विज्ञान और राष्ट्रवाद: विज्ञान की दुनिया में राष्ट्रवाद का बदलता अर्थ और महत्व
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पिछले कुछ सालों में गोमूत्र, गाय के गोबर का लाभ और इसके गुणों की बातें सिर्फ सार्वजनिक चर्चा का ही नहीं, राजनीतिक सरगर्मी और खबरों का विषय भी बना रहा। कोरोना महामारी के दौरान शुरू हुई गोमूत्र और गाय के गोबर पर चर्चा आज राष्ट्रीय स्तर पर शोध, राष्ट्रीयता और गर्व का विषय बन चुका है। हालांकि, यह पहली बार नहीं जब किसी विधायक, नेता या अभिनेता ने इस पर कोई बयान दिया हो या गाय के अलग-अलग सह-उत्पादों के विशेषताओं का गुणगान किया गया हो। राज्यसभा और विधानसभा के कई सदस्य सार्वजनिक रूप से बयान जारी कर चुके हैं कि गोमूत्र से कैंसर और कोरोना महामारी का इलाज संभव है। इतना ही नहीं, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ के रूप में अपनाए जाने तक की बात भी कह चुके हैं। 

पिछले दिनों केंद्र सरकार ने देशी गायों की विशिष्टता और संभावित कैंसर उपचार सहित गोमूत्र, गोबर और गाय के दूध के औषधीय गुणों पर शोध प्रस्तावों के लिए एक सरकारी विज्ञापन भी जारी किया था। गौरतलब, है कि इस प्रस्ताव पर भारतीय वैज्ञानिकों ने आपत्ति जताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा और बयान भी जारी किया। भारतीय वैज्ञानिकों ने इस प्रयास को अवैज्ञानिक और भारत में गायों की या गाय से जुड़ी भावना की विशेष स्थिति को मज़बूत करने का एक प्रयास बताया, जो समाज में पहले से मौजूद पूर्वाग्रह को बढ़ाने का काम करेगा।

हालांकि, ऐसा नहीं है कि लोग गाय या गाय के गोबर जैसे उत्पाद का इस्तेमाल पहले नहीं करते थे। लेकिन एक अवैज्ञानिक दावे को वैज्ञानिक दिशा देने और इससे राष्ट्रवाद की भावना को जोड़ने की कोशिश वैज्ञानिक प्रगति को पीछे धकेलने का काम कर सकता है। एक प्रगतिशील और लोकतांत्रिक देश में आस्था के बल पर राज्य और केंद्र सरकार का इस तरह के नैरेटिव को महत्व देना, इस विषय पर शोध के लिए सरकारी निवेश करना आनेवाले समय में खतरनाक और नुकसानदेह साबित हो रहा है। 

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क्या भारत में विज्ञान और वैज्ञानिकता राष्ट्रवादी रहा है

स्वतंत्रता के बाद, भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत में उच्च शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए कई मूलभूत परिवर्तन और सुधार किए। भारत दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहता था और इसलिए इसके अर्थव्यवस्था में भी बदलाव की ज़रूरत थी। एक आधुनिक देश बनने, नुक्लिअर युग में फिट होने और विज्ञान के क्षेत्र में विकास के लिए तमाम नीतियां या बदलाव जरुरी थे। बात 1950 और 60 के दशक की बात करें, तो इस दौर में पहले आईआईटी से लेकर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का तेजी से विकास और भारत को परमाणु शक्ति में सक्षम होते देखा गया। इस दौर के कई वैज्ञानिकों ने विज्ञान को एक अलग तरह के भारतीयकरण करने की दिशा में काम किया, जो कि मूलरूप से विज्ञान के माध्यम से लोगों का जीवन आसान और बेहतर बनाना था। आज जिस तरह विज्ञान पर थोपी हुई भारतीयता और राष्ट्रवाद को हम महसूस कर रहे हैं, यह उससे बिलकुल अलग लोकसेवा और भारत को विज्ञान के क्षेत्र में मज़बूत करने का रूप था।

