स्वास्थ्यशारीरिक स्वास्थ्य ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम पर वैज्ञानिक चेतावनी और बढ़ती पर्यावरणीय चुनौतियां

ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम पर वैज्ञानिक चेतावनी और बढ़ती पर्यावरणीय चुनौतियां

भारत में, अनुमानित 151 जिलों और 18 राज्यों में ग्राउंडवाटर में यूरेनियम प्रदूषण की रिपोर्ट है, और बिहार में लगभग 1.7 फीसद ग्राउंडवाटर स्रोत प्रभावित हैं।

ब्रेस्टमिल्क बच्चों के लिए पोषण का सबसे अच्छा स्रोत माना जाता है, जो ज़रूरी पोषक तत्व, एंटीबॉडी और बायोएक्टिव कंपाउंड देता है जो विकास और इम्यून सिस्टम के विकास में मदद करते हैं। हालांकि, बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के कारण ब्रेस्टमिल्क में हानिकारक दूषित पदार्थों की मौजूदगी को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। औद्योगीकरण, शहरीकरण और बड़े पैमाने पर केमिकल के इस्तेमाल से हवा, पानी और मिट्टी में प्रदूषक फैल गए हैं, जिनमें से कुछ इंसान के शरीर में जा सकते हैं और समय के साथ जमा हो सकते हैं। कई एनवायरनमेंटल पॉल्यूटेंट लिपोफिलिक होते हैं, जिसका मतलब है कि वे पानी के बजाय फैट में घुल जाते हैं। एक हालिया स्टडी में बिहार के कई जिलों में दूध पिलाने वाली माँओं के ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम (U238) का खतरनाक लेवल पाया गया है, जिससे उनके शिशुओं के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं। कई संस्थानों के शोधकर्ताओं ने पाया है कि ब्रेस्टमिल्क के ज़रिए यूरेनियम के संपर्क में आने से शिशुओं को कैंसर के अलावा भी स्वास्थ्य संबंधी गंभीर खतरे हो सकते हैं।

प्रदूषण अब केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी एक गंभीर चिंता का कारण बन चुका है। जिस हवा में लोग सांस ले रहे हैं और जिस पानी का इस्तेमाल घर-घर में हो रहा है, उसकी गुणवत्ता लगातार गिरती जा रही है। इसका असर सिर्फ़ बीमारियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह बच्चों के विकास और पोषण से जुड़े सवाल भी खड़े कर रहे हैं। प्रदूषण सिर्फ हमारे वर्तमान को ही प्रभावित नहीं कर रहा, बल्कि हमारी भावी पीढ़ियों पर भी इसका गहरा असर पड़ रहा है। प्रदूषण का असर अब ब्रेस्टमिल्क पर भी होने लगा है और इसी विषय पर वैज्ञानिक जांच भी की जा रही है। चूंकि ब्रेस्टमिल्क में काफी मात्रा में फैट होता है, इसलिए यह इन पदार्थों को माँ से बच्चे तक पहुंचाने का रास्ता बन सकता है। पॉल्यूटेंट प्रदूषित हवा में सांस लेने, दूषित खाना और पानी पीने, और जहरीले पदार्थों के साथ स्किन कॉन्टैक्ट से माँ के शरीर में चले जाते हैं। समय के साथ, ये केमिकल शरीर के फैट में जमा हो सकते हैं और बाद में ब्रेस्टफीडिंग के दौरान ब्रेस्ट मिल्क में निकल सकते हैं।  

एक हालिया स्टडी में बिहार के कई जिलों में दूध पिलाने वाली माँओं के ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम (U238) का खतरनाक लेवल पाया गया है, जिससे उनके शिशुओं के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं। कई संस्थानों के शोधकर्ताओं ने पाया है कि ब्रेस्ट मिल्क के ज़रिए यूरेनियम के संपर्क में आने से शिशुओं को कैंसर के अलावा भी स्वास्थ्य संबंधी गंभीर खतरे हो सकते हैं।

