समाजविज्ञान और तकनीक विज्ञान की दुनिया में औरतों के प्रति पितृसत्तात्मक नज़रिया और प्रतिष्ठित सम्मान में असमान प्रतिनिधित्व

विज्ञान की दुनिया में औरतों के प्रति पितृसत्तात्मक नज़रिया और प्रतिष्ठित सम्मान में असमान प्रतिनिधित्व

बायोमेडिकल साइंस के क्षेत्र में 1968 से लेकर 2017 तक के समय के 628 पुरस्कारों से जुड़ा डाटा इकट्ठा किया गया। इसमें अनुसंधान के लिए प्रमुख पुरस्कार के साथ-साथ शिक्षण और सलाह जैसे पेशेवर सेवाएं भी शामिल थी। आंकड़ों के अनुसार महिलाएँ केवल 14.6 फीसदी प्रतिष्ठित पांच पुरस्कारों की विजेता बनीं।

साल 1903 में मेरी क्यूरी वह पहली महिला वैज्ञानिक बनीं जिन्हें नोबेल सम्मान से सम्मानित किया गया। उसके बाद उन्हें 1911 में उन्हें भौतिक विज्ञान में उनकी खोज के लिए यह सम्मान दिया गया था। मेरी क्यूरी के नाम के बाद लगभग तीस साल बाद किसी अन्य महिला वैज्ञानिक को यह सम्मान नहीं मिला। ऐसा इसलिए क्योंकि विज्ञान के क्षेत्र में बड़े स्तर पर लैंगिक भेदभाव भी स्थित है। यही वजह है कि चाहे नोबेल पुरस्कार हो या फिर अन्य अवसर वहां महिलाओं की उपलब्धियों को पहचाने, मान्यता देने की गति बहुत धीमी है। भले ही इक्कीसवीं सदी आधुनिक कम्यूटर और विज्ञान क्रांति का समय है लेकिन अन्य क्षेत्रों की तरह तर्क और शोध वाले विज्ञान क्षेत्र में भी लैंगिक भेदभाव की जड़ें बहुत गहरी है। 

आज विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में महिलाओं की खूब भागीदारी बढ़ रही हैं। इसके बावजूद विज्ञान के क्षेत्र में उनके आगे बढ़ने के लिए स्थापित पूर्वाग्रहों को साफ देखा जा सकता है। इन्हीं की वजह से उनके आगे बढ़ने के रास्ते ज्यादा कठिन हो जाते हैं। तमाम तरह के आंकड़े और रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करते हैं कि विज्ञान की दुनिया में महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है। उनके काम को कम गंभीरता से लिया जाता है। 

साल 1901 से 2019 तक 334 नोबेल पुरस्कारों में से 616 भौतिक, रसायन और चिकित्सा के क्षेत्र में वितरित हुए हैं जिनमें से 20 पुरस्कारों में से 19 महिलाओं ने जीते हैं। मैरी क्यूरी रसायन और भौतिक विज्ञान में दो नोबेल जीतने वाली पहली महिला वैज्ञानिक थीं।

यूनेस्को की 2018 की फैक्ट शीट के अनुसार दुनिया में 28.8 प्रतिशत महिलाएं विज्ञान रिसर्च में शामिल हैं। यह आंकड़ा विज्ञान रिसर्च के क्षेत्र में महिलाओं के कुल प्रतिनिधित्व की दर है। भारत में महिलाओं का स्टेम में प्रतिनिधित्व 28 प्रतिशत हैं। विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं को लेकर रूढ़िवादी विचार की वजह से उनकी क्षमता को कम आंका जाता है। आमतौर पर महिला शोधकर्ताओं को पुरुष समकक्षों के मुकाबले कम रिसर्च ग्रांट मिलती है। केवल 33 फीसदी महिलाएं रिसर्चर हैं और उनमें से केवल 12 प्रतिशत नैशनल साइंस एकेडमिक की सदस्या हैं। 

वर्तमान में तेजी से बढ़ते आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में काम करने वाले पांच पेशवरों में से केवल एक महिला हैं। साथ ही बात जब इंजीनियरिंग, कम्प्यूटर विज्ञान और सूचना की आती है तो इसमें स्नातक करने वाली महिलाएं क्रमशः 28 प्रतिशत और 40 प्रतिशत हैं। विज्ञान रिसर्च को पब्लिश होने में भी महिलाएं पीछे है। ऐसी बहुत कम महिलाएं हैं जिनकी रचनाएं प्रमुख जर्नल्स में प्रकाशित होती है।     

तस्वीर साभारः ASBMB TODAY

फंडिंग में जेंडर गैप

वैज्ञानिकों के लिए अपने शोध कार्य को आगे बढ़ाने के लिए ग्रांट बहुत आवश्यक है जो आर्थिक रूप से आने वाली बाधाओं को दूर करती है। साल 2019 की केलॉग स्कूल की प्रोफेसर ऑफ मैनेजमेंट और नॉर्थवेस्टर्न फाइनबर्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन की प्रोफेसर टेरेसा के. वुडड्रॉफ्ट के दो पेपर से यह निष्कर्ष निकलता है कि नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ महिला बॉयोमेडिकल रिसर्चर को कम ग्रांट फंडिंग करता है। इतना ही नहीं जब महिला वैज्ञानिक पुरस्कार जीतती है तो उन्हें कम पुरस्कार राशि दी जाती है।

इस रिसर्च में एनआईएच के द्वारा साल 2006 से 2017 के समय में दिए गए 53,000 ग्रांट्स अवॉर्ड का विश्लेषण किया गया। उन्होंने पाया कि मीडियम ग्रांट साइज जो पहली बार महिलाओं को दिया गया वह यूएस डॉलर 126,615 था। वहीं पहली बार पुरुषों को मिलने वाली यह समान ग्रांट की राशित 165,271 यूएस डॉलर थी। महिला और पुरुषों को मिलने वाली इस धनराशि में 24 फीसदी का अंतर देखा गया। 

