इंटरसेक्शनलजेंडर विश्व शौचालय दिवसः भारत के सार्वजनिक शौचालय और महिलाओं के अनुभव ग्राउंड से

विश्व शौचालय दिवसः भारत के सार्वजनिक शौचालय और महिलाओं के अनुभव ग्राउंड से

देश के छोटे-छोटे शहरों में सार्वजनिक जगहों पर पहले के मुकाबले शौचालयों की इमारतें दिखनी शुरू हो गई है लेकिन उनके हालात बहुत बेहतर नहीं कहे जा सकते है। जब भी महिलाओं से सार्वजनिक शौचालयों के उपयोग को लेकर बात की जाती है तो उनकी बातों का सार निकलता है कि वे इसके इस्तेमाल करने से बचती हैं।

एक दिन में कितना पानी पीना है जिससे पेशाब न आए, क्या आपने कभी इस बारे में सोचा है? लेकिन ख़ासतौर पर महिलाएं घर से बाहर निकलने पर इस तरह का हिसाब रखती हैं जिससे उन्हें सार्वजनिक शौचालय का इस्तेमाल न करना पड़े। सार्वजनिक शौचालयों का नाम लेते ही पहली तस्वीर दिमाग में आती है, बदबू, टूटा हुआ दरवाजा, पानी की सुविधा का अभाव और बेहद गंदगी। ये परेशानी उस वक्त ज्यादा गंभीर हो जाती है जब शौचालय का इस्तेमाल करनेवाली महिला हो। देश के छोटे शहरों, कस्बों में सार्वजनिक जगहों पर पहले के मुकाबले शौचालयों की इमारतें दिखनी शुरू हो गई हैं लेकिन उनके हालात बहुत बेहतर नहीं कहे जा सकते हैं।

जब भी महिलाओं से सार्वजनिक शौचालयों के उपयोग को लेकर बात की जाती है तो उनकी बातों का सार यही निकलता है कि वे इसके इस्तेमाल से बचती हैं। साफ तौर पर कहें तो महिलाएं सार्वजनिक शौचालय का इस्तेमाल कम करती हैं, अगर इमरजेंसी में शौचालय के इस्तेमाल करने की उन्हें बहुत आवश्यकता है तो सबसे पहले तो कई बार उसकी तलाश के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ता है दूसरा ख़राब शौचालय का सामना करना पड़ता है।

शौचालय की स्वच्छता महिलाओं और जेंडर माइनॉरीटिज़ से आनेवाले लोगों के लिए एक चिंता का विषय है ख़ासतौर पर पीरियड्स के दिनों में। हर साल 19 नवंबर को ‘विश्व शौचालय दिवस’ मनाया जाता है। मानव जीवन में शौचालय की उपयोगिता और सब तक समान पहुंच के लिए इस दिशा में किए गए प्रयासों और योजनाओं पर इस दिन विशेष तौर पर चर्चा होती है।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने वॉश (WASH) के तहत शौचालय की पहुंच और स्वच्छता के महत्व को बताया है। वॉश के तहत महिलाओं के अनुकूल शौचालय बनाने जिसमें मेंस्ट्रुअल हाइजीन मैनेजमेंट को स्थापित करना है। इसी तरह महिलाओं के लिए कार्यस्थल और बाजार में मेंस्ट्रुअल हाइजीन के लिए पर्याप्त शौचालय उपलब्ध होना बहुत ज़रूरी है। शौचालय की उपस्थिति महिलाओं के लिए स्वास्थ्य, सम्मान और स्वतंत्रता का मुद्दा भी है। 

साल 2019, जनवरी में उत्तर प्रदेश खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया गया था। यह बात अलग है कि मीडिया की ख़बरों में कई बार खुले में शौच की ख़बरे सामने आई चुकी हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (2019-2021) के अनुसार उत्तर प्रदेश के घरों में बेहतर स्वच्छता सुविधाओं का फ़ायदा केवल 68.8 फीसद आबादी ले पाती है। शहरी क्षेत्र में यह दर 80.9 और ग्रामीण क्षेत्र में 64.8 फीसदी है। द इंडियन एक्सप्रेस में छपी ख़बर के अनुसार सरकार के मुताबिक़ राज्य में 2,61000 शौचालय बनाए गए हैं जिसमें 62,818 समुदाय शौचालय और 652 पिंक टॉयलेट (केवल महिलाओं के लिए) शहरों में बनाए गए।

हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार ने अप्रैल 2022 में राज्य में 100 दिन के भीतर 2.40 लाख शौचालय बनाने की घोषणा की थी। राज्य में शौचालयों के बनने के साथ-साथ उनकी बेहद ख़राब स्थिति एक बड़ा सवाल है। सार्वजनिक शौचालयों का बेहद गंदा और बदबूदार होना उनकी पहचान बनी हुई है। खुद आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के एक सर्वे में यह बात सामने आ चुकी है कि राष्ट्रीय राजधानी के 55 फीसद सार्वजनिक शौचालय बेहद गंदे और पूरी तरह बेकार है। राजधानी से अलग बाकी देश की क्या हालात होंगे उसे सोचा जा सकता है। यही नहीं, शौचालय कर्मचारी संविदा पर रखे हुए है जिनका समय पर वेतन न मिलना, सही सुविधाओं का अभाव भी एक अलग लेकिन बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला मुज़फ़्फ़रनगर में शौचालयों की स्थिति और उनके इस्तेमाल को लेकर महिलाओं के क्या अनुभव हैं इसको हमने जानने की कोशिश की। इस दौरान हमने शहर में अलग-अलग जगह बने छह सार्वजनिक शौचालयों का जायज़ा लिया। लेकिन छह में से केवल चार शौचालय ही खुले मिलें। शहर के बंद शौचालायों में से पहला मुज़फ़्फ़रनगर का केंद्र कहे जाने वाले शिवचौक इलाके में मिला। वहीं, शहर की कचहरी की सड़क पर स्थित शौचालय में भी ताला लगा था।

शिक चौक पर स्थित सार्वजनिक शौचालय में लगा ताला।

शिवचौक के शौचालय के बंद होने की वजह के बारे में जब हमने आसपास के मौजूद लोगों से पूछा तो उनका कहना था कि बाजार की साप्ताहिक बंदी होने की वजह से शौचालय को हर मंगलवार बंद रखा जाता है। इस दौरान जब हम बंद शौचालय के सामने मौजूद थे उसे इस्तेमाल करने के लिए एक आदमी हमारे सामने ही आया था, शौचालय बंद होने की वजह से जिसे आसपास के लोगों ने दूसरे शौचालय में जाने की सलाह दी थी। दूसरा, कचहरी सड़क पर स्थित शौचालय भी बंद था इस बारे वहां मौजूद पुरुषों ने कहा पता नहीं आज क्यों नहीं खुला है।

कचहरी सड़क पर स्थित बंद शौचालय
एसडी मार्केट के शौचालय के बाहर की तस्वीर

शहर के जितने भी सार्वजनिक शौचालयों में हम गए वहां की स्थिति को बहुत आदर्श नहीं कहा जा सकता है। एक जगह इमारत बहुत जर्जर हालात में मिली। इससे अलग शहर के एसडी मार्केट परिसर में सनातन धर्म एसोसिएशन द्वारा संचालित शौचालय में भले ही महिला-पुरुष के लिए अलग-अलग शौचालय बने हो लेकिन वहां पुरुषों को आप महिला शौचालय इस्तेमाल करते भी देख सकते हैं। हमारी मौजूदगी के दौरान ही हमने दो पुरुषों को ऐसा करते देखा। जब एक पुरुष से उनके ऐसा करने पर हमने सवाल किया तो उनका कहना था कि यह कॉमन टॉयलेट है। वहां मौजूद अन्य पुरुष इस बात पर भी यह कहते नज़र आए कि यहां सब पढ़े-लिखे लोग हैं तो कुछ भी गड़बड़ होने की संभावना नहीं है। एसडी मार्केट परिसर में स्थित इस शौचालय में हुई इस घटना को इस तरह भी देखने की ज़रूरत है कि कैसे पुरुष सार्वजनिक शौचालयों में महिलाओं के स्पेस पर भी खुद का क्लेम करके उसे इस्तेमाल कर रहे हैं। इस शौचालय में पुरुष और महिलाओं के लिए अलग-अलग सेक्शन होने के बावजूद पुरुषों का महिलाओं के हिस्से में जाकर महिलाओं के स्पेस को खत्म कर रहा है।

शहर के सार्वजनिक शौचालयों को लेकर क्या है महिलाओं का कहना

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली से ताल्लुक रखने वाली जीनत कहती हैं, “आमतौर पर मैं पब्लिक टॉयलेट का इस्तेमाल नहीं करती हूं। पब्लिक टॉयलेट में जाने से अच्छा परेशानी सहन कर लेना है। कई बार ऐसा हुआ कि बाथरूम का प्रेशर बना हुआ है और घर पहुंचने में लगभग एक घंटा लगेगा तो मैंने घर जाकर ही बाथरूम करना चुना है। सफर में तो टॉयलेट का महिलाओं के लिए विकल्प ही नहीं होता है। बस से जाते हुए अक्सर पेट्रोल पंप पर बस रोकते हैं तो बहुत सी जगह टॉयलेट अंधेरे और सीलन भरी जगहों पर होते हैं। जब कोई रास्ता नहीं बचता है तो थक हारकर आखिर में घर से बाहर किसी टॉयलेट का इस्तेमाल करना मुश्किल से एक दो-बार ही हुआ है।” 

