मेरा गांव जहां की औरतों ने आज तक 'सैनिटरी पैड' का नाम तक नहीं सुना
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बिहार की राजधानी पटना के पास मेरा गांव अबदुल्लाह चक। मेरे गांव की अधिकतर महिलाएं खेतों में काम करती हैं। साथ ही अपने घरों की लड़कियों को भी खेतों में साथ काम करने के लिए ले जाती हैं। हमारे गांव के लोग बहुत कम पढ़े-लिखे हैं। यहां की लड़कियां भी स्कूल कम ही जाती हैं। इनके माता-पिता बहुत कम उम्र में इनकी शादी करवा देते हैं। शिक्षा और जागरूकता के अभाव के कारण यहां कि महिलाओं और लड़कियों को पीरियड्स और स्वास्थ्य से जुड़े अन्य मुद्दों की जानकारी कम है।

पीरियड्स के दौरान इन्हें बहुत तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। अपनी जानकारी के अनुसार जिसे जो सुविधा होती है उसके हिसाब से कोई कपड़ा इस्तेमाल करता है तो कोई कुछ और। अबदुल्लाह चक की रेखा देवी कहती हैं, “हम तो कपड़ा ही इस्तेमाल करते हैं।” यह पूछने पर कि उन्हें कपड़ा इस्तेमाल करने के बाद किस तरह की दिक्कत होती है और वह पैड इस्तेमाल क्यों नही करती हैं? इस पर वह बताती हैं कि दिक्कत तो बहुत होती है लेकिन पैड खरीदने के पैसे कहां से आएंगे।

और पढ़ें: महंगे पैड और इसकी सीमित पहुंच के कारण आज भी कपड़े के इस्तेमाल पर निर्भर हैं महिलाएं

जानकारी की कमी

गांव की अधिकतर औरतों और लड़कियों को पीरियड्स के बारे में अच्छे से जानकारी नहीं है। उन्हें यह नहीं पता है की पीरियड्स के वक्त किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए। उन्हें यह भी नहीं पता होता है कि पीरियड्स के समय कपड़ा या फिर सैनिटरी पैड का इस्तेमाल किस तरह करना चाहिए। कभी-कभी तो गंदा कपड़ा इस्तेमाल करने की वजह से उन्हें कई तरह की बीमारियां भी हो जाती हैं। उदाहरण के तौर पर पुनिया देवी भी अबदुल्लाह चक की रहनेवाली हैं। पुनिया देवी भी पढ़ी-लिखी नहीं हैं। इन्होंने तो अपने जीवन में कभी सैनिटरी पैड देखा भी नहीं है तो इस्तेमाल करना तो दूर की बात है। पुनिया देवी शुरू से ही पीरियड्स के दौरान कपड़े का इस्तेमाल करती आई हैं। 

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“अबदुल्लाह चक की रेखा देवी कहती हैं, “हम तो कपड़ा ही इस्तेमाल करते हैं। यह पूछने पर कि उन्हें कपड़ा इस्तेमाल करने के बाद किस तरह की दिक्कत होती है और वह पैड इस्तेमाल क्यों नही करती हैं। इस पर वह बताती हैं कि दिक्कत तो बहुत होती है लेकिन पैड खरीदने के पैसे कहां से आएंगे।”

गांव में दूसरे लोग भी ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं जो इस मुद्दे पर जागरूकता फैला सकें, गांव की महिलाओं और लड़कियों को पीरियड्स के मुद्दे पर जागरूक कर सकें। आंगनवाड़ी में जो महिलाएं काम करती हैं वे भी अपनी सीमित जानकारी के साथ गांव की महिलाओं और औरतों की थोड़ी-बहुत ही मदद कर पाती हैं। कभी-कभी आंगनवाड़ी कार्यकर्ता सैनिटरी पैड्स भी देती हैं। लेकिन जैसा कि हम जानते हैं कि सरकार की तरफ से भी आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को बेहद सीमित संसाधन ही उपलब्ध करवाए जाते हैं। इस गांव में कभी भी हेल्थ कैंप भी नहीं लगते हैं जिससे लोगों को पीरियड्स और प्रजनन स्वास्थ्य के मुद्दे पर जागरूक किया जा सके।

फिलहाल, हमारे गांव में नारी गुंजन नाम की एक संस्था जो खासकर महिलाओ और लड़कियों के लिए काम करती है वह यहां की महिलाओं को पैड बनाना सीखा रही है। इस संस्था के कार्यकर्ता गांव में आकर सैनिटरी पैड का वितरण करते हैं। कोविड-19 के समय भी इस संस्था और इस संस्था के लोगों ने गांव की बहुत ज्यादा मदद की थी। लेकिन यह मदद गांव की सभी औरतों और लड़कियों के लिए काफी साबित नहीं होती।

