आंगनवाड़ी वर्कर्स का प्रदर्शन
तस्वीर: रितिका
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दिल्ली का सिविल लाइंस इलाका, जगह- विकास भवन। वहां मौजूद औरतें नारे लगा रही हैं- “लड़ेंगे, जीतेंगे।” केजरीवाल और मोदी सरकार के ख़िलाफ़ लिखे नारों वाली तख्तियां लिए बैठीं कुछ औरतें, उन तख्तियों के सहारे अपने बच्चों को धूप से बचाने की जुगत में नज़र आई। कुछ प्रदर्शनकारी औरतें उस भीड़ में भी अपनी जान-पहचान की औरतों के साथ बैठने के लिए परेशान दिखीं। वहीं, कुछ औरतें भागती-भागती चली आ रही थीं कि कहीं हाजरी न छूट जाए। कोई द्वारका, कोई नांगलोई, कोई विकासपुरी, दिल्ली के अलग-अलग कोनों से घंटों बस का सफर तय कर ये प्रदर्शन स्थल पर पहुंच रही थीं- अपने काम की पहचान और सही कीमत के लिए। बता दें कि जिस जगह पर ये नारें लग रहे हैं, उस से कुछ किलोमीटर की दूरी पर ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का आवास है। प्रदर्शन करनेवाली इन औरतों की पहचान है- आंगनवाड़ी कार्यकर्ता।

38 दिनों से जारी आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की हड़ताल रोक दी गई आवश्‍यक सेवा अनुरक्षण कानून (ESMA) के तहत। इस कानून के तहत अनिवार्य सेवाओं में शामिल लोग हड़ताल नहीं कर सकते। दिल्ली स्टेट आंगनवाड़ी वर्कर्स एंड हेलपर्स यूनियन ने इसके ख़िलाफ़ कोर्ट जाने का फैसला किया। सरकार के इस कदम के ख़िलाफ़ DSAWHU ने बीते 11 मार्च को अपने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि यह कदम पूरी तरह से जनता और श्रमिकों के अधिकारों के ख़िलाफ़ है। संगठन के मुताबिक हड़ताल में शामिल कई वर्कर्स को टर्मिनेशन नोटिस भी थमा दिया गया है।

सगंठन का यह भी आरोप है कि अब जो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता काम पर वापस जा रही हैं उनसे सादे कागज़ पर हस्ताक्षर करवाए जा रहे हैं। फेमिनिज़म इन इंडिया से बात करते हुए DSAWHU की सदस्य प्रियंवदा ने बताया कि अब तक 991 आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को बर्ख़ास्त किया जा चुका है। इसे लेकर संगठन ने कोर्ट में अर्ज़ी भी दाखिल की है। वहीं, दिल्ली सरकार ने इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट को कहा है कि अब सरकार किसी भी आंगनवाड़ी वर्कर को टर्मिनेट नहीं करेगी। 

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बीती 31 जनवरी से दिल्ली की 22 हज़ार आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए यह रोज़ की दिनचर्या बन चुकी थी। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने सरकार से कई मांगें की हैं लेकिन उनकी सभी मांगों का सार यही है कि उनके श्रम की उन्हें सही कीमत मिले, उनके काम को पहचान मिले। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के इस प्रदर्शन में आपको आसानी से कई ऐसी तख्तियां दिख जाएंगी जिन पर लिखा था कि सरकार किस तरह से इनसे ‘बेगारी’ करवा रही है। 

प्रदर्शन में नारे लगाती आंगनवाड़ी वर्कर्स और हेल्पर्स, तस्वीर: रितिका

क्यों अपने अधिकारों के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतरना पड़ा?

