समाजकार्यस्थल इच्छा के बावजूद भी महिलाएं क्यों नहीं कर पाती हैं नौकरी

इच्छा के बावजूद भी महिलाएं क्यों नहीं कर पाती हैं नौकरी

हाल ही में यूनिसेफ के द्वारा किए गए एक सर्वे से पता चला है कि भारतीय महिलाएं शिक्षा के तुरंत बाद शादी के बजाय नौकरी के अवसरों को वरीयता देना चाहती हैं। यूनिसेफ के यूथ प्लेटफॉर्म ‘युवाह’ और यू रिपोर्ट के द्वारा किए गए सर्वे में देश के 18-29 साल के 24,000 से अधिक युवाओं ने अपनी राय सामने रखीं।

मुझे यह जानकर बहुत धक्का लगा था जब मेरी माँ ने मुझे बताया था कि मुझे लड़के वाले देखने आ रहे हैं क्योंकि कुछ सात-आठ महीने पहले ही मेरी बड़ी बहन की शादी हुई थी और मुझे लगा था कि मेरे पास खुद का करियर बनाने के लिए लंबा समय है लेकिन टीचर ट्रेनिंग की डिग्री पूरी करने के कुछ महीने बाद ही मेरी शादी तय कर दी गई यह कहना है पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली मेघा का। जिनकी शादी हुए लगभग आठ महीने का समय ही हुआ है। मेघा अध्यापक बनना चाहती हैं और फिलहाल घर और पारिवारिक जिम्मेदारियां संभालते हुए सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही हैं।

भारतीय समाज में लैंगिक भेदभाव के कारण छोटी बच्चियों से लेकर महिलाओं के जीवन को नियंत्रण में किया जाता है। वे क्या चाहती हैं, क्या पहनना है, क्या पढ़ना और क्या करना है इन सबको तय करने में पितृसत्ता अहम भूमिका निभाती है। वक्त बदल गया है, हम पहले के मुकाबले अधिक तकनीक और विज्ञान पर केंद्रित जीवन की ओर बढ़ते जा रहे हैं। लेकिन जब औरतों के जीवन की बात आती है तो उनको पारंपरिक तय भूमिकाओं के दायरें यानी घर, परिवार, रिश्तों में रहने पर जोर दिया जाता है। कामकाजी महिलाओं को घर-परिवार के नज़रिये से अनुपयुक्त माना जाता है। भले ही साल दर साल लड़कियों का स्नातक और परास्नातक में नामाकंन अधिक हो लेकिन नौकरी की बाते आते ही उनके चाहने के बावजूद भी वह नौकरी करने का एक सपना ही देखती रहती है और काश में अपनी बातों को जाहिर करती नज़र आती हैं। 

सुप्रिया का कहना है, “जब मैंने एमबीए करना तय किया था तो सोचा था कि दो-तीन साल नौकरी करने के बाद ही शादी करूंगी पहले अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं लेकिन घर वालों ने शादी तय कर दी। अब एक साल हो गया है कभी अपने घर कभी ससुराल और रीति-रिवाजों में बीत गया।”

भारतीय महिलाएं शिक्षा के बाद चाहती हैं नौकरी करना

हाल ही में यूनिसेफ के द्वारा किए गए एक सर्वे से पता चला है कि भारतीय महिलाएं शिक्षा के तुरंत बाद शादी के बजाय नौकरी के अवसरों को वरीयता देना चाहती हैं। यूनिसेफ के यूथ प्लेटफॉर्म ‘युवाह’ और यू रिपोर्ट के द्वारा किए गए सर्वे में देश के 18-29 साल के 24,000 से अधिक युवाओं ने अपनी राय सामने रखीं। आउटलुक में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़ सर्वे के परिणाम में 75 फीसदी युवा महिलाएं और पुरुषों का मानना है कि पढ़ाई के बाद नौकरी हासिल करना महिलाओं के लिए सबसे ज़रूरी कदम है। इससे अलग पांच फीसदी से भी कम उत्तरदाताओं ने पढ़ाई के तुरंत बाद शादी की वकालत की है। 

तस्वीर साभारः N-IUSSP

सर्वे में कार्यबल भागीदारी के बारे में युवा महिलाओं के निर्णयों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों पर भी बात की गई है जिसमें 52 फीसदी ने सूचना, अवसरों और परिवार के समर्थन पर जोर डाला है। साथ ही कौन से पहलू जो महिलाओं की कार्यस्थल में भागीदारी को प्रभावित करते है उन पर भी राय जानी गई जिनमें शादी, बच्चे पैदा करने का फैसला, पारंपरिक और गैर-पारंपरिक नौकरी की भूमिकाओं को वरीयता देना और काम करने में लचीलापन यानी रिमोट वर्क है।

“नौकरी को लेकर मेरी तलाश जारी है”

मेरठ में रहने वाली सुप्रिया की मास्टर्स डिग्री के बाद शादी कर दी गई है। वह पढ़ना और काम करना चाहती है आज परिवार और एक सही नौकरी न मिलने के कारण वह अपना अधिकतर समय घर पर ही बिताती है। सुप्रिया का कहना है, “जब मैंने एमबीए करना तय किया था तो सोचा था कि दो-तीन साल नौकरी करने के बाद ही शादी करूंगी पहले अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूं लेकिन घर वालों ने शादी तय कर दी। अब एक साल हो गया है कभी अपने घर कभी ससुराल और रीति-रिवाजों में बीत गया। अभी नौकरी तलाश रही हूं लेकिन चाहती हूं कि कोई ऐसी नौकरी मिले जिससे घर और नौकरी दोनों को संभाला जा सकें। अब जिम्मेदारी बढ़ गई है तो नौकरी के बाद भी घर के काम को देखना यहां ज़रूरी हो गया है।” 

“अब मैं खुद के बार में कम सोचती हूं”

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गाँव की रहने वाली दीपू वर्तमान में मास्टर्स इन कॉमर्स की पढ़ाई कर रही हैं। उनकी डिग्री पूरी होने के लिए अभी फाइनल ईयर के एग्जाम होने बाकी है लेकिन उनकी शादी तय हो चुकी हैं और साल के आखिर नवंबर में उनकी शादी होगी। दीपू का कहना है, “जब कक्षा 12 के बाद मुझे पढ़ने के लिए कही बाहर नहीं भेजा मुझे काफी हद तक चीजें साफ हो गई थी कि मेरी पढ़ाई को घर में ज्यादा तवज़्जों नही दी जाएगी। फिर भी सीमित संसाधनों के बीच मैंने हमेशा बेहतर करने की कोशिश की है। जहां शादी होने वाली उन्होंने कहा है कि अगर मेरी आगे बीएड करने की इच्छा है तो हम तुझे बीएड कराएंगे। हालांकि अब मैं खुद के बारे उस तरह से नहीं सोचती जैसा पहले सोचती थी।”

श्रम बल में पिछड़ती महिलाएं

पारंपरिक तय भूमिका, लैंगिक भेदभाव और पितृसत्ता के कारण महिलाओं के लिए घर से बाहर निकल कर काम करना बहुत चुनौतीपूर्ण है। ये सब बाधाएं भारतीय महिलाओं की श्रम बल में भागीदारी को सीमित करती है। चाहते हुए भी वे नौकरी नहीं कर पाती है या फिर पूर्णरूप से उससे जुड़ी नहीं रह पाती है। द वॉयर में छपी जानकारी के अनुसार पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएलएस जुलाई 2021-जून 2022) के आंकड़े बताते है कि 29.4 प्रतिशत महिलाएं (15-49 उम्र) ही भारतीय श्रम बल में योगदान दे रही हैं। पुरुषों में यह दर 80.7 फीसदी है। भारत में ऐतिहासिक रूप से महिलाओं की श्रम बल में कमी रही है और इसका एक बड़ा कारण महिलाओं के लिए निर्धारित जेंडर रोल्स है। जेंडर के आधार पर तय की गई भूमिका के कारण महिलाओं से वे घर-परिवार को ज्यादा महत्व देने की अपेक्षा की जाती है।

पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएलएस जुलाई 2021-जून 2022) के आंकड़े बताते है कि 29.4 प्रतिशत महिलाएं (15-49 उम्र) ही भारतीय श्रम बल में योगदान दे रही हैं। पुरुषों में यह दर 80.7 फीसदी है।

क्यों महिलाओं की नौकरी में भागीदारी आवश्यक

जब महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होती है तो वह किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए एक वरदान के समान है। अधिकतर देश जो तेजी से विकास कर रहे है उसकी एक कारण यह भी है कि वहां कार्यश्रम में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के समान है। अगर भारत के नज़रिये से भी बात करे तो साल 1990 के बाद से सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में बढ़ोत्तरी हुई है और महिला की श्रम में भागीदारी भी बढ़ी है। लेकिन अन्य देशों के मुकाबले आज भी यह कम है। विश्व बैंक के साल 2021 के अनुमान के अनुसार भारत में पांच में से एक से भी कम महिलाएं औपचारिक रूप से काम करती हैं। कृषि और घरेलू कामों को अनौपचारिक क्षेत्र में माना जाता है इसलिए उनके श्रम योगदान को गिना नहीं जाता है। लैंगिक भेदभाव के कारण रोजगार के क्षेत्र में महिलाएं बहुत पीछे हैं। स्वरोजगार के मामले में भी वे पुरुषों के मुकाबले पीछे हैं। नौकरियों में असमानता को खत्म करने के लिए हमें महिलाओं को लैंगिक भूमिका से अलग करके एक कुशल श्रम के रूप में भी देखना होगा जिसकी भागीदारी से देश की अर्थव्यवस्था में तो सुधार होगा ही हमारे समाज में लैंगिक भेदभाव भी कम होगा।


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