समाज के गढ़ने और मढ़ने के नियम जो महिलाओं की यौनिकता पर अपना शिकंजा कसते है
तस्वीर साभारः EastMojo
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“शादीशुदा औरतों को हमेशा सज-धज के रहना चाहिए, जिससे लगे कि वे शादीशुदा हैं, पढ़ी-लिखी महिला का पहनावा बेहतर होना चाहिए, उन पर एक ख़ास तरह का पहनावा और व्यवहार ही फ़ब्ता है, सामाजिक काम करनेवाली महिलाओं को किसी भी तरह का श्रृंगार नहीं करना चाहिए। उनके हर काम में क्रांति दिखनी चाहिए।” महिलाओं के पहनावे और उनके व्यवहार को लेकर हमेशा हमारा समाज अलग-अलग समय पर अपने हिसाब से ख़ास नियम गढ़ने और उसे महिलाओं पर मढ़ने का काम करता है। शादीशुदा औरत, तलाक़शुदा औरत, कामकाजी औरत, घरेलू औरत, कॉलेज जाने वाली युवतियों जैसी अलग-अलग भूमिकाओं में रहने वाली औरतों को लेकर हमारे समाज ने अपने कुछ ख़ास नियम पहले से सेट कर रखे हैं, जिन्हें थोपने का काम सदियों से लेकर आज तक क़ायम है।

मैं ग्रामीण परिवेश के एक मध्यमवर्गीय परिवार से आनी वाली महिला हूं। घरेलू काम के साथ-साथ एक संस्था के साथ सामाजिक कार्य भी करती हूं। घर में मेरी एक बहु, पत्नी और माँ के रूप में पहचान है। इसके लिए मुझे अपने पहनावे और व्यवहार को लेकर एक ख़ास तरह के नियम का पालन करना पड़ता है। ये वे नियम हैं जिन्हें शादी के बाद से मेरे नाम, पहचान और अस्तित्व के साथ जोड़ दिया गया। जिसे मैंने क़रीब दस से पंद्रह साल तक निभाया है। लेकिन पिछले कुछ सालों से जब से मैंने सामाजिक कार्य का काम शुरू किया तब से मेरी भूमिकाओं और लोगों का मुझे लेकर नज़रिए में काफ़ी बदलाव आया है।

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मैं ग्रामीण परिवेश के एक मध्यमवर्गीय परिवार से आनी वाली महिला हूं। घरेलू काम के साथ-साथ एक संस्था के साथ सामाजिक कार्य भी करती हूं। घर में मेरी एक बहु, पत्नी और माँ के रूप में पहचान है। इसके लिए मुझे अपने पहनावे और व्यवहार को लेकर एक ख़ास तरह के नियम का पालन करना पड़ता है।

ये बदलाव ऐसे हैं कि घरवालों को अपनी सालों से पोसी गई ‘इज़्ज़त वाली सत्ता’ ख़तरे में नज़र आती है। जब भी मैं गाँव में महिलाओं के साथ बैठक करती हूं, सामाजिक बदलाव के लिए उनके नेतृत्व को बढ़ावा देती हूं और उन्हें उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करती हूं तो ये सभी काम मुझे एक नयी पहचान देते हैं। वह पहचान जो मेरे खुद के काम की वजह से हैं। वहीं, परिवार की अपेक्षाएं ये होती हैं कि मैं बहु, पत्नी और माँ की भूमिकाओं को लेकर बनाए गए नियमों का सख़्ती से पालन करूं जिससे मेरी आदर्श महिला की छवि क़ायम रह सके।

