वी गीता
वी गीता और उनकी किताब पैट्रिआर्की
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पितृसत्ता ऐसा विषय और व्यवस्था है जिससे हम पैदा होने से लेकर मृत्यु तक आजीवन जूझते हैं। अपनी-अपनी नज़र से समझते हैं, अनुभव करते हैं। लेकिन जब किसी व्यवस्था को हम सैद्धांतिक रूप से यानी थियोरेटिकली पढ़ते हैं तब उसके उद्भव से लेकर वर्तमान स्थिति, कारण आदि चीजें बेहतर समझ पाते हैं क्योंकि ऐसा ज़रूरी नहीं कि हमने अपने एकल जीवन में सभी तरह से अनुभव कर लिया हो। इसीलिए विभिन्न अनुभव, दस्तावेज, संकलन को पढ़ते हुए हम विषय को गहराई से समझ सकते हैं और किसी को समझा भी सकते हैं। आज ऐसी ही एक किताब के बारे में हम जानेंगे जो पितृसत्ता पर सैद्धांतिक रूप से बात करती है। किताब का नाम है पैट्रियार्की किताब मूलतः अंग्रेजी में ही उपलब्ध है। इसे नारीवादी लेखिका वी.गीता ने लिखा है और किताब की वरिष्ठ संपादक मैत्रेई कृष्णराज हैं।

पहले किताब के ढांचे को जानते हैं और फिर समझेंगे इसमें दी गई जानकारी को। इंट्रोडक्शन (परिचय) में वी गीता किताब के संबोधन में लिखती हैं, ”यह किताब पितृसत्ता के सिद्धांत को प्रतिपादित नहीं करती है बल्कि यह वास्तविकता के उन क्षेत्रों और ज्ञान की परंपराओं को चुनने की ओर इशारा करती है जिससे हम पितृसत्ता को परिभाषित कर सकते हैं।” फॉरवर्ड (अग्रेषित), इंट्रोडक्शन (परिचय), कंक्लूजन (निष्कर्ष) और इंडेक्स (अनुक्रमणिका) को छोड़कर पूरी किताब पांच भाग या कहें कि पांच पाठों में विभाजित है, जो निम्नलिखित हैं:-

  1. पैट्रियार्की: अ हिस्ट्री ऑफ द टर्म (पितृसत्ता: धारणा का इतिहास)
  2. प्रोडक्शन, रिप्रोडक्शन एंड पैट्रियार्की: ग्लोबल डिबेट्स (उत्पादन, प्रजनन और पितृसत्ता: वैश्विक बहस)
  3. प्रोडक्शन, रिप्रोडक्शन एंड पैट्रियार्की: इंडियन आर्जुमेंट्स ऑन हाउसहोल्ड, किनशिप, कास्ट एंड स्टेट (उत्पादन, प्रजनन और पितृसत्ता: परिवार, सगोत्रता, जाति और राज्य पर भारतीय तर्क)
  4. कल्चर, रिलीजन एंड पैट्रियार्की (संस्कृति, धर्म और पितृसत्ता)
  5. सेक्सुअलिटी एंड पैट्रियार्की (लैंगिकता और पितृसत्ता)

हर भाग को अलग-अलग लेकर चलते हुए इसमें दी गई अहम जानकारी की बात करेंगे ताकि आप में ये किताब पढ़ने की उत्सुकता पैदा हो सके।

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वी गीता, तस्वीर साभार: TN labour

पैट्रियार्की: अ हिस्ट्री ऑफ द टर्म ( पितृसत्ता: धारणा का इतिहास)

