इंटरसेक्शनलजेंडर बात पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े फैसलों पर उनके अधिकार की

बात पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े फैसलों पर उनके अधिकार की

जब किसी महिला को इलाज के लिए समय, पैसे या अनुमति नहीं मिलती, तो यह उसकी गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है। रीना, सुषमा और मानसी के अनुभव यही दिखाते हैं कि समाज में महिलाओं की सेहत को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता।

दिल्ली के द्वारका में रहने वाली 37 वर्षीय रीना (नाम बदला हुआ) हर दिन सुबह जल्दी उठकर पूरे घर के लिए खाना बनाती है, अपने दो बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करती है और घर के बुजुर्गों की देखभाल करती है। यह सब उसकी रोज़मर्रा की दिनचर्या का हिस्सा है। लेकिन, पिछले चार सालों से उसके दाहिने हाथ में एक गांठ है। शुरुआत में उसने इसे नजरअंदाज किया, लेकिन जब दर्द बढ़ने लगा और सूजन गंभीर हो गई, तब उसने डॉक्टर को दिखाया। इलाज शुरू हुआ, लेकिन कुछ समय बाद उसने उसे बीच में ही छोड़ दिया। रीना कहती है, “ससुराल में मुझसे सिर्फ घर के काम और खाना बनाने की ही उम्मीद की जाती है, जिससे कई बार मुझे सम्मान और अपनापन महसूस नहीं होता।”

इलाज शुरू हुआ, लेकिन कुछ समय बाद उसने उसे बीच में ही छोड़ दिया। रीना कहती है, “ससुराल में मुझसे सिर्फ घर के काम और खाना बनाने की ही उम्मीद की जाती है, जिससे कई बार मुझे सम्मान और अपनापन महसूस नहीं होता।”

डॉक्टर ने रीना को साफ सलाह दी थी कि वह इलाज पूरा करे और आराम ले। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि अगर समय पर इलाज नहीं हुआ, तो यह गांठ आगे चलकर कैंसर का रूप ले सकती है। इसके बावजूद घरेलू जिम्मेदारियों के बीच रीना अपने इलाज और आराम को प्राथमिकता नहीं दे पाती। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य पर घरेलू स्तर पर कई बाधाएं होती हैं। इनमें पितृसत्तात्मक सोच, आर्थिक निर्भरता, निर्णय लेने की सीमित शक्ति और समय की कमी शामिल हैं। लगभग 84 फीसद महिलाएं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में कम से कम एक बाधा का सामना करती हैं, जैसे अनुमति की जरूरत, पैसों की कमी या साथ न मिलना।

महिलाओं की सेहत और शरीर पर सीमित अधिकार

रीना की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की एक गहरी सच्चाई को दिखाती है। यहां महिलाओं से उम्मीद की जाती है कि वे घर की पूरी देखभाल करें और दूसरों की जरूरतों को पहले रखें। उनकी देखभाल और काम को तो सामान्य माना जाता है, लेकिन उनकी अपनी सेहत अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती है। वहीं पुरुषों से उम्मीद की जाती है कि वे घर के लिए कमाएं। अगर कोई पुरुष बीमारी या किसी कारण से काम नहीं कर पाता, तो समाज में उसकी आलोचना भी होती है। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत लापरवाही का परिणाम नहीं है, बल्कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था से जुड़ी हुई है। यह व्यवस्था महिलाओं को मुख्य रूप से ‘देखभाल करने वाली’ भूमिका में सीमित कर देती है, जहां उनसे उम्मीद की जाती है कि वे अपनी जरूरतों से पहले परिवार की जरूरतों को रखें। इसी कारण महिलाओं में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता की कमी, अपने शरीर पर कम नियंत्रण और इलाज में देरी जैसी समस्याएं सामने आती हैं।

लगभग 84 फीसद महिलाएं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में कम से कम एक बाधा का सामना करती हैं, जैसे अनुमति की जरूरत, पैसों की कमी या साथ न मिलना।

जब कोई महिला अपने इलाज को टालती है या बीच में छोड़ देती है, तो यह केवल उसका व्यक्तिगत निर्णय नहीं होता, बल्कि उन सामाजिक दबावों का नतीजा होता है जो उसे हमेशा दूसरों को पहले रखने के लिए मजबूर करते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के आंकड़े इस असमानता को साफ तौर पर दिखाते हैं। भारत में केवल लगभग 41 फीसद महिलाएं ही अपने स्वास्थ्य और जीवन से जुड़े फैसलों में भाग ले पाती हैं। इसके अलावा, 50 फीसद से अधिक महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में कई तरह की रुकावटों का सामना करना पड़ता है। वहीं, 57 फीसद महिलाएं एनीमिया से ग्रस्त हैं, जो उनके खराब पोषण और स्वास्थ्य की उपेक्षा को दिखाता है। ये आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं की स्वास्थ्य स्थिति सिर्फ व्यक्तिगत आदतों का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे सामाजिक और संरचनात्मक कारण जुड़े हुए हैं।

क्या मिल रहा है शरीर पर अधिकार और एजेंसी

दिल्ली के नांगलोई में रहने वाली 27 वर्षीय मानसी (नाम बदला हुआ) अपने ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष में थी, जब एक सड़क दुर्घटना में उसके बाएं पैर में फ्रैक्चर हो गया। इसके बाद वह लगभग 9 महीने तक चलने-फिरने में असमर्थ रही। इस दौरान उसके परिवार को उसकी सेहत से ज्यादा उसकी शादी की चिंता थी, और उसे पढ़ाई छोड़ने की सलाह दी गई। पीरियड्स के समय उसे काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन वह अपने घर के पुरुष सदस्यों से इस बारे में खुलकर बात नहीं कर पाई। उसकी देखभाल महिलाओं ने की, लेकिन फैसले पुरुषों द्वारा लिए जाते रहे। मानसी कहती है, “घर वालों ने इतना परेशान किया कि लगता था आत्महत्या कर लूं। अगर मैं चलने में सक्षम होती, तो घर से भाग जाती।” यह अनुभव दिखाता है कि पितृसत्तात्मक ढांचे में महिलाओं की अपनी पसंद और नियंत्रण सीमित हो जाते हैं।

