समाजख़बर यौन हिंसा, वीडियो बनाती भीड़ और बढ़ता सामाजिक संकट

यौन हिंसा, वीडियो बनाती भीड़ और बढ़ता सामाजिक संकट

भीड़ का हिंसक होना और बिना डर के वीडियो बनाना यह दिखाता है कि कानून का भय कमजोर पड़ रहा है। यह सवाल भी उठता है कि अपराधियों में इतना साहस कहां से आ रहा है। इसके पीछे समाज में मौजूद पितृसत्तात्मक सोच और महिलाओं के प्रति भेदभाव भी एक बड़ा कारण है।

साल 2023 में मणिपुर में महिलाओं के साथ हुए यौन हिंसा के घाव अभी भरे नहीं थे कि सामुहिक यौन हिंसा का एक विभत्स वीडियो वायरल होने लगता है। हाल ही में नालंदा में घटी घटना में एक महिला को सार्वजनिक रूप से भीड़ के बीच घसीटा गया, उसके साथ यौन हिंसा की गई और इस पूरी घटना का वीडियो बनाकर फैलाया गया। वीडियो में उसकी मदद की पुकार साफ सुनाई देती हैं, लेकिन आस-पास मौजूद लोगों की भीड़ मानो पूरी तरह संवेदनहीन बनी रहती है। असल में ऐसी घटनाओं का सामने आना सिर्फ एक अपराध को सामने नहीं लाता है बल्कि मानवता को झकझोर देने वाली प्रवृत्ति सामने लाती है। ऐसी घटनाओं का एक चिंताजनक पहलू यह है कि अपराधियों ने न केवल यह अमानवीय और आपराधिक घटना करते हैं बल्कि उसे रिकॉर्ड कर प्रसारित करने की मानसिकता भी दिखाते हैं। जैसे किसी की पीड़ा उनके लिए महज प्रदर्शन का माध्यम बन गई हो। यह प्रवृत्ति दिखाती है कि तकनीक का दुरुपयोग किस तरह संवेदनहीनता को बढ़ावा दे रहा है।

आज तकनीक, जो जागरूकता और संवाद का माध्यम हो सकती थी, कई बार पीड़ा के प्रसार का टूल बनती दिख रही है। ऐसे वीडियो सर्वाइवर के सम्मान को ठेस पहुंचाते हैं और समाज में भय और असुरक्षा की भावना को और गहरा करते हैं। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अपराधियों का मनोबल इतना क्यों बढ़ रहा है। क्या यह कानून के भय के कम होने का संकेत है? क्या यह हमारी सामाजिक चुप्पी का नतीजा है? या फिर हमारी सामूहिक उदासीनता ही ऐसी प्रवृत्तियों को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दे रही है? इस तरह की घटनाएं केवल कानून-व्यवस्था के सामने चुनौती नहीं है, बल्कि समाज की आत्मा की भी परीक्षा है। ज़रूरत है कि हम संवेदनशीलता, जवाबदेही और न्याय के पक्ष में दृढ़ता से खड़े हों। सर्वाइवर के प्रति सहानुभूति और सम्मान बनाए रखते हुए, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी घटनाओं दोबारा न हो।

नालंदा में घटी घटना में एक महिला को सार्वजनिक रूप से भीड़ के बीच घसीटा गया, उसके साथ यौन हिंसा की गई और इस पूरी घटना का वीडियो बनाकर फैलाया गया। वीडियो में उसकी मदद की पुकार साफ सुनाई देती हैं, लेकिन आस-पास मौजूद लोगों की भीड़ मानो पूरी तरह संवेदनहीन बनी रहती है।

