आदिवासी समाज और उनके संघर्ष को दिखाती बीजू टोप्पो और मेघनाथ की दस्तावेज़ी फिल्में
आदिवासी समाज और उनके संघर्ष को दिखाती बीजू टोप्पो और मेघनाथ की दस्तावेज़ी फिल्में
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‘अखरा रांची’ फ़िल्म प्रोडक्शन 1996 में बीजू टोप्पो और मेघनाथ द्वारा शुरू किया गया एक समूह है। इसने समानांतर सिनेमा द्वारा शुरू किए बीज विद्रोह को न केवल अंकुरित किया बल्कि शोषण के विरुद्ध एकजुटता और प्रतिरोध की एक नई धारा उत्पन्न की है। बीजू टोप्पो और मेघनाथ ने इस समूह के माध्यम से आदिवासी समुदाय के उत्पीड़कों के विरुद्ध आंदोलन और समस्याओं (विशेष रूप से झारखंड के आदिवासियों) पर न केवल फिल्मों का निर्माण किया बल्कि उन्हें गांव-शहरों में जाकर प्रदर्शित भी किया। वे एक गांव की समस्याओं और संघर्ष को दूसरे गांव के लोगों को दिखाते ताकि आदिवासी शोषण के प्रति जागरूक और एकजुट हो सकें।

उन्होंने कई दस्तावेजी फिल्मों, गीतों का निर्माण किया। इनमें आदिवासी अस्मिता, क्षेत्रीय भाषाओं को बचाने का संघर्ष, आदिवासी परम्पराओं, सरकार और कॉरपोरेट दलालों की अवैध खनन माफियाओं द्वारा उनका शोषण, आदिवासियों का उनके खिलाफ आंदोलन आदि को फिल्मों में दर्शाया है। उन्होंने 25 से अधिक प्रतिरोधी फिल्मों और गीतों का निर्माण किया। इसमें अधिकतर को न केवल कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों (2010 और 2018) से नवाज़ा गया बल्कि उन्होंने दर्शकों का फिल्म देखने का नज़रिया भी बदला। उन्होंने आदिवासियों के आंदोलनधर्मी संघर्ष से रूबरू भी करवाया। 

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उनकी प्रमुख फिल्मों में शहीद जो अंजान रहे (1996), एक हादसा और भी (1997), जहां चींटी लड़ी हाथी से (1998), हमारे गांव में हमारा राज (2000), Development flows from the Barrel of the Gun (2003), कोरा राजी (2005), 100 days work for you a film on MGNREGA (2009), गाड़ी लोहरदगा मेल (2010), लोहा गर्म है (2010), एक रोपा धान (2010), सोना गही पिंजरा (2011), टेकिंग साइड (2015), दि हंट (2015), नाची से बाची (2017) और झरिया जैसी दस्तावेजी फिल्में शामिल हैं। उनकी फिल्मों में रोपनी जैसे आदिवासी लोक गीत, सोहराई और करम जैसे त्यौहारों, आदिवासी आंदोलनकारियों, विकास और खनिजों के अवैध खनन के नाम पर आदिवासियों के शोषण को दिखाया गया है।

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100 Days work for you A film on MGNREGA(2009)

तस्वीर साभारः Youtube

मनरेगा योजना की ज़मीनी हकीकत को बीजू टोप्पो और मेघनाथ ने इस फ़िल्म के जरिए दिखाते नज़र आते हैं। साल 2005 में सरकार द्वारा ग्रामीण जनता को 100 दिन के रोज़गार की गारंटी के साथ ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (MGNREGA) को लागू किया गया। यह फ़िल्म इस योजना की हकीकत को दिखाती है कि किस तरह वहां ठेकेदारों और दलालों की घुसपैठ के कारण मज़दूरी कर रहे मजदूरों को न तो पूरी मज़दूरी मिल रही और न ही उन लोगों को रोज़गार की गारंटी। इसके अंतर्गत बनाए गए बेरोज़गार होने की स्थिति में या 100 दिन में मजदूरी न मिलने पर मजदूरी भत्ता देने का प्रावधान भी नजर नहीं आता। फ़िल्म दिखाती है कि यह योजना महज़ एक कानूनी प्रावधान बनकर रह गई। बीजू टोप्पो और मेघनाथ मजदूर ग्रामीण आदिवासियों को जागरूक करने के लिए इस योजना की समस्याओं को नाटकीय ढंग से दिखाते हैं, ताकि लोग आसानी से समझ सकें और अपने हक़ के लिए एकजुट हो सकें।