क्या हम कभी ये सोचते हैं कि आख़िर वह पितृसत्ता असल में क्या है? जिस पितृसत्ता व्यवस्था में हम जकड़े हुए हैं उसका इतिहास क्या रहा है? ज्यादातर हम नहीं सोचते लेकिन वर्तमान स्थिति को समझने के लिए बीते हुए तल को समझना अनिवार्य है। किताब का पहला भाग इसी सवाल से जूझता है। पितृसत्ता का मतलब एक पुरुष प्रभुत्व व्यवस्था से है लेकिन कैसे इस व्यवस्था में सभी पुरुष भी एक बराबर नहीं हैं। जैसे भारतीय परिपेक्ष में तथाकथित उच्च जाति का पुरुष और दलित पुरुष बराबर नहीं है। पितृसत्ता से पहले समाज की व्यवस्था संरचना में मातृसत्ता का होना इस भाग में प्रमुख केंद्र है। वैश्विक स्तर पर 1970 से लेकर नारीवादी आंदोलनों का पनपना और भारत में अलग-अलग तरह से महिलाओं के सशक्तिकरण की बात किस तरह भारतीय पितृसत्ता के लिए चुनौती बनकर खड़ी होती है।

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प्रोडक्शन, रिप्रोडक्शन एंड पैट्रियार्की: ग्लोबल डिबेट्स ( उत्पादन, प्रजनन और पितृसत्ता: वैश्विक बहस)

किताब का यह भाग पितृसत्ता को अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा के पटल पर रखते हुए समझने की कोशिश करता है। मुख्य रूप से समाजवादी सिद्धांत को लेकर महिलाओं के शोषण को समझने की कोशिश की जाती है, कैसे महिलाओं द्वारा उत्पादन और प्रजनन एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। महिलाओं द्वारा अधिक प्रजनन पुरुषों के लिए उनकी सम्पत्ति को आगे बढ़ानेवाली पीढ़ी और ज्यादा से ज्यादा काम करनेवाले व्यक्तियों की संख्या में बदला। उन्नीसवीं सदी की तीसरी शताब्दी में फ्रांस और इंग्लैंड में कामगार महिलाओं ने कैसे अपने हकों के लिए आवाज़ उठाई और रेडिकल विचारों के साथ आगे आईं। इस दौरान कैपिटलिज्म ने जब अपने पैर पसारे तब कामगार महिलाएं अत्यधिक प्रभावित हुईं। उनकी मेहनत को सस्ता श्रम मानते हुए उनका शोषण किया गया। 

इस विषय से जूझते हुए वी गीता इसी भाग में राजनीतिक विचारक फ्रेडरिक एंगेल्स की थियरी “द ओरिजिन ऑफ द फैमिली, प्राइवेट प्रॉपर्टी और राज्य” का जिक्र करती हैं कि कैसे एंगल्स ने अपने सिद्धांत द्वारा यह समझाया कि प्राइवेट प्रॉपर्टी कैसे अस्तित्व में आई और किस तरह इस प्राइवेट प्रॉपर्टी के दायरे में पुरुषों ने महिलाओं को भी ला खड़ा कर दिया और उनका शोषण किया। फिर सेक्सुअल डिविजन ऑफ लेबर अपने अस्तित्व में आया। इस भाग को पढ़ते हुए जब हम वर्तमान स्थिति को देखेंगे तो हर वह काम जो स्त्री पुरुष के दायरे में बांटा गया है उसके उद्भव को पहचान पाएंगे।

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प्रोडक्शन, रिप्रोडक्शन एंड पैट्रियार्की: इंडियन आर्जुमेंट्स ऑन हाउसहोल्ड, किनशिप, कास्ट एंड स्टेट (उत्पादन, प्रजनन और पितृसत्ता: परिवार, सगोत्रता, जाति और राज्य पर भारतीय तर्क)

वी. गीता ने न सिर्फ वैश्विक सिद्धांतों पर नारीवाद, पितृसत्ता की बात की है बल्कि भारतीय परिपेक्ष में भी वे इसे अच्छे से परिभाषित करती नज़र आती हैं। इस भाग में गीता बताती हैं कि कैसे भारतीय समाज में परिवार की संस्था और अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है जिसके केंद्र में जाति है। एक तरफ मानव श्रम दूसरी ओर महिला का शोषण दोनों ही जाति केंद्रित हैं। ज़मीन के एकाधिकार से लेकर संसाधनों का असमान तरीके से बंटवारा और परिवार की संस्था द्वारा महिलाओं के शोषण को बारीकी से समझ पाते हैं। इस भाग में छोटे-छोटे भाग और हैं। जैसे सगोत्रता जिसमें ये पता चलता है कि कैसे गोत्र जाति व्यवस्था को बनाए रखते हैं और इसी व्यवस्था से महिला की लैंगिकता को भी काबू किया जाता है। जाति की नज़र से भी पितृसत्ता का मूल्यांकन इस भाग में है। ज्योतिबा फुले द्वारा रचित गुलामगिरी का संदर्भ महिलाओं के शोषण को समझने के लिए किया गया है, महिलाओं की नागरिकता से लेकर, कानूनन प्रावधान आदि की बात वी. गीता करती हैं।

