समाजख़बर देश की लगभग 50 फीसदी युवा महिलाएं शिक्षा और रोज़गार से दूरः रिपोर्ट

देश की लगभग 50 फीसदी युवा महिलाएं शिक्षा और रोज़गार से दूरः रिपोर्ट

सर्वे के अनुसार 15-29 साल की युवा महिलाओं में से 51.7 फीसदी महिलाएं शिक्षा और रोजगार से दूर हैं। पुरुषों में यह दर 15.4 प्रतिशत है। यह आंकड़ा मुख्य तौर पर लैंगिक असमानता को दर्शाता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांव कुटबी की 17 साल की सारिका (बदला हुआ नाम) रोज दिन में लगभग तीन-चार घंटे अपने पड़ोसी के यहां से घर के कामों के लिए पानी ढोने का काम करती है। पढ़ाई करने की उम्र में वह पानी की व्यवस्था के अलावा घर के कामों में अपनी मां की मदद करने में पूरा दिन बिता देती है। ऐसा नहीं है कि सारिका के गांव में स्कूल नहीं है लेकिन घर के काम की जिम्मेदारी की वजह से वह स्कूल नहीं जाती है। भारत में सारिका जैसी अनेक बच्चियां हैं जो पढ़ाई से दूर है जिनके श्रम के योगदान की कोई गणना नहीं है।

हाल ही में जारी नैशनल सैंपल सर्वे ऑफिस (एनएसएसओ) की भारत की युवा महिलाओं की स्थिति को लेकर रिपोर्ट जारी की गई है जिसके अनुसार भारत की अधिकतर युवा महिलाएं शिक्षा से दूर हैं, कार्यस्थल में उनकी पहुंच नहीं है और उनके पास किसी तरह का प्रशिक्षण नहीं है। सर्वे के अनुसार 15-29 साल की युवा महिलाओं में से 51.7 फीसदी महिलाएं शिक्षा और रोजगार से दूर हैं। पुरुषों में यह दर 15.4 प्रतिशत है। यह आंकड़ा मुख्य तौर पर लैंगिक असमानता को दर्शाता है। यह रिपोर्ट साल 2021 में 2.76 लाख घरों से एकत्र आंकड़ों पर आधारित है। यह सर्वे संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों से का हिस्सा है जिसका मकसद वैश्विक स्तर पर शिक्षा, रोजगार और लैंगिक असमानता को खत्म करना है।  

रिपोर्ट के मुताबिक़ एनईईटी संख्या में लैंगिक असमानता की प्राथमिक वजह महिलाओं पर अवैतनिक घरेलू कामों का भार है। रिपोर्ट के मुताबिक़ लगभग 7.3 फीसदी पुरुषों के मुकाबले 90 फीसदी एनईईटी युवा महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों में भाग ले रही थी। सर्वे में शामिल युवा महिलाओं ने दर्ज कराया की वे सर्वे से पहले सप्ताह के 7 दिन तक घरेलू जिम्मेदारियों को पूरा करने में समय खर्च करती रही। ग्रामीण क्षेत्र में यह दर 52.4 फीसदी और शहरी क्षेत्र में यह दर 50 फीसदी है। 

काम को लेकर महिलाओं की तलाश

सर्वे में शामिल एनईईटी महिला और पुरुषों से काम को लेकर अलग-अलग पहलूओं से जुड़े सवाल किए गए। इसमें काम की उपलब्धता, घरेलू काम में योगदान आदि शामिल थे। महिलाओं में तकनीक ज्ञान और कार्यस्थल पर कमी की पहली वजह घरेलू कामों का भार है। रिपोर्ट के मुताबिक़ घरेलू जिम्मेदारियों को निभाने में केवल 7.3 प्रतिशत पुरुषों का योगदान हैं जबकि महिलाओं में यह दर 89.8 प्रतिशत हैं।

एनएसएसओ की रिपोर्ट के अनुसार 65.3 प्रतिशत पुरुष सक्रिय रूप से काम के लिए उपलब्ध हैं और काम की तलाश में हैं। वहीं एनआईआईटी युवा महिलाओं में यह दर केवल 5.9 प्रतिशत देखी गई। ग्रामीण स्तर पर तो केवल 4.2 प्रतिशत महिलाओं में काम के लिए उपलब्धता के प्रति इच्छा दर्ज की गई। यह अंतर महिलाओं की श्रम बल में झुकाव की स्थिति को दिखाता है। 

