समाजकैंपस दिल्ली विश्वविद्यालय में हाशिये के विद्यार्थियों के लिए संघर्ष, कैंपस ‘सवर्णों का स्वर्ग’ है

दिल्ली विश्वविद्यालय में हाशिये के विद्यार्थियों के लिए संघर्ष, कैंपस ‘सवर्णों का स्वर्ग’ है

दिल्ली विश्वविद्यालय अपनी बुनियाद में पूरा एलीट है। गाँव से आने वाले पिछड़े, दलित-आदिवासी विद्यार्थी यहाँ सहज नहीं महसूस कर पाते हैं। उन्हें लगता है कि ये अलग 'दुनिया' है। दिल्ली विश्वविद्यालय इन विद्यार्थियों को सहज महसूस कराने का कोई प्रयास भी नहीं करता है।

एक दिन शाम को लाइब्रेरी में बैठा हुआ था। थोड़ी भूख लग रही थी तो ऑनलाइन कुछ खाने का आर्डर किया। फैकल्टी के बाहर डिलीवरी करने के लिए लड़का आया।’यहीं पढ़ते हो?’, उसने पूछा। ‘हाँ’, मैंने कहा। ‘अच्छा ये बताओ यहाँ हम लोगों के लिए भी कुछ है?’ ‘मतलब?’, ‘मतलब एससी कटेगरी के लिए भी कुछ है यहां?’, ‘देश के हर सरकारी संस्थान की तरह यहां भी आरक्षण लागू है।’, ‘सोच रहा हूं भाई का दाखिला करवा दूं, उसे आईएएस की तैयारी करानी है।’ जब दिल्ली विश्वविद्यालय अपने सौ वर्ष पूरे होने पर कार्यक्रमों में डूबा है तो एक तबका सवाल पूछता है कि क्या हमारे लिए भी कुछ है?

दिल्ली विश्वविद्यालय अपनी बुनियाद में पूरा एलीट है। गाँव से आने वाले पिछड़े, दलित-आदिवासी विद्यार्थी यहाँ सहज नहीं महसूस कर पाते हैं। उन्हें लगता है कि ये अलग ‘दुनिया’ है। दिल्ली विश्वविद्यालय इन विद्यार्थियों को सहज महसूस कराने का कोई प्रयास भी नहीं करता है। विद्यार्थियों के मन में एक किस्म का हीनताबोध पहले ही भर जाता है। उन्हें लगता है कि इस पूरे ढाँचे में वे ‘मिसफिट’ हैं। अगर आपके पास किसी भी तरह का प्रिविलेज नहीं है तब आप यहाँ नहीं पढ़ सकते हैं। कहने के लिए सबके पास शिक्षा का अधिकार है लेकिन शिक्षा तक पहुँचने के उपकरण इतने कठिन हैं कि हर कोई वहाँ नहीं पहुँच सकता है।

विधि संकाय से एलएलबी कर रहे कुंदन बताते हैं, “दिल्ली विश्वविद्यालय निश्चित रूप से सवर्णों का स्वर्ग है। यहां कास्ट प्राइड प्रोफ़ेसर्स से लेकर विद्यार्थियों में बहुत आसानी से दिख जाती है।न सिर्फ कास्ट प्राइड होता है बल्कि उनमें श्रेष्ठता का दंभ भी होता है।”

बहुत सारे बच्चे जिनमें ‘प्रतिभा’ थी और उनका दाखिला दिल्ली विश्वविद्यालय में हो सकता था, वे दिल्ली आकर नहीं पढ़ पाये। उन्होंने इलाहाबाद, पटना या बनारस चुन लिया। 2019 में बिहार से दिल्ली विश्वविद्यालय में ग्रेजुएशन करने आये विशाल का तजुर्बा भी कुछ इसी तरह का है। उन्होंने किरोड़ीमल कॉलेज में दाखिला लिया लेकिन एक महीने बाद ही छोड़ देना पड़ा। वह बताते हैं, “फीस तो हमने भर दी, लेकिन रहना-खाना बहुत महँगा था जिसके चलते मुझे दिल्ली छोड़ देनी पड़ी।” इस तरह की कहानी के साथ विशाल अकेले नहीं हैं। हजारों विद्यार्थी जो किसी से भी कमतर नहीं हैं, वे सिर्फ़ इसलिए यहाँ नहीं पढ़ पा रहे हैं क्योंकि उनके पास आर्थिक पूंजी नहीं है।

हॉस्टलों की स्थिति

तस्वीर साभारः College Batch.com

किसी भी शैक्षणिक संस्थान में हर कोई पढ़ सके इसके लिए हॉस्टल की व्यवस्था की जाती है। दिल्ली विश्वविद्यालय में हॉस्टल की भारी कमी है। विद्यार्थियों की संख्या को देखते हुए बमुश्किल एक प्रतिशत लोगों को हॉस्टल मिलता है। डीयू में हॉस्टल क्यों नहीं बनाये जा रहे हैं यह भी एक बड़ा सवाल है। हिंदू कॉलेज में सत्र 2022-23 के लिए गर्ल्स हॉस्टल की फीस 1 लाख 30 हजार थी। जबकि यह सत्र सिर्फ़ 9 महीने के लिए था। साल भर चलने पर ये आँकड़ा डेढ़ लाख तक पहुँच जाता है। कॉलेज प्रशासन का मानना है कि क्योंकि हॉस्टल पूरी तरह वातानुकूलित है इसलिए फीस ज्यादा है। हॉस्टल का वातानुकूलित होना विद्यार्थियों का चुनाव नहीं, कॉलेज प्रशासन का है। इस हॉस्टल में गाँव से आने वाली कौन-सी लड़की रह पाएगी? यह सिर्फ़ ‘ख़ास’ लोगों के लिए है जो आर्थिक रूप से समृद्ध हैं। हंसराज कॉलेज आदि की भी हालत कमोबेश ऐसी ही है।

कोविड के बाद जब कॉलेज खुले तो हिंदू कॉलेज का हॉस्टल लड़कों के लिए नहीं खोला गया। कहने को ये कंस्ट्रक्शन के लिए बंद है लेकिन कोई काम नहीं हो रहा है। जबकि उसी के समानांतर कई इमारतें कॉलेज परिसर में बनकर खड़ी हो गईं। ज़ाहिर है कि हॉस्टल कॉलेज की प्राथमिकता में आता ही नहीं है। हॉस्टल की कमी के बाद सवाल हॉस्टल आवंटन की प्रक्रिया पर भी उठता है। यहाँ पर हॉस्टल के लिए सिफारिशें चलती हैं। जाहिर है सिफारिश के लिए पहुँच चाहिए और पहुँच किसकी होती है। एक तबका यहाँ भी छँट जाता है। हॉस्टल में रेगुलर सीट को भी गेस्ट के आधार पर रखकर ज्यादा फीस वसूली जाती है जबकि गेस्ट की अवधारणा ही तब की है जब हॉस्टल की सीट खाली रह जाए।

कैंपस में अपने लिए ‘स्पेस’ तलाशना कठिन काम है। गाँवों से आने वाले पिछड़े, दलित विद्यार्थी दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘एस्थेटिक्स’ से ख़ुद को जोड़ नहीं पाते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.ए. की फीस भी 16-17 हजार से ज्यादा है। एक बड़ी आबादी पहले ही यहाँ पढ़ने से वंचित हो जाती है। लड़कियों के मामले में मध्यवर्गीय परिवारों में अभी-भी ये धारणा है कि यहीं से बी.ए. कर लो, डीयू क्या जाओगी। कैंपस में जिन लोगों का वर्चस्व है वे उच्च वर्ग से आने वाले सवर्ण हैं। जाहिर है जिनका प्रभुत्व होगा वे चीज़ों को अपने हिसाब से ढालने की कोशिश करेंगे। रहने-खाने की समस्या जो ग्रामीण पृष्ठभूमि से आनेवाले विद्यार्थियों को होती है, एलीट लोगों के लिए वो बातचीत का विषय भी नहीं है।