हमारी समाज की सुरक्षा के लिए जिम्मेदारी  

समाज तभी सुरक्षित बन सकता है जब हर व्यक्ति, संस्था और व्यवस्था मिलकर स्पष्ट संदेश दे कि किसी भी प्रकार की हिंसा और अपमान के लिए इस देश में कोई स्थान नहीं है। पटना ज़िले के गोपालपुर थाना क्षेत्र के बैरिया गाँव में हाल ही में घटी एक दूसरी घटना में 17 वर्षीया छात्रा की गंभीर रूप से जलने के बाद अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। परिजनों के अनुसार, उसी गाँव का एक 22 वर्षीय युवक महीनों से छात्रा के साथ उसके रोज़मर्रा के रास्ते में यौन हिंसा कर रहा था। घटना वाले दिन, जब उसने आरोपी ने बात करने से मना कर दिया, उसने कथित रूप से उसपर पेट्रोल डालकर आग लगा दी।

यह घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि समाज की सुरक्षा और संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। इस हादसे के बाद स्थानीय लोगों में आक्रोश फैल गया है और महिलाओं और किशोरियों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं एक बार फिर गहरी हो गई हैं। यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर कब तक ऐसी हिंसा हमारे समाज का हिस्सा बनी रहेगी, और कब हम एक सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित कर पाएंगे। ज़रूरत है कि ऐसे मामलों में त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई हो, साथ ही समाज के स्तर पर भी जागरूकता और संवेदनशीलता को बढ़ाया जाए, ताकि हर लड़की बिना डर के अपना जीवन जी सके।

भीड़ का किया गया सामूहिक अपराध यह साफ दिखाता है कि देश में कानून-व्यवस्था कितनी कमजोर होती जा रही है। यह भी दिखता है कि समाज और प्रशासन, दोनों ही महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर संवेदनहीन होते जा रहे हैं। यह कोई एक घटना नहीं है, बल्कि ऐसे कई उदाहरण हैं जो बताते हैं कि महिलाएं किस डर और असुरक्षा के माहौल में जीने को मजबूर हैं।

भीड़ का अमानवीय व्यवहार और दुस्साहस

भीड़ का किया गया सामूहिक अपराध यह साफ दिखाता है कि देश में कानून-व्यवस्था कितनी कमजोर होती जा रही है। यह भी दिखता है कि समाज और प्रशासन, दोनों ही महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर संवेदनहीन होते जा रहे हैं। यह कोई एक घटना नहीं है, बल्कि ऐसे कई उदाहरण हैं जो बताते हैं कि महिलाएं किस डर और असुरक्षा के माहौल में जीने को मजबूर हैं। आजकल अक्सर सोशल मीडिया पर महिलाओं के खिलाफ हिंसा के वीडियो और खबरें देखने को मिलती हैं। किसी भी समाज के लिए सामूहिक अपराध बहुत चिंता की बात होती है। यह इस बात का संकेत है कि समाज में व्यवस्था और जिम्मेदारी की भावना कम हो रही है। खुलेआम सड़कों पर अपराध हो रहे हैं, जो और भी चिंताजनक है। इन मामलों में पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठते रहे हैं। कई बार ऐसा लगता है कि कार्रवाई तब ही होती है, जब घटना का वीडियो या खबर सामने आ जाती है।

इसी तरह बिहार के नालंदा ज़िले के अजयपुर गाँव में एक और चौंकाने वाली घटना में एक महिला के साथ भीड़ ने महज इस शक में यौन हिंसा किया कि उसका किसी के साथ शादी के बाहर संबंध था। घटना की वायरल हुई वीडियो क्लिप में कुछ लोग महिला के साथ यौन हिंसा करते और उसे घसीटते हुए दिखाई दे रहे हैं। इस मामले में दो आरोपियों को गिरफ़्तार कर लिया गया है। इस घटना की सर्वाइवर के अनुसार वह अपना मोबाइल रिचार्ज करवाने गई थी, तभी गाँव वालों ने उसे मोबाइल रिपेयर करने वाले टेक्नीशियन के साथ देख लिया और उन्हें शक हो गया कि उन दोनों के बीच कोई प्रेम-संबंध है। बीबीसी की एक रिपोर्ट में गाँव की कुछ महिलाएं आरोपियों का बचाव भी करती दिखती हैं। घटना के कई दिनों बाद तक सर्वाइवर खुलकर बयान देने से बचती रही और बार-बार पुलिस जांच का हवाला देती रही, जिससे उसके डर और दबाव में होने का संकेत मिलता है।