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गाड़ी लोहरदगा मेल (2010)

तस्वीर साभारः Akhra Films

गाड़ी लोहरदगा मेल, फ़िल्म झारखंड में 1907 में शुरू हुई और 2003 में बंद कर दी गई, लोहरदगा पैसेंजर ट्रेन पर आधारित है। इस फिल्म ने साल 2004 में इतिहास रच दिया। फिल्म में ट्रेन के बंद होने आदिवासियों ने किस प्रकार अपने भावों को व्यक्त किया उसे दिखाती है। ट्रेन के आखिरी सफर में सभी यात्री जो रोज अपना सामान बेचने या किसी जगह जाने के लिए इसका इस्तेमाल करते थे, उसे दर्शाया गया। वे अपने इस आखिरी सफर को यादगार बनाने के लिए अपनी-अपनी कहानियां, अनुभव, लोककथाएं एक-दूसरे से बांटते हैं। वे सभी गानों और बांसुरी के माध्यम से अपने भावों को व्यक्त करते हैं। इसमें तीन मुख्य कलाकार डॉ रामदयाल मुण्डा, मुकुंद नायक और मधुमंसूरी हंसमुख हैं। आज ये तीनों ही कलाकार पद्मश्री के सम्मान से सम्मानित हैं।

टेकिंग साइड (2015)

तस्वीर साभारः facebook

सदियों से न जाने कितने ही लोगों ने शोषितों के हक़ की लड़ाई में अपनी जान तक गंवाई है, वेल्सा जॉन उन्हीं में से एक हैं। इनके संघर्ष पर बीजू टोप्पो और मेघनाथ ने 2015 में डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म ‘टेकिंग साइड’ बनाई। फ़िल्म वेल्सा जॉन की मृत्यु के बाद की है जहां झारखंड के विभिन्न लोगों द्वारा उनके कार्यों और संघर्ष सुनने को मिलता है। उनका जन्म केरल में हुआ था और वे एक सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षिका थीं। उन्होंने झारखंड के संथाल आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकार के साथ कोल माफियाओं के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था। उन्होंने झारखंड के आदिवासियों को शिक्षित करने, उन्हें अपने अधिकारों के बारे में जानकारी और उनके साथ हो रहे शोषण के खिलाफ विद्रोह के लिए जागरूक किया। उन्होंने सरकार द्वारा विकास के नाम पर आदिवासियों की ज़मीनों को भू माफियाओं और उद्योगपतियों को देने का पुरजोर विरोध किया। उनके इसी विरोध के चलते 15 नवम्बर 2011 में माइनिंग माफियाओं द्वारा हत्या कर दी गई। यह फ़िल्म उनकी मृत्यु के बाद आदिवासियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और उनके परिचितों द्वारा उनके सामाजिक योगदान और आंदोलनों को दिखाती है।

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झरिया (2018)

तस्वीर साभारः Akhra films

‘झरिया’ झारखंड के सिमोन उरांव के संघर्षों और कार्यों पर आधारित फिल्म है। उन्होंने झारखंड के आदिवासियों के सामने आ रही पानी की समस्या को दूर करने के लिए कई कार्य किए। उनके गांव वाले कृषि के लिए पूरी तरह वर्षा जल पर निर्भर थे, जिस वजह से उन्हें कृषि करने में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता था। उन्होंने इस समस्या को हल करने के उपाय शुरू किया। उन्होंने मात्र 15 साल की उम्र से ही डैम बनाने की शुरुआत की। वे 1951 से जल, जंगल और जमीन के लिए काम कर रहे हैं। सिंचाई जलाशयों के निर्माण के साथ ही पर्यावरण परियोजना जिसमें बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और कुओं-तालाबों की खुदाई शामिल है इसमें 51 गाँव आते हैं। उन्होंने 2020 तक तीन डैम, छह तालाब और दस कुओं का निर्माण किया। उन्हें झारखंड का ‘वॉटर मैन’ भी कहा जाता है। गांव वाले उन्हें ‘सिमोन बाबा’ कहकर बुलाते हैं। 1964 में गांव वालों ने उन्हें ‘परहा राजा’ यानी जनजाति प्रमुख घोषित किया था। सिमोन उरांव को 2016 में भारत सरकार ने उनके सामाजिक योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

हमें विकास की धूल नहीं चाहिए (we do not need Dust of Development) 

यह फ़िल्म खनिज संपदा से संपन्न भारत के उन क्षेत्रों की कहानी को बयां करती है जहां देश की सबसे गरीब आबादी आवास करती है यानी देश के जिन इलाकों में सबसे अधिक सम्पदा है, उन्हीं इलाकों में सबसे अधिक गरीबी भी है। वहीं, सबसे अधिक प्रतिरोध के स्वर भी उठते हैं। जहां एक तरफ देश में विकास के नाम पर अडानी-अंबानी जैसे कुछ औद्योगिक घरानों के हाथों में जल, जंगल और जमीन हड़पने का अधिकार दे दिया गया है। वहीं, आदिवासियों को उनकी ही जमीन और वनों के अधिकार से वंचित कर उन्हें विस्थापन और भूखा मरने के लिए विवश कर दिया जा रहा है।

फ़िल्म बताती है कि आदिवासी पूंजीपतियों की तरह प्रकृति पर कब्ज़ा नहीं करना चाहते हैं। वे न उस पर अपना वर्चस्व जताना चाहते हैं। वे प्रकृति के साथ-साथ जीने में विश्वास करते हैं, विनाश में नहीं। निर्देशक बीजू टोप्पो और मेघनाथ ने फ़िल्म के माध्यम से दिखाया है कि झारखंड में सालों से विकास के नाम पर माइनिंग कम्पनियों के अधिक से अधिक खनिज संपदा को लूटने की भूख ने न केवल प्रकृति और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया बल्कि वहां के स्थानीय आदिवासियों के जीवन पर भी बुरा प्रभाव डाला है। फ़िल्म में विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं के साक्षात्कार, झारखंड और वहां के निवासियों की परिस्थितियों को बताते हैं। फिल्म में दिखाया है कि किस तरह सरकार और उद्योग कंपनियां झारखंड के विकास को खनिज दोहन से आगे नहीं देख पा रही है। इन्हीं आगे के विकल्पों को फ़िल्म पेश करती है।

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संघर्ष और तमाम आंदोलनों को शब्दबद्ध और दृश्यबद्ध करने का काम कलम और कैमरा से बखूबी किया जा रहा है। अब आदिवासी समाज अपनी अस्मिता के लिए लड़ने और अपने संघर्षरत आंदोलन को दुनिया के समक्ष पेश करने के लिए किसी अन्य का मोहताज नहीं है। आज उसी आदिवासियत संघर्ष की देन है कि महादेव टोप्पो, बीजू टोप्पो, मेघनाथ, रंजीत उरांव, संजय काक, श्रीप्रकाश और निरंजन कुजूर जैसे प्रतिबद्ध निर्देशक हैं। इन्होंने दर्शक की सहूलियत के हिसाब से न केवल क्षेत्रीय भाषाओं में फिल्मों और दस्तावेजी फिल्मों का निर्माण किया बल्कि उन्होंने मुख्य धारा की भाषाओं हिंदी और अंग्रेजी में भी निर्देशन किया है।

लेकिन यहां यह भी कहना होगा कि इन लोगों ने निर्देशक की भूमिका से आगे जाकर काम किया है। उन्होंने न केवल प्रतिरोध के स्वर को एकीकरण के सूत्र में बांधा है बल्कि जनता की पहुंच से दूर सिनेमा की अहमियत और उसकी ताकत को देखते हुए खुद अलग-अलग ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जाकर उन फिल्मों का प्रदर्शन कर उन्हें समझाया भी है। ‘अखरा रांची’ फ़िल्म प्रोडक्शन समूह के माध्यम से बीजू टोप्पो और मेघनाथ ने यह भूमिका निभायी है। उनकी फिल्मों में “गाँव छोड़ब नहीं, जंगल छोड़ब नहीं, माय माटी छोड़ब नहीं लड़ाई छोड़ब नहीं।” का आदिवासी संघर्ष दिखाई देता है।

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मैं दिल्ली से हूँ,  दिल्ली विश्वविद्यालय से  हिंदी साहित्य में एमए किया है। साहित्य और आलोचनाएं पढ़ने के साथ-साथ, कविताएं और लेख लिखना, फिल्में देखना, गाने सुनना और किसी मुद्दे पर अपनी बात रखना बेहद पसंद है। कहने को बहुत कुछ पर लिखने के लिए शब्द नहीं।

 

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