ऑटिज़्म और महिलाएं: महिलाओं के एहसास की मान्यता, उनकी चुनौतियों और समस्याओं की बात
तस्वीर साभार: Swanscotland
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ऑटिज़्म या ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर मस्तिष्क की सूचनाओं को समझने और समझ के हिसाब से काम करने के तरीके को प्रभावित करता है, जिससे लोगों को सामाजिक संबंध, संचार और व्यवहार में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यह एक जटिल स्थिति है और हर किसी को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करती है। दुनिया में लगभग हर 44 बच्चों में से एक ऑटिज़्म से पीड़ित होता है। लेकिन इसके बावजूद आम लोगों में इसकी जागरूकता बहुत कम है। हालांकि, महिलाएं और पुरुष दोनों ही ऑटिज़्म से पीड़ित होते हैं, लेकिन सदियों से ऑटिज़्म से जुड़े शोध मूल रूप से पुरुषों पर होते आए हैं।

इसलिए आज भी लोगों और विशेषज्ञों में यह धारणा बनी हुई है कि यह लड़कों को ज्यादा प्रभावित करती है। इस पूर्वाग्रह के वजह से महिलाओं में ऑटिज़्म का निदान पुरुषों की तुलना में देर से या होता ही नहीं है। इस तरह वे ऑटिज़्म से जुड़ी विशेष चिकित्सा और सहायता से दूर हो जाती हैं। अमेरिका स्थित नेशनल ऑटिस्टिक सोसाइटी के अनुसार ऑटिस्टिक पुरुषों और महिलाओं का अनुपात 2:1 से 16:1 के बीच हो सकता है। लेकिन, तत्कालीन समय के आंकलन के अनुसार यह अनुपात में 3:1 पाया गया, यानि हर तीन पुरुष में एक महिला ऑटिज़्म से पीड़ित हो रही है।

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नई दिल्ली स्थित एक्शन फॉर ऑटिज़्म की निदेशक डॉ. निधि सिंघल बताती हैं, “मैं यह नहीं कह सकती कि पहले की तुलना में जागरूकता बढ़ी है। हालांकि, हमारे देश में ऑटिज़्म के क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम हुआ है। लेकिन दूसरे देशों से तुलना करें, तो इसके निदान और चिकित्सा के क्षेत्र में एक लम्बा रास्ता तय किया जाना बाकी है। अब लोगों ने समझना शुरू किया है कि ऑटिज़्म क्या है। आज हमारे पास दो से ढाई साल के बच्चे भी आ रहे हैं। कोरोना महामारी के वक़्त चूंकि बच्चों के साथ माता-पिता ज्यादा समय बिता पाए, इसलिए भी यह संख्या पहले से बढ़ी है।”

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अमेरिका की नेशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन की वेबसाइट पबमेड के अनुसार ऑटिज़्म से पीड़ित लड़कियों और महिलाओं का अक्सर इलाज नहीं होता, गलत इलाज किया जाता है या काफी उम्र के बाद उन्हें चिकित्सा की सुविधा मिलती है। इस कारण उनका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और आज़ादी प्रभावित हो सकती है। डॉ. निधि कहती हैं, “कोरोना महामारी के बाद बहुत से वयस्क हमारे पास अपने इलाज के लिए आ रहे हैं जिनमें बहुत सी हाई फंक्शनिंग कामकाजी या घरेलू महिलाएं हैं, जो कहीं न कहीं महसूस कर रही हैं कि वह सामाजिक रूप से फिट नहीं बैठ रही।”  

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क्यों ऑटिज़्म महिलाओं के लिए हो सकता है ज्यादा चुनौतीपूर्ण   

ऑटिज़्म का निदान प्रमुख नैदानिक वर्गीकरण प्रणालियों के विवरण से जुड़ा है, जो मुख्य रूप से पुरुषों पर किए गए शोध और अवलोकन (ऑब्जरवेशन) पर आधारित है। महिलाएं अक्सर अपनी कठिनाइयों को छिपाने या खुद को सामान्य दिखाने में बेहतर होती हैं। इसलिए, जब महिलाएं ऑटिज़्म से पीड़ित होती हैं, तो वह लगातार समाज के उन मानदंडों के अनुसार खुद को फिट बैठाने की कोशिश करती हैं, जो उनके लिए बनाए गए हैं। इस क्रम में कई बार ऑटिज़्म के लक्षण या तो दिखते नहीं या फिर नज़रअंदाज़ हो जाते हैं। डॉ. निधि कहती हैं, “ऑटिज़्म से पीड़ित लोगों को चिकित्सकीय जानकारी की कमी में कई बार दूसरे मानसिक विकार जैसे ओसीडी, चिंता, उत्तेजना या अवसाद से ग्रसित मानकर इलाज शुरू कर दिया जाता है।”

डॉ. निधि बताती हैं, “हालांकि ऑटिस्टिक पुरुषों के अनुभव को भी नकारा जाता है लेकिन यह महिलाओं के साथ ज्यादा होता है। इसलिए कई बार महिलाएं ‘इम्पोस्टर सिंड्रोम’ से भी ग्रसित हो जाती हैं, जिससे उनमें आत्मविश्वास की कमी हो सकती है।”  

लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि इन मानसिक समस्याओं के इलाज होने से ही ऑटिस्टिक लोगों को लाभ होगा। अनेक महिलाओं का खुद को अलग महसूस करने को तुच्छ और मामूली बताया जाता है। लोग अक्सर उन्हें मज़बूत बनने, दूसरों के अनुसार खुद को एडजस्ट करने या ज्यादा संवेदनशील नहीं होने को कहते हैं। महिलाओं के लिए शर्मीला या आज्ञाकारी होना, नियमों का पालन और अपनी समस्याओं पर बात न करना या शिकायती न होना गुण माने जाते हैं। ऐसे में, कई बार ऑटिज़्म से पीड़ित महिलाओं के लक्षण नज़रअंदाज़ हो जाते हैं क्योंकि उन्हें ‘अच्छी महिला’ कहा जाता है। वहीं इसके उलट, ऐसी ऑटिस्टिक महिलाओं के लक्षणों को भी अक्सर मामूली समझा जाता है, जो बहुत बात या सवाल करती हैं। उन्हें अमूमन चुप रहने की सलाह दी जाती है जो अन्य समस्याओं का कारण बन जाता है।”

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पबमेड पर जारी हुए एक रिपोर्ट से पता चलता है कि महिलाओं में ऑटिज़्म के लक्षण बहुत अलग और अनोखे हो सकते हैं। अमूमन महिलाओं में ऑटिज़्म के लक्षण बहुत हल्के और दबे तरीके से दिखते हैं। यह विशेषकर उन हाई फंक्शनिंग महिलाओं पर लागू होता है जो अच्छी तरह बोल लेती हैं और जिनका आईक्यू औसत या औसत से ज्यादा होता है। यह शोध महिलाओं में ऑटिज़्म के निदान में मौजूदा रूढ़िवादी सोच और ऑटिस्टिक महिलाओं की पहचान करने के लिए आवश्यक संवेदनशीलता की कमी को भी दर्शाता है। यह शोध उन महिलाओं के अनोखे लक्षणों के आधार पर ऑटिज़्म को चिन्हित करने की बात नहीं करता, जो अपनी समस्या छिपाने में कामयाब होती हैं।

इसके अलावा, ऑटिस्टिक महिलाओं को किशोरावस्था में अलग-अलग समस्याएं जैसे अत्यधिक चिंता या घबराहट, अवसाद, आत्महत्या की संभावना, खाना खाने का विकार और अन्य चिकित्सकीय समस्याओं की संभावना बहुत ज्यादा होती है। समय पर इलाज करने से इन समस्याओं को कम किया जा सकता है जो ऑटिज़्म से पीड़ित महिलाएं के शारीरिक, मानसिक और यौन स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक या व्यक्तिगत जरूरतों में बाधा डालती है। डॉ. निधि बताती हैं, “हालांकि ऑटिस्टिक पुरुषों के अनुभव को भी नकारा जाता है लेकिन यह महिलाओं के साथ ज्यादा होता है। इसलिए कई बार महिलाएं ‘इम्पोस्टर सिंड्रोम’ से भी ग्रसित हो जाती हैं, जिससे उनमें आत्मविश्वास की कमी हो सकती है।”   

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चूंकि ऑटिज़्म दिमाग के समझने की क्षमता को प्रभावित करती है, इसलिए पीरियड्स की सही जानकारी के अभाव में इस प्रक्रिया को समझना और जीना अपनेआप में एक चुनौती है। पीरियड्स के दौरान होने वाले एहसास या शारीरिक बदलाव से खुद को परिचित करना ऑटिस्टिक लोगों के लिए मुश्किल हो सकता है। रास्तों पर सार्वजनिक शौचालयों का इस्तेमाल, स्वच्छता उत्पाद के बदलने या जांचने की ज़रूरत या महज पीरियड्स में होने वाले दर्द और असहजता से मुकाबला करना ऑटिस्टिक लोगों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हर व्यक्ति में पीरियड्स का अनुभव अलग होता है और समय, उम्र, रहन-सहन या प्रजनन के साथ इसमें बदलाव होने की संभावना होती है, जिसे मानना और अपनाना ऑटिस्टिक लोगों के लिए आसान नहीं।

ऑटिस्टिक महिलाओं को किशोरावस्था में अलग-अलग समस्याएं जैसे अत्यधिक चिंता या घबराहट, अवसाद, आत्महत्या की संभावना, खाना खाने का विकार और अन्य चिकित्सकीय समस्याओं की संभावना बहुत ज्यादा होती है। समय पर इलाज करने से इन समस्याओं को कम किया जा सकता है

नेशनल ऑटिस्टिक सोसाइटी के एक शोध में अधिकतर ऑटिस्टिक लोगों ने पीरियड्स से संबंधित मुद्दे जैसे स्वच्छता उत्पाद, सुरक्षा और उनके उपयोग पर सही और स्पष्ट जानकारी की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। शोध में शामिल हुए लोगों ने पीरियड्स के दौरान; सामाजिक रूप से मिलने-जुलने में कठिनाइयों के कारण; अपने समकक्षों की मदद और सहयोग की संभावना कम होने की सूचना दी। साथ ही, महिलाओं के अलावा दूसरे ऑटिस्टिक लोगों ने पीरियड्स पर बातचीत के लिए जेंडर न्यूट्रल भाषा इस्तेमाल किए जाने की इच्छा जाहिर की।

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ऑटिस्टिक महिलाओं के साथ यौन हिंसा होने की संभावना अधिक होती है 

हालांकि, ऑटिस्टिक लोगों का जीवनभर उत्पीड़ित होने की संभावना बनी रहती है लेकिन यह महिलाओं के लिए ज्यादा होता है। अमूमन, ऑटिस्टिक लोगों को किसी भी प्रकार के उत्पीड़न के बाद पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसॉर्डर (PTSD) का खतरा भी बना रहता है। अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों के इस विषय पर संयुक्त रूप से एक शोध में यह पाया गया कि ऑटिस्टिक महिलाओं को यौन हिंसा का खतरा अधिक होता है। इस शोध के अनुसार जिन महिलाओं के ऑटिस्टिक लक्षण सबसे ज्यादा थे, उनमें यौन हिंसा, शारीरिक या भावनात्मक रूप से दुर्व्यवहार, यौन संपर्क बनाने के लिए दबाव का सामना करना और PTSD होने की संभावना भी अधिक पाई गई। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और चिकित्सकीय पत्रिकाओं के प्रकाशक फ्रंटियर्स मीडिया की एक रिपोर्ट अनुसार हर दस ऑटिस्टिक महिलाओं में नौ ऑटिस्टिक महिलाएं यौन हिंसा का सामना करती हैं।

ऑटिज़्म के साथ हमेशा से कई मिथक जुड़े रहे हैं। कई बार यह देखा गया है कि ऑटिस्टिक बच्चों की मांओं को उनकी स्थिति के लिए दोष दिया जाता है। डॉ. निधि कहती हैं, “आज पूरी दुनिया में यह साबित हो चुका है कि मां की इसमें कोई भूमिका नहीं होती लेकिन फिर भी ऐसा सुनने को आता है।” डॉ. निधि बताती है कि माता-पिता या परिवेश का बच्चे के ऑटिस्टिक होने में कोई भूमिका नहीं होती। ऑटिज़्म को लेकर समस्या तब और बढ़ जाती है जब स्कूल ऐसे बच्चों को प्रवेश देने से माना करते हैं। साथ ही, सरकार की योजनाएं बहुत ज्यादा चिकित्सकीय खर्च नहीं देती और सिर्फ एक निजी कंपनी को छोड़ कोई अन्य निजी कंपनी ऑटिज़्म का कवरेज नहीं देती। इस तरह आजीवन चिकित्सा कराते रहना एक अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन जाता है।

एक ऐसे देश में जहां लड़कियों को आर्थिक बोझ समझा जाता हो, वहां उनके एक जटिल स्वास्थ्य समस्या पर लगातार खर्च करना पितृसत्तात्मक समाज बेफिज़ूल खर्च ही समझता है। इसके अलावा, हाशिये पर रह रहे लोगों का चिकित्सा तक पहुंच हो, तो भी, इस लाइलाज अवस्था के चिकित्सा पर खर्च करते रहना उनके लिए विलासिता बन जाती है। इसलिए जागरूकता के साथ-साथ ऑटिज़्म से पीड़ित लोगों के प्रति संवेदनशीलता, बेहतर स्वास्थ्य बीमा योजनाएं और लैंगिक दृष्टिकोण की ज़रूरत है।

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तस्वीर साभार: Swanscotland

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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