इंटरसेक्शनलजेंडर पहली किस्त: क्या बेटियों के लिए उनके ‘पिता का घर’ सबसे महफूज़ होता है?

पहली किस्त: क्या बेटियों के लिए उनके ‘पिता का घर’ सबसे महफूज़ होता है?

बेटियों का बचपन से ही रसोई और घर के काम में माँ का हाथ बंटाने और फिर बड़े होने पर घर का पूरा काम संभलाने में बीत जाता है। इसके बावजूद पूरा समाज, रिश्तेदार और परिवार अक्सर बेटियों से करता है कहता है कि पिता के घर में हो तो सुख से हो। ससुराल जाओगी तो पता चलेगा।

किसी परिवार में बेटी का पैदा होना श्राप जैसा माना जाता है तो किसी परिवार में यह बहुत ख़ुशी का पल होता। इसके बीच में कुछ परिवार ऐसे होते हैं जहां कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। अब श्राप हो, ख़ुशी हो या फिर कोई ख़ास बात नहीं, बेटियां होती तो हैं। आज बात उन परिवार की बेटियों पर जिनके पैदा होने पर घर में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा, जिनमें मेरा परिवार भी शामिल है। अक्सर ये वाला परिवार निम्न मध्यमवर्गीय परिवार होता है, जहां आमदनी का कोई ख़ास ज़रिया नहीं होता पर सब ‘भगवान’ भरोसे चल रहा होता है और ज़्यादा बच्चों को कहीं न कहीं ज़्यादा कमाई के हाथ के रूप में देखा जाता है। 

इन परिवार में बेटियों बचपन रसोई और घर के काम में माँ का हाथ बंटाने में बीत जाता है और फिर बड़े होने पर घर का पूरा काम संभलाने में इनका वक्त बीतने लगता है। इसके बावजूद पूरा समाज, रिश्तेदार और परिवार अक्सर बेटियों से कहता है कि पिता के घर में हो तो सुख से हो। ससुराल जाओगी तो पता चलेगा। यह बात कई बार रिश्तेदारों तो क्या अपने साथ काम करनेवाली शादीशुदा महिलाओं के मुंह से भी सुनती हूं जहां वह कहती हैं, “अभी तो तुम्हारी ज़िंदगी आसान है। शादी के बाद दिक़्क़त होती है हर चीज़ में।” अब सवाल यह है कि क्या वाक़ई में पिता के घर में बेटियों को पूरा सुख मिलता है? उन्हें किसी भी तरह की कोई दिक़्क़त नहीं होती? क्या उन पर कोई भी दबाव नहीं होता है? आइए आज बात करते हैं कुछ उन दबावों और चुनौतियों की जिसका सामना अक्सर निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की बेटियों को करना पड़ता है।

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बेटियों का बचपन से ही रसोई और घर के काम में माँ का हाथ बंटाने और फिर बड़े होने पर घर का पूरा काम संभलाने में बीत जाता है। इसके बावजूद पूरा समाज, रिश्तेदार और परिवार अक्सर बेटियों से करता है कहता है कि पिता के घर में हो तो सुख से हो। ससुराल जाओगी तो पता चलेगा।

दहलीज़ न पार करने का ज़रूरी नियम

“बेटी माँ साया होती है।” यह बात मैं बचपन से सुनती हुई बड़ी हुई हूं। दादी अक्सर यह कहती थीं कि बेटियों को अपने माँ के साये में रहकर अच्छे से घर का काम सीखना चाहिए। इसलिए भले ही समय से परिवार में बेटियों को कलम-कॉपी न दी जाए पर समय से पहले हाथ में झाड़ू और चूल्हे का काम ज़रूर सौंप दिया जाता है। इससे चौदह-पंद्रह साल तक हम बेटियां घर का हर काम सीख जाती हैं और धीरे-धीरे माँ की सारी ज़िम्मेदारी अपने सिर ले लेती हैं।

इस दौरान अगर हम स्कूल जाते हैं तो घर में यह सख़्त नियम होता है कि पहले अपने हिस्से का काम निपटाओ तब पढ़ने जाना यानी सुबह उठकर हम सिर्फ अपना टिफ़िन नहीं बनाते बल्कि रात के बर्तन धोते हैं, पूरे घर के लिए चाय और खाना बनाते हैं उसके बाद ही पढ़ने जा पाते हैं। स्कूल की पढ़ाई से लेकर किसी दोस्त से मिलने, घूमने, चाहे कोई काम जिसके लिए हमलोगों को घर से बाहर जाना है तो घर का काम पूरा करके ही जाने दिया जाता है। ये सालों से बिना लिखा हुआ एक ऐसा नियम है, जिसका पालन करते हुए मेरी माँ अपने मायके से ससुराल और मेरी दीदी अपने मायके से उसके ससुराल पहुंच गई।

