़ी से उठाया, जिसके लिए महिलाओं ने हाईवे तक जाम किया।

बता दें कि यह सब तब हुआ जब बनारस शहर में सातवें चरण के चुनाव प्रचार में प्रधानमंत्री से लेकर हर राजनीतिक पार्टी के प्रमुख विकास के वादों के साथ चुनावी मैदान में अपने प्रचार-प्रसार की पारी खेल रहे थे। उस समय ये महिलाएं साफ़ पीने के पानी का साधन उपलब्ध करवाने की मांग को लेकर संघर्ष कर रही थी। आख़िरकार सभी की मेहनत रंग लायी और बस्ती में साफ़ पीने के पानी के लिए हैंडपंप लगा। ये पूरी लड़ाई आसान नहीं रही और सिर्फ़ हैंडपंप काफ़ी नहीं है। लेकिन मुख्यधारा से अपनी मांगों के लिए मुखर होती ये महिलाएं एक अच्छा संकेत है, क्योंकि ये न केवल अपनी आवाज़ उठा रही है, बल्कि सदियों से अनसुनी फ़रियादों के चलते चुप्पी ताने और अभाव को अपनी नियति मानने वाले मुसहर समुदाय के लिए उम्मीद की किरण है।

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सभी तस्वीरें रेणु द्वारा उपलब्ध करवाई गई हैं।

रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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