भारतीय समाज में कला का विशेषाधिकार हमेशा सत्ता के गलियारों से तय हुआ है। दीवारों पर किसका चेहरा उकेरा जाएगा और किन कहानियों को पोस्टरों और इतिहास में जगह मिलेगी और कौन मंच पर होगा। यह हिस्सेदारी कभी भी लोकतांत्रिक नहीं रही है। इसका हक हमेशा से कथित सवर्ण समुदाय के पास रहा, यहां तक कि उन्होंने अलग-अलग समुदायों के व्यक्तियों और उनकी कला को कितना विजुअल स्पेस मिलेगा। यह भी तय किया और इसका सबसे ज्यादा असर, दलित समुदाय के व्यक्तियों पर देखने को मिला, कला के क्षेत्र में उनका जीवन अदृश्य रहा या फिर अक्सर सवर्ण नजरिए से पेश किया गया।
आज़ादी के पहले कई सालों तक कला, राजनीति, इतिहास हर जगह कथित उच्च वर्गों का बोलबाला रहा। उनकी लड़ाई जीवन की बुनियादी जरूरतों के लिए थी, फूले और आंबेडकर की राजनीतिक चेतनाओं ने दलित संघर्षों को नई दिशा दी। समय के साथ -साथ दलितों से जुड़े आंदोलनों ने नारों, भाषणों और विजुअल्स को अपने विरोध का जरिया बनाया। दलित क्रांतिकारियों ने केवल अपने नारे ही नहीं चुने, बल्कि अपना रंग, पेंटिंग कलाओं के जरिए दलित जीवन को दुनिया के सामने अपने तरीके से पेश किया। आज के डिजिटल दौर में दलित विजुअल्स को कई संदर्भों में देखा जा सकता है। जो कि वर्तमान में दलित नारे, नीला रंग, आंबेडकर और फूले की प्रतिमाएं, विरोध और आंदोलनो में शोषण, के खिलाफ आवाजों को बुलंद करने में उपयोगी साबित हो रहे हैं।
आज़ादी के पहले कई सालों तक कला, राजनीति, इतिहास हर जगह कथित उच्च वर्गों का बोलबाला रहा। उनकी लड़ाई जीवन की बुनियादी जरूरतों के लिए थी, फूले और आंबेडकर की राजनीतिक चेतनाओं ने दलित संघर्षों को नई दिशा दी। समय के साथ -साथ दलितों से जुड़े आंदोलनों ने नारों, भाषणों और विजुअल्स को अपने विरोध का जरिया बनाया।
दलित विज़ुअल परंपरा का इतिहास और मायने
दलित विज़ुअल परंपरा की शुरुआत मुख्यधारा की कला से अलग, अपने अधिकारों और हक़ की अभिव्यक्ति के रूप में हुई। भारत की कला परंपरा में मंदिरों, स्मारकों, चित्रों और पुरातन ग्रंथों में दलित जीवन और उनके अनुभवों की मौजूदगी बहुत सीमित रही है। दृश्य इतिहास लंबे समय तक सत्ता, धर्म और सवर्णों के नज़रिए से लिखा और दिखाया गया। ऐसे में दलित जीवन को अपनी नज़र से चित्रों और प्रतीकों के माध्यम से सामने लाना अपने आप में एक सबसे बड़ी चुनौती रही है। इस बदलाव की सबसे बड़ी घटना साल 1956 में डॉ. बी.आर. आंबेडकर के बौद्ध धर्म अपनाने के बाद हुई। यह वह दौर था, जब दलित समुदाय के लोगों ने महसूस किया कि मुख्यधारा में उनकी पहचान और अनुभवों के लिए कोई जगह नहीं है। यहीं से बुद्ध और बाबासाहेब की तस्वीरें दलित जीवन और संघर्ष की सबसे बड़ी पहचान बन गईं। आंबेडकर का कोट-टाई पहनना और हाथ में किताब लेना केवल एक तस्वीर नहीं थी, बल्कि यह संदेश था, कि अब दलित समाज शिक्षित होकर दुनिया के सामने बराबरी से खड़ा होगा।
