समाजख़बर लैंगिक असमानता की चुनौतीपूर्ण स्थिति को ज़ाहिर करती सांख्यिकी मंत्रालय की रिपोर्ट 

लैंगिक असमानता की चुनौतीपूर्ण स्थिति को ज़ाहिर करती सांख्यिकी मंत्रालय की रिपोर्ट 

केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने ‘वीमन एंड मैन इन इंडिया 2022’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट मंत्रालय द्वारा जुलाई 2021 से जून 2022 के बीच इकठ्ठा किए गए आंकड़ों के आधार पर है। रिपोर्ट के मुताबिक़ सभी व्यवसायों में पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानता की बड़ी खाई मौजूदा है।

श्रम के बाजार में एक महिला और पुरुष दोनों काम करते हैं लेकिन निर्धारित मजदूरी उल्लेखनीय रूप से महिला को कम मिलती है। यह स्थिति शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में लगभग समान है। यही वजह है कि भारतीय समाज में लैंगिक समानता अभी भी बहुत दूर की बात है। यह एक ऐसा विषय जिसे गंभीरता से नहीं लिया जाता है। लैंगिक समानता सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे तमाम क्षेत्रों में महिलाओं और पुरुषों के बीच समान अवसर की वकालत करती है। लेकिन साल 2023 में भी हम समान अवसर के लक्ष्य की पहुंच से कोसो दूर हैं। लैंगिक भेदभाव की वजह से महिलाओं को तमाम अवसरों का हिस्सा बनने से रोका जाता है।

हाल ही में केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने ‘वीमन एंड मैन इन इंडिया 2022’ नाम से एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट मंत्रालय द्वारा जुलाई 2021 से जून 2022 के बीच इकठ्ठा किए गए आंकड़ों के आधार पर है। रिपोर्ट के मुताबिक़ सभी व्यवसायों में पुरुषों और महिलाओं के बीच असमानता की बड़ी खाई मौजूदा है। रिपोर्ट में राजनीतिक भागीदारी, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और जनसांख्यिकीय संकेतकों सहित कई विषयों को शामिल किया गया है। 

कार्यस्थल में पुरुषों से काफी पीछे महिलाएं

लैंगिक असमानता और रूढ़िवादी सोच की वजह से महिलाओं के लिए अभी भी घर से बाहर जाकर काम करना बहुत बड़ी उपलब्धियों में से एक है। यही वजह है कि आज भी कार्यक्षेत्र में महिलाओं की संख्या, पुरुषों के मुकाबले कम है। रिपोर्ट बताती है कि साल 2021-22 में कार्यस्थल मे भागीदारी में पुरुषों की दर 77.2 फीसदी और महिलाओं की 32.8 फीसदी थी। यह असमानता केवल कार्यस्थलों में ही नहीं है बल्कि वेतन में भी है। टाइम्स ऑफ इंडिया में रिपोर्ट पर आधारित ख़बर के मुताबिक़ अप्रैल-जून 2022 के दौरान सभी राज्यों में ग्रामीण भारत में महिला मजदूरी दर, पुरुष मजदूरी के 93.7 प्रतिशत से आधा है और शहरों में यह 100.8 फीसदी तक थी। महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले 32 फीसदी कम मजदूरी मिलती है। ग्रामीण क्षेत्र में पुरुषों की प्रतिदिन औसतन मजदूरी 393 रूपये व महिलाओं की 265 रुपये है। शहरी क्षेत्र में यह 483 और ग्रामीण क्षेत्र में 333 रुपये प्रतिदिन है। 

तस्वीर साभारः Scroll

अवैतनिक कार्यों में महिलाओं का योगदान अधिक 

अवैतनिक काम (बिना पैसे के काम) में सबसे ज्यादा श्रम महिलाओं का खर्च होता है। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं पर कामों की जिम्मेदारी सौंपकर उनसे जीवनभर अवैतनिक काम कराया जाता है। रिपोर्ट में अवैतनिक, वैतनिक और शेष अन्य गतिविधियों में प्रति व्यक्ति द्वारा एक दिन में व्यतीत किए गए औसत समय को मिनट में बताया गया है। इसके अनुसार महिलाएं अवैतनिक गतिविधियों में 305 मिनट, वैतनिक गतिविधियों में 56 मिनट और अन्य गतिविधियों में 1,079 मिनट खर्च किए। वहीं अवैतनिक गतिविधियों में पुरुषों ने 67 मिनट खर्च किये हैं, वैतनिक गतिविधियों में 240 मिनट और शेष अन्य गतिविधियों में 1133  मिनट खर्च किए। अवैतनिक गतिविधियों का यह आंकड़ा उन महिलाओं की तस्वीर बयां करता है जिनका श्रम घरेलू कामों तक सिमट जाता है। इतना ही नहीं अवैतनिक कामों का भार महिलाओं की गतिशीलता को भी प्रभावित करता है। हाल ही में जर्नल साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित ‘जेंडर गैप इन मोबिलिटी आउटसाइड होम इन अर्बन इंडिया’ के नाम से प्रकाशइत स्टडी के मुताबिक 53% महिलाएं ऐसी हैं जो दिन में एक बार भी घर से बाहर नहीं निकलती। 

आज भी कार्यक्षेत्र में महिलाओं की संख्या, पुरुषों के मुकाबले कम है। रिपोर्ट बताती है कि साल 2021-22 में कार्यस्थल मे भागीदारी में पुरुषों की दर 77.2 फीसदी और महिलाओं की 32.8 फीसदी थी। यह असमानता केवल कार्यस्थलों में ही नहीं है बल्कि वेतन में भी है।

