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घर में आर्थिक तंगी से परेशान होकर जब मैंने काम करके पैसे कमाने का मन बनाया तो मेरा अपना परिवार इसके ख़िलाफ़ होने लगा। घरवालों की तरफ़ से साफ़ कहा गया कि अपनी मर्ज़ी से घर के बाहर कदम रखोगी और बच्चों का भविष्य ख़राब हुआ तो ये तुम्हारी ज़िम्मेदारी होगी। मैंने तब भी हार नहीं मानी, फिर मेरे आने-जाने में भी किसी भी तरह की मदद करने से मेरे परिवार ने मना कर दिया लेकिन मेरे छोटे बेटे ने मेरा साथ दिया। मात्र बारह साल के मेरे बेटे ने मुझे अपनी साइकिल दी और कहा, “मम्मी आप जाओ काम करने।” आरती (बदला हुआ नाम) ने एक मीटिंग के दौरान अपना अनुभव साझा किया। वहीं पूजा (बदला हुआ नाम) ने बताया कि लॉकडाउन से पहले मैं और मेरे पति सूरत में काम करते थे लेकिन लॉकडाउन के दौरान हमलोगों को गांव वापस आना पड़ा। यहां आने के बाद पांच छोटे बच्चों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना हमलोगों को भारी पड़ने लगा और मेरे पति की शराब की लत और बढ़ने लगी। गांव में वह मज़दूरी के छोटे-मोटे काम करता और जो भी पैसे मिलते उसकी शराब पी जाता। शराब पीकर घर आने बाद मारपीट अलग। आख़िर में मैंने सिलाई टीचर के काम की तलाश की और मुझे वह काम मिल गया। काम मिलते ही पति खुश हो गया। लेकिन महीने की पहली तारीख़ आते ही उसने मुझसे फिर लड़ाई करना शुरू किया ये कहकर कि इतनी दूर कैसे जाओगी? आजतक मेरे घर की कोई औरत बाहर नहीं निकली। अब तुम पैसे कमाओगी। ये सब कहकर उसने मेरे साथ मारपीट की। लेकिन मैं नहीं मानी, क्योंकि मैं अपने बच्चों को दो वक्त की रोटी के लिए तरसता नहीं देखना चाहती थी। मैंने अपना काम शुरू किया।

महिलाओं की इन आपबीती को सुनने के बाद मुझे महसूस हुआ कि मैं अपने घर और ज़िंदगी में जिन समस्याओं का सामना कर रही हूं, ऐसी मैं अकेली नहीं हूं बल्कि मेरे जैसी हर औरत, जो पारिवारिक समस्याओं ख़ासकर आर्थिक तंगी से जूझकर आगे बढ़ने का सोचती है, उसे ऐसी ही समस्याओं का सामना करना पड़ता है। शहरों में महिलाओं का काम पर जाना अब भले ही कुछ हद तक सामान्य हो गया है लेकिन गांव में आज भी किसी औरत का काम पर जाना अपने आप में बहुत संघर्षपूर्ण है। यही वजह है कि जब गांव से महिलाएं बाहर निकलती हैं तो उन्हें बहुत ही सोच समझकर निकलना पड़ता है और परिवार-समाज की ढ़ेरों समस्याओं का सामना करना पड़ता है। परिवार और समाज हर कदम पर उसकी परीक्षा लेने के लिए तैयार होता है, जिसके चलते महिलाओं को हर कदम पर ख़ुद को साबित करना पड़ता है। कई मामलों में वक्त के साथ ये दबाव कम होता जाता है लेकिन ऐसे मामले बहुत कम होते है। अधिकतर मामलों में महिलाएं ख़ुद अपने कदम पीछे खींच लेती हैं क्योंकि घर संभालने और काम करने के दोहरे दबाव को झेल नहीं पाती।

ज़रूरी है कि हम ग्रामीण महिलाएं अपने घर की दहलीज़ को पार कर अपनी पहचान बनाए और अपनी और बहनों को भी अपने साथ आगे लाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का काम करें।

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चूंकि गांव की महिलाएं ज़्यादा शिक्षित नहीं होती और अगर वे डिग्री के रूप में भले ही शिक्षित हो पर किसी काम के लिए उन्हें शहरी महिलाओं की अपेक्षा ज़्यादा ट्रेनिंग की ज़रूरत होती है, खासकार तब जब काम तकनीकी हो। इसके चलते महिलाओं पर काम सीखने और बेहतर करने का भी दबाव बना रहता है, जिसे कई महिलाएं अच्छी तरह निभा ले जाती हैॆ पर कई घुटने टेक कर पीछे हट जाती हैं। लेकिन मेरा मनाना है कि जब हम महिलाएं काम करने का मन बनाती हैं तो हमें अपना मन मज़बूत करना चाहिए और अपने आपको तैयार करना चाहिए। समाज और परिवार के दबाव से डरकर हमारा पीछे हटना ही तो समाज का लक्ष्य है और जब हम पीछे हट जाते हैं तो सिर्फ़ हम ही नहीं हमारे घर और आसपास की महिलाओं के लिए भी आगे बढ़ने और घर की दहलीज़ से बाहर निकलने के रास्ते बंद होने लगते हैं। अक्सर गांव में देखती हूं कि जो महिलाएं घर से बाहर काम करने जाती हैं, भले ही वे मज़दूरी का काम क्यों ना हो, वे हमेशा अपनी बेटी और बहु को भी काम के लिए प्रोत्साहित करती हैं। वहीं दूसरी तरफ़, जो महिलाएं घर से बाहर नहीं निकलती या फिर परिवार-समाज के डर से काम छोड़ चुकी होती हैं वे हमेशा अपनी बेटियों और बहु पर ये दबाव देती हैं कि वे घर से बाहर जाने की मांग ना करें। इसलिए मेरा मानना है कि बदलते समय के साथ अब हमें अपने परिवार और समाज के नियम को बदलना चाहिए और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के लिए कदम बढ़ाना चाहिए। साथ ही, हमें ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि हो सकता है काम करने से हम बहुत ज़्यादा पैसा ना कमाए, पर हम जो भी कमाते है वो हमारा अपना होता है, जिसपर हमलोगों का अपना हक़ है, जिसकी एक-एक पाई हम अपने हिसाब से खर्च कर सकती है।

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मैंने जब गांव की महिलाओं के साथ अलग-अलग मुद्दों पर बैठक करने का काम शुरू किया तो गांव की महिलाएं मुझे मेरे नाम से जानने और पुकारने लगी। इससे पहले मेरी अपनी कोई पहचान नहीं थी। शादी से पहले मेरी पहचाने मेरे पिता और फिर भाई से होती थी और शादी के बाद पति और ससुर के नाम से। कोई मुझे मेरे नाम से नहीं बुलाता, बल्कि मुझसे उनके रिश्ते ही मेरा नाम बन गए, कोई बहु कहता तो कोई भाभी और जब बच्चे हुए तो मां पर मेरा अपना नाम जैसे गुम-सा गया था। आज जब मैं काम पर जाती हूं तो मेरी पहचान मेरे नाम से होती है, कई गांव की औरतें मुझे मेरे नाम से जानती हैं। ये सब मेरे आत्मविश्वास को बढ़ाता है और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इसलिए ज़रूरी है कि हम ग्रामीण महिलाएं अपने घर की दहलीज़ को पार कर अपनी पहचान बनाए और अपनी और बहनों को भी अपने साथ आगे लाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का काम करें।

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तस्वीर साभार : Indian Express

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