ललितपुर एसएचओ रेप केस
तस्वीर साभार: Keystone via Getty Images
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बीते गुरुवार को खबर आई कि उत्तर प्रदेश के ललितपुर ज़िले में एक 13 वर्षीय दलित किशोरी जो कि सामूहिक बलात्कार की सर्वाइवर थी, उसके साथ उस एरिया के एसएचओ ने कथित तौर पर थाने में फिर से बलात्कार किया गया। यह घटना उस वक्त हुई जब सर्वाइवर सामूहिक दुष्कर्म के खिलाफ़ शिकायत दर्ज कराने थाने गई थी। घटना की खबर आने के बाद अधिकारियों ने उस स्टेशन में घटना के समय थाने में मौजूद सभी 29 लोगों को निलंबित कर दिया जिनमें छह सब-इंस्पेक्टर, छह हेड कांस्टेबल, पांच महिला कांस्टेबल, 10 कांस्टेबल और दो ड्राइवर शामिल हैं। ये सभी लोग बलात्कार के समय पुलिस स्टेशन में मौजूद थे। इस बात का खुलासा सर्वाइवर ने चाइल्ड लाइन NGO को काउंसलिंग के दौरान किया। इसके बाद सर्वाइवर की मां ने इंस्पेक्टर समेत 6 के खिलाफ रेप, बहला-फुसलाकर भगाने का केस दर्ज करवाया।

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लोग सोचते हैं कि बलात्कार एक अकेला अपराध है। लेकिन सर्वाइवर्स के लिए यह अपराधों और संघर्षों की एक आजीवन श्रृंखला की शुरुआत है: मानसिक शोषण, भय, धमकी,  बुनियादी अधिकारों और शिक्षा और एक अच्छी आजीविका से वंचित होना, सूची बहुत लंबी है। किसी भी अपराध के घटित होने के बाद सर्वाइवर व्यक्ति को सिर्फ एक बात याद आती कि वह मदद के लिए पुलिस के पास जाए। मगर सवाल यह है कि अगर पुलिस अधिकारी ही उसके साथ हिंसा करे तो वह सर्वाइवर कहां जाए? एक रेप सर्वाइवर जो पहले से ही शारीरिक और मानसिक रूप से चोटिल है अगर उसके साथ पुलिस अधिकारी गलत व्यवहार करेंगे तो उसका बचा हुआ मनोबल भी टूट जाएगा।

वे रक्षक (पुलिस या सेना या अन्य सुरक्षा बल) जिन्हें आम व्यक्तियों के जीवन की रक्षा के लिए नियुक्त किया जाता है, कई बार वही अपराधी बन जाते हैं। हिरासत/अभिरक्षा में बलात्कार की अवधारणा में न केवल सुरक्षाबल बल्कि अस्पताल, मानसिक संस्थान, आश्रय गृह और किशोर गृह भी शामिल हैं जहां सर्वाइवरों को उनके स्वास्थ्य को फिर से जीवंत करने के लिए भेजा जाता है, दुर्भाग्यवश वहीं पर उनके साथ क्रूरतापूर्वक बलात्कार किया जाता है।

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‘हिरासत/अभिरक्षा’ शब्द का विस्तार

साल 1983 के बाद से आपराधिक कानून ने हिरासत में बलात्कार को व्यापक अर्थ दिया है। 1983 से पहले, इसमें केवल पुलिस थाने में पुलिस अधिकारियों द्वारा बलात्कार था लेकिन अब इसमें शामिल हैं:

  • थाने में पुलिस अधिकारियों द्वारा हिरासत में मौजूद सर्वाइवर के साथ बलात्कार;
  • लोक सेवक द्वारा लोक सेवक की हिरासत में मौजूद महिला से बलात्कार;
  • सेना के जवान द्वारा बलात्कार उस क्षेत्र में जहां सैन्य बल तैनात हैं;
  • जेल, रिमांड होम, महिला गृह और अन्य जगहों पर जहां महिलाएं हिरासत में हैं, वहां के प्रबंधन/कर्मचारियों द्वारा बलात्कार;
  • अस्पताल के कर्मचारियों द्वारा बलात्कार जहां एक महिला अभिरक्षा में हैं।