“घर वालों ने इतना परेशान किया कि लगता था आत्महत्या कर लूं। अगर मैं चलने में सक्षम होती, तो घर से भाग जाती।” यह अनुभव दिखाता है कि पितृसत्तात्मक ढांचे में महिलाओं की अपनी पसंद और नियंत्रण सीमित हो जाते हैं।

उत्तम नगर, दिल्ली की 48 वर्षीय सुषमा (नाम बदला हुआ) लंबे समय से पेट दर्द से परेशान थीं, लेकिन वे इलाज टालती रहीं। जब हालत बिगड़ी, तब पता चला कि उन्हें गॉलब्लैडर में पथरी है और ऑपरेशन जरूरी है। इस बीच परिवार को उनकी सेहत से ज्यादा घर के कामों की चिंता रही, और जिम्मेदारी उनकी बेटी पर आ गई, जो खुद भी बीमार पड़ गई। सुषमा भी पूरी तरह ठीक हुए बिना ही फिर से काम पर लौट आईं और उन्हें जरूरी देखभाल नहीं मिल सकी। वे कहती हैं, “औरत का क्या है, सारी जिंदगी सबके लिए किया, लेकिन जब हम बीमार पड़े तो कौन देखे?” यह अनुभव दिखाता है कि महिलाओं की सेहत अक्सर नजरअंदाज की जाती है, जबकि उनसे लगातार देखभाल की उम्मीद की जाती है।

महिलाओं की एजेंसी, गरिमा और देखभाल की असमानता

रीना की स्थिति सिर्फ स्वास्थ्य की अनदेखी नहीं दिखाती, बल्कि यह महिलाओं की सीमित एजेंसी को भी सामने लाती है। एजेंसी का मतलब है—अपने जीवन, शरीर और फैसलों पर नियंत्रण। जब कोई महिला डॉक्टर की सलाह के बावजूद इलाज पूरा नहीं कर पाती, तो यह उसकी पसंद नहीं, बल्कि उसकी सीमित आज़ादी का परिणाम होता है। पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को अपने ही स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने का अधिकार अक्सर नहीं मिलता। यह बात महिलाओं के गरिमा के अधिकार से भी जुड़ी है। गरिमा का मतलब सिर्फ सम्मान से जीना नहीं, बल्कि अपने शरीर और स्वास्थ्य का ख्याल रखने की आज़ादी भी है।

जब किसी महिला को इलाज के लिए समय, पैसे या अनुमति नहीं मिलती, तो यह उसकी गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है। रीना, सुषमा और मानसी के अनुभव यही दिखाते हैं कि समाज में महिलाओं की सेहत को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता।

जब किसी महिला को इलाज के लिए समय, पैसे या अनुमति नहीं मिलती, तो यह उसकी गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है। रीना, सुषमा और मानसी के अनुभव यही दिखाते हैं कि समाज में महिलाओं की सेहत को उतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता। देखभाल की असमानता भी एक बड़ी समस्या है। महिलाएं पूरे परिवार की देखभाल करती हैं—बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक। लेकिन जब उन्हें खुद देखभाल की जरूरत होती है, तो अक्सर कोई साथ नहीं होता। कई बार उन्हें मायके पर निर्भर होना पड़ता है या अपनी सेहत से समझौता करना पड़ता है।

हालांकि संविधान महिलाओं को समानता और भेदभाव से सुरक्षा का अधिकार देता है, और सरकार ने स्वास्थ्य से जुड़ी कई योजनाएं भी शुरू की हैं, फिर भी ज़मीनी स्तर पर स्थिति पूरी तरह नहीं बदली है। पितृसत्ता, सामाजिक असमानताएं और परिवार में पुरुषों का ज्यादा नियंत्रण महिलाओं को अपने स्वास्थ्य से जुड़े फैसलों में पीछे कर देता है। इसके साथ ही, बेटों को प्राथमिकता और दहेज जैसी सोच महिलाओं की स्थिति को और कमजोर करती है। महिलाओं की सामाजिक और पारिवारिक स्थिति उनके स्वास्थ्य पर सीधा असर डालती है। इससे वे जरूरी इलाज और देखभाल से वंचित रह जाती हैं। इस स्थिति को बदला जा सकता है। अगर महिलाओं के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाए, उन्हें फैसले लेने की आज़ादी मिले और घर की जिम्मेदारियां बराबर बांटी जाएं। साथ ही, स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान पहुंच और समाज की सोच में बदलाव भी बहुत जरूरी है, ताकि महिलाओं की सेहत और गरिमा को सही महत्व मिल सके।

About the author(s)

मेरा नाम ममता है। मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक और अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली से शहरी अध्ययन में स्नातकोत्तर किया है। मैंने पीरामल फाउंडेशन से उड़ीसा में दो साल की गांधी फेलोशिप पूर्ण की है। मुझे जाति, महिला और लैंगिक भेदभाव से जुड़े मुद्दों पर काम करना और संवाद करना विशेष रूप से रुचिकर लगता है। साथ ही, मुझे विभिन्न संस्कृतियों के लोगों के साथ घुलना-मिलना और उनसे सीखना भी बेहद पसंद है।

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