और पढ़ें: पीरियड्स से जुड़े अंधविश्वास और कुरीतियों के दंश

पीरियड्स से जुड़े अंधविश्वास भी निभाते हैं एक अहम भूमिका

पीरियड्स के दौरान महिलाओं को सामान्य जीवन के कामों में भाग लेने से मना किया जाता है। गांव के लोगों का मानना है कि सुबह उठकर अपने परिवार और अपने जीवन के रोज़मर्रा के कामों को करने के लिए औरतों को ‘शुद्ध’ होना चाहिए। पीरियड्स के दौरान गांव में औरतों और लड़कियों को किसी भी धार्मिक कार्यक्रम या पूजा में भी शामिल नहीं होने दिया जाता है। उन्हें हर तरह से रोका-टोका जाता है। कई परिवारों में उन्हें किचन में भी नहीं जाने दिया जाता है। घर की कोई भी ‘पवित्र पुस्तक’ को उन्हें नहीं छूने नहीं देने दिया जाता है। यह भी कहा जाता है की पीरियड्स के दौरान औरतें और लड़कियां अशुद्ध हो जाती हैं इसलिए अगर वे खाना बनाती हैं तो इस दौरान खाना भी अशुद्ध हो जाता है। इतना ही नहीं पीरियड्स में औरतों और लड़कियों के खाने-पीने पर भी रोक-टोक की जाती है। जैसे खट्टी इमली, अचा और दही आदि चीजों को उन्हें खाने नहीं दिया जाता है।

गांव की अधिकतर औरतों और लड़कियों को पीरियड्स के बारे में अच्छे से जानकारी नहीं है। उन्हें यह नहीं पता है की पीरियड्स के वक्त किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए। उन्हें यह भी नहीं पता होता है कि पीरियड्स के समय कपड़ा या फिर सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करना चाहिए। इस वजह से कभी-कभी तो गंदा कपड़ा इस्तेमाल करने की वजह से उन्हें कई तरह की बीमारियां भी हो जाती हैं। 

पीरियड्स के दौरान औरतें और लड़कियों पर इस तरह की रोक-टोक से उनका भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। इसकी वजह से गांव की अधिकतर लड़कियां अपनी पढ़ाई तक छोड़ देती हैं। गांव की अधिकतर महिलाएं और लड़कियां पीरियड्स के दौरान पुराने कपड़े को कई महीनों तक धोकर इस्तेमाल करती हैं जिससे उन्हें कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। 

और पढ़ें: भारत की मेंस्ट्रुएशन नीतियां : क्या पीरियड्स को सार्वजनिक स्वास्थ्य और मानवाधिकार मुद्दा मानती हैं हमारी सरकारें? 

ज़रूरत है जागरूकता और संसाधनों की

किशोर लड़कियों और महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य में सुधार के लिए पीरियड्स से जुड़े मिथकों और सामाजिक अंधविश्वासों को सबसे पहले दूर करना होगा। इस संबंध में सबसे पहले ज़रूरी है कि मेरे गांव की किशोरियों और महिलाओं को पीरियड्स, स्वास्थ्य और स्वच्छता से संबंधित विषयों पर जागरूक किया जाए। पीरियड्स को लेकर समुदाय आधारित स्वास्थ्य शिक्षा अभियान और स्कूलों के ज़रिये लड़कियों में जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है।

पीरियड्स के बारे में लड़कों और पुरुषों को भी जानकारी होना चाहिए ताकि वह अपने घर की औरतों, अपनी माँ, बहन और पत्नी आदि को पीरियड्स के दौरान ज़रूरी संसाधन मुहैया करवा सकें। उनके साथ होनेवाले भेदभाव को खत्म करने में साथ दे सकें। हमारे गांव में तो न के बराबर लड़के या पुरुष महिलाओं की मदद करते हैं। पीरियड्स के बारे में सरकारी स्वास्थ कार्यकर्ताओं जैसे आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को भी अधिक से अधिक जागरूक किया जाना चाहिए ताकि ग्रामीण इलाकों में वे इस जागरूकता अभियान को आगे बढ़ा सकें। आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ग्रामीण इलाकों में पीरियड्स से जुड़े मिथकों को दूर करने में एक अहम भूमिका निभा सकती हैं।

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तस्वीर साभार: रीता कुमारी

मुझे टीम वर्क काम करना बहुत पसंद है। मैं कराटे भी करती हूं। मुझे महिलाओं और लड़कियों के साथ काम करने में बहुत अच्छा लगता है। मैं आगे भी इसी क्षेत्र में काम करना चाहती हूं। मेरी छह बहने हैं और मैं सबसे बड़ी हूं। हंसना और लोगों को हंसाना बहुत अच्छा लगता है। किताबें पढ़ना और लोगों से अलग-अलग मुद्दों पर बातें करना भी मुझे बेहद पसंद है।

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