कैंपस में बनने वाली दोस्तियों पर क्लास और कास्ट का प्रभाव देखा जा सकता है। सोशल मीडिया पर अभिव्यक्त करने पर विद्यार्थियों को कई बार ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। विद्यार्थी अपनी समस्याओं को प्रोफ़ेसर्स से कहने में संकोच महसूस करते हैं। विधि संकाय से एलएलबी कर रहे कुंदन बताते हैं, “दिल्ली विश्वविद्यालय निश्चित रूप से सवर्णों का स्वर्ग है। यहां कास्ट प्राइड प्रोफ़ेसर्स से लेकर विद्यार्थियों में बहुत आसानी से दिख जाती है। न सिर्फ कास्ट प्राइड होता है बल्कि उनमें श्रेष्ठता का दंभ भी होता है।”

प्रतिनिधित्व का सवाल और आरक्षण

1979 में भारत के ‘सामाजिक या शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों’ के लोगों की पहचान करने के लिये बी पी मंडल की अध्यक्षता में मंडल आयोग का गठन किया गया। 1980 में ये रिपोर्ट सौंप दी गई। किसी प्रधानमंत्री ने इसे लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई। 1990 में वीपी सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू किया जिसके चलते सरकारी नौकरियों और सार्वजनिक क्षेत्र में अन्य पिछड़ा वर्ग को 27% आरक्षण दिये जाने का प्रावधान है। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय में कहने भर के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27% आरक्षण है। एससी-एसटी के लिए 22.5% आरक्षण की व्यवस्था है। यहाँ की तस्वीर कुछ और है, यहाँ प्रतिनिधित्व नदारद है। आरक्षित सीटों को भी एनएफएस (नॉट फाउंड सुटेबल) बताकर अनारक्षित कर दिया जाता है।

कैंपस में अपने लिए ‘स्पेस’ तलाशना कठिन काम है। गाँवों से आने वाले पिछड़े, दलित विद्यार्थी दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘एस्थेटिक्स’ से ख़ुद को जोड़ नहीं पाते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में बी.ए. की फीस भी 16-17 हजार से ज्यादा है। एक बड़ी आबादी पहले ही यहाँ पढ़ने से वंचित हो जाती है। लड़कियों के मामले में मध्यवर्गीय परिवारों में अभी-भी ये धारणा है कि यहीं से बी.ए. कर लो, डीयू क्या जाओगी।

प्रतिनिधित्व के मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय को देखकर कोई भी कह सकता है कि ये सवर्ण मानसिकता से ग्रसित है। 20 जुलाई 2020 को ‘द प्रिंट’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली विश्वविद्यालय में 5% से भी कम ओबीसी शिक्षक हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आवंटित 1706 पदों में से महज़ 79 पदों पर नियुक्तियाँ हुईं हैं। जबकि असोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर के पद पर ओबीसी का कोई प्रतिनिधित्व नहीं। विभागाध्यक्ष का पद किसी भी विभाग में महत्वपूर्ण होता है। पूरे सत्र में विभाग की दशा-दिशा वही तय करते हैं। हैरत की बात है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में सिर्फ़ एक बार कोई दलित विभागाध्यक्ष हुआ है। प्रो श्योराज सिंह बेचैन पिछले सत्र में विभागाध्यक्ष चुने गए थे। बाकी विभागों में भी कमोबेश यही हाल है।

प्रतिनिधित्व का सवाल सिर्फ़ विद्यार्थियों और शिक्षकों का नहीं, उनके नायकों का भी है। ‘मकतूब इंडिया’ को दिये साक्षात्कार में राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर एन. सुकुमार कहते हैं, “फुले और पेरियार का जन्मदिन फलक से गायब है; जबकि गांधी दिवस को राष्ट्रीय जयंती के रूप में मनाया जाता है। (अंबेडकर जयंती कुछ हद तक याद की जाती क्योंकि इस मामले में हम मजबूर हैं।) और स्मृतिलोप की यह राजनीति सामान्य हो गई है।” जब हम मेरिट की बात करते हैं तो हमें अवसरों की बात भी करनी होगी। सौ मीटर की दौड़ में कोई पहले ही पचास मीटर आगे खड़ा होगा तो प्रतियोगिता निष्पक्ष नहीं होगी। जाति, वर्ग, धर्म के मुद्दों पर दिल्ली विश्वविद्यालय में एक अभी भी ‘स्पेस’ की खोज है।


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