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हाल ही में मेरी एक महिला मित्र से बात हुई। मेरी महिला मित्र लेखक हैं। मेरी मित्र बहुत समय से महिलाओं और दलित महिलाओं के विषय में कविता और लेख लिखती आई हैं। अभी कुछ समय से वो अन्य मुद्दे जैसे रंग भेद, गरीबी, लेखकों की स्वतंत्रता आदि मुुद्दों पर भी लिखती हैं। उनके लेखन में राजनीति और समाज से जुड़े मुद्दे और सवाल होते हैं। मैं जब अपनी महिला मित्र से बात कर रही थी तभी उन्होनें बताया कि आज कल उनके महिलाओं के अतिरिक्त विषयों पर लिखने के कारण बहुत से प्रतिष्ठित पुरुष लेखक और लोग उनपर तंज कसने लगे हैं। वो लोग कहने लगे हैं, “आप महिलाओं के बारे में ही लिखा कीजिए।” कुछ पुरुष तो फ़ोन करके भी उनसे कहने लगे हैं कि आप राजनीति की बातें क्यों करने लगी हैं ?  

जब महिलाएं राजनीतिक या अन्य विषयों पर लिखती हैं तो बहुत से लोगों को परेशानी होने लगती है। सच तो यह है ,जब महिलाएं सिर्फ महिला केंद्रित मुद्दों पर लिखती हैं तब भी समाज के एक तबके को लगता है कि ‘फलां महिला ’पुरुष विरोधी है। धीरे-धीरे पुरुष वर्ग उस ‘फलां महिला’ पर ‘नारीवादी’ का लेबल लगा कर महिला और उसकी लिखी या बोली जाने वाली बातों को नज़रअंदाज़ करते हैं। महिलाएं जब सामाजिक, आर्थिक, राजनीति मुद्दों पर लिखने- बोलने लगती हैं तो उनके विचारों का, उनके मत का मज़ाक बनाया जाता है। जब महिलाएं, सिर्फ महिलाओं के बारे में न लिखकर राजनीति, सत्ता, जातिगत भेदभाव, रंग-भेद अथवा अन्य विषयों पर लिख कर समाज की आलोचना करती हैं, तो समाज के एