इतिहास भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण मुस्लिम महिलाएं और उनका योगदान

भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण मुस्लिम महिलाएं और उनका योगदान

मध्य कालीन भारतीय राजव्यवस्था हो या स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई, सभी में मुस्लिम महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और अपना योगदान दिया। आज़ादी के पहले और उसके बाद भी ये महिलाएं शिक्षा, कला और समाज सुधारक के रूप में काम करती रहीं।

किसी भी समाज में महिलाओं के लिए कुछ नया करना हमेशा से एक चुनौती रही है। समाज की रूढ़िवादी मानसिकता के साथ साथ मुस्लिम महिलाओं को पर्दा-प्रथा जैसी बेड़ियों से निकल कर ख़ुद को साबित करना बेहद मुश्किल रहा है। इन मुश्किलों के बावजूद इन महिलाओं ने सामाजिक ,राजनीतिक और सांस्कृतिक ,हर छेत्रों में अपना अमिट योगदान दिया है। मध्य कालीन भारतीय राजव्यवस्था हो या स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई, सभी में मुस्लिम महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और अपना योगदान दिया। आज़ादी के पहले और उसके बाद भी ये महिलाएं शिक्षा, कला और समाज सुधारक के रूप में काम करती रहीं। इन महिलाओं ने उस ज़मीन पर भी नारीवादी परचम लहराया जो पुरुषों के नाम पर दर्ज थी। इस लेख में हम कुछ ऐसी महीलाओं के विषय में जानेंगे।

रशीद-उन-निसा

तस्वीर साभार: Heritage Times

1855 में रशीद-उन-निसा का जन्म पटना के शम्सुल उलामा सैय्यद वहीदुद्दीन खान बहादुर के घर हुआ था। उन्हें पहली महिला उर्दू उपन्यासकार होने का गौरव हासिल है। उनके भाई, इमदाद इमाम असर, उर्दू साहित्य के सबसे बड़े साहित्यकारों में से एक थे। वो राशिद अली इमाम और हसन इमाम की चाची थीं। उनकी शादी मौलवी मोहम्मद याह्या से हुई थी, जो साहित्य में रूचि रखते थे। वैसे तो रशीद-उन-निसा शिक्षित और संपन्न परिवार से परिवार से थीं पर महिला होने के नाते साहित्य और ज्ञान तक उनकी पहुंच बहुत ज़्यादा नहीं थी।

पहली किताब का प्रकाशन

बात 1869 की है जब मौलवी नज़ीर अहमद के उपन्यास मिरात-उल-उरूस का प्रकाशन हुआ था। तब वो 16 वर्ष की थीं। मिरात-उल-उरूस को पढ़ कर वो काफ़ी प्रभावित हुईं और 1880 में उन्होंने अपना उपन्यास लिखना शुरू किया। उन्होंने इसे छह महीने के भीतर पूरा भी कर लिया। हालांकि यह उपन्यास 1881 में लिखा गया था लेकिन इसे प्रकाशित करने के लिए पूरे 13 साल का इंतेज़ार करना पड़ा। 1894 में जब रशीद-उन-निशा के बेटे बैरिस्टर सुलेमान कानून की डिग्री हासिल कर के इंग्लैंड से वापस आए, तब आखिरकार ये उपन्यास छपी। लेकिन तब इसमें लेखिका के नाम की जगह बैरिस्टर सुलेमान की मां, सैयद वहीदुद्दीन खान बहादुर की बेटी और इमदाद इमाम की बहन लिखा गया। ये वो मुश्किल समय था जब लेखिका को अपनी ही किताब को अपने नाम से छपवाने की इजाज़त नहीं थी। लेकिन आज रशीद-उन-निशा किसी पहचान की मोहताज नहीं। वो हर दौर की महिलाओं के लिए एक प्रेरणा हैं। उनका मानना था कि हिन्दू हो या मुस्लिम हर महिला को आधुनिक शिक्षा पाने का हक़ है।

