बात जब अल्पसंख्यकों की आती है तब न्यायपालिका को 'मानवीय आधार' और 'पहला अपराध' जैसे तर्क क्यों नज़र नहीं आते?
बात जब अल्पसंख्यकों की आती है तब न्यायपालिका को 'मानवीय आधार' और 'पहला अपराध' जैसे तर्क क्यों नज़र नहीं आते?
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पिछले दिनों दिल्ली की दो अलग-अलग अदालतों के दो फ़ैसले चर्चा और आलोचना का विषय रहे। इसमें से एक दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया। दिल्ली उच्च न्यायालय के जस्टिस चंद्र धारी सिंह ने उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े कथित नफरत भरे भाषणों के खिलाफ सीपीआई (एम) नेता वृंदा करात द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा, “अगर मुस्कुरा कर कुछ कहा जाता है, तो कोई अपराध नहीं है लेकिन अगर आक्रामक रूप से कुछ कहा जाता है, तो यह अपराध हो सकता है।”

वहीं, दूसरा फ़ैसला दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा दिया गया। पटियाला हाउस कोर्ट के जज पंकज शर्मा ने ‘सुली डील्स’ और ‘बुल्ली डील्स’ ऐप के तहत मुस्लिम महिलाओं की बोली लगानेवाले आरोपियों को मानवाधिकारों के आधार पर ज़मानत दे दी। 26 वर्षीय ओमकारेश्वर ठाकुर को और 21 वर्षीय नीरज बिश्नोई को ज़मानत देते हुए मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने कहा कि वह ‘पहली बार अपराधी’ था और बहुत लंबे समय तक जेल में रहना उसके समग्र स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा।

कोर्ट के मुताबिक, “आरोपी पहली बार अपराधी है और एक युवा व्यक्ति है, लंबे समय तक कारावास उसकी समग्र भलाई के लिए हानिकारक होगा। उसके मुकदमे के ट्रायल में काफी समय लगेगा और उसे और हिरासत में रखने से कोई सार्थक उद्देश्य पूरा नहीं होगा।” अदालत ने माना कि अगर ओमकारेश्वर ठाकुर और नीरज बिश्नोई के खिलाफ मामला आगे भी जारी रहा तो उनका भविष्य और कल्याण दोनों ही बाधित होंगे।

इन दोनों ही ऐप के मामलों में ‘मुस्लिम महिलाओं की नीलामी‘ को ‘डील ऑफ द डे’ के रूप में ऑनलाइन पेश किया गया था। इन ऐप पर उनकी सहमति के खिलाफ उनकी तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया था। दोनों ही मामलों का उद्देश्य मुस्लिम महिलाओं को नीचा दिखाना और उन्हें अपमानित करना था। इन ऐप पर जिन महिलाओं के नाम और तस्वीरें शामिल थीं, वे समाज में मुखर रही हैं। इनमें से कुछ महिलाएं मौजूदा बीजेपी सरकार के तहत हिंदू राष्ट्रवाद के बढ़ते ज्वार के बारे में मुखर हैं।

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इन मामलों की समीक्षा के बाद यह पता चलता है कि कुछ लोग (सरकार के समर्थक) अन्य (सरकार के आलोचकों) की तुलना में अधिक समान हैं। अगर अदालत किसी आरोपी को मानवीय आधार पर बरी करती है तो यह मानवीय आधार दूसरों के लिए क्यों बक्से में बंद हो जाते हैं।

दूसरे मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने नेता वृंदा करात की याचिका पर सुनवाई की जिसमें केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और सांसद परवेश वर्मा के खिलाफ उनकी कथित अभद्र और भड़काऊ भाषा के लिए प्राथमिकी दर्ज करने की प्रार्थना को अस्वीकार कर दिया गया था। द्वेषपूर्ण भाषण के वाद में यह कहते हुए कि चुनावों के दौरान सभी राजनेताओं के खिलाफ ऐसी हजारों प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है। अदालत ने कहा, “यदि आप मुस्कुराते हुए कुछ कह रहे हैं तो कोई आपराधिकता नहीं है, अगर आप कुछ आक्रामक कह रहे हैं तो आपराधिकता होगी। आपको जांचना होगा और संतुलन बनाना होगा। मुझे लगता है कि चुनाव के दौरान सभी राजनेताओं के खिलाफ 1,000 प्राथमिकी दर्ज की जा सकती हैं।”

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक बीजेपी सांसद परवेश वर्मा कथित तौर पर कहा था, “ये लोग आपके घर में घुसेंगे, आपकी बेटियों को उठाएंगे और उनको रेप करेंगे …”, अदालत ने पूछा कि इसमें ‘ये लोग’ किन्हें इंगित करता है और याचिकाकर्ता कैसे निष्कर्ष निकाल रहे थे कि यह विशेष समुदाय को संदर्भित करता है। अदालत ने आगे कहा कि वह सामान्य रूप से टिप्पणी कर रहे हैं न कि विशेष रूप से इसी मामले के संदर्भ में। उन्होंने आगे कहा, “मान लीजिए कि महौल (माहौल) बनाने के लिए यह सब कुछ कहा है और, मुझे लगता है कि यहाँ कोई आपराधिक मनःस्थिति नहीं है क्योंकि कुछ अन्य राजनीतिक दल कुछ और कहते हैं। हर कोई अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को संबोधित कर रहा है और अपने वोटरों को जुटाने कि लिए ऐसा कर रहा है। यह भाषण निर्वाचन क्षेत्र को जुटाने के उद्देश्य से किया गया है।”

वहीं, जनवरी 2020 में एक रैली में, केंद्रीय मंत्री ठाकुर को “देश के गद्दारों को” चिल्लाते हुए सुना गया और भीड़ ने “गोली मारो सालो को” के साथ जवाब दिया। नारे का मतलब था “देशद्रोहियों को गोली मारो”, “देशद्रोहियों” के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अपशब्द के साथ नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने वालों का संदर्भ था।

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‘मानवीय आधार’ और ‘पहली बार का अपराधी’ 

दिल्ली की अदालतों के इन दोनों हालिया फैसलों की लोगों ने खूब आलोचना की है। न्यायपालिका के ये फैसले लोगों के लिए उसके दोहरे मानकों को चित्रित करते हैं। सवाल यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय की बात आते ही ये मानवीय आधार कहां गायब हो जाते हैं? केवल मुस्लिम अल्पसंख्यक ही नहीं बल्कि दलित, आदिवासी और दूसरे वंचित तबको के ऊपर इस तरह के सवाल उठने पर अदालत का रवैया बदल जाता है। अदालत के ये मानवीय आधार बूढ़े और बीमार स्टेन स्वामी या गर्भवती सफूरा जरगर पर लागू क्यों नहीं हो पाए?

‘मानवीय आधार’ पर ज़मानत देने का हमारी कानूनी व्यवस्था में बहुत ही जटिल अस्तित्व है। अदालत मानवीय आधारों पर ज़मानत की सुनवाई के समय मानवीय आधारों से अधिक सरकारी आधारों को ध्यान में रखती है। जून 2020 में, दिल्ली पुलिस की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जामिया मिलिया इस्लामिया की छात्रा सफूरा जरगर की ज़मानत याचिका का विरोध किया, जो उस समय गर्भावस्था के पांचवें महीने में थी। जरगर को अप्रैल में कड़े गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया गया था। मेहता ने तर्क दिया था कि पिछले 10 वर्षों में तिहाड़ जेल में 39 प्रसव हुए हैं और जरगर को पर्याप्त चिकित्सा देखभाल मिल रही है।

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दिल्ली उच्च न्यायालय को अपनी स्थिति रिपोर्ट में पुलिस ने कहा, “गर्भवती कैदी, जिस पर इस तरह के जघन्य अपराध का आरोप हैं, को केवल गर्भावस्था के कारण ज़मानत पर रिहा करने के लिए कोई अपवाद नहीं है। इसके विपरीत, कानून जेल में उनकी हिरासत के दौरान पर्याप्त सुरक्षा उपाय और चिकित्सा सुविधा प्रदान करता है।” हालांकि जरगर एक तथाकथित ‘पहली बार अपराधी’ थी फिर भी सफूरा के मामले में अदालत ने सारे मानवीय आधार ताक पर रख दिए थे। सफूरा का क़सूर क्या था? पुलिस के अनुसार वह दिल्ली में जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के नीचे सीएए के विरोध और सड़क नाकाबंदी का आयोजन करने वालों में शामिल थीं। इसीलिए उसे अप्रैल 2020 में दिल्ली में फरवरी में हुए दंगों को लेकर साजिश के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। बाद में जून में जाकर सफूरा को ज़मानत मिली। 

न्यायपालिका के ये फैसले लोगों के लिए उसके दोहरे मानकों को चित्रित करते हैं। सवाल यह है कि अल्पसंख्यक समुदाय की बात आते ही ये मानवीय आधार कहां गायब हो जाते हैं? केवल मुस्लिम अल्पसंख्यक ही नहीं बल्कि दलित, आदिवासी और दूसरे वंचित तबको के ऊपर इस तरह के सवाल उठने पर अदालत का रवैया बदल जाता है। अदालत के ये मानवीय आधार बूढ़े और बीमार स्टेन स्वामी या गर्भवती सफूरा जरगर पर लागू क्यों नहीं हो पाए?