हालांकि, ऐसा नहीं है कि लोग गाय या गाय के गोबर जैसे उत्पाद का इस्तेमाल पहले नहीं करते थे। लेकिन एक अवैज्ञानिक दावे को वैज्ञानिक दिशा देने और इससे राष्ट्रवाद की भावना को जोड़ने की कोशिश वैज्ञानिक प्रगति को पीछे धकेलने का काम कर सकता है। एक प्रगतिशील और लोकतांत्रिक देश में आस्था के बल पर राज्य और केंद्र सरकार का इस तरह के नैरेटिव को महत्व देना, इस विषय पर शोध के लिए सरकारी निवेश करना आनेवाले समय में खतरनाक और नुकसानदेह साबित हो सकता है। 

उदाहरण के लिए, बायोकेमिस्ट और नूट्रिशनिस्ट आर. राजलक्ष्मी ने भारतीय परिवारों के लिए पौष्टिक और किफायती आहार विकसित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राजलक्ष्मी का सबसे महत्वपूर्ण काम उनकी किताब ‘एप्लाइड न्यूट्रीशन’ थी, जहां उन्होंने भारत में उपलब्ध अनाज, सब्जियां, जड़ी-बूटियों आदि को ध्यान में रखते हुए पोषण के सिद्धांतों को प्रासंगिक बनाया। 1960 के दशक की शुरुआत में, राजलक्ष्मी यूनिसेफ के प्रायोजित एक पोषण कार्यक्रम का प्रबंधन और संशोधन करने में कामयाब रही। उस समय तक नुट्रिशन के पाठ्यक्रम पश्चिमी पाठ्यपुस्तकों पर आधारित होते थे जिनमें ऐसे खाने के नाम हुआ करते थे जो भारत में या तो महंगे थे या पाए नहीं जाते थे। इसी तरह, बात अगर होमी जहांगीर भाभा की करें, तो हालांकि उनके भारत में बतौर वैज्ञानिक का सफर द्वितीय विश्व युद्ध के कारण वापस विदेश न जा पाने से शुरू हुआ था। लेकिन भाभा ने भारत में महत्वाकांक्षी परमाणु कार्यक्रम शुरू करने के लिए तत्कालीन वरिष्ठ नेताओं, विशेष कर जवाहरलाल नेहरू को राज़ी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद उन्होंने साल 1945 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च और साल 1948 में एटॉमिक एनर्जी कमीशन की स्थापना की।

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क्या वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास में मदद कर सकती है सरकार

भारत के संविधान का अनुच्छेद 51 ए (एच) कहता है कि भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञान अर्जन और सुधार की भावना का विकास करें। समाज में किसी व्यक्ति का दृष्टिकोण कितना वैज्ञानिक और मानवता के हित में है, यह उसके शैक्षिक क्षमता, आर्थिक और सामाजिक स्थिति के अलावा, देश के राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक हालात पर भी निर्भर करता है।

इतिहास में जाएं तो अलग-अलग सरकारों द्वारा लोगों के बीच वैज्ञानिक सोच को विकसित करने के लिए अनेकों प्रयास किए गए जो तार्किक सोच और तर्कसंगत निर्णय को बढ़ावा देता है जो एक राष्ट्र के सम्पूर्ण विकास के लिए प्राथमिक रूप से ज़रूरी है। यह महत्वपूर्ण है कि समाज के विकास में सभी लोग शामिल हो और इसलिए लोगों की उम्र, जाति, नस्ल, समुदाय, आस्था या धर्म को परे रखकर वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकसित करना ज़रूरी है। लेकिन जब देश के राजनीतिज्ञ सिर्फ किसी संभावना या आस्था के आधार पर विज्ञान को आगे बढ़ाने की कोशिश करे, तो वह समाज के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। मसलन, भगवान गणेश का ज़िक्र करते हुए प्लास्टिक सर्जरी की शुरुआत बताना, गाय के गोबर से कैंसर या कोरोना महामारी का इलाज संभव होना बताना या जलवायु परिवर्तन से लड़ने के एक तरीके के रूप में योग करने की सलाह देना नुकसानदेह साबित हो सकता है।

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क्या हो सकता है अवैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिणाम 

