रामनवमी के मौके पर मुसलमानों के साथ हुई हिंसा और उनके ख़िलाफ़ बढ़ती नफ़रत इस देश को किस ओर ले जाएगी
तस्वीर साभार: ABP News
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भारत में बीते रविवार को रामनवमी समारोह के दौरान छह राज्यों – गुजरात, मध्य प्रदेश, गोवा, दिल्ली, झारखंड और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में हिंसा की ख़बरें आईं। इन राज्यों में भगवान के नाम पर उनके नाम मात्र के अनुयायियों ने कई जगहों पर हिंसा की। जगह-जगह मुसलमान समुदाय के लोगों को उकसाने की भरसक कोशिशें की गईं। कई इलाकों में रामनवमी का जुलूस मुस्लिम बहुल मोहल्लों से गुज़ारा गया। जुलूसों में तेज़ आवाज़ में गाने चलाए गए। मस्ज़िदों के बाहर भगवा युवा हाथ में तलवारें लेकर नाच रहे थे।

कई जगह पुलिस की मौजूदगी में ‘मियां मादर***’ जैसे शब्दों वाले गाने बजाए गए। एक मज़ार में तोड़-फोड़ की गई। एक मस्जिद पर भगवा झंडा लहराया गया। भगवा भीड़ ने मुस्लिम समुदाय को उकसाने की कोई कसर न छोड़ी। वे सुनियोजित और हथियारों से सुसज्जित थे। इस बार रामनवमी के जुलूस में जिस तरह से बड़ी संख्या में युवा तलवारें लेकर सड़कों पर अपनी शक्ति का प्रचार कर रहे थे उससे वे कहीं से भी राम के मूल्यों को मानने वाला नहीं लग रहे थे बल्कि उनका इरादा राम के बताये हुए मूल्यों और मानकों को पैरों तले रौंदना था। 

दिसंबर में यति नरसिंहानंद ने मुसलमानों के नरसंहार का आह्वान किया। वहीं, हाल ही में सरेआम महंत बजरंग मुनि ने मुस्लिम समुदाय की महिलाओं का बलात्कार करने की धमकी दी। सवाल यह है कि क्या सिर्फ भगवा वस्त्र पहनने से मुंह से राम-राम करने से कोई राम वाला बन जाता है। ये दोनों ही समाज के ‘महंत-मुनि’ लोग हैं। दोनों के ही काफी सारे अनुयायी हैं। इन भगवाधारियों ने कुछ भी कहने से पहले ये नहीं सोचा कि अगर सच में ही उनके अनुयायी उनके आव्हान पर सड़कों पर उतर गए और महिलाओं के साथ हिंसा करने लगे या नरसंहार करने लगे तो समाज ‘रामराज्य’ रह पाएगा।

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प्रतिबंध के नाम पर मुस्लिम समुदाय के अस्तित्व को दबाने की कोशिश 

पिछले एक दशक में, भारत में अल्पसंख्यक समुदाय का हिस्सा होना, ख़ासतौर पर मुस्लिम होना हर दिन कठिन होता जा रहा है। कभी मुसलमानों के कपड़े तो कभी उनके घर तो कभी उनके खाने की प्लेट पर सवाल खड़ा किया जाता रहा है। केवल सवाल खड़ा किया जाए तो भी समझ आता है मगर सवाल खड़े किए जाने के साथ-साथ उनके साथ हिंसा भी की जा रही है। सबसे पहले यह उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में लिंचिंग के साथ शुरू हुआ, फिर अज़ान को मुद्दा बनाया गया, लव जिहाद को मुद्दा बनाया गया, उसके बाद दिल्ली में दंगे भड़काए गए फिर मुसलमानों पर COVID-19 महामारी (2020-21) के दौरान वायरस फैलाने का आरोप लगाया गया। 

इसके बाद कर्नाटक से हिजाब पर प्रतिबंध का मुद्दा शुरू हुआ, फिर यह हलाल मीट तक पहुंचा। इस बीच मुस्लिम महिलाओं की सोशल मीडिया पर बोली लगाई गई। इस बार नवरात्रों के दौरान मीट की दुकानों को बंद किया गया। कई जगह प्रशासनिक ऑर्डर देकर मीट की दुकानों को बंद करवाया। रमज़ान का पवित्र महीना चल रहा है। मीट की दुकानों को बंद करने से दुकानदारों का रोज़गार बंद हो गया है। ऐसा नहीं है कि मीट की दुकान के मालिक केवल मुस्लिम ही थे। लेकिन इस प्रतिबंध का टारगेट मुस्लिम समुदाय ही था। कहीं- कहीं मुस्लिम फल-सब्ज़ी वालों से फल और सब्ज़ियां न खरीदने का आव्हान किया गया। महंगाई के इस दौर में रोज़गार न होने पर लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। असल में, ये प्रतिबंध सिर्फ प्रतिबंध नहीं हैं बल्कि ये मुसलमानों के अस्तित्व को ख़त्म करने की जी तोड़ कोशिशें हैं।