पटना ज़िले के गोपालपुर थाना क्षेत्र के बैरिया गाँव में हाल ही में घटी एक दूसरी घटना में 17 वर्षीया छात्रा की गंभीर रूप से जलने के बाद अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। परिजनों के अनुसार, उसी गाँव का एक 22 वर्षीय युवक महीनों से छात्रा के साथ उसके रोज़मर्रा के रास्ते में यौन हिंसा कर रहा था।

भारत में यौन हिंसा के संदर्भ में बायस्टैंडर सिंड्रोम एक गंभीर सामाजिक समस्या के रूप में सामने आता है। कई मामलों में जब किसी महिला या सर्वाइवर के साथ सार्वजनिक स्थान पर उत्पीड़न या हिंसा होती है, तो आस-पास मौजूद लोग हस्तक्षेप करने के बजाय चुपचाप देखते रहते हैं या वीडियो बनाते हैं। हर व्यक्ति यह सोचता है कि कोई और मदद कर देगा, जिसके कारण वास्तविक सहायता समय पर नहीं पहुंच पाती या फिर महज असंवेदनशीलता से काम लेते हैं। इस निष्क्रियता से अपराधी का हौसला बढ़ता है और उसे यह महसूस होता है कि उसे रोकने वाला कोई नहीं है।

कई मामलों में जब किसी महिला या सर्वाइवर के साथ सार्वजनिक स्थान पर उत्पीड़न या हिंसा होती है, तो आस-पास मौजूद लोग हस्तक्षेप करने के बजाय चुपचाप देखते रहते हैं या वीडियो बनाते हैं।

यह स्थिति यौन हिंसा को और अधिक खतरनाक बना देती है, क्योंकि सर्वाइवर अकेली पड़ जाती है और उसे तुरंत सुरक्षा नहीं मिल पाती। साथ ही, भीड़ की यह चुप्पी सामाजिक जिम्मेदारी की कमी को दिखाती है, जिससे अपराध के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध कमजोर हो जाता है। कई बार लोग डर, सामाजिक दबाव या पुलिस-प्रशासन के झंझटों से बचने के कारण भी हस्तक्षेप नहीं करते। नतीजन यौन हिंसा की घटनाएं न केवल बढ़ती हैं, बल्कि उनका असर भी अधिक भयावह हो जाता है। ये समझने और साफ करने की जरूरत है कि किसी भी प्रकार की यौन हिंसा कोई मजाक या मनोरंजन का साधन नहीं बन सकता या बनना चाहिए।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में आगे का रास्ता

लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं के खिलाफ इस तरह की घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं। भीड़ का हिंसक होना और बिना डर के वीडियो बनाना यह दिखाता है कि कानून का भय कमजोर पड़ रहा है। यह सवाल भी उठता है कि अपराधियों में इतना साहस कहां से आ रहा है। इसके पीछे समाज में मौजूद पितृसत्तात्मक सोच और महिलाओं के प्रति भेदभाव भी एक बड़ा कारण है। कई बार यदि कोई महिला अपनी इच्छा से किसी संबंध में होती है, तब भी समाज का एक हिस्सा उसके खिलाफ हिंसक रवैया अपनाता है। सोशल मीडिया पर भी महिलाओं से जुड़े मामलों को गलत तरीके से फैलाया जाता है, जिससे नकारात्मक सोच और बढ़ती है। अगर इस पर रोक नहीं लगी तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। महिला सुरक्षा के लिए मजबूत कानून, फास्ट-ट्रैक अदालतों में त्वरित सुनवाई और पुलिस व्यवस्था में महिलाओं की अधिक भागीदारी जरूरी है। साथ ही समाज में लैंगिक संवेदनशीलता को बढ़ाना भी आवश्यक है, ताकि ऐसी घटनाओं को रोका जा सके।

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