कैसे लैंगिक समानता में विश्वास रखनेवाले पिता बेटियों की ज़िंदगी में बदलाव ला सकते हैं
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तनु को घर की आर्थिक तंगी की वजह से अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी। घर में सब ठीक था, फिर एक दिन उसके पिता ने अचानक कहा कि अब उनकी आर्थिक हालत ठीक नहीं है, इसलिए वो तनु को आगे नहीं पढ़ा सकते है, जिसके बाद आठवीं कक्षा के बाद तनु ने पढ़ाई छोड़ दी। तनु की तीन बहन और दो भाई हैं। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है, जिसके चलते तीनों बहनों को अपनी पढ़ाई की क़ुर्बानी देनी पड़ी।

तनु बताती हैं कि उनकी ही तरह उसकी बड़ी बहन की पढ़ाई छुड़वा दी गई थी और कुछ दिन बाद उसकी शादी कर दी गई। छोटी उम्र में जल्दबाज़ी में रिश्ता हुआ जिसकी वजह से उसकी बहन की ज़िंदगी में घरेलू हिंसा रोज़मर्रा की बात हो गई। लेकिन ‘लोक-लाज’ की वजह से सारी हिंसाओं के सहते उसकी बहन ने ससुराल ही हर शर्त मान ली। तनु अक्सर कहती है कि अगर उसे उसके पिता का साथ मिलता तो वह बहुत कुछ कर सकती थी, पढ़-लिखकर अपने परिवार को गरीबी से निकाल सकती थी। लेकिन तनु जैसे कई परिवारो में तो आज भी बेटियों को पिता से बात करने में भी डर लगता है।

हमेशा कहा जाता है कि बेटियां अपने पिता से ज़्यादा क़रीब होती हैं। लेकिन ऐसा सिर्फ़ कुछ ही परिवारों में देखने को मिलता है। अगर हम बात करें ग्रामीण क्षेत्रों की तो आज भले ही यहां भी संयुक्त परिवार अब एकल परिवार में बदल रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद बेटियों का लगाव पिता से सीमित ही देखने को मिलता है। ये दूरी धीरे-धीरे बेटियों की परवरिश में से पिता का साथ और उनके भरोसे को हटा देती हैं। एक समय ऐसा आता है कि पिता सिर्फ़ एक शासक और पोषक के रूप में ही दिखाई पड़ता है, जिसकी ज़िम्मेदारी शादी तक बेटी की सुरक्षा और खाना उपलब्ध करवाने की बन होती है।

और पढ़ें: पहली किस्त: क्या बेटियों के लिए उनके ‘पिता का घर’ सबसे महफूज़ होता है?

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पर सच्चाई ये है कि जब भी हमलोग परवरिश की बात करते है तो पूरा समाज बस महिलाओं की ओर देखने लगता है, जैसे बच्चों की परवरिश की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ माँ की ही हो। पर इसमें कहीं भी पिता की भूमिका तय नहीं की जाती है। लेकिन अगर हम देखें तो बच्चों की परवरिश में माता-पिता दोनों का होना बेहद ज़रूरी है, क्योंकि इन दोनों का साथ ही बच्चों के विकास को दिशा देता है। अब ऐसे में जब हम बात करते हैं बेटियों की तो कहा जाता है कि बेटियों का बचपन से लगाव उसके पिता के प्रति ज़्यादा देखने को मिलता है और बेटियों अपने पिता के साथ रहना ज़्यादा पसंद करती है। ये अलग बात है कि ऐसे हमारे आस-पास कुछ परिवारों में ही देखने को मिलता है। हमारे आस-पास पिता और बेटी के रिश्ते में लिहाज और डर अधिक हावी नज़र आता है।

बेटियों का लगाव पिता से सीमित ही देखने को मिलता है। ये दूरी धीरे-धीरे बेटियों की परवरिश में से पिता का साथ और उनके भरोसे को हटा देती हैं। एक समय ऐसा आता है कि पिता सिर्फ़ एक शासक और पोषक के रूप में ही दिखाई पड़ता है, जिसकी ज़िम्मेदारी शादी तक बेटी की सुरक्षा और खाना उपलब्ध करवाने की बन होती है।