भारत में बीते रविवार को रामनवमी समारोह छह राज्यों – गुजरात, मध्य प्रदेश, गोवा, दिल्ली, झारखंड और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में हिंसा की ख़बरें आईं। इन राज्यों में भगवान के नाम पर उनके नाम मात्र के अनुयायियों ने कई जगहों पर हिंसा की। जगह-जगह मुसलमान समुदाय के लोगों को उकसाने की भरसक कोशिशें की गईं। कई इलाकों में रामनवमी का जुलूस मुस्लिम बहुल मोहल्लों से गुज़ारा गया। जुलूसों में तेज़ आवाज़ में गाने चलाए गए। मस्जिदों के बाहर भगवा युवा हाथ में तलवारें लेकर नाच रहे थे।

पिछले कुछ सालों के भारतीय चुनावी इतिहास का अगर मूल्यांकन किया जाए तो उसके अनुसार धर्म को केवल तभी खतरे में होते हैं जब भी चुनाव आनेवाले होते हैं। भारतीय जनता अब चुनाव में महंगाई, बेरोज़गारी, शिक्षा आदि मुद्दों से प्रभावित नहीं होती बल्कि वह अब धर्म की लड़ाई, ‘मियां’, पाकिस्तान आदि मुद्दों से प्रभावित होती है। अभी कुछ राज्यों में चुनाव ख़त्म हुए हैं और अब कुछ में आनेवाले हैं। जहां चुनाव ख़त्म हुए हैं और बीजेपी की सरकार आई है वहां वे अपनी शक्ति दिखाने के लिए लगातार इस प्रकार के हथकंडे अपना रहे हैं, जिससे कि उनका वर्चस्व बना रहे। वहीं, दूसरी और जहां चुनाव होने हैं वहां इस प्रकार के हथकंडे चुनावी सरगर्मियों में ‘हॉट टॉपिक’ के रूप में काम करेंगे । रामनवमी, रमज़ान और विधानसभा चुनावों की घटना की निकटता, जो गुजरात में केवल कुछ महीने दूर हैं, ध्रुवीकरण की राजनीति की ओर इशारा करती है, क्योंकि धर्म आधारित लामबंदी गुजरात में एक बार फिर केंद्र में है।

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सज़ा भी पीड़ितों को ही

इन हिंसा की घटनाओं के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति कोविंद और बाकी सभी बड़े नेताओं की चुप्पी इस बात का एक ‘स्पष्ट प्रमाण’ है कि इन घटनाओं के पीछे की ताकतों को आधिकारिक संरक्षण प्राप्त है। केंद्र सरकार लगातार अड़ियल रवैया अपनाये हुए है। कोई भी केंद्रीय मंत्री इस पर बात करने को तैयार नहीं है। यही हाल दिल्ली दंगों के दिनों में हुआ था। दिल्ली में दंगा होने से पहले केंद्रीय मंत्री कपिल मिश्रा ने पुलिस की मौजूदगी में दंगा भड़काने वाला भाषण दिया। उसके बाद दिल्ली में दंगे भड़क गए। तीन से चार दिन तक चले दंगों के शुरुआती दिनों में देश के प्रधान की तरफ से कोई भी अपील नहीं की गई थी। हालिया घटनाओं में भी कई जगह उत्पातियों ने पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में उत्पात मचाया। 

उसके बाद प्रशासन द्वारा की जाने वाली मनमानी ने पीड़ित लोगों को और मुश्किल में डाल दिया है। मध्य प्रदेश की सरकार ने प्रशासन को आदेश दिए हैं कि जो भी लोग दंगों में शामिल हुए हैं उनके घर पर बुलडोज़र चला दिया जाए। चौबीस घंटों के भीतर प्रशासन ने बहुत से घरों को तोड़ दिया इनमें अधिकतर घर मुस्लिम समुदाय के लोगों के थे। ऐसे में सवाल यह खड़ा होता है कि बिना कोई आरोप तय किए और बिना कोई दोष सिद्ध किए प्रशासन ने इतना बड़ा क़दम क्यों और किस क़ानून एक तहत उठाया? प्रशासन का यह क़दम लोगों के मानवधिकारों का उल्लंघन है। पहले ही नफरती हिंसा के पीड़ित अब बेघर होने से और हताश हैं।