दो अन्य छात्र एक्टिविस्ट शरजील इमाम और उमर खालिद की ज़मानत की सुनवाई के दौरान कोई भी ‘मानवीय आधार’ और ‘मुस्कुराने के सिद्धांत’ को ध्यान में नहीं रखा गया है। दोनों छात्र साल 2020 से UAPA के तहत जेल में बंद हैं। उमर खालिद को सितंबर, 2020 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने दिल्ली दंगों के मामले में कथित साजिशकर्ता के रूप में गिरफ्तार किया था। चूंकि दोनों हालिया सरकार के कार्यों और नियमों के विरोधी थे तो उन पर कड़ा एक्शन लिया गया। ये दोनों भी तथाकथित ‘पहली बार अपराधी’ हैं।

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ये सभी मामले भारतीय संविधान के उस अधिकार की धज्जियां उड़ाते प्रतीत होते हैं कि कानून के लिए बराबर। इन मामलों की समीक्षा के बाद यह पता चलता है कि कुछ लोग (सरकार के समर्थक) अन्य (सरकार के समीक्षक) की तुलना में अधिक समान हैं।

एक विशेष राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) अदालत ने 83 वर्षीय स्टेन स्वामी की अंतरिम औसत दर्जे की जमानत याचिका भी खारिज कर दी थी। झारखंड में आदिवासियों के साथ काम करनेवाले कार्यकर्ता स्टेन स्वामी को भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में गिरफ्तार किया गया और तलोजा सेंट्रल जेल, नवी मुंबई में बंद कर दिया गया। बीमार और बूढ़े स्टेन स्वामी ने अपनी बीमारी के आधार पर ज़मानत की गुहार लगाई थी लेकिन अदालत ने उसे ख़ारिज कर दिया। बाद में स्टेन स्वामी की जेल में ही मौत हो गई। तथाकथित ‘पहली बार अपराधी’ के एक अन्य मामले में पत्रकार सिद्दीकी कप्पन भी शामिल हैं। वह एक साल से जेल में हैं। कप्पन को पुलिस ने उत्तर प्रदेश में उस समय पकड़ लिया जब वह पत्रकार के रूप में अपना काम कर रहा था। वह उत्तर प्रदेश के हाथरस जा रहे थे, उस घटना की रिपोर्ट करने के लिए जहां एक दलित लड़की का सामूहिक बलात्कार किया गया और हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने उस पर भी यूएपीए के तहत आरोप लगाया।

हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कवि और सामाजिक कार्यकर्ता वरावर राव की चिकित्सा आधार पर स्थायी जमानत की याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। राव 2018 भीमा कोरेगांव-एल्गार परिषद मामले में आरोपी हैं। एनआईए ने अदालत से यह कहते हुए याचिका खारिज करने का आग्रह किया कि राव के खिलाफ आरोप “बहुत, बहुत गंभीर” हैं।

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डॉक्टर कफील खान को भी सरकारी कार्यों की पोल खोलने और सीएए विरोध के दौरान भाषण देने के कारण UAPA के तहत गिरफ्तार किया गया था। बाद में कई महीनों बाद जाकर कफील खान को ज़मानत मिल पाई थी। पिछले वर्ष दिसंबर में, यति नरसिंहानंद गिरि और अन्य राइट विंग धार्मिक नेताओं ने हरिद्वार में एक बैठक के दौरान हिंदुओं से मुसलमानों के खिलाफ ‘नरसंहार’ के लिए खुद को हथियार देने का आह्वान किया था। इस बैठक की वीडियो फुटेज भी वायरल हुई थी। उसके बाद गिरी को गिरफ्तार किया गया। कुछ महीनों बाद गिरी को अदालत से ज़मानत भी मिल गयी थी। उमर खालिद, शरजील इमाम या जरगर का भीड़ में दिया गया भाषण ऐसा नहीं था जितना कि गिरी का साफ़ और खुले शब्दों में दिया गया भाषण खतरनाक था जिसमें ‘नरसंहार’ के लिए आह्वान किया गया था।

ये सभी मामले भारतीय संविधान के उस अधिकार की धज्जियां उड़ाते प्रतीत होते हैं कि कानून के लिए बराबर। इन मामलों की समीक्षा के बाद यह पता चलता है कि कुछ लोग (सरकार के समर्थक) अन्य (सरकार के आलोचकों) की तुलना में अधिक समान हैं। अगर अदालत किसी आरोपी को मानवीय आधार पर बरी करती है तो यह मानवीय आधार दूसरों के लिए क्यों बक्से में बंद हो जाते हैं।

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दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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