तीसरी किस्त: बेटियों के सा हिंसा को नज़रंदाज़ कर दिया जाता है
तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
FII Hindi is now on Telegram

जब किसी के यहां बेटा पैदा होता है तो कहा जाता है कि उन्हें ‘पुत्र रत्न’ की प्राप्ति हुई है जैसा बेटा नहीं कोई नायाब हीरा हो। लेकिन बेटियों के लिए शायद ही कभी ऐसे शब्द नहीं कहे जाते हैं। उनके लिए ‘लक्ष्मी’ शब्द इस्तेमाल किया जाता है, जो दूसरों की सुख-समृद्धि का काम करती है। कहीं न कहीं हमारी भाषा से भी हम अपने विचार दिखाते हैं। इसलिए जैसा भेदभाव हम लोग अपने घर में करते हैं, वही भेदभाव अपनी भाषा में भी इस्तेमाल करते हैं। फिर धीरे-धीरे यही भाषा बेटियों को ‘पराया धन’ बताने लगती है। पराया धन यानी कि शादी करके दूसरे के घर जाकर रहना।

जब तक लड़कियों की शादी नहीं होती उसके पहले उनकी ज़िंदगी कैसी होती है? उनकी चुनौतियां कैसी होती हैं? इन मुद्दों पर हम ज़्यादा बात नहीं करते हैं। इसकी शायद एक वजह यह भी है कि हम कभी भी बेटी के पिता के घर को उनका अपना घर मानते ही नहीं हैं। इसलिए जो घर अपना नहीं है वहां होनेवाली किसी भी तरह की समस्या या हिंसा को नज़रंदाज़ कर दिया जाता है। अपनी पिछली की दो किस्त में लिखे लेखों में मैंने उन्हीं चुनौतियों की बात की थी, जिसे अक्सर लड़कियों को अपने पिता के घर में झेलना पड़ता है। अपने इस लेख में मैं कुछ और भी नयी चुनौतियों के बारे बात करने जा रही हूं, जिसका सामना तो हम लड़कियां करती हैं पर इस पर कभी बात नहीं होती है।

और पढ़ें: पहली किस्त: क्या बेटियों के लिए उनके ‘पिता का घर’ सबसे महफूज़ होता है?

गतिशीलता पर कड़ा शिकंजा

जब भी मैं किसी भी लड़की को देखती हूं जो कहीं घूमने गई है तो मैं भी अपने घर में घूमने जाने की बात करती हूं। लेकिन हर बार मुझ से यही कहा जाता है कि जब शादी हो जाएगी तो जहां मन करेगा वहां घूमना। जब भी कभी कोई अच्छा सूट या कपड़ा ख़रीदने का मन होता है तो कहा जाता है कि शादी हो जाएगी तो अपने पति से मांगना। अगर इन सबके ख़िलाफ़ जाकर मैं अपने पैसे से कुछ चीजें ख़रीद लूं तो क़यामत आ जाती है। एक ही पल में मुझे ‘आवारा और मनमानी करनेवाली’ का टैग दे दिया जाता है।

Become an FII Member

जब तक लड़कियों की शादी नहीं होती उसके पहले उनकी ज़िंदगी कैसी होती है? उनकी चुनौतियां कैसी होती हैं? इन मुद्दों पर हम ज़्यादा बात नहीं करते हैं। इसकी शायद एक वजह यह भी है कि हम कभी भी बेटी के पिता के घर को उनका अपना घर मानते ही नहीं हैं।

कहने का मतलब यह है कि लड़कियां कहां जाएंगी, क्या करेंगीं, क्या पहनेंगी और कैसे अपनी ज़िंदगी जिएंगी, ये सभी छोटे-बड़े फ़ैसले पर हमारे परिवार का पूरा वर्चस्व होता है। जैसे ही कोई उस वर्चस्व को चुनौती देता है तो कई बार अपनी बात मनवाने के लिए हिंसा का भी इस्तेमाल किया जाता है। मेरे पास के गाँव की एक लड़की ने जब एक पतंगबाज़ी कार्यक्रम में हिस्सा लिया तो उससे एक साल बड़े भाई ने उसके साथ बुरी तरह मारपीट की। ऐसा इसलिए क्योंकि वह लड़की होकर लड़कों की तरह पतंग उड़ा रही थी। लड़कियां अपनी ज़िंदगी को कैसे जीना चाहती हैं, उनके सपने और उनकी सहमति को कोई भी अहमियत नहीं दी जाती है।

और पढ़ें: दूसरी किस्त: पिता के घर में बेटियों की वे चुनौतियां जिन पर बोलना ‘मना’ है

हर हिंसा को नज़रंदाज़

“उस रिश्तेदार ने तुम्हें प्यार से छुआ होगा, तुम्हें ऐसे ही बुरा लग रहा है।” असुरक्षित स्पर्श को लेकर अक्सर ऐसी बात कही जाती हैं, जब भी कोई छोटी बच्ची अपने साथ होनेवाली हिंसा के ख़िलाफ़ अपने माता-पिता को कहती है। इसके बाद जब बात भाई के मारपीट करने या अन्य किसी रिश्तेदार के गाली-गलौच करने की आती है इसे हमेशा नज़रंदाज़ किया जाता है।

गाँव में अक्सर देखती हूं कि जब परिवार में लड़कियों के साथ बुरा बर्ताव शुरू होता है तो उसे यह कहकर नज़रंदाज़ करते हैं कि कौन सा उन्हें इस घर में जीवनभर रहना है, जब शादी हो जाएगी तो अपने घर चली जाएंगी। यही वजह है कि जब भी अविवाहित लड़कियां हिंसा की शिकायत जब दर्ज़ करवाती हैं तो अधिकतर मामले अपनी मर्ज़ी से शादी करने पर घरवालों द्वारा परेशान करने के होते हैं, लेकिन घर में भाई-पिता ने मारपीट की या फिर उनका बाल यौन शोषण हुआ, ऐसी कोई भी शिकायत कभी दर्ज़ नहीं होती है।

“जब भी मैं किसी भी लड़की को देखती हूं जो कहीं घूमने गई है तो मैं भी अपने घर में घूमने जाने की बात करती हूं। लेकिन हर बार मुझ से यही कहा जाता है कि जब शादी हो जाएगी तो जहां मन करेगा वहां घूमना। जब भी कभी कोई अच्छा सूट या कपड़ा ख़रीदने का मन होता है तो कहा जाता है कि शादी हो जाएगी तो अपने पति से मांगना। अगर इन सबके ख़िलाफ़ जाकर मैं अपने पैसे से कुछ चीजें ख़रीद लूं तो मुझे ‘आवारा और मनमानी करनेवाली’ का टैग दे दिया जाता है।”

संपत्ति की सुरक्षा पर शादी का खर्च भारी

हमारे संविधान में अब बेटियों को भी पैतृक संपत्ति में बराबर का हक़ है, लेकिन अगर इस क़ानून को ज़मीन पर लागू करने की बात करें तो इसका प्रतिशत बहुत ही कम है। भारतीय समाज में बेटियों को हमेशा पराया धन समझा जाता है और उनकी परवरिश भी इसी सोच के साथ होती है कि उन्हें दूसरे के घर जाना है। इससे धीरे-धीरे पूरा माहौल ही बेटी को धूमधाम से ससुराल भेजने का बन जाता है न की संपत्ति में हिस्सा देने का। पिता का घर आज भी सामाजिक तौर पर बेटियों का घर नहीं माना जाता है, इसलिए उनकी किसी भी चुनौती या उनके साथ होने वाली किसी भी तरह की हिंसा को वैध नहीं माना जाता है।

लेकिन जब बेटियां कभी भी संपत्ति को लेकर यह मांग करती हैं तो घरवाले तुरंत कहते हैं कि उनके हिस्से की संपत्ति को उनकी शादी में खर्च कर दिया गया है, जिसके बाद बेटियां कभी संपत्ति का नाम तक नहीं लेती हैं। संपत्ति महिलाओं को एक मज़बूत आर्थिक आधार देती है और उन्हें आत्मनिर्भर भी बनाती है। शायद कहीं न कहीं इसी सोच के साथ बेटियों की संपत्ति में बात की गई लेकिन दुर्भाग्यवश अगर बात करें ग्रामीण क्षेत्रों की तो ऐसा होना बहुत दूर की बात है।

जब भी हम लोग महिलाओं की बातें करते हैं या उनसे जुड़ी चुनौतियों के बारे में बात करते हैं तो इसमें सभी महिलाओं को हम किन्हीं मुद्दों पर एक-जैसा नहीं मान सकते हैं। कहीं-न-कहीं उनकी उम्र, जाति, वैवाहिक स्थिति और वर्ग जैसे अलग-अलग आधार उनके लिए अन मुद्दों को और भी जटिल बनाते हैं। जैसे जब हम हिंसा की बात करते हैं तो शादीशुदा महिला और बिना शादीशुदा महिला के साथ हिंसा का स्तर और स्वरूप अलग-अलग मौक़े पर अलग रूप में होता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम अपनी समझ को भी विकसित करें तो यह समझें कि पिता के घर में भी बेटियों के कई संघर्ष होते हैं। लेकिन कहीं न कहीं हमारी पितृसत्तात्मक सोच की वजह से हम इस पर कभी बात तो क्या इसके बारे में सोचते तक नहीं हैं।

और पढ़ें: संपत्ति में आखिर अपना हक़ मांगने से क्यों कतराती हैं महिलाएं?


तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply