ग्राउंड ज़ीरो से चुनावी वादा, झुग्गी की राजनीति और दिल्ली में तरसते बेघर लोग

चुनावी वादा, झुग्गी की राजनीति और दिल्ली में तरसते बेघर लोग

लोग पीढ़ी दर पीढ़ी झुग्गियों में, फुटपाथ पर, सड़क किनारे, रेलवे प्लेटफॉर्म या स्टेशन के पास खाली जमीन, अन्य खुली जगह पर रहते हैं। आवास और शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 17,73,040 लोग बेघर है जिसमें से 9,38,348 शहरी क्षेत्र में और 8,34,692 ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं।

“जब भी चुनाव होने वाला होता है तब दिल्ली सरकार यह कहती है कि हम झुग्गी वालों के लिए घर देंगे, पुनर्वास की योजना बनाएंगे और दिल्ली के एलजी साहब भी कहते हैं कि यह काम दिल्ली के मुख्यमंत्री करेंगे लेकिन बाद में वही मुख्यमंत्री यह कहते है कि डीडीए केंद्र सरकार के आधीन आती है और हमें परमिशन नहीं दे रही है। ऐसे में हम केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच में पिस रहे हैं।” यह कहना है हीरा लाल का। जो दिल्ली के बेला स्टेट में रहते हैं। 

बेला स्टेट, दिल्ली में राजघाट के समीप स्थित है। वहां रह रहे लोगों का कहना है कि उनकी पीढ़िया यहां गुज़र गई है उनका कही और आश्रय गृह नहीं है। उनके बुजुर्ग यही रहते थे, उन लोगों के पास सारे कागजात भी मौजूद है लेकिन फिर भी दर-बदर फिर रहे है। ये लोग झुग्गी बना कर रहते हैं जिसे आए दिन सरकार के द्वारा तुड़वा दिया जाता है ताकि वे उस जगह को छोड़कर चले जाये।

हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क में प्रकाशित जानकारी के अनुसार दिल्ली में डेढ़ से दो लाख बेघर लोग हैं जिनमें से 10,000 महिलाएं हैं। साथ ही भारत में दुनिया में सबसे ज्यादा बेघर बच्चों की संख्या है।  

भारत में बेघर की आबादी

भारत बेघर लोगों को उन लोगों के रूप में परिभाषित करता है जो घरों में नहीं रहते हैं। भारत में 1.77 मिलियन बेघर लोग हैं। काम की तलाश में बड़े शहरों में पलायन किए लोग पीढ़ी दर पीढ़ी झुग्गियों में, फुटपाथ पर, सड़क किनारे, रेलवे प्लेटफॉर्म या स्टेशन के पास खाली जमीन, अन्य खुली जगह पर रहते हैं। आवास और शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 17,73,040 लोग बेघर है जिसमें से 9,38,348 शहरी क्षेत्र में और 8,34,692 ग्रामीण क्षेत्र में रहते हैं। हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क में प्रकाशित जानकारी के अनुसार दिल्ली में डेढ़ से दो लाख बेघर लोग हैं जिनमें से 10,000 महिलाएं हैं। साथ ही भारत में दुनिया में सबसे ज्यादा बेघर बच्चों की संख्या है।  

बेघर होने के तरफ ले जानी वाली कई समस्याएं है, रोजगार की कमी, पानी का आभाव, आर्थिक तंगी, अच्छी शिक्षा इत्यादि। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार बेघर होना, सामाजिक समावेशन और जीवन के अधिकार पर हमला है। पहली नजर में यह आवास के अधिकार का उल्लंघन है और जीवन के अधिकार, गैर-भेदभाव, स्वास्थ्य, पानी, स्वच्छता और सुरक्षा समेत अनेक मानवाधिकारों का उल्लंघन है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार “बेघर गरीबी बच्चें, हिंसा, उत्पीड़न और शोषण का सामना करते हैं। यह बच्चें घर से भाग जाते हैं या सड़कों पर ही रह जाते हैं।”

चुनाव और बेघर लोग

लोकतांत्रिक देश में चुनाव हमेशा अहम किरदार निभाता है। वोट जनता के हाथ में होती है। वह जिसे चाहे मौका दे सकती है और देती भी है। देश की जनता हमेशा इस उम्मीद में वोट करती है कि सरकार अपना वादा पूरा करेंगी, जो वादा वोट मांगते समय करती है। जनता यह सोचती है कि उनके भलाई में भी कुछ होगी लेकिन बाद में उन्हें निराशा का सामना करना पड़ता है। देश की राजधानी दिल्ली में बड़ी संख्या में बेघर लोग रहते हैं। आये दिन विकास के नाम पर अपने ही देश के झुग्गी में रहने वाले लोगों को अवैध बस्ती बताकर उनकी झुग्गी को तोड़ दिया जाता है। उनका सामान उठा के फेंक दिया जाता है। यह लोग मजदूरी करके दो समय की रोटी के लिए पैसा कमाते हैं। लेकिन कई बार उनके सामान को उठाकर गड्डा खोद के दबा दिया जाता है। ताकि यह समुदाय उस जगह को छोड़ दें और कहीं और चला जाएं।

तस्वीर साभारः ज्योति कुमारी।

दिल्ली में भाजपा हो या आम आदमी पार्टी दोनों ने ही यहां की जनता से घर देने का वादा कर चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी अपनी चुनावी सभा में जहां झुग्गी वहां पक्के मकान’ का सपना दिखा चुके हैं। दिल्ली में भाजपा और आप का झुग्गी की जगह पक्के मकान का वादा होने के बाद आज भी राजधानी में बड़ी संख्या में लोगों बेघर है और सड़कों पर रहने को मजबूर है। द प्रिंट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार झुग्गी पुर्नविकास से जुड़ा काम अन्य जगह के मुकाबले राजधानी दिल्ली में बहुत धीमा चल रहा है। 

बेघर लोग चुनाव और सरकार को लेकर क्या कहते है आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र इस विषय पर बात करने के लिए हमने राजघाट के पास बसी बस्ती बेला स्टेट के लोगों से बातचीत की। यहां के लोग बीस साल से बेघर हैं और उनकी लड़ाई जारी है। बेला स्टेट में रह रहे लोगों का कहना है कि उनकी पांच पीढ़ी यहां गुज़र गई उनका कही और आश्रय गृह नहीं है। उनके बुजुर्ग यही रहते थे उन लोगों के पास सारे कागजात है लेकिन फिर उनके पास अपना घर नहीं है।

बेला स्टेट में रहने वाले हीरा लाल कहते हैं, “2002 में डीडीए का एक सर्वे हुआ था यहां हाइवे बन रहा था हमारे घर के सामने नोटिस लगा दिया गया कि यह जमीन डीडीए के अंडर आ रही है। आपलोग इस जगह को खाली करें और 2002 में ही घर तोड़ दिया गया तब से इस जगह पर दो हज़ार से ज्यादा लोग बेघर हैं। हालांकि कोर्ट में बीस साल से बात चल रही है लेकिन अब तक कोई सुनवाई हमारे पक्ष में नहीं हुई है और न हमारा पुनर्वास हुआ है।” वह आगे कहते हैं, “हम बीस साल से यहां फ्लाईओवर के नीचे रह रहे हैं। आए दिन डीडीए वाले आते हैं और कहते है कि आपलोग यहां से चले जाइए, यहाँ पर बायो सिटी पार्क बनेगा, हमारा समान उठा के लेकर चले जाते हैं लेकिन हम इस जगह को छोड़ कहां जायेंगे, हमारा कोई दूसरा घर भी नहीं है। जब भी डीडीए वाले यहां आते हैं साथ में पुलिस आती है और हमें डंडा लेकर भगाने लगती है। उनका कहना होता है कि एलजी साहब का ऑर्डर है इस जगह को छोड़ कर जाये।” 

चुनाव को लेकर बात करते हुए वह कहते है, “ हमारे लिए चुनाव का कोई मतलब ही नहीं है। इतने साल से हम सरकार को इसलिए चुनते है ताकि सरकार हमारे लिए काम करेगी, हमें रहने का ठिकाना देगी। प्रधानमंत्री के योजना के अनुसार, जहां झुग्गी वही मकान इसके लिए भी हम लोगों ने आवेदन किये हैं लेकिन अब तक कुछ भी नहीं हुआ।” वह आगे कहते है, “हम अपनी ही जगह पर पराये हो गये हैं, हम करें तो क्या करें। हम लोग यहां तक भी बोले कि हमारा पुनर्वास कर दीजिये ताकि रहने का ठिकाना मिल जाये, छोटे-छोटे बच्चे लेकर हम कहां जायेंगे लेकिन कोई सुनता ही नहीं है।”

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार बेघर होना, सामाजिक समावेशन और जीवन के अधिकार पर हमला है। पहली नजर में यह आवास के अधिकार का उल्लंघन है और जीवन के अधिकार, गैर-भेदभाव, स्वास्थ्य, पानी, स्वच्छता और सुरक्षा समेत अनेक मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

नेताओं को हम लोगों की सिर्फ वोट दिखती है समस्याएं नहीं

कपड़े धोती यमुना। तस्वीर साभारः ज्योति कुमारी।

बेला स्टेट की रहने वाली यमुना की उम्र उम्र 60 साल है। चुनाव को लेकर कहती है, “हमारा जो अधिकार है हम तो उसी की मांग कर रहे है लेकिन हमारे साथ कुछ ठीक नहीं हो रहा है। कितने साल हो गये घर का मुँह देखे, लगता है जीवन बस ऐसे ही खत्म हो जायेगा। घर का सुख कभी नसीब नहीं होगा। चुनाव के समय नेताओं के वादे होते हैं वोट लेने के लिए उसके बाद वे सब कुछ भूल जाते हैं। हमारी समस्या बहुत बड़ी है लेकिन कही कोई सुनवाई नहीं है।” 

उम्र के साथ घर होने की कम होती उम्मीदें

तस्वीर में कस्तूरी। तस्वीर साभारः ज्योति कुमारी।

जब भी चुनाव होने वाला होता है तब लोग आते है। वोट मांगने और हमारे यहाँ खाना भी खाते हैं। हमें यह सब देखकर बहुत अच्छा लगता है लेकिन बाद में कोई नज़र नहीं आता है। यह कहना है 80 वर्षीय कस्तूरी का। जो दिल्ली में फ्लाईओवर के नीचे रहती हैं। वह कहती हैं, “इस जगह से भावनात्मक लगाव है। हमारा यहाँ घर था। हम खेती करते थे लेकिन अब हमारे पास कुछ नहीं है बीस साल से हम बेघर हैं अब हम उम्र के उस पड़ाव पर है जहां बस चैन की दो रोटी मिल जाये। हम लड़ते-लड़ते थक चुके हैं लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ, उम्र के साथ-साथ उम्मीद खत्म हो रही है।” चुनाव के बारे में बोलते हुए कस्तूरी कहती हैं, “अब चुनाव का बहुत मतलब नहीं बचा है किसी के लिए भी, मेरा तो अब मन ही नहीं होता है वोट देने का, मन ऊब गया है।”

बच्चों को खुले आसामना के नीचे सोना पड़ता है

बेला स्टेट की महिलाएं। तस्वीर साभारः ज्योति कुमारी।

मेरी बेटी बड़ी हो रही है उसे खुले में सोना पड़ता है। बहुत डर लगता है लेकिन क्या करें। डीडीए वाले आते है उनके साथ महिला पुलिस आती है जो डांटती है, बेइज़्ज़ती करती है। हम अपने बच्चों को कैसी परवरिश दे रहे हैं। हमें इस तरह से हटाया जाता है जैसे हम चोर हो जबकि हमारे पास दिल्ली में ही बने सारे कागजात मौजूद है। लेकिन फिर भी हमारा जीवन त्रस्त है। यह कहने वाली अनीता बीस साल से दिल्ली में रहती है और हर बार वोट देती है। वह आगे कहती हैं, “हमारे लिए सरकार कुछ नहीं कर रही है। हम तो सोच रहे इस बार वोट ही नहीं देंगे। सरकार हमारी पीढ़ियों का भविष्य खराब कर रही है हम किस लिए वोट दें।” अनीता की बेटी रजनी ने बारहवीं के पेपर दिए हैं। वह कहती है कि यहां के माहौल में वह ठीक से पढ़ नहीं पाती है।

रजनी बारहवीं की छात्रा है। उनकी उम्र 17 साल है। वह कहती है, “आये दिन यहां कुछ न कुछ होता रहता है जिससे पढ़ाई पर बुरा असर पड़ता है।” हालांकि उन्होंने अबतक वोट नहीं दी है लेकिन चुनाव पर बोलते हुए वह कहती है, “जो सरकार हमें बसाएंगी हमारी वोट उसके लिए है। घर न होने कारण हमारी पढ़ाई नहीं हो पाती है। कोई सुविधा नहीं है। रात में यहाँ लाइट तक नहीं आती है। इसलिए जब तक मेरे पास घर नहीं होगा मैं वोट नहीं दूंगी। हालांकि यह गलत है लेकिन अब यही है जो है।” भारत में बेघर लोगों का मुद्दा बहुत बड़ा है। चुनाव के समय हर राजनीतिक पार्टी इस पर बात करती नज़र आती है लेकिन चुनाव के बाद लोगों को उसी हाल पर जीने के लिए छोड़ दिया जाता है जिस पर वे जीते आ रहे हैं। 


Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content