आज हमारे देश में दूसरे देशों की तुलना में कम संख्या में वैज्ञानिक और शोधकर्ता तैयार हो रहे हैं। साथ ही, भारत न सिर्फ विज्ञान और प्रौद्योगिकी बल्कि अनुसंधान में भी वित्तीय संकट का सामना कर रहा है। ऐसे में सही दिशा में निवेश न करने से देश की वैज्ञानिक प्रगति प्रभावित होने के साथ-साथ आर्थिक दुरुपयोग भी होगा। वॉशिंगटन, डीसी में स्थित गैर-सरकारी सार्वजनिक नीति संस्था ब्रुकिंग्स इंडिया की रिपोर्ट अनुसार, भारत में शोधकर्ताओं की संख्या चीन के शोधकर्ताओं की संख्या का लगभग 18 प्रतिशत, अमेरिका का 5 प्रतिशत और दक्षिण कोरिया का महज 3 प्रतिशत है। इस रिपोर्ट के आधार पर मिंट में छपी एक खबर बताती है कि भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद का 1 फीसद से भी कम अनुसंधान और विकास पर खर्च करता है, जबकि दक्षिण कोरिया 4.23 फीसद से अधिक और चीन 2.11 प्रतिशत खर्च करता है। यूनेस्को के अनुसार भारत में प्रति मिलियन निवासियों पर 252.70 शोधकर्ता हैं जबकि चीन में यह संख्या 1307, अमेरिका में 4412 और दक्षिण कोरिया में 7980 है।

ब्रुकिंग्स इंडिया की रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो दशक में भारत में शोध प्रकाशन सात गुना बढ़े हैं, लेकिन यह अभी भी चीन और अमेरिका जैसे देशों से बहुत पीछे है। अधिक संख्या में शोधकर्ताओं का किसी भी देश में स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सेवाओं की गुणवत्ता से सीधा संबंध है। केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय को इस साल केंद्रीय बजट में 14,217 करोड़ रुपये आवंटित किए गए जो कि पिछले साल की तुलना में 3.9 प्रतिशत कम है।

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इतिहास में जाएं तो अलग-अलग सरकारों द्वारा लोगों के बीच वैज्ञानिक सोच को विकसित करने के लिए अनेकों प्रयास किए गए जो तार्किक सोच और तर्कसंगत निर्णय को बढ़ावा देता है जो एक राष्ट्र के सम्पूर्ण विकास के लिए प्राथमिक रूप से ज़रूरी है।

डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट में विशेषज्ञ बताते हैं कि इस तरह का बजट आवंटन इस बात का प्रमाण है कि भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को बहुत कम समर्थन मिलता है। द प्रिंट में छपी एक खबर अनुसार वैज्ञानिकों ने केंद्र सरकार नियोजित सूत्र पिक (SUTRA-PIC) परियोजनाओं के दावों की प्रमाणिकता के लिए छात्रों के लिए एक प्रतियोगिता की घोषणा की है। हालांकि सदियों से गाय के सह-उत्पादों के औषधीय गुणों का ज़िक्र होते आया है, लेकिन कई शोधकर्ताओं के अनुसार इन उत्पादों को सूंघने या सेवन करने से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम जुड़े होते हैं। इस प्रक्रिया से जानवरों में पाई जाने वाली अनेक बीमारी इंसानों में भी फैल सकती है।

विज्ञान को किसी एक धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय या भाषा से जोड़ने का एक दुष्परिणाम यह भी है कि इससे किसी एक वर्ग के विशेषाधिकार को बढ़ावा देना होगा। विज्ञान हर दिन विकसित हो रहा है। एक आधुनिक और वैज्ञानिक दुनिया में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए देश में बनाई जा रही नीतियां या नैरेटिव और उससे जुड़ी हमारी मानसिकता की अहम भूमिका है। भारत में तेजी से विज्ञान और राष्ट्रवाद के संबंध में बदलाव आया है और आम जनता के लिए यह एक जटिल और गैर-ज़रूरी मुद्दा है जो उनके दैनिक जीवन और रोजी-रोटी पर असर नहीं करता। लेकिन विकास का एक मानदंड दूसरे बेहतर और विकसित देशों से तुलना करना भी है। ज़रूरी है कि हम स्कूल में पढ़ाए जा रहे पाठ्यक्रम से लेकर टीवी पर दिखाए जा रहे कार्यक्रमों तक और सरकारी नीतियों से लेकर राजनीतिज्ञों के बयानों का आंकलन करें, सवाल करें और खुद को विज्ञान से दूर न होने दे।

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कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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