सुप्रीम कोर्ट का फैसला सेक्स वर्कर्स के लिए कैसे बहुत मायने रखता है
तस्वीर साभारः The Leaflet
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पेशे से सेक्स वर्कर सुनीता (बदला हुआ नाम) अपने शहर के रेड लाइट एरिया में अपने कमरे में थीं। अचानक से पुलिस छापा मारते हुए कमरे में दाखिल हुई। पुलिस ने उन्हें थाने में लेकर जाने से पहले पूरे शहर में घुमाते हुए उनके मोहल्ले में जाकर परिवार को सूचना दी, उसके बाद उसे पुलिस स्टेशन में ले जाकर आगे की कार्रवाई की। इस पूरे रास्ते में उनके साथ बेहद अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया। सुनीता को लंबे समय तक थाने में बैठाए रखा गया था। सेक्स वर्कर होने की वजह से सुनीता को इस तरह की पुलिस की कार्रवाई और व्यवहार होने का डर हमेशा बना रहता है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के सेक्स वर्कर से जुड़े एक आदेश के बाद इस तरह के अनुभवों और घटनाओं को रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण है।     

एक अनुमान के मुताबिक देश में लगभग 800,000 सेक्स वर्कर्स हैं। सेक्स वर्कर्स ने हमेशा मान-सम्मान और अधिकारों की मांग की है। सेक्सवर्क को एक काम के रूप में चिन्हित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम आदेश जारी किया है। एक दशक से ज्यादा समय की लंबी कानूनी कार्रवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है, “वेश्यावृति एक पेशा है और सेक्स वर्कर्स कानून के अनुसार सम्मान और समान सुरक्षा की हकदार हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को सेक्स वर्कर्स के लिए कुछ सिफारिशों को जारी करते हुए उन्हें सख्ती से पालन करने के लिए निर्देश जारी किया। द हिंदू में प्रकाशित ख़बर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार सेक्स वर्कर्स को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है। कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जा सकता है। 

अदालत ने आगे कहा है कि यदि किसी वेश्यालय पर छापा मारा जाता है, तो इसमें शामिल सेक्स वर्कर को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा, दंडित नहीं किया जाएगा। सेक्स वर्क ग़ैरकानूनी नहीं है केवल वेश्यालय चलाना ग़ैरकानूनी है। यदि सेक्स वर्कर व्यस्क है और सहमति के साथ वहां मौजूद है तो वह गिरफ्तार नहीं की जाएंगी। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से कहा है कि सेक्स वर्कर की सहमति के ख़िलाफ़ आपराधिक कार्रवाई न करें।

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एक दशक से ज्यादा समय की लंबी कानूनी कार्रवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है, “वेश्यावृति एक पेशा है और सेक्स वर्कर्स कानून के अनुसार सम्मान और समान सुरक्षा की हकदार हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में सेक्स वर्कर्स के पुनर्वास पर दी गई सिफ़ारिशों पर विचार किया। इन सिफ़ारिशों को जुलाई 2011 में नियुक्त पांच सदस्यीय पैनल ने तैयार किया था। पैनल को मुख्य तौर पर तीन बातों पर ध्यान देना था ट्रैफिकिंग कैसे रोकी जाए?, सेक्स वर्क छोड़ने की इच्छा रखनेवाली सेक्स वर्कर्स का पुनर्वास करना और सेक्स वर्कर्स को काम करने के लिए अनुकूल माहौल का निर्माण करें। सभी पक्षों से बातचीत होने के बाद पैनल ने साल 2016 में एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इसके बाद मामले पर सुनवाई के बाद अदालत ने सरकार को कानून बनाने की बात कही गई। सरकार की तरफ से कोई कार्रवाई न होने के बाद सर्वोच्च अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 से मिली विशेष शक्ति का प्रयोग कर निर्देश जारी किए हैं। 

लाइव लॉ के अनुसार जस्टिस एल नाग्शेवर राव, जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस ए. एस. बोपन्ना ने केंद्र सरकार को छह हफ्तों के समय के बीच पैनल द्वारा की गई अन्य सिफारिशों पर जवाब देने को कहा है। केंद्र सरकार ने पैनल की कुछ सिफारिशों को मान लिया था जिसे अब सर्वोच्च अदालत ने राज्यों को अपनाने का निर्देश दिया है। हालांकि, कुछ सिफारिशों पर आपत्ति भी जताई थी। सेक्स वर्कर्स कानून के आधार पर समान संरक्षण की हकदार हैं। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को सेक्स वर्कर्स या उसके प्रतिनिधियों को सभी निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में शामिल करना चाहिए। उनसे जुड़ी योजनाओं के बनाने, लागू करने, कानूनों में कोई बदलाव में उन्हें शामिल किया जाएं।