शिक्षा के लिए पलायन महिलाओं में है कम

रिपोर्ट में आगे एक जगह से दूसरी जगह जाने यानी पलायन से संबंधित आंकड़े भी जारी किए है। जिसके अनुसार रोजगार और शिक्षा के लिए पयालन करने में महिलाओं की संख्या पुरुषों से काफी कम है। रोजगार के संबंध में केवल एक प्रतिशत महिलाएं पयालन करती हैं। जबकि पुरुषों में यह दर 48.8 प्रतिशत है। पढ़ने के लिए 0.9 फीसदी महिलाएं पलायन करती हैं हालांकि पुरुषो में यह दर लगभग आठ फीसद है। इंडियन एक्सप्रेस में छपी जानकारी के अनुसार भारत में 79 फीसदी महिलाओं ने महसूस किया हैं कि उनको अपने मन का काम करने के लिए अनुमति लेने की आवश्यकता पड़ती है।   

भारत की अधिकतर युवा महिलाएं शिक्षा से दूर हैं, कार्यस्थल में उनकी पहुंच नहीं है और उनके पास किसी तरह का प्रशिक्षण नहीं है। सर्वे के अनुसार 15-29 साल की युवा महिलाओं में से 51.7 फीसदी महिलाएं शिक्षा और रोजगार से दूर हैं।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली गुड़िया ग्रेजुएशन के दूसरे साल में हैं। फाइन आर्ट्स की पढ़ाई करने वाले के लिए वह अपने शहर से दूर दिल्ली जाकर पड़ना चाहती थी लेकिन घर वालों की मनाही के बाद वह घर के पास वाले कॉलेज में ही पढ़ाई कर रही हैं। गुड़िया का कहना है, “मैं बाहर जाकर पढ़ना चाहती थी लेकिन मेरे घर वालों ने इसकी साफ मनाही कर दी थी। हालांकि इस साल मेरा भाई ने बाहरवीं की परीक्षा दी है और उसका एडमिशन नोएडा के एक कॉलेज में कराने की योजना चल रही है। यहां तक की अभी से मुझे कहा जाता है कि घर से बाहर जाकर जो भी करना है अपने घर (ससुराल) जाकर करना है। मुझे ग्रेजुएशन के बाद नौकरी करने की भी इजाजत नहीं है, हां केवल इतना कहा जाता है जो भी करना है घर से शुरू करना है।” एनएसएसओ की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 87 फीसदी महिलाएं शादी के संबंध में पलायन करती है। पुरुषों में यह दर 5.8 फीसद है।  

द प्रिंट में छपी लेख में नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पोलिसी की प्रोफेसर लेखा चक्रवती के मुताबिक़ महिलाओं पर देखभाल अर्थव्यवस्था का भार उन्हें कार्यबल में शामिल होने से रोकता है। यही वजह है कि महिलाओं का इन आंकड़ों में अधिक प्रतिनिधित्व मिलता है। दूसरा बहुत से परिवार भारत में महिलाओं के भविष्य को रोजगार के बजाय शादी में देखते हैं। 

महिलाओं में तकनीक ज्ञान और कार्यस्थल पर कमी की पहली वजह घरेलू कामों का भार है। रिपोर्ट के मुताबिक़ घरेलू जिम्मेदारियों को निभाने में केवल 7.3 प्रतिशत पुरुषों का योगदान हैं जबकि महिलाओं में यह दर 89.8 प्रतिशत हैं।

भारत में लैंगिक असमानता और समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए महिलाओं के प्रति नज़रिये को बदलना और उन्हें प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी में लैंगिक समानता हासिल करने भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 27 प्रतिशत की वृद्धि हासिल की जा सकती है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के साल 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 2005 से 2019 के बीच महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी 45 फीसदी से 27 फीसदी हो गई है। 

लैंगिक असमानता की खाई को दूर करने के लिए शिक्षा के माध्यम से सबसे ज्यादा उन्हें आगे बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए ग्रामीण और शहरी दोनों जगह पर महिलाओं को उनकी पसंद से शिक्षा हासिल करके आगे रोजगार के क्षेत्र में आगे बढ़ाने की बहुत आवश्यकता है। महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए साथ ही तकनीक प्रशिक्षण और ज्ञान में उनका आगे आना बहुत ज़रूरी है।


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