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कल्चर, रिलीजन एंड पैट्रियार्की (संस्कृति, धर्म और पितृसत्ता)

इस बात से हम सभी परिचित हैं कि वैश्विक स्तर पर धर्म, संस्कृति लोगों के लिए क्या मायने रखती है। इसीलिए पितृसत्ता को समझने के लिए महिलाओं के शोषण को धर्म की दृष्टि से जानना भी बहुत ज़रूरी हो जाता है। इस भाग में लेखिका ने मुख्य धर्मों की मुख्य किताबों का संदर्भ लेते हुए महिलाओं के लिए लिखी गईं बेबुनियाद बातों का जिक्र करती हैं। हिंदू धर्म में स्मृति, मनुस्मृति कैसे महिलाओं के साथ व्यवहार करने के दिशा-निर्देश देती है। इस्लाम, जैन, बौद्ध धर्म की जातक कथा आदि द्वारा महिलाओं को झूठा, सही फैसले ना लेने योग्य, सदैव पुरुष के लिए गुलाम की तरह काम करने वाली, आदि बातें कही गई हैं। महिलाओं को कैसे ‘अच्छी’ महिला बनी रहनी चाहिए। देवदासी प्रथा, कैसे लिंग, जाति, धर्म को एक साथ मिलाकर दलित महिलाओं के लिए शोषक प्रथा के रूप में उपजी, बाबा साहेब द्वारा महिलाओं के अधिकारों के लिए हिंदू कोड बिल संविधान सभा में पेश करना, आदि मुद्दों साफ तरीके से सभी बात कही गई हैं।

सेक्सुअलिटी एंड पैट्रियार्की (लैंगिकता और पितृसत्ता)

महिलाओं को किस तरह व्यवहार करना चाहिए, पुरुषों को किस तरह, कौन सा भाव महिलाओं का है, कौन सा पुरुषों का ये सभी मानक पितृसत्ता ने गढ़े हैं। गांधी ने महिलाओं के संदर्भ में किस तरह अपनी बात रखी और उनका और सरला देवी का संबंध, रखमाबाई केस इस भाग में केंद्र में हैं। पेरियार द्वारा आत्म समान आंदोलन जिसने महिलाओं के लिए विवाह से लेकर उनकी स्वतंत्रता तक की बात जोर देकर रखी गई। बाबा साहब द्वारा जाति और जेंडर दोनों पर बेबाक तरीके से अपने विचार स्पष्ट करना। लेस्बियन, हेट्रोसेक्सुअल, ट्रांस, आदि मुद्दों पर वी. गीता इस भाग में बताती हैं जिससे हम ये समझ पाते हैं कि कैसे हर चीज सिर्फ महिला या पुरुष के खांचे में नहीं आती है। ये समाज सिर्फ महिला या पुरुष से नहीं बना है इसमें और भी अस्तित्व जिंदा हैं।

इस किताब को पढ़ने के बाद कुछ सवाल जहन में आते हैं कि आखिर महिलाओं का श्रम सस्ता क्यों है, पुरुष होते हुए एक दलित पुरुष, उच्च जाति का पुरुष एक बराबर क्यों नहीं हैं, महिलाएं चाहें बाहर काम करती हो लेकिन फिर भी घर में सम्मान कब पाती हैं। इन सारे सवालों का जवाब इस किताब ने दिया, ना सिर्फ जवाब दिया बल्कि उससे संबंधित इतिहास भी समझाया।

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मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रही हूँ। मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है।

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