पर अब समय बदल रहा है, इसलिए हमें भी बदलना होगा और अब पिता नहीं बल्कि नारीवादी पिता को प्रोत्साहित करना होगा क्योंकि कई बार ऐसा देखा गया है कि जो बेटियां अपने पिता के क़रीब होती हैं और उनके साथ लगातार बात-व्यवहार में बनी होती है उन्हें आगे बढ़ने के अधिक मौके मिलते हैं, उन पर रोक-टोक कम होती है। ऐसे में अगर पिता बेटियों के साथ अपने रिश्ते को क़ायम रखते हैं और अपनी परवरिश में अगर कुछ बुनियादी बातों का ध्यान रखें तो वे अपनी बेटी के एक मज़बूत सपोर्ट सिस्टम साबित हो सकते हैं।

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आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दें

आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना किसी भी महिला के साथ होने वाली हिंसा के स्तर और इसकी संभावना को काफ़ी कम करता है। ऐसे में अगर पिता बचपन से बेटी को दुल्हन बनने की बजाय उसे भी बेटों की तरह आगे बढ़ने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के लिए कहते हैं, इसके मौके बराबरी से उनके सामने रखते हैं तो धीरे-धीरे लड़कियां भी अपने रास्ते तलाशती हैं और सपने देखना शुरू करती हैं। उन्हें तब यह डर नहीं सताता कि उनके सपने देखने से पहले ही उनकी शादी की बात शुरू हो जाएगी। इसलिए पिता को हमेशा बेटियों को यह सीख देनी चाहिए कि उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना है और उन्हें हमेशा इसके फ़ायदे भी बताना चाहिए। इसके लिए बचपन से ही बेटियों को सपने देखने के प्रेरित करना चाहिए, उन्हें आगे बढ़ने और पढ़ने का बराबर मौका देना चाहिए, जिससे वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने की दिशा में आगे बढ़ सकें।  

न जाने कितनी लड़कियां हैं जो अपने पिता के सपोर्ट के बिना अपनी पढ़ाई, विकास और अवसरों से दूर हो जाती हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि परवरिश की पहल में पिता की भागीदारी को तय किया जाए और उन्हें अपनी बेटियों के प्रति बचपन से ही कुछ कदम उठाने के लिए प्रेरित किया जाए।

बेटियों को एहसास दिलाएं पिता घर भी उनका अपना घर है

बचपन से ही लड़कियों को उनके भाइयों द्वारा यह कहकर चिढ़ाया जाता है कि वे तो अपने ससुराल चली जाएंगी, फिर पूरा घर उनके भाई का हो जाएगा। बचपन में मज़ाक़ में कही जानेवाली ये बात, हर बार यह एहसास दिलाना कि पिता का घर उनका अपना घर नहीं है बेटियोंके मन में इस कदर बैठती जाती है कि बेटियां सम्पत्ति के अधिकार से वंचित हो जाती हैं। वे यह तक सोच नहीं पाती कि जिस घर में उन्होंने जन्म लिया है वह उनका अपना घर है, जिसकी वजह से अक्सर जब महिलाएं शादी के बाद घरेलू हिंसा का सामना करती हैं तो उसे सहती हैं, क्योंकि उन्हें इस बात का हमेशा डर होता है कि उनके पास अपनी कोई छत, कोई घर नहीं है। इसलिए ज़रूरी है कि अगर हम वाक़ई में अपनी बेटियों से प्यार करते हैं तो उन्हें बचपन से ही ये सिखाएं कि उनका मायका उनका अपना घर है, जैसा उसके भाई का है। यह बात बेटियों को हमेशा मानसिक रूप से आश्वस्त करती है कि उनके पास उनकी अपनी छत है।

तनु जैसी ढ़ेरों लड़कियां हैं जो अपने पिता के सपोर्ट के बिना अपनी पढ़ाई, विकास और अवसरों से दूर हो जाती हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि परवरिश की पहल में पिता की भागीदारी को तय किया जाए और उन्हें अपनी बेटियों के प्रति बचपन से ही कुछ कदम उठाने के लिए प्रेरित किया जाए। इस पितृसत्तात्मक समाज में ऐसा करना कोई आसान काम नहीं है, लेकिन ये भी विश्वास है कि ये नामुमकिन भी नहीं है। अपने इस लेख की पहली किस्त में मैंने आपके साथ दो बुनियादी कदम के बारे में बताया और बाक़ी के कदमों को अपने लेख की दूसरी किस्त में साझा करूंगी। 

और पढ़ें: तीसरी किस्त: ‘पिता के घर’ में अस्तित्व ढूंढती बेटियां


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रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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