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ठीक उसी वक्त समुदाय की मुझसे अपेक्षाएं ये होती हैं कि मैं साड़ी जैसे पारंपरिक पहनावे को छोड़कर सूट-सलवार को अपनाऊं। साइकिल की बजाय स्कूटी से काम पर आऊं, वग़ैरह-वग़ैरह। घर से लेकर समुदाय तक की ये सारी अपेक्षाओं के बीच मेरी अपनी सोच और मेरी अपनी पसंद कहीं न कहीं पीछे छूटने लगती है। इसी तरह मेरे साथ काम करने वाली अविवाहित लड़कियों के साथ उनके परिवार और समुदाय की कुछ ख़ास तरह की अपेक्षाएं होती हैं। तो वहीं युवा विधवा महिलाओं से अलग अपेक्षाएं होती हैं। वे क्या पहने, कैसे पहने, क्या खाए, कहाँ जाए, किसके साथ रहे जैसे हर छोटे-बड़े सवाल पर समाज के अपने निर्धारित मानक लगातार महिलाओं की स्थिति को प्रभावित करते हैं।

खासतौर पर ग्रामीण परिवेश में हम महिलाओं को बचपन से ही चुप रहने और दूसरों का कहा मानने कि ट्रेनिंग दी जाती है। इसकी वजह से अपनी इच्छाओं और पसंद पर बात करने के लिए हमलोगों के पास अपनी कोई जगह नहीं होती है। किसी भी रिश्ते या भूमिकाओं में अपनी पसंद को रखना अपने आप में किसी चुनौती से कम नहीं होता है। सच्चाई ये है कि भले ही कोई काम हम लोगों को अपनी पहचान बनाने में और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में मदद करता है लेकिन जब बात मेरी यौनिकता की आती है तो वहां समाज के नियम मुझ पर थोपे जाने शुरू हो जाते हैं।

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खासतौर पर ग्रामीण परिवेश में हम महिलाओं को बचपन से ही चुप रहने और दूसरों का कहा मानने कि ट्रेनिंग दी जाती है। जिसकी वजह से अपनी इच्छाओं और पसंद पर बात करने के लिए हमलोगों के पास अपनी कोई जगह नहीं होती है।

ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के अनुसार महिला-पुरुष की भूमिकाओं, काम और समाज में उनकी स्थिति को अलग-अलग तरीके से निर्धारित किया हुआ है। समय के साथ इसमें बदलाव भी आता है लेकिन इन सभी गढ़न में अपने आपमें एक जटिलता है। इसे चुनौती देना कई बार मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है। अगर मैं अपनी बात करूं तो घर-परिवार की अपेक्षाएं और समुदाय की अपेक्षाओं में फ़र्क़ भले है, पर उन दोनों में समानता ये है कि इसमें मेरी अपनी पसंद कहीं नहीं है।

सामाजिक कार्य करनेवाली महिलाएं एक ख़ास तरह का पहनावा पहनती हैं और एक ख़ास तरीक़े से व्यवहार करती हैं। ये दबाव महिलाओं पर हमेशा बना रहता है। अक्सर गाँव में महिलाओं और किशोरियों के साथ बैठक करने पर मेरे साड़ी पहनने को लेकर ये बात सामने आती है कि आप तो सामाजिक कार्य का काम करती हैं तो आपको बंधनों से मुक्त होना चाहिए। आपको सूट-सलवार पहनना चाहिए। लेकिन ऐसा किस किताब में लिखा है ये मुझे मालूम नहीं है। अगर बात आती है बंधनों की तो हो सकता है कि मेरे लिए बंधन का मतलब कुछ और हो, वब बंधन जो मुझे परेशान करते हो। यह भी हो सकता है कि साड़ी पहनना मेरी अपनी पसंद हो। इसलिए किसी पर भी किसी तरह का दबाव बनाना, बिना उसकी इच्छा जाने हुए उस पर चीजें थोपना एक तरह की हिंसा ही है।

इसके बाद अगर बात करें बदलाव को लेकर सहजता की तो कड़वी सच्चाई ये है कि जब भी कोई महिला अपने पसंद की जीवनशैली अपनाती है तो वह हमेशा समाज को खलती है। ऐसी नियम-कानून महिलाओं के लिए केवल बाधा के समान है। महिलाएं आगे आने लगेंगी अगर हम उनके लिए मानकों और परिभाषाओं को गढ़ने का काम करना बंद कर दें।

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रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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