शामली जिले के थाना भवन के पास के एक गांव की तनु रोज मुज़फ़्फ़रनगर कोचिंग करने आती है। तनु एक विकलांग महिला हैं। तनु का कहना है, “मैं सुबह घर से टॉयलेट करके निकली हूं और तीन बजे के बाद अक्सर घर वापस लौटती हूं। मैंने कभी अपने कोचिंग या शहर के किसी भी शौचालय का इस्तेमाल नहीं किया। आप ऐसे भी समझ सकती हैं कि मैंने अपनी एक आदत भी बना ली है। मैं घर से बाहर टॉयलेट इस्तेमाल करने में सहज महसूस नहीं कर पाती हूं इस वजह से घर से लौटकर ही बाथरूम करती हूं। शरीर को भी ऐसी आदत पड़ गई है।” 

मैं पानी पीना कम कर देती हूं ताकि पेशाब न आए

बुढ़ाना के एक गांव से मुज़फ़्फ़रनगर के कॉलेज में पढ़ने वाली सोनिया कहती हैं, “सार्वजनिक शौचालय के इस्तेमाल करने से डर लगता है। मुझे तो बहुत बाथरूम आता है लेकिन अगर मैं अपने कॉलेज से अलग कही जा रही हूं तो मैं पानी नहीं पीती हूं, क्योंकि मेरे मन में ये ख्याल रहता है कि बाहर के शौचालय बहुत गंदे होंगे उनमें जाने से अच्छा तो पानी न पीना ही है। ख़ासतौर पर जो सरकारी शौचालय हैं उनकी हालात तो बहुत ही ख़राब होती है। इसके मुकाबले जो प्राइवेट मॉडल के तहत बने हैं उन्हें दस में से एक नंबर दिया जा सकता है। मुझे यहां एक बात यह भी कहनी है कि शौचालयों के इस्तेमाल करने में लोगों को भी थोड़ी सहूलियत बरतनी चाहिए। हमें भी बतौर नागरिक किसी भी जगह के इस्तेमाल करने में जिस तरह की बेसिक सावधानी बरतनी चाहिए, उनका ख्याल रखना चाहिए। सार्वजनिक शौचालय को साफ रखने की जिम्मेदारी केवल कर्मचारी की नहीं है बल्कि हम लोगों की भी हैं। आप देखिएगा लोग ठीक से फ्लश नहीं करते हैं, बाथरूम करने के बाद पानी नहीं डालते हैं। इस तरह के व्यवहार को बदलने की भी ज़रूरत है।” वहीं एक और छात्रा फहरीन का कहना है कि सार्वजनिक शौचालयों की हालात बहुत खराब है। गंदे शौचालयों के इस्तेमाल करने से इन्फेक्शन होने का बहुत खतरा रहता है। गंदगी और इन्फेक्शन के डर की वजह से वह वहां जाने से बचती हैं।

रेलवे रोड़ स्थित महिलाओं के इस्तेमाल करने वाले शौचालय के सामने पड़ा कूड़ा।

शौचालय एक बुनियादी ज़रूरत है

प्रीती एक कामकाजी महिला हैं जब उनसे सार्वजनिक शौचालय को लेकर बात की तो उनका कहना था, “मैं बाहर आती जाती रहती हूं। कई बार शहरों में बने शौचालय का भी सामना किया है लेकिन वे बहुत गंदे होते हैं। जब कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता तो फिर ऐसी जगह ही जाना पड़ता है। कई बार ऐसा भी हुआ है कि बाथरूम का प्रेशर बना हुआ है और बाहर किसी शौचालय में मैं नहीं गई हूं। लगा है कि कुछ देर में घर चली जाऊंगी तो वहीं जाकर बाथरूम कर लूंगी। अधिकतर मैं जितने भी टॉयलेट में गई हूं मैंने उनके हालात बहुत ख़राब ही देखे हैं।”

मुज़फ़्फ़रनगर कचहरी में स्थित सार्वजनिक शौचालय का टूटा हुआ मुख्य दरवाजा

मुज़फ़्फ़रनगर की कचहरी में एक साल से प्रैक्टिस करने वाली रूपा कहती हैं, “मेरी जानकारी में यहां कचहरी में दो और पब्लिक टॉयलेट है। मैं अक्सर जो इस्तेमाल करती हूं उसकी हालत कोई बहुत अच्छी नहीं है। हालांकि ये ज्यादा पुराना बना नहीं है लेकिन साफ-सफाई का बहुत अभाव है। अब लगभग रोज के घर से नौ-दस घंटे घर से बाहर बिताते है तो इस बीच टॉयलेट आना तो सामान्य है। पीरियड्स के दौरान टॉयलेट इस्तेमाल करने की ज्यादा आवश्यकता पढ़ती है।” टॉयलेट एक बुनियादी ज़रूरत है। महिलाओं के लिए तो यह और भी बहुत ज़रूरी है। बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याएं हर किसी को प्रभावित करती हैं लेकिन महिलाओं और अन्य जेंडर माइनॉरीटीज़ के लिए यह एक गंभीर चुनौती बनकर सामने आती है। 


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