जैसा कि 22.3.2012 की छठी अंतरिम रिपोर्ट में पहले ही सिफारिश की गई है, उसके अनुसार एक सेक्स वर्कर्स के किसी भी बच्चे को केवल इस आधार पर माँ से अलग नहीं किया जाए कि वह सेक्स वर्कर है। यदि कोई नाबालिग वेश्यालय या सेक्स वर्कर के साथ रह रहा है, तो यह नहीं मानना चाहिए कि उसकी तस्करी हुई है। ऐसे केस में यदि सेक्स वर्कर दावा करती है कि वह उसकी संतान है, तो यह तय करने के लिए जांच की जा सकती है। नाबालिग को जबरन अलग नहीं किया जाना चाहिए।

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कोर्ट ने मीडिया को भी दी हिदायत

सेक्स वर्कर्स को जिस तरह से पुलिस द्वारा प्रताड़ित किया जाता है और मीडिया में उसका जिस तरह से कवरेज होता है उसको ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मीडिया को कहा है कि छापे और रेस्क्यू के दौरान सेक्स वर्कर्स की तस्वीरें नहीं छापनी चाहिए। अदालत ने कहा अगर मीडिया कस्टमर के साथ सेक्स वर्कर्स की तस्वीरें दिखाता है तो आईपीसी की धारा 354-सी के तहत मामला दर्ज किया जाना चाहिए। अदालत ने इस संदर्भ में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को मीडिया को निर्देश जारी करने को भी कहा है। अदालत ने केंद्र से इन सिफारिशों पर सुनवाई की अगली तारीख 27 जुलाई का जवाब देने के लिए कहा है। 

पुलिस का बर्ताव है एक बड़ी समस्या

सेक्स वर्क पर आधारित रिपोर्टों में यह बात सामने निकलकर आती है कि उनके साथ बड़ी संख्या में अपराध होता है। भारत में सेक्स वर्कर्स के साथ हिंसा और बुरे बर्ताव की धारणा इस बात से जुड़ी है कि वह सेक्स वर्कर है न कि इस देश की एक सामान्य नागरिक। सेक्स वर्कर्स के साथ पुलिस के बर्ताव को लेकर जारी एक रिपोर्ट के आंकड़े बताते है कि आधे से ज्यादा सेक्स वर्कर्स के साथ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल सामान्य है। 3000 सेक्स वर्कर्स के साथ हुए इस सर्वे के अनुसार 1431 यानी 50 प्रतिशन सेक्स वर्कर्स ने पुलिस द्वारा अपमानजनक भाषा का अनुभव किया है। 1011 लगभग 35 प्रतिशन ने पुलिस की मार, बाल खींचने और बेल्ट से पीटे जाने की बात भी स्वीकार की है। वहीं, 1052 ने धमकी की बात भी कबूली है। पुलिस ने 569 यानी 20 प्रतिशत सेक्स वर्कर्स को रिश्वत देने के लिए मजबूर किया है। पुलिस का ऐसा बर्ताव सेक्स वर्कर्स को अपने ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा के विरोध में बोलने से भी रोकता है। 

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गीता (बदला हुआ नाम) का कहना है, “कोई भी लड़की हो, औरत हो या फिर सेक्स वर्कर ही क्यों ना हो। वह है तो भारत की नागरिक ही ना। वह जो काम कर रही है और अपनी सहमति से वह वो काम कर रही है तो उसको बुरी नज़र से न देखें। जो क्लाइंट आता है वह भी भारत का नागरिक है। वह आता है सर्विस लेकर चला जाता है लेकिन बुरी नज़र से देखा हमें जाता है।

सेक्स वर्कर्स का क्या है कहना

पूरे देश में सेक्स वर्कर्स की स्थिति और उनके अधिकारों के लिए कई संगठन मौजूद है। सेक्स वर्कर नेटवर्क इस दिशा में कार्य कर रहे हैं। यह आदेश एक लंबी कानूनी कार्रवाई के बाद जारी हुआ है। साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट में सेक्स वर्कर्स से जुड़े मामले में एक पैनल गठित किया गया था। इसमें एंटी ट्रैफिकिंग, रिहेब्लिटेशन और सेक्स वर्कर्स के सम्मान पर मुख्य रूप से ध्यान दिया गया। 

इसी पैनल की सदस्य और गैर-सरकारी संस्था दुरबार महिला समन्वय की भारती डे कहती हैं, “हम लोगों की यह लड़ाई बीस साल से भी लंबी लड़ाई है। सेक्स वर्क एक काम है। सुप्रीम कोर्ट का जो ऑर्डर आया है वह अच्छा है। काम के सम्मान, पुलिस और मीडिया को लेकर जो बातें कही गई है वह बहुत ज़रूरी है। सेक्स वर्क को काम के तौर पर लागू होने से सेक्स वर्कर्स की जो स्थिति है उसको सुधारने में मदद मिलेगी। वर्कर्स राइट्स मिलने से कम से कम जो सरकारी सुविधाएं है, स्कीम है वो तो मिल जाएगी। समाज की जो सोच है वह तो इससे नहीं बदलेंगी लेकिन एक सेक्स वर्कर के नागरिक के तौर पर जो बुनियादी अधिकार है वह उसे मिलने चाहिए। सरकार को इस दिशा में तेजी से काम करना चाहिए। सेक्स वर्कर्स की स्तिथि को सुधारने के लिए वेस्ट बंगाल में हम लोगों ने बहुत काम किया है लेकिन ज़रूरी नहीं कि यह स्थिति देश के बाकी राज्यों में भी हो। सेल्फ रेगुलेटरी बोर्ड के बारे में सुप्रीम कोर्ट के सामने सिफारिश रखी। हमने उन्हें सारी स्थिति के बारे में बताया यह फैसला सेक्स वर्कर्स की स्थिति, उनकी डिग्नटी को लेकर जो बातें कही है उसके लिहाज से सही है। यह आदेश सेक्स वर्कर्स को पुलिस के ग़ैर ज़रूरी डराने और धमकाने से बचाएगा।”