बेग़म अनीस क़िदवई

तस्वीर साभार: Times of Pedia

बेग़म अनीस क़िदवई का जन्म 1906 में उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में हुआ था। उनके पिता का नाम शेख विलायत अली था। उनकी शादी शफ़ी अहमद किदवई से हुई थी। उनके पिता और पति स्वतंत्रता सेनानी थे। बेग़म अनीस क़िदवई ने भारत की आज़ादी में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। लेकिन वो बंटवारे से खुश नहीं थीं। विभाजन के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों ने उनके पति शफ़ी अहमद किदवई की जान ले ली, जो शांति और सद्भाव के लिए काम कर रहे थे। लेकिन इस घटना ने भी बेग़म अनीस का हौंसला टूटने नहीं दिया। उन्होंने  सुभद्रा जोशी, मृदुला साराभाई जैसे अन्य महिला नेताओं के साथ मिलकर दंगों में पीड़ित महिलाओं, बच्चों और विस्थापित लोगों के लिए काम किया। उन लोगों के लिए राहत शिविर लगाए, मरीज़ों का इलाज किया और उनके खाने-पीने से लेकर अंतिम संस्कार तक का काम किया। वो दंगों के बीच जातीं और दंगाई से दंगा रोकने की अपील करती। बेगम अनीस किदवई और सुभद्रा जोशी ने मिलकर शांति कायम करने की पुरज़ोर कोशिश की। 1957-68 तक वो राज्य सभा की सदस्य रहीं। हिन्दू-मुस्लिम एकता की मिसाल बेगम अनीस ने 16 जुलाई 1982 को अंतिम सांस ली।

हाजरा बीबी स्माइल

तस्वीर साभार: Awaz the Voice

आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के तेनाली की रहने वाली हाजरा बीबी स्माइल की शादी मोहम्मद स्माइल साहब से हुए थी। ये दंपति गांधी जी के अनुयाई थे और गांधी जी के खादी आंदोलन में सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे। सक्रिय रूप से खादी आंदोलन में जुड़े रहने और महात्मा गांधी के बताए रास्ते पर चलने की वजह से उन्हें मुस्लिम लीग का कड़ा विरोध सहना पड़ा। उन दिनों मुस्लिम लीग का मुख्यालय तेनाली आंध्र क्षेत्र में था। हर मुश्किल परिस्थिति में हाजरा बीवी ने अपने पति मोहम्मद इस्माइल साहब का साथ दिया और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी रहीं। लीग के विरोध और सामाजिक बहिष्कार ने भी उनका मनोबल नहीं तोड़ा।

उन्होंने अपने बच्चों की शिक्षा उन विद्यालयों से करवाई जहां राष्ट्रवाद की शिक्षा दी जाती थी। बार-बार जेल जाने की वजह से खद्दर स्माइल का स्वास्थ्य बिगड़ चुका था और 1948 में उनका निधन हो गया। पति के मौत के बाद भी हाज़रा स्माइल ने अपने बच्चों के साथ मिलकर खादी स्टोर को चलाया। देश के लिए उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी की श्रेणी में ज़मीन देने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने यह कहते हुए विनम्रता से मना कर दिया कि वह अपनी देशभक्ति की कीमत नहीं लगाना चाहतीं। 16 जून 1994 को उनका तेनाली में निधन हो गया। हाजरा बीबी स्माइल एक समर्पित खादी कार्यकर्ता रहीं और अंतिम समय तक खादी वस्त्र ही पहना।