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हिंसा-एक चेतावनी

भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ लगातार बढ़ती हिंसा “एक बहुत ही अशुभ संकेत है।” यह अशुभ संकेत भारत को ‘गृह युद्ध’ की तरफ धकेल रहा है। बहुत से बुद्धिजीवियों ने भारत में ‘गृह युद्ध’ की आशंका जताई है और इसके लिए सरकार को चेताया है। मगर सरकार के अड़ियल और बहरे रवैये की वजह से इस पर अभी तक कोई भी रोक नहीं लगाई गयी है। चीन जिस तरह से अपने देश के रोहिंग्या मुस्लिम जनसंख्या के साथ व्यवहार कर रहा है या चुका है भारत भी उसी और अग्रसर होता प्रतीत हो रहा है। गृह युद्ध के अलावा भी देश आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है लेकिन धर्म और धर्म के खतरे की लड़ाई से अगर नागरिकों को बाहर किया जाए तो ही वह यह सब सोच पाएंगे।  

इन हिंसा की घटनाओं के सामने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति कोविंद और बाकी सभी बड़े नेताओं की चुप्पी इस बात का एक ‘स्पष्ट प्रमाण’ है कि इन घटनाओं के पीछे की ताकतों को आधिकारिक संरक्षण प्राप्त है। केंद्र सरकार लगातार अड़ियल रवैया अपनाये हुए है। कोई भी केंद्रीय मंत्री इस पर बात करने को तैयार नहीं है।

हालिया सरकार का नारा है, ‘सबका साथ सबका विकास’ लेकिन यह नारा केवल पोस्टर तक ही सीमित रह गया है। लेकिन पिछली कई घटनाओं को देखते हुए लगता है कि यह नारा केवल पोस्टर्स तक ही सीमित रह गया है। केवल इसी नारे की ही नहीं बल्कि हिजाब प्रतिबंध ने ‘बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ’ नारे की भी धज्जियां उड़ा दी हैं। भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान के तहत, सभी नागरिकों को उनके धर्म की परवाह किए बिना समान अधिकारों की गारंटी दी जाती है। हालांकि, भारत की सत्तारूढ़ पार्टी भारत को एक हिंदू-बहुल राष्ट्र बनाए रखने की कोशिश करने में लगी हुई है और इस कोशिश में वह दूसरों के अधिकारों को कुचल रही है। विपदा यह है कि सर्वोच्च न्यायलय जिसे कि संविधान के संरक्षक कहा जाता है वह भी मौन है।

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सोशल मीडिया की नफरत

‘मुहब्बत बांटो तो यह तेज़ी से फैलती है’ भारत में यह कथन अब गलत होता प्रतीत होता है। भारत में नफरत बड़ी तेज़ी से फैल रही है। इन सब तरह की नफरत फैलाने में फेसबुक, व्हाट्सप्प, मीडिया चैनल, अखबार लगातार अपना सहयोग बनाये हुए हैं। फ़र्ज़ी न्यूज़ को इधर से उधर फॉरवर्ड किया जा रहा है। परिणामस्वरूप यह नफरत की आग और अधिक फैल रही है। पिछले कुछ सालों से हमारे देश में इंटरनेट पैक का इस्तेमाल अधिकतर लोग इसी प्रकार की वीडियो और मैसेज देखने, पढ़ने और बिना जांच पड़ताल किए फॉरवर्ड करने में करते हैं।

फेसबुक पर भारत की सत्तारूढ़ पार्टी और सरकार के साथ संबंधों को बनाए रखने के लिए हिंदू राष्ट्रवादी राजनेताओं द्वारा अवैध अभद्र भाषा को सेंसर करने में विफल रहने का आरोप लग चुका है। फेसबुक के अनुसार उसके पास भारत में पर्याप्त संसाधन नहीं हैं और इसीलिए वह मुस्लिम विरोधी पोस्ट सहित, वहां पेश की गई समस्याओं से निपटने में पूरी तरह से असमर्थ है।

हमारा समाज आज भारी नैतिक संकट का सामना कर रहा है। भारत को अपने सेक्यूलर मूल्यों को फिर से मज़बूत करने की और पहचान के मुद्दों को अलग रखने की सख्त जरूरत है। इस भूमि को सतही तर्कों में शामिल होने के बजाय अपनी नींव की मूल बातों पर काम करने की ज़रूरत है। हमें एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की आवश्यकता है जो ईमानदार, धर्मनिरपेक्ष, प्रतिबद्ध और सत्यनिष्ठा के उच्चतम मानकों को प्रदर्शित करे।

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तस्वीर साभार: ABP News

दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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