कैसे ब्रेस्टमिल्क में पहुंच रहा है यूरेनियम

द हिन्दू के रिपोर्ट मुताबिक नेचर में पब्लिश हुए पेपर ‘बिहार, भारत में मां के दूध में यूरेनियम की मात्रा की खोज और माताओं और शिशुओं के लिए इससे जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों का आकलन’ में, अरुण कुमार के साथ अन्य शोधकर्ताओं ने कहा कि अक्टूबर 2021 और जुलाई 2024 के बीच बिहार के छह जिलों – बेगूसराय, कटिहार, नालंदा, समस्तीपुर, खगड़िया और भोजपुर से रैंडमली चुनी गई 40 माताओं के स्तन के दूध के सैंपल लिए गए। इन सैंपलों का पटना के महावीर कैंसर संस्थान और अनुसंधान केंद्र में डिटेल में यूरेनियम एनालिसिस किया गया। नतीजों से पता चला कि सभी ब्रेस्टमिल्क के सैंपलों में यूरेनियम की मात्रा 0 माइक्रोग्राम/L और 5.25 माइक्रोग्राम/L के बीच थी। सबसे ज़्यादा U238 की मात्रा कटिहार जिले में देखी गई। लेखकों ने ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम को ग्राउंडवाटर के यूरेनियम प्रदूषण से जोड़ा, और इस लिंक को साबित करने के लिए पहले के ग्राउंडवाटर अध्ययनों का हवाला दिया।

फिलहाल, ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम की मात्रा के लिए कोई स्वीकार्य सीमा या बेंचमार्क तय नहीं है। हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यूएचओ) ने पीने के पानी में यूरेनियम के लिए 30 माइक्रोग्राम/L की एक अस्थायी गाइडलाइन सीमा तय की है। वैज्ञानिकों ने ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम-238 (U-238) पाया है। यह यूरेनियम का सबसे सामान्य रूप है और प्राकृतिक यूरेनियम का 99 फीसद से अधिक हिस्सा इसी का होता है। यह एक कमज़ोर रेडियोधर्मी, बहुत भारी धातु है। यूरेनियम-238 प्राकृतिक रूप से पर्यावरण में पाया जाता है। यह लगभग सभी चट्टानों, मिट्टी और पानी में मौजूद होता है, यहाँ तक कि समुद्र के पानी में भी, लेकिन आमतौर पर इसकी मात्रा बहुत कम होती है। द हिन्दू की रिपोर्ट अनुसार अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (यूएसईपीए) के अनुसार, यूरेनियम से बाहर से संपर्क (जैसे त्वचा के माध्यम से) ज़्यादा खतरनाक नहीं होता, क्योंकि त्वचा इससे निकलने वाली किरणों को रोक लेती है।

इन सैंपलों का पटना के महावीर कैंसर संस्थान और अनुसंधान केंद्र में डिटेल में यूरेनियम एनालिसिस किया गया। नतीजों से पता चला कि सभी ब्रेस्टमिल्क के सैंपलों में यूरेनियम की मात्रा 0 माइक्रोग्राम/L और 5.25 माइक्रोग्राम/L के बीच थी।

लेकिन अगर यूरेनियम अधिक मात्रा में शरीर के अंदर चला जाए, तो यह हड्डियों या लीवर के कैंसर जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है। यूरेनियम शरीर में प्रदूषित हवा की धूल सांस के साथ लेने से, दूषित पानी पीने से या दूषित भोजन खाने से प्रवेश कर सकता है। यूएसईपीए के अनुसार, आम लोगों को यूरेनियम की बहुत कम मात्रा मुख्य रूप से भोजन और पानी के जरिए मिलती है। द हिन्दू की रिपोर्ट बताती है कि शोधकर्ताओं के अनुसार हाल के सालों में, ग्राउंडवाटर यूरेनियम पॉइज़निंग से प्रभावित आबादी में गंभीर स्वास्थ्य खतरे पैदा हुए हैं। भारत में, अनुमानित 151 जिलों और 18 राज्यों में ग्राउंडवाटर में यूरेनियम प्रदूषण की रिपोर्ट है, और बिहार में लगभग 1.7 फीसद ग्राउंडवाटर स्रोत प्रभावित हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है माँ के दूध की गुणवत्ता

माँ का दूध, डबल्यूएचओ शिशु के शुरुआती महीनों के लिए सबसे उपयुक्त आहार मानता है, आज बढ़ते पर्यावरणीय प्रदूषण से पूरी तरह अछूता नहीं रह गया है। डबल्यूएचओ के अनुसार, बच्चे के पहले छह महीनों तक इक्स्क्लूसिव ब्रेस्टफीड उसे आवश्यक पोषण देता है और उसकी ज़रूरतों के अनुसार खुद को ढालता है। यह बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए सबसे संतुलित भोजन माना जाता है। लेकिन हाल के सालों में हुए वैज्ञानिक अध्ययनों से यह संकेत मिले हैं कि हमारे आसपास फैल रहा प्रदूषण अब केवल हवा, पानी और मिट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि वह धीरे-धीरे इंसानी शरीर के भीतर भी प्रवेश कर रहा है। इसका असर माँ के शरीर पर भी पड़ सकता है और इसी कारण ब्रेस्टमिल्क की गुणवत्ता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इसी संदर्भ में साइंस जर्नल में अध्ययन प्रकाशित किए गए हैं, ताकि यह समझा जा सके कि बदलता पर्यावरण शिशुओं के पोषण को किस तरह प्रभावित कर रहा है।

डबल्यूएचओ के अनुसार, बच्चे के जन्म के बाद जब वह स्तनपान करता है, तो माँ के मस्तिष्क को संकेत मिलता है। इसके बाद प्रोलैक्टिन हार्मोन दूध के निर्माण की प्रक्रिया शुरू करता है, जबकि ऑक्सीटोसिन हार्मोन दूध को ब्रेस्ट से बाहर निकालने में मदद करता है। यह पूरी प्रक्रिया माँ और शिशु के बीच एक प्राकृतिक तालमेल से संचालित होती है। डबल्यूएचओ और मेडिकल पत्रिका द  लैन्सेट में प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि माँ का दूध बच्चे की उम्र और ज़रूरतों के अनुसार बदलता रहता है। इसमें मौजूद पोषक तत्व, एंटीबॉडी और हार्मोन शिशु की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं और उसे संक्रमण से बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। डबल्यूएचओ और अन्य वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, मां का शरीर कई स्तरों पर हानिकारक तत्वों को रोकने का काम करता है। दूध बनने की प्रक्रिया के दौरान शरीर यह सुनिश्चित करने की कोशिश करता है कि अधिकतर नुकसानदेह तत्व स्तन दूध तक न पहुंचे।

भारत में, अनुमानित 151 जिलों और 18 राज्यों में ग्राउंडवाटर में यूरेनियम प्रदूषण की रिपोर्ट है, और बिहार में लगभग 1.7 फीसद ग्राउंडवाटर स्रोत प्रभावित हैं।

इसी कारण ब्रेस्ट मिल्क सीधे खून जैसा नहीं होता और कई बड़े प्रदूषक व बैक्टीरिया उसमें प्रवेश नहीं कर पाते। हालांकि वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट करते हैं कि यह सुरक्षा पूरी तरह प्रभावी नहीं होती। कुछ अत्यंत सूक्ष्म प्रदूषक, भारी धातुएं (हैवी मेटल्स) और ऐसे रसायन जो वसा में आसानी से घुल जाते हैं, मां के शरीर की इस प्राकृतिक सुरक्षा को पार कर सकते हैं। ये तत्व पहले मां के शरीर में जमा होते हैं और फिर रक्त के माध्यम से ब्रेस्ट टिशू तक पहुंच सकते हैं। ऐसे मामलों में प्रदूषण का असर केवल मां के शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे शिशु के पोषण से जुड़ जाता है, क्योंकि बच्चा पूरी तरह स्तन दूध पर निर्भर होता है।

तत्काल खतरा नहीं, पर जागरूकता है ज़रूरी

मां का दूध एक जैविक प्रक्रिया का परिणाम है, लेकिन इससे जुड़े सवाल केवल व्यक्तिगत नहीं हैं। ये सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण से भी गहराई से जुड़े हुए हैं। पर्यावरण में बढ़ता प्रदूषण सिर्फ प्रकृति को नुकसान नहीं पहुंचाता बल्कि माताओं और शिशुओं के स्वास्थ्य से जुड़े विकल्पों को भी प्रभावित करता है। यह शोध इस ओर ध्यान दिलाने के लिए है एक महत्वपूर्ण कारक है कि बदलता पर्यावरण शिशु के पोषण से किस तरह जुड़ रहा है। इसका मकसद यह समझना है कि सुरक्षित हवा, स्वच्छ पानी और बेहतर पर्यावरण क्यों माँ और बच्चे दोनों के लिए ज़रूरी हैं, चाहे वे ब्रेस्टफीड करें, फ़ॉर्मूला का उपयोग करें या दोनों का सहारा लें। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि फिलहाल कोई तात्कालिक खतरा सामने नहीं आया है।

ब्रेस्टमिल्क में यूरेनियम की मात्रा कम पाई गई है और कैंसर से जुड़ा कोई तत्काल जोखिम नहीं दिखा है। हालांकि, जिन संभावित खतरों की ओर इशारा किया गया है, वे लंबे समय में असर डाल सकते हैं। इसलिए सतर्कता ज़रूरी है। यह रिपोर्ट किसी भी स्थिति में ब्रेस्टफीड रोकने की सलाह नहीं देती। ऐसे शोध प्रदूषण को गंभीरता से लेना क्यों आवश्यक है इसपर जोर डालता है ताकि माँ और बच्चे दोनों सुरक्षित रह सकें। यह अध्ययन हमारे लिए एक चेतावनी भी है। अगर आज हवा, पानी और मिट्टी को साफ रखने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

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