“काम करते-करते बुढ़ापा आ गया, पेंशन जैसी चीज़ का सहारा तो हमें भी चाहिए न। जब हम काम कर रहे हैं तो, सब कुछ समय पर कर रहे हैं तो सरकार को तो हमारे बारे में सोचना चाहिए न! यह कहना है 53 साल की कमलेश का जो पिछले 10 सालों से आंगनवाड़ी हेल्पर के रूप में काम कर रही हैं। उनके पैरों में चोट लगी है लेकिन वह पहले दिन से इस प्रदर्शन में आ रही हैं। वह इतने सालों से लगातार कम पैसों में इसलिए काम करती आई क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि सरकार आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए पेंशन की स्कीम लाएगी। कमलेश यहां तक कहती हैं कि सरकार चाहे तो उनकी तनख्वाह से कुछ पैसे काट ले लेकिन पेंशन की सुविधा दे।

बता दें कि इस हड़ताल से पहले आंगनवाड़ी हेल्पर्स का मानदेय 4,839 रुपये था जिसे केजरीवाल सरकार ने बढ़ाकर 5,610 रुपये कर दिया है। आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ता इस देश के स्वास्थ्य और जन कल्याण नीतियों की धुरी कही जाती हैं। लेकिन इन पेशेवर महिलाओं के श्रम को हमेशा कमतर आंका गया। चाहे वह आशा वर्कर्स हो या आंगनवाड़ी, इन सभी महिलाओं को कभी पेशेवर नहीं माना गया। इनके श्रम की तुलना हमेशा हमारे घरों किए जाने वाले अनपेड काम से की जाती रही है। इनके श्रम की कीमत हमारी सरकारों के लिए कभी प्राथमिकता नहीं बन पाईं। तभी एक आंगनवाड़ी हेल्पर जिन्हें महीने के महज़ 5 हज़ार कुछ रुपये दिए जा रहे हैं वह अपनी इस न्यूनतम ‘तनख़्वाह’ से भी कुछ पैसे कटवाने के लिए तैयार हैं ताकि उनका बुढ़ापा एक हद तक सुरक्षित हो सके।

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बीती 31 जनवरी से दिल्ली की 22 हज़ार आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए यह रोज़ की दिनचर्या बन चुकी थी। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने सरकार से कई मांगें की हैं लेकिन उनकी सभी मांगों का सार है यही है कि उनके श्रम की उन्हें सही कीमत मिले, उनके काम को पहचान मिले। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के इस प्रदर्शन में आपको आसानी से कई ऐसी तख्तियां दिख जाएंगी जिन पर लिखा था कि सरकार किस तरह से इनसे ‘बेगारी’ करवा रही है। 

बता दें कि इस हड़ताल के बाद दिल्ली राज्य सरकार ने आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का मानदेय बढ़ाकर 12,720 रुपये कर दिया है। साथ ही ट्रांसपोर्ट और संचार के लिए अब इन्हें 1500 रुपये देने का ऐलान किया है। इसी तरह आंगनवाड़ी हेल्पर्स का मानदेय 4,839 रुपये से बढ़ाकर 5,610 किया गया है। इसके अलावा ट्रांसपोर्ट और संचार के लिए अब हेल्पर्स को 1200 रुपये दिए जाएंगे। इस ऐलान के साथ ही केजरीवाल सरकार सोशल मीडिया पर आप सरकार के नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं ने इस बात का प्रचार करना शुरू कर दिया कि पूरे भारत में केजरीवाल सरकार आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को सबसे अधिक मानदेय दे रही है। समाज कल्याण मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने बीती 24 फरवरी को इसका ऐलान किया था।

लेकिन आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं :

  • आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की मांग है कि उन्हें 25,000 रुपये महीने के लिए जाए। साथ ही हेल्पर्स को 20,000 रुपये मिलें। 
  • उन्हें प्रॉविडेंट फंड और पेंशन जैसी सुविधाएं दी जाएं। 
  • उनके काम को सरकारी कर्मचारी की पहचान मिले। उन्हें श्रम कानूनों के अंतर्गत लाया जाए।
  • कोविड-19 के दौरान संक्रमित हुई कार्यकर्ताओं को पूरी सुरक्षा दी जाए। 
  • इंटिग्रेटेड चाइल्ड डेवलेपमेंट स्कीम में गैर-सरकारी संगठनों की दख़ल कम हो। इस स्कीम के तहत खाली पदों को भरा जाए। इस स्कीम का निजीकरण रोका जाए।
  • आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के फोन और इंटरनेट का खर्च सरकार वहन करे।
  • आंगनवाड़ी के बजट को बढ़ाया जाए। 
  • पुरानी पेंशन बहाल की जाए।
आंगनवाड़ी वर्कर्स की मांगें