हिरासत में बलात्कार का मुद्दा 1970 के दशक के अंत में और 1980 के दशक की शुरुआत में सामने आया जब पुलिस हिरासत में महिलाओं के साथ बलात्कार की लगातार घटनाओं की एक श्रृंखला सामने आई जिसमें मथुरा रेप केस, रमीज़ा बी रेप केस, माया त्यागी रेप केस आदि शामिल हैं। इस मुद्दे को महिला आंदोलन ने लामबंद किया था। इसकी शुरुआत मथुरा रेप केस से हुई थी। मथुरा जो 16 साल की लड़की थी, नुंशी नामक एक महिला के घर में घर का काम करती थी। वहीं पर उसने नुंशी के भाई के साथ प्रेम संबंध बनाए। कुछ समय बाद वह नुंशी के भाई के साथ चली गई। मथुरा के भाई ने नुंशी और उसके भाई के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज कराया।

पुलिस ने उन्हें ढूंढकर हिरासत में ले लिया। उसी रात मथुरा के साथ दो पुलिसकर्मियों ने थाने में बलात्कार किया। बाद में, जब वह अपने परिवार और दोस्तों से मिली तो उसने उन्हें पूरी घटना बताई। मथुरा की चिकित्सकीय जांच की गई। मेडिकल जांच में कहा गया कि उसका हाइमन पहले से फटा हुआ है और साथ ही उसे कोई शारीरिक चोट नहीं आई है। मामले की सुनवाई पर हाईकोर्ट ने पुलिस आरोपियों को बलात्कार का दोषी पाया और सजा सुनाई लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसला पलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस कांस्टेबल गणपत और तुकाराम को बरी करते हुए कहा कि क्योंकि मथुरा के शरीर पर कोई शारीरिक चोट नहीं मिली थी, जिससे पता चलता है कि मथुरा ने बलात्कार का विरोध नहीं किया और पुलिस अधिकारियों को अपनी सहमति दे दी थी।

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सर्वाइवर ऐसे मामलों में हमेशा मुश्किलों और दिक्कतों से जूझती है। यह मुश्किलें तब और बढ़ जाती हैं जब कि सर्वाइवर दलित, बहुजन, आदिवासी या अल्पसंख्यक समुदाय से आती हो। भारत में दलित, बहुजन महिलाओं और लड़कियों पर अत्याचार, बलात्कार, हिंसा ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और जातिवादी व्यवस्था को मज़बूत करने के लिए सवर्ण जातियों द्वारा एक हथियार के रूप में व्यवस्थित रूप से इस्तेमाल किया जाता रहा है।      

अदालत के इस फैसले के बाद देशभर में इस फैसले का विरोध होने लगा। इस मामले में अदालत की टिप्पणियों ने ‘सहमति’ के प्रश्न पर बड़े पैमाने पर विवाद छेड़ दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के कानून के प्रोफेसर उपेंद्र बक्सी, रघुनाथ केलकर और लोतिका सरकार और पुणे की वसुधा धगमवार ने फैसले में ‘सहमति’ की अवधारणा का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट को एक खुला पत्र भी लिखा। यह मामला सामाजिक और कानूनी दोनों दृष्टिकोणों से स्मरणीय था। इस मामले ने भारत में पहली बार बलात्कार के मुद्दे पर सार्वजनिक विरोध को जन्म दिया और यौन उत्पीड़न कानूनों में सुधार का नेतृत्व किया। इसने भारत में एक महिला आंदोलन को जन्म दिया, जिसने बाद में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए समर्पित कई समूहों को जन्म दिया। लोगों ने भी पुलिस अधिकारियों द्वारा लिंग आधारित हिंसा को समझना शुरू किया कि वास्तव में यह अधिकारियों द्वारा किया गया एक क्रूर कार्य है।

इस घटना के बाद नए कानून भी बनाए गए। भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (बलात्कार के लिए सजा) में धारा 376 (ए), धारा 376 (बी), धारा 376 (सी), धारा 376 (डी) के अधिनियमन और जोड़ के साथ बदलाव किया गया, जिसने हिरासत/अभिरक्षा में बलात्कार को दंडनीय बना दिया। नए संशोधनों के अनुसार किसी भी मामलें में एक बार संभोग स्थापित हो जाने के बाद साबित करने का बोझ आरोपी पर डाल दिया, इन-कैमरा ट्रायल, पीड़ित की पहचान के खुलासे पर प्रतिबंध और बलात्कार के लिए सख्त सजा का प्रावधान किया गया।

पुलिस द्वारा की गई यौन हिंसा को अक्सर एक छिपा हुआ अपराध माना जाता है जो नियमित रूप से रिपोर्ट नहीं किया जाता है। उसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। जैसे, धमकी, सबूत का न होना, अपमानित महसूस करना, प्रतिशोध का डर आदि। साथ ही पुलिस द्वारा की गई यौन हिंसा की शिकायत दर्ज कराने में सर्वाइवर्स को बाधाओं का भी सामना करना पड़ता है क्योंकि यह प्रक्रिया अनावश्यक रूप से कठिन और/या डराने वाली होती है।

पुलिस- मदद और न्याय करनेवाली संस्था?