स्वास्थ्य सेवा और लैंगिक असमानता

केंद्रीय मंत्रालय द्वारा जारी यह रिपोर्ट बताती है लिंग, लोगों तक स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाओं की पहुंच को भी प्रभावित करता है। रिपोर्ट के अनुसार, संसाधनों और निर्णय लेने की क्षमता में कमी, आने-जाने की गतिशीलता पर प्रतिबंध जैसी वजहों से पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और सेवाओं तक पहुंच ज़्यादा मुश्किल हो जाती हैं। इसी कारण वे कई गंभीर रोगों से ग्रस्त हो जाती हैं। रिपोर्ट स्वास्थ्य के क्षेत्र में लैंगिक पहचान के जिन नतीजों की यहां बात कर रही है उसकी जड़ें पितृसत्तात्मक मानसिकता के माहौल से है। कम स्वास्थ्य संसाधन और निर्णय लेने की क्षमता का अभाव उनका अपने शरीर की स्वायत्तता के हक को भी छीनने लगता है।

प्रबंधकीय पदों पर कम महिलाएं मौजूद

रिपोर्ट में कहा गया है कि महिला आबादी का एक चौथाई हिस्सा भी विभिन्न संगठनों में प्रबंधकीय पद पर नहीं है। पीएफएलएस (आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण) डेटा के अनुसार, 2020 में भारत में प्रबंधकीय पदों पर काम करने वाले अधिकारियों में 18.8 प्रतिशत महिलाएं थीं जो 2021 में घटकर 18.1 प्रतिशत रह गईं। टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित ख़बर के अनुसार भारतीय कंपनियों में केवल पांच फीसदी महिलाएं टॉप मैनेजमेंट में शामिल हैं। केवल सात फीसदी वरिष्ठ प्रबंधकीय तक पहुंच पाती है। इस अध्ययन के मुताबिक महिलाओं को अपने सहयोगी पुरुष के मुकाबले 17 प्रतिशत कम वेतन मिलता है।

तस्वीर साभारः Indian Express

 शिक्षा के नामांकन में अंतर 

शिक्षा, वर्तमान में मानव विकास का पहला क्षेत्र है। लैंगिक भेदभाव की वजह से शिक्षा पाने में भी महिलाएं पीछे हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्र में महिला साक्षरता दर में जेंडर गैप मौजूद है। यह रिपोर्ट स्नातक स्तर पर प्रमुख विषयों में महिलाओं और पुरुषों के साल 2020-21 में दर्ज किए गए नामांकन के अंतर को दर्शाती है। इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी के विषय में 10,69,136 महिलाओं के नामांकन और पुरुषों के 26,17,155 हैं। आईटी और कंप्यूटर के विषय में 3,44,492 महिलाओं की संख्या के मुकाबले 5,33,445 पुरुषों के दर्ज किये गए।

प्रबंधन/मैनेजमेंट के विषय में 2,98,594 महिलाओं के नामांकन के मुकाबले पुरुषों में यह 5,16,273 है। कानून/लॉ के विषय में 1,61,897 महिलाओं के नामांकन दर्ज है और पुरुषों में 3,16,115 है। कॉमर्स के विषय में 20,96,418 महिलाओं के नामांकन के मुकाबले पुरुषों में यह संख्या 22,27,036 है। लगभग हर विषयों में स्नातक स्तर पर शिक्षा के लिए महिलाओं का नामाकंन कम है। शिक्षा और सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों की पढ़ाई में उनकी संख्या ज्यादा हैं। विज्ञान, तकनीक क्षेत्र की शिक्षा में कम है। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि महिला आबादी का एक चौथाई हिस्सा भी विभिन्न संगठनों में प्रबंधकीय पद पर नहीं है। पीएफएलएस (आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण) डेटा के अनुसार, 2020 में भारत में प्रबंधकीय पदों पर काम करने वाले अधिकारियों में 18.8 प्रतिशत महिलाएं थीं जो 2021 में घटकर 18.1 प्रतिशत रह गईं।

आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति 

बैंको में खाते और उनमें जमा राशि के संबंध में असमानता से रिपोर्ट में पता चलता है कि महिलाएं बैंको में एक तिहाई से अधिक जमा खातों की धारक/मालिक हैं। लेकिन शेड्यूल्ड कमर्शियल बैंक की कुल जमा राशि का यह केवल पांचवां हिस्सा है। लैंगिक भूमिकाओं से जुड़े सामाजिक मानदंडों के परिणामस्वरूप महिलाओं का वित्तीय संसाधनों पर कम नियंत्रण उनकी स्थिति को स्पष्ट करता है। अवैतनिक श्रम की वजह से महिलाओं की बड़ी जनसंख्या आर्थिक तौर पर अक्षम बनी रहती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाएं अपने बिजनेस, फॉर्म, इंटरप्रेन्योर, रोजगार और अवैतनिक घरों के कामों की वजह से अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभाती हैं। लेकिन वे गरीब, भेदभाव और शोषण से ज्यादा प्रभावित हैं।

लैंगिक असमानता का मतलब है कि महिलाओं तक हर स्तर पर अवसरों की पहुंच का अभाव। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार लैंगिक समानता न केवल मौलिक मानव अधिकार है बल्कि समृद्ध, शांति पूर्ण और सतत विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। सामाजिक बाधाओं की वजह से महिलाओं को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। भारत सरकार की यह रिपोर्ट लैंगिक असमानता को दर्शाते हुए देश के हर क्षेत्र में समान अवसरों की पहुंच के अभाव को उजागर करती हैं। असमानता का यह आधार इतना दृढ़ होता जा रहा है कि स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी पितृसत्तात्मक मानदंड हावी साबित हो रहे हैं।


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