फातिमा शेख

तस्वीर साभार: News NCR

इन्हें पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त है। फ़ातिमा शेख़ ने  दलित, आदिवासी और मुस्लिम महिलाओं और बच्चों के शिक्षा के अधिकार के लिए दृढ़ता से काम किया है। उन्होंने शिक्षा के दिशा में महिलाओं और बच्चों को शिक्षित करने के लिए सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले के साथ काम किया। वह ज्योतिराव फुले के नेतृत्व वाले सत्यशोधक आंदोलन का एक हिस्सा थीं। जब ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले को परिवार और गांव के सदस्यों ने उनके घर और गांव से निकाल दिया, लोगों ने 1848 में दलित बच्चों और महिलाओं के लिए पहला स्कूल शुरू करने के उनके प्रयासों को ‘धार्मिक विरोधी कार्य’ करार दिया, तो उस्मान और फातिमा शेख ने उन्हें अपना योगदान देकर उनकी मदद की।  जन्हें स्कूल में रहने और चलाने दोनों के लिए आवास दिया।

सावित्रीबाई के साथ, फातिमा ने एक शिक्षक के रूप में प्रशिक्षित होने के लिए कड़ी मेहनत की।  फुले परिवार के साथ,  फातिमा शेख को भी सामाजिक अपमान और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वे ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था की कठोर संरचनाओं के खिलाफ लड़ रहे थे। फातिमा शेख़ ने घर-घर जा कर शिक्षा को फैलाया और लड़कियों को स्कूल भेजने को प्रोत्साहित किया। फ़ातिमा के कामों का कोई लिखित प्रमाण नहीं मिलता। जो भी जानकारी मिली है वो  सावित्रीबाई के पत्र मिशन के माध्यम से मिली है। अफ़सोस फ़ातिमा शेख़ जिस सम्मान की हक़दार थीं वो उन्हें नहीं मिला। हालांकि महाराष्ट्र सरकार ने उनके योगदान को चिन्हित करने के लिए पाठ्यपुस्तकों में एक संक्षिप्त परिचय शामिल किया है।

बेग़म एज़ाज़ रसूल

तस्वीर साभार: विकिपिडिया

अपनी आत्मकथा ‘पर्दा टू पार्लिआमेन्ट: अ मुस्लिम वीमन इन इन्डियन पॉलिटिक्स’ की लेखिका बेग़म एज़ाज़ का असल नाम बेग़म साहेबा क़ुदुसिया था। वो भारत की एक मात्र मुस्लिम महिला हैं जो संविधान सभा के प्रारूप समिति में शामिल थीं। उनका जन्म 2 अप्रैल 1909 को लाहौर में हुआ था। वो पेशे से राजनीतिज्ञ, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता थीं। वह उन कुछ महिलाओं में से एक थीं, जो गैर-आरक्षित सीट से सफलतापूर्वक चुनाव लड़ीं और यूपी विधानसभा के लिए चुनी गई। उन्होंने 1937 से 1940 तक परिषद के उपाध्यक्ष का पद संभाला। पहले वो मुस्लिम लीग की सदस्य थीं। लेकिन 1950 में वो कांग्रेस में शामिल हो गईं। ज़मीदार घराने से ताल्लुक रखने के बावजूद उन्होंने जमींदारी उन्मूलन का मजबूती से समर्थन किया था। धर्म के आधार पर अलग निर्वाचक मंडल की मांग का भी उन्होंने कड़ा विरोध किया।

राजनीति के साथ-साथ बेग़म रसूल खेल में भी खूब रुचि रखती थीं। उन्होंने दो दशकों तक  भारतीय महिला हॉकी महासंघ के अध्यक्ष का पद संभाला और एशियाई महिला हॉकी महासंघ की अध्यक्ष भी रहीं। साहित्य में भी उनको बेहद दिलचस्पी थी और उन्होंने ‘थ्री वीक्स इन जापान’ नामक पुस्तक लिखी। उन्होंने विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में भी योगदान दिया। 1 अगस्त साल 2001 में बेग़म एज़ाज़ का निधन हो गया। बेग़म एजाज़ के समाज में योगदान और उनके कार्यों के लिए भारत सरकार ने साल 2000 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।

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