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तस्वीर: रितिका

श्रम को मिले सही पहचान और कीमत

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की इस हड़ताल से जुड़े एक पर्चे पर लिखा है- “केंद्र और दिल्ली सरकार दोंनो ही हमें सस्ते श्रम का एक ज़रिया मानती है।” आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की मुख्य ज़िम्मेदारियों के तहत गर्भवती महिलाओं का वैक्सीनेशन, चेकअप, बच्चों का टीकाकरण, उनका पोषण, 3-6 साल की उम्र के बच्चों की प्रारंभिक शिक्षा जैसे बेहद ज़रूरी और बुनियादी काम आते हैं। भारत जैसा देश जो भुखमरी और कुपोषण के क्षेत्र में लगातार पिछड़ता जा रहा है, वहां आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की भूमिका और ज़रूरी हो जाती है। लेकिन चूंकि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताएं महिलाएं ही होती हैं तो इनके काम को ‘काम’ की तरह कम केयर गिविंग के रूप में ज्यादा देखा जाता है। 

पूंजीवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था हमेशा से ही महिलाओं के सस्ते या मुफ्त श्रम पर टिकी रही है। यह सस्ता या मुफ्त श्रम न सिर्फ घरों बल्कि कार्यक्षेत्र में भी इस्तेमाल किया जाता रहा है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की पहचान को ‘वॉलेंटियर’ तक सीमित करना इसी सोच का नतीजा है। ज़ाहिर सी बात है, जब तक इन महिलाओं के काम की पहचान को नकारा जाता रहेगा, इनके श्रम की सही कीमत से ये महरूम रहेंगी। महिलाओं के श्रम के पीछे न सिर्फ जेंडर, बल्कि जाति, वर्ग, धर्म उनकी हर पहचान एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ग्राउंड पर मौजूद जितनी वर्कर्स से फेमिनिज़म इन इंडिया ने बात की, उनमें से सबकी आर्थिक परेशानियां लगभग एक सी नज़र आईं। यहां यह भी सोचना ज़रूरी है कि ये वर्कर्स अपनी आवाज़ इसलिए मीडिया तक कुछ हद तक पहुंचा पाई क्योंकि इन्होंने देश की राजधानी में अपना स्पेस क्लेम किया 38 दिनों तक। इनकी परेशानियों के ज़रिये हम उन दूर-दराज के गांवों में काम करनेवाली वर्कर्स के श्रम का अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते।

वक़्त के साथ महिलाओं की श्रमबल में भागीदारी तो बढ़ी पर इन पूर्वाग्रहों पर आधारित मानसिकता और नीतियों के कारण उनके जीवन में बड़ा बदलाव नज़र नहीं आता। इन महिलाओं की भूमिका सरकार, उसकी नीतियां और हमारा पितृसत्तात्मक समाज केवल ‘केयर गिवर’ तक ही महिलाओं की भूमिका को सीमित रखना जानता है, निजी और पेशेवर दोंनो ही क्षेत्रों में।

तस्वीर: रितिका

52 साल की मेरी साल 2007 से आंगनवाड़ी के कार्यकर्ता के रूप में काम कर रही हैं। वह साल 2017 के प्रदर्शन को याद करते हुए करती हैं कि जो वादें साल 2017 में सरकार ने किए थे, उन्हें तक नहीं पूरा किया गया। तब 15 हज़ार रुपये की मांग की गई थी। इसलिए पांच साल बाद फिर से हम उन्हीं मांगों के साथ सड़क पर हैं। “जो कीमत हमें हमारे काम की मिलती है, वह तो एक मज़दूर की कमाई से भी कम है। सुबह साढ़े नौ बजे हम प्रदर्शन के लिए निकल जाते हैं, यहां से फिर 5-6 बजे घर की ओर वापस जाते हैं। पिछले एक महीने से हमारा खाना-पीना यहीं सड़क पर हो रहा है। पानी, वॉशरूम जैसी चुनौतियां भी हैं लेकिन अपने हक़-अधिकार के लिए आना ही पड़ता है।” इतना कहकर मेरी अपने दूसरे साथियों के साथ नारे लगाने लगीं- “आवाज़ दो, हम एक हैं।”