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गीता (बदला हुआ नाम) का कहना है, “कोई भी लड़की हो, औरत हो या फिर सेक्स वर्कर ही क्यों ना हो वह है तो भारत की नागरिक ही ना। वह जो काम कर रही है और अपनी सहमति से वह वो काम कर रही है तो उसको बुरी नज़र से न देखें। जो क्लाइंट आता है वह भी भारत का नागरिक है। वह आता है सर्विस लेकर चला जाता है लेकिन बुरी नज़र से देखा हमें जाता है। इस काम की वजह से अपमानजनक व्यवहार का सामना करना पड़ता है। मीडिया में हमसे जुड़ी ख़बरों में मिर्च-मसाला लगाकर दिखाया जाता है। हमारे साथ हमारे काम को लेकर जो बर्ताव होता है उसको लेकर अदालत ने जो बात कही है वह बहुत सही है लेकिन इससे लागू भी करना है। समाज का रवैय्या बदलने की बात तो अभी बहुत दूर की बात है लेकिन यदि देश की पुलिस, सरकार हमारे लिए सोचें, हमारे अधिकारों का उल्लघंन न करें तो चीजें बदल जाएगी। यह अभी बहुत लंबी लड़ाई है। यह आर्डर सही होने की दिशा में एक अच्छी शुरुआत है।”

सर्वोदय समिति महिला संगठन, राजस्थान की सुल्ताना बेगम का कहना है, “पुलिस हमारे साथ सबसे बुरा व्यवहार करती है। पुलिस हमारे साथ हुई हिंसा को हिंसा नहीं मानती है। उनकी भाषा हमारे साथ बहुत ख़राब होती है। यदि कोई सेक्स वर्कर अपने साथ हुई पारिवारिक हिंसा की रिपोर्ट दर्ज कराने जाती है तो पुलिस उस हिंसा को सही ठहराती है।”

सर्वोदय समिति महिला संगठन, राजस्थान की सुल्ताना बेगम का कहना है, “सेक्स वर्कर्स की स्थिति को लेकर अदालत जो भी आदेश जारी कर रही है वह सही है लेकिन उन पर अमल कितना होगा इसकी कोई गांरटी नहीं है। जब भी हम कोई सरकारी सुविधा लेने जाते हैं तो हमसे कह दिया जाता है कि हमें कोई ऑर्डर नहीं मिला है। हर तरह से चीजों को सुधारने के लिए सरकार की बहुत सक्रियता होनी चाहिए। सरकारी आदेश के कागज जब दफ्तरों में पहुंचे तो हमें कुछ ज्यादा बेहतर होता दिखेगा। राशन कार्ड लेने के लिए लंबा पेपरवर्क करना पड़ता है। ऑर्डर पास होने के साथ उसे सही तरह से लागू होना बहुत ज़रूरी है। लॉकडाउन के बाद से हमनें बहुत बुरी स्थिति देखी है। इससे पहले राशन और आधार कार्ड वाले फैसले के बाद भी कागज बनवाने के लिए बहुत सारी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है।” 

सुल्ताना आगे कहती हैं, “पुलिस और मीडिया को लेकर जिस तरह की बातें कही गई है उसको लेकर वह बहुत सही है। पुलिस हमारे साथ सबसे बुरा व्यवहार करती है। पुलिस हमारे साथ हुई हिंसा को हिंसा नहीं मानती है। उनकी भाषा हमारे साथ बहुत ख़राब होती है। यदि कोई सेक्स वर्कर अपने साथ हुई पारिवारिक हिंसा की रिपोर्ट दर्ज कराने जाती है तो पुलिस उस हिंसा को सही ठहराती है। उसके साथ हुई मारपीट को सही ठहराते हुए उसकी कंप्लेन तक को दर्ज नहीं किया जाता है। संगठन की मदद से इस तरह की केस में मामला दर्ज होता है। पुलिस की रेड में भी पुलिस बहुत ज्यादा परेशान करती है। कौन होगा जो अपने रोजी-रोटी कमाने की वजह से जेल जाता होगा लेकिन सेक्स वर्कर्स को जाना पड़ता है। हम अदालत के माध्यम से अपने हकों के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं। आने वाले समय में चीजें बदलती है तो हम कह सकते है कि अदालत के फैसले से हमारी मदद हुई है।”

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तस्वीर साभारः The Leaflet

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