ये प्रतीक घरों की दीवारों, मोहल्लों, गलियों और सार्वजनिक जगहों पर दिखाई देने लगे। इसी दौर में रंगों और नारों की एक नई राजनीति शुरू हुई। नीले रंग का चुनाव डॉ. आम्बेडकर की राजनीतिक पार्टियों से हुआ, जो धीरे-धीरे मुक्ति और आत्मसम्मान का प्रतीक बन गया, जैसे आकाश सबके लिए एक जैसा है, वैसे ही नीला रंग दलितों के लिए समानता का प्रतीक बना। इसी तरह जय भीम का नारा, जिसकी शुरुआत साल 1930 के दशक में बाबू एल.एन. हरदास ने की थी। वह केवल आवाज़ नहीं बल्कि दीवारों पर उकेरी गई एक विज़ुअल ताकत बन गया। सिर्फ पहचान ही नहीं, दलित विज़ुअल परंपरा ने आर्थिक मज़बूती भी दी। इसका सबसे अच्छा उदाहरण मधुबनी पेंटिंग्स में मिलता है।
इस बदलाव की सबसे बड़ी घटना साल 1956 में डॉ. बी.आर. आंबेडकर के बौद्ध धर्म अपनाने के बाद हुई। यह वह दौर था, जब दलित समुदाय के लोगों ने महसूस किया कि मुख्यधारा में उनकी पहचान और अनुभवों के लिए कोई जगह नहीं है। यहीं से बुद्ध और डॉक्टर आम्बेडकर की तस्वीरें दलित जीवन और संघर्ष की सबसे बड़ी पहचान बन गईं।
रोजमर्रा की वस्तुएं बनी दलित कलाओं में विरोध का जरिया
दलित विजुअल कल्चर में विरोध के लिए किसी महंगे कैनवास की ज़रूरत नहीं पड़ी, बल्कि रोज़मर्रा की साधारण वस्तुओं को ही अपनी आवाज़ बना लिया गया। इतिहासकार गैरी टार्टाकोव बताते हैं, कि जिन चीज़ों को कभी दलितों को अपमानित करने के लिए उन पर थोपा गया था, आज के कलाकारों ने उन्हें ही विरोध का टूल बना दिया है। पेशवा काल में गले में बांधा जाने वाला मिट्टी का बर्तन और कमर में लटकी झाड़ू कभी कथित अछूत होने की पहचान थी। लेकिन आज सवि सावरकर जैसे कलाकार अपनी कला में इन्हीं वस्तुओं का इस्तेमाल जातिवाद की मानसिक सोच को दिखाने और उसके विरोध के लिए करते हैं।
विरोध का यह तरीका केबल यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि आज यह और भी रचनात्मक हो गया है। समकालीन कलाकार राज्यश्री गुडी ने अपनी प्रदर्शनी में मनुस्मृति जैसे ग्रंथों के पन्नों को पानी में गलाकर उनकी लुगदी बना दी और उसे एक लड्डू का अकार दे दिया। यह एक बेहद रचनात्मक दृश्य है, जहां दमन करने वाली चीज़ को नष्ट करके उसे एक नई शक्ल दे दी गई। इसी तरह, भोजन के विजुअल्स के ज़रिए वे यह सवाल करती हैं कि दलितों के लिए भोजन केवल ज़िंदा रहने का संघर्ष क्यों रहा, वह कला या आनंद का हिस्सा क्यों नहीं बन पाया। संगीत और शरीर भी इस विजुअल क्रांति का बड़ा हिस्सा बने। दक्षिण भारत के आत्मसम्मान आंदोलन ने ‘परै’ ढोल को, जिसे कभी शोक और कथित अशुद्धता का प्रतीक माना जाता था, उसे सम्मान के प्रतीक में बदल दिया। अब इसे बजाना ही अपने आप में एक राजनीतिक विद्रोह है। ये साधारण चीज़ें चाहे वह मिट्टी का बर्तन हो, नीला कपड़ा हो या दीवार पर लिखा कोई नारा यह बताती हैं कि दलित विजुअल कल्चर ने अपमान के हर औज़ार को सम्मान के प्रतीक में बदल दिया है।
दक्षिण भारत के आत्मसम्मान आंदोलन ने ‘परै’ ढोल को, जिसे कभी शोक और कथित अशुद्धता का प्रतीक माना जाता था, उसे सम्मान के प्रतीक में बदल दिया। अब इसे बजाना ही अपने आप में एक राजनीतिक विद्रोह है।
दलित विजुअल्स में जेंडर और सवर्णों का दलित कलाओं के प्रति रवैया
भारतीय कला के इतिहास में जेंडर की भूमिका हमेशा से अहम रही है, जिस तरह दलित समुदाय के व्यक्तियों को इतिहास और संस्कृति के मुख्य हिस्सों से दूर रखा गया, ठीक वैसी ही स्थिति महिलाओं की भी रही। दलित महिलाओं के लिए यह चुनौती और भी कठिन और दोहरी रही है। दलित विजुअल्स में भी शुरुआत में महिलाओं को अक्सर दया की दृष्टि के साथ ही दिखाया जाता था, या फिर वे पूरी तरह अदृश्य रही। हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि विजुअल कल्चर ने धीरे-धीरे महिलाओं को जगह देनी शुरू की है। इसमें ‘सावित्रीबाई फुले‘ का पोस्टर सबसे अहम है, जो दलित महिलाओं को केवल एक घरेलू पहचान से बाहर निकालकर शिक्षा और जागरूकता के एक वैश्विक प्रतीक के रूप में स्थापित करता है।
जब महिलाओं को समाज में बराबरी के अधिकार नहीं मिले, तो उन्होंने गोदना के जरिए अपनी पहचान बनाई, जिसे सवर्ण समाज ने सुंदरता के पैमानों से बाहर रखा। उन्होंने मधुबनी पेंटिंग्स के ज़रिए महिलाओं को अलग अलग नजरिए से पेश किया। आज के समय में राज्यश्री गुडी जैसे कई कलाकार इस नज़रिए को और मज़बूत कर रहे हैं। वे महिलाओं को केवल अत्याचार सहने वाली सरवाईवर के रूप में नहीं दिखातीं, बल्कि उन्हें योद्धाओं, नेतृत्वकर्ताओं और शिक्षित महिलाओं के रूप में पेश करती हैं। आज सवर्ण कलाकार या गैलरी मालिक दलित कला को जगह तो देते हैं, लेकिन सिलेक्टिव रूप में। वे दलित फाइन आर्ट को बराबरी देने के बजाय अक्सर फोल्क कला कहकर मुख्यधारा से अलग कर देते हैं। आज की राजनीति में भी यह साफ दिखता है कि दलित प्रतीकों का इस्तेमाल सवर्णों ने केवल प्रगतिशील दिखने के लिए किया। वे नीले रंग या बाबासाहेब की तस्वीरों को लहराते हुए दिखाई देते है, जिनके लिए सिर्फ दलित विजुअल्स एक वोट बैंक है। इसे ‘पॉलिटिकल टोकनिज्म’ कहा जा सकता है, जहां बदलाव के बजाय केवल प्रतीकों का दिखावा ज़्यादा मिलता है।
प्रभाकर कांबले जैसे परफॉरमेंस आर्टिस्ट यह दिखाते हैं कि कैसे व्यवस्था ने दलित शरीर को केवल सस्ते लेबर एक सीमित रखा है। उनके कामों में बिना सिर वाले शरीर या खेती औजारों का इस्तेमाल यह दिखाता है कि हाशिए के समुदायों की पहचान को उनकी मेहनत तक ही सीमित कर दिया गया है।
डिजिटल युग में दलित कलाकारों और उनकी कला को मिलता स्पेस
डिजिटल युग ने दलित कलाकारों के लिए एक आज़ाद और समावेशी मंच प्रदान किया है, जिसकी पहुंच सिर्फ पारंपरिक आर्ट गैलरीज़ और मुख्यधारा तक थी। अब कला केवल भौतिक माध्यमों तक सीमित नहीं रही है। यह पिक्सल, पोस्ट और डेटा के ज़रिये सीधे दर्शकों तक पहुंच रही है, इससे दलित समुदाय के लोग अपने जीवन, संघर्ष और जातिगत हिंसा के अनुभवों को अपनी ही आवाज़ में सामने रख पा रहे हैं। डिजिटल माध्यम ने एकाधिकार की राजनीति खत्म की है। हालांकि इसके साथ ही साथ इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है, कि ब्राह्मणवाद की मानसिकता को भी ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुंचने का स्पेस मिलता है। नतीजतन दलित कलाकारों के खिलाफ ऑनलाइन ट्रोलिंग, जातिसूचक शब्द व उनके कामों को कथित जातियों से जोड़कर नीचा दिखाया जाता है। इसके बावजूद भी वह अपनी कला को देश और दुनिया के सामने मजबूती के साथ रख रहे हैं।
इस विमर्श में सवि सावरकर का नाम प्रमुखता से आता है, जिन्होंने धार्मिक प्रतीकों को दलितों के लिए हिंसा के बोझ के रूप में चित्रित किया है। उनके चित्रों में दिखने वाला क्रोध और पीड़ा दर्शक को असहज करता है, जो दरअसल उसे अपने विशेषाधिकारों पर सोचने के लिए मजबूर करने का एक बेहतरीन प्रयास है। इसी क्रम में, प्रभाकर कांबले जैसे परफॉरमेंस आर्टिस्ट यह दिखाते हैं कि कैसे व्यवस्था ने दलित शरीर को केवल सस्ते लेबर एक सीमित रखा है। उनके कामों में बिना सिर वाले शरीर या खेती औजारों का इस्तेमाल यह दिखाता है कि हाशिए के समुदायों की पहचान को उनकी मेहनत तक ही सीमित कर दिया गया है। वहीं, मालविका राज ने सवर्णो के वर्चस्व वाली ‘मधुबनी कला‘ को ही अपना जरिया बनाकर उसमें बुद्ध के जीवन और जातिगत भेदभाव की कहानियां उकेरनी शुरू की। अपनी जगह वापस पाने की इस लड़ाई में अब दलित कलाकार केवल सरवाईवर नहीं, बल्कि निर्माता और उद्यमी की भूमिका में आ चुके हैं।
सुधीर राजभर का चमार स्टूडियो इसका सबसे सशक्त उदाहरण है, जिसने एक जातिसूचक शब्द को विज़ुअल ब्रांड में बदलकर उसे हाई-फैशन और वैश्विक बाज़ार में खड़ा कर दिया। यह नाम को कथित गाली से गौरव में बदलने की प्रक्रिया है। इसी तरह राजश्री गुडी भोजन की राजनीति के माध्यम से यह दिखाती हैं कि कैसे जूठन भी एक तरह की विज़ुअल हिंसा रही है। आखिरकार इसमें कोई दोराय नहीं है कि डिजिटल सक्रियता ने विजुअल कल्चर को स्पेस दिया है। दलितों की दृश्य कलाएं केवल कला नहीं हैं, बल्कि अपनी बात कहने और हक़ मांगने का तरीका हैं। नीला रंग, अंबेडकर की तस्वीरें, दीवारों पर लिखे नारे और डिजिटल पोस्ट, ये सब मिलकर जातिवाद और शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ बनते हैं। आज दलित कलाकार अपनी कला के माध्यम से खुद को भी दिखा रहे हैं और उस सोच को भी चुनौती दे रहे हैं, जिसने उन्हें लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया। आज के दौर में विजुअल कला हर कलाकार के लिए बराबरी, सम्मान और बदलाव की बात करती है।