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बढ़ते काम का बोझ और पहचान शून्य

“सरकार ने हमें एक बोतल सैनिटाइज़र दिया और कह दिया लो जी, इसे पूरे दो साल चलाओ। 2007 से लगे हुए हैं, काम ऐसा बढ़ाया है कि कुछ कह नहीं सकते और सैलरी है ज़ीरो। रात-बिरात कह देते हैं पोषण ऐप को ट्रैक करो। आस-पास के लोगों को लगता है हमारी 30-40 हज़ार रुपये तनख़्वाह होगी। हमारी हालत ऐसी है कि अपने बच्चों को गोद में लेकर हम दूसरों के बच्चों को टीका लगवाने जाते हैं।” यह कहना है अनिता का जो इस प्रदर्शन में अपने बच्चे के साथ शामिल होने आई।

आगे वह बताती हैं, “क्या मतलब है इन सब का, हमारी बहुत सिंपल सी मांगें हैं सरकार से। कम से कम सरकार हमें यह तो बता दे कि आखिर हमारी पहचान क्या है? हमारी कोई वैल्यू नहीं है। कोविड के दौरान क्या आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की मौत नहीं हुई? क्या हमारी जान कीमती नहीं है? कम से कम हमें हर दिन का पांच सौ रुपये तो मिलें। हम पहचान मांग रहे हैं। कोई ऐसा काम नहीं है जिसे करने से हम पीछे हटते हैं। कहीं कोई पैदा हो तो आंगनवाड़ी वर्कर, कहीं किसी की मौत हो तो आंगनवाड़ी वर्कर। केजरीवाल सरकार द्वारा बढ़ाए गए मानदेय पर वह पूछती हैं कि इस बात का क्या सबूत है? कल को सरकार यह भी कह सकती है कि महिलाओं का किराया क्यों लगे, दिल्ली में तो बसें महिलाओं के लिए मुफ्त हैं। फोन ऐसे दिए गए कि छह महीने में बंद पड़ गए। हमें तो बस लॉलीपॉप पकड़ाए जा रहे हैं।”

इतने कामों के बावजूद केंद्र और राज्य दोंनो ही सरकारों की नज़र में आज भी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता महज़ ‘वॉलेंटियर्स’ हैं। शायद ही कोई ऐसा वॉलेंटियर होगा जो अपनी मर्ज़ी से इस देश के महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण की जिम्मेदारी न्यूनतम पैसों में पूरी करना चाहेगा।

प्रदर्शन में शामिल फूलवती, तस्वीर: रितिका

“हम उस वक्त से काम कर रहे हैं, जब हमारी तनख्वाह महज़ 110 रुपये हुआ करती थी।” करीब 2 दशक से इस काम में लगी फूलवती भी इस प्रदर्शन में शामिल होने आई थीं। वह आगे बताती हैं, “ऐसा लगता है 1995 से बेगारी ही कर रहे हैं, 110 रुपये आज 4800 रुपये तनख्वाह हुई है हमारी, इसके अलावा कुछ नहीं मिला। दीपावली पर एक टाफी तक नहीं मिलती। यह पूछने पर कि इतनी उम्र बीत जाने के बाद भी वह क्यों रोज़ाना धरने के लिए आती रहीं, फूलवती जवाब देती हैं- “चलो हमारी तो कट गई, कम से कम जो आनेवाली बहनें हैं, उन्हें तो कुछ मिले।”

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तस्वीर: सभी तस्वीरें रितिका द्वारा खींची गई हैं

Ritika is the Managing Editor at Feminism in India (Hindi). Ritika is an award-winning multimedia journalist with over five years of experience. She is a passionate advocate for social justice and gender rights, and has been awarded the prestigious UN Laadli Media Awards twice and Breakthrough Reframe Media Awards for her gender-sensitive writing and reporting. She is also a fellow of Rise Up (Youth Championship Initiative).

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