पुरस्कार पाने में भी पीछे हैं महिलाएं

जैसे- जैसे महिलाएं आगे बढ़ती है यह असमानता और बढ़ जाती है। महिला वैज्ञानिकों को मिलने वाली पुरस्कार की राशि में भी इस तरह का अंतर देखा गया है। इस टीम ने बायोमेडिकल साइंस के क्षेत्र में 1968 से लेकर 2017 तक के समय के 628 पुरस्कारों से जुड़ा डाटा इकट्ठा किया गया। इसमें अनुसंधान के लिए प्रमुख पुरस्कार के साथ-साथ शिक्षण और सलाह जैसे पेशेवर सेवाएं भी शामिल थी। आंकड़ों के अनुसार महिलाएँ केवल 14.6 फीसदी प्रतिष्ठित पांच पुरस्कारों की विजेता बनीं। द कंवरशेसन में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में मनोवैज्ञानिक सपना चेरियन के अनुसार हमें इस बारे में सोचना होगा कि हमें पुरुषों के व्यवाहार को बदलने के लिए क्या कर सकते हैं ताकि यह सुनिश्तित किया जा सकें कि पुरुष यह प्रतिष्ठित पुरस्कार नहीं जीत रहे हैं क्योंकि वे इस बात का फायदा उठा रहे हैं अन्य लोग जो उनके साथ काम कर रहे हैं वे उनसे ज्यादा सेवा में योगदान दे रहे हैं।” 

नोबेल पुरस्कार में महिला वैज्ञानिक और असमानता

तस्वीर साभारः NoblePrize.org

एक सदी से अधिक समय पहले शुरू हुए दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम रहा है ख़ासतौर पर विज्ञान में। पुरस्कार के शुरुआती समय से ही नोबेल प्राप्त करने वाले व्हाइट, पुरुष और अमेरिकरन रहे हैं। पिछले बीस सालों में नोबेल पुरस्कारों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ा है। नोबेल प्राइज की वेबसाइट पर छपी जानकारी के अनुसार रसायन, भौतिक, मनोविज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में अबतक कुल 23 महिलाओं को सम्मानित किया जा गया हैं। रसायन विज्ञान में केवल चार और भौतिक विज्ञान में आठ महिलाएं यह पुरस्कार जीत चुकी हैं। मनोविज्ञान और चिकित्सा में 12 महिला वैज्ञानिक को अबतक नोबेल मिल चुका हैं। 

साल 1901 से 2019 तक 334 नोबेल पुरस्कारों में से 616 भौतिक, रसायन और चिकित्सा के क्षेत्र में वितरित हुए हैं जिनमें से 20 पुरस्कारों में से 19 महिलाओं ने जीते हैं। मैरी क्यूरी रसायन और भौतिक विज्ञान में दो नोबेल जीतने वाली पहली महिला वैज्ञानिक थीं। इतना ही नहीं आजतक किसी भी ब्लैक वैज्ञानिक को विज्ञान के क्षेत्र में नोबेल नहीं मिला है इसमें न कोई महिला है और न ही कोई पुरुष। 

साल 2021 में हुए एक अध्ययन में पुरस्कार वितरण में अंतर का विश्लेषण किया गया है। 141 टॉप साइस पुरस्कारों में पिछले दो दशक में पाया गया है कि महिलाओं को अपनी रिसर्च और उसकी गुणवत्ता के इतर पुरुष साथियों की तुलना में पुरस्कार जीतने की कम संभावना है। नस्लीय और आर्थिक तौर पर इस तरह की बाधाएं महिलाओं और ब्लैक लोगों को एसटीईएम के क्षेत्र में आगे बढ़ने नहीं देती हैं। नोबेल में प्रतिनिधित्व की कमी भी सकीर्ण सोच को स्पष्ट तरीके से दिखाती है। गणित में दिया जाना वाला प्रतिष्ठित एबेल पुरस्कार केवल अबतक एक महिला ने जीता हैं। साल 2019 अमेरिकन केरेन उललेनबेक ने पार्टिल डिफरेनटियल इक्वेशन से संबंधित काम के लिए एबेल सम्मान से सम्मानित किया गया था। इस पुरस्कार के शुरुआत साल 2003 में नॉर्वे में हुई थी जिसमें 60 लाख नॉर्वेयिन क्रोन की धनराशि विजेता को दी जाती है। 

आमतौर पर महिला शोधकर्ताओं को पुरुष समकक्षों के मुकाबले कम रिसर्च ग्रांट मिलती है। केवल 33 फीसदी महिलाएं रिसर्चर हैं और उनमें से केवल 12 प्रतिशत नैशनल साइंस एकेडमिक की सदस्या हैं। 

विज्ञान का क्षेत्र आज भी पुरुषों के दायरे से घिरा हुआ है। यही वजह है कि विज्ञान के क्षेत्र में जेंडर गैप हैं। महिलाओं की पहुंच, भागीदारी, स्थिति, लाभ, वेतन और सम्मान के स्तर पर यह अंतर बना हुआ है। वैज्ञानिक संस्थान समावेशी नहीं है। महिलाओं को लेकर इस क्षेत्र में जो पूर्वाग्रह है वो इस अंतर की बड़ी वजह है। विज्ञान की दुनिया के इंटरसेक्शन तरीके से समावेशी होना वर्तमान के सामाजिक कल्याण के लिए न केवल आवश्यक है बल्कि महिलाओं की स्थिति को भी बेहतर कर सकता है। 


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