पुलिस का काम लोगों की मदद करना और उनको न्याय दिलवाना होता है। पुलिस के पास काफी शक्तियां होती हैं। लेकिन अक्सर पुलिस अपनी इन शक्तियों का प्रयोग लोगों के खिलाफ उपयोग करने लगती है। वे महिलाओं के साथ भी गलत व्यवहार करने से परहेज़ नहीं करते हैं। भारतीय आपराधिक कानूनों में, संज्ञेय अपराधों की जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों को व्यापक शक्तियां प्रदान की गई हैं। पुलिस प्राधिकरण इन्हीं शक्तियों का इस्तेमाल गलत तरीके से करते हैं।

पुलिस द्वारा की गई यौन हिंसा को अक्सर एक छिपा हुआ अपराध माना जाता है जो नियमित रूप से रिपोर्ट नहीं किया जाता है। उसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। जैसे, धमकी, सबूत का न होना, अपमानित महसूस करना, प्रतिशोध का डर आदि। साथ ही पुलिस द्वारा की गई यौन हिंसा की शिकायत दर्ज कराने में सर्वाइवर्स को बाधाओं का भी सामना करना पड़ता है क्योंकि यह प्रक्रिया अनावश्यक रूप से कठिन और/या डराने वाली होती है।

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गोविंद बनाम राज्य के वाद में घटना इतनी भयानक थी कि सर्वाइवर महिला को पहले तो पुलिस अधिकारियों ने लाठियों से पीटा और फिर उसके साथ पुलिस निरीक्षक से लेकर कांस्टेबल तक ने एक के बाद एक बलात्कार किया। दुखद प्रकरण में एकरूपता यह है कि जब उन्होंने थाने के अंदर सामूहिक बलात्कार किया, तब वे सभी पुलिसवाले वर्दी में थे और ड्यूटी पर थे। इसके बाद वे बेहोश हुई पीड़ित महिला को थाने के पीछे एक सुनसान जगह पर उठा कर ले गए और 7 फीट गहरी खाई में फेंक दिया। उसके बाद उन पुलिस कर्मियों ने उसे खत्म करने के उद्देश्य से उसके सिर पर बड़े-बड़े पत्थर फेंके। यह सोचकर कि वह मर गई, वे अपने नियमित कर्तव्यों में शामिल होने के लिए वापस पुलिस स्टेशन चले गए।

मद्रास उच्च न्यायालय ने दोषियों को सजा सुनाते हुए कहा था कि सार्वजनिक जीवन में शालीनता और नैतिकता को तभी बढ़ावा और संरक्षित किया जा सकता है जब हम उन लोगों के साथ सख्ती से पेश आते हैं जो सामाजिक मानदंडों का उल्लंघन करते हैं। जब प्राधिकरण में व्यक्तियों द्वारा ऐसा गंभीर अपराध किया जाता है, उदाहरण- पुलिस अधिकारियों द्वारा, न्यायालय को इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि हमारे आपराधिक कानूनों में, संज्ञेय अपराधों की जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों को व्यापक शक्तियां प्रदान की गई हैं।

महिलाओं को समय रहते न्याय प्रदान करने और हिरासत में यौन हिंसा को रोकने के लिए कई बदलाव किए जा चुके हैं लेकिन फिर भी इस तरह की अमानवीय हिंसा रुकने का नाम नहीं लेती हैं। सर्वाइवर थाने में जाने के बाद दोबारा से सर्वाइवर बन जाती है। सर्वाइवर ऐसे मामलों में हमेशा मुश्किलों और दिक्कतों से जूझती है। यह मुश्किलें तब और बढ़ जाती हैं जब कि सर्वाइवर दलित, बहुजन, आदिवासी या अल्पसंख्यक समुदाय से आती हो। भारत में दलित, बहुजन महिलाओं और लड़कियों पर अत्याचार, बलात्कार, हिंसा ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और जातिवादी व्यवस्था को मज़बूत करने के लिए सवर्ण जातियों द्वारा एक हथियार के रूप में व्यवस्थित रूप से इस्तेमाल किया जाता रहा है।      

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दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

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