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बात चाहे उनके बुनियादी अधिकार हो या फिर विकास की उन्हें हर दूसरे कदम पर पाबंदी और हिंसा झेलनी पड़ती हैं पर बेटियां पिता के घर में होनेवाली हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाए ये सामाजिक नियम के ख़िलाफ़ है। इसलिए जब भी दिक़्क़त ज़्यादा बढ़ने लगती है तो बेटियों की शादी करके उन्हें ससुराल भेज दिया जाता है।

हमारी पढ़ाई स्कूल की दूरी पर निर्भर

मैंने सिर्फ़ आठवीं तक पढ़ाई की क्योंकि जब आठवीं पास की तो नौवीं का स्कूल थोड़ी दूरी पर था। इसलिए मेरी पढ़ाई छुड़वा देने की बात होने लगी। यही नियम पूरी बस्ती की लड़कियों के लिए लागू होता है। अगर स्कूल ज़्यादा दूरी पर है तो आज भी लड़कियों को पढ़ने नहीं भेजा, जिसमें दो प्रमुख कारण हैं- सुरक्षा और घर के काम में दिक़्क़त।

अगर लड़की ज़्यादा दूर पढ़ने जाएगी तो उसके साथ ‘ऊंच-नीच’ हो जाएगी, यह चिंता हमेशा परिवार को रहती है। दूसरी बड़ी समस्या यह होती है कि अगर ज़्यादा दूर पढ़ने जाएगी तो समय ज़्यादा लगेगा और इससे उसके ज़िम्मे का काम प्रभावित होगा। इसलिए स्कूल की दूरी अगर ज़्यादा दूर है तो पढ़ाई से भी बेटियों को दूर कर दिया जाता है। इतना ही नहीं, क्योंकि हमें अपने हिस्से का काम पूरा करने के बाद ही स्कूल जाने की इजाज़त है इसलिए ज़्यादातर हम लोगों का नाम सरकारी स्कूल में लिखवाया जाता है, जहां वक्त और हाज़िरी को लेकर ज़्यादा सख़्ती नियम नहीं रहते और लड़कियां आराम से घर का काम पूरा करके पढ़ने जाती हैं।

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पिता के साथ भाई का दोहरा शासन और हिंसा

पितृसत्तात्मक परिवार की यह व्यवस्था है कि हर परिवार में पुरुष ही मालिक की भूमिका में होता है। हमलोगों के परिवार में भले ही बेटी से छोटा उसका भाई हो और उसकी बड़ी बहन ही उसका लालन-पालन और उसे हर वक्त संभालने का काम करती हो पर जैसे ही बेटा धीर-धीरे बड़ा होने लगता है तो पिता की ही तरह अपनी बहन पर अपना हुकुम चलाने लगता है। पिता के हर नियम को लागू करने या कई बार हिंसा को बढ़ावा देने में भाई का बड़ा होता है।

अगर संयोग से भाई बड़ा हो तो क्या ही कहना। लड़कियां कहां जाएंगी, नहीं जाएंगी से लेकर यहां तक कि वे क्या पहनेंगी, जैसे भी फ़ैसले भाई करने लगते हैं। मैंने कई बार लड़कियों से भी बात की है, जिनके साथ उनके भाई मारपीट करते हैं। जैसे-जैसे परिवार में बेटों की उम्र बढ़ने लगती है, पिता शांत होने लगते हैं और भाई अक्सर क्रूर रूप में आने लगते हैं और कई बार अपनी बात को मनवाने और अपने हिसाब से बहन के फ़ैसले लेने के लिए वे हिंसा भी करते हैं।

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जब भी घरेलू हिंसा की बात होती है हमेशा शादीशुदा महिलाओं के बारे में ही बात की जाती है पर घरेलू हिंसा क़ानून में ‘महिला’ की बात की गई यानी कि एक महिला जो शादीशुदा, तलाकशुदा या फिर अविवाहित भी हो सकती है। लेकिन फिर भी किसी बेटी ने घरेलू हिंसा क़ानून के तहत कोई शिकायत दर्ज़ करवाई हो ये बात कभी सुनाई नहीं देती। ऐसा नहीं है कि बेटियां अपने पिता से घर में किसी भी तरह की हिंसा का शिकार नहीं होती हैं।

बात चाहे उनके बुनियादी अधिकार हो या फिर विकास की उन्हें हर दूसरे कदम पर पाबंदी और हिंसा झेलनी पड़ती हैं पर बेटियां पिता के घर में होने वाली हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाए ये समाज के नियम के ख़िलाफ़ है। इसलिए जब भी दिक़्क़त ज़्यादा बढ़ने लगती है तो बेटियों की शादी करके उन्हें ससुराल भेज दिया जाता है। इसलिए ज़रूरी है कि बेटियों के ऊपर दबाव और उनकी चुनौतियों पर चर्चा की जाए और उनके अनुभवों को सामने लाया जाए। सच्चाई यह है कि बेटियों की चुनौतियों की परत इतनी मोटी है कि इसे तीन-चार बिंदुओं में समेटना मुश्किल है, इसलिए इस बात को अपने अगले लेख में भी ज़ारी रखूंगी।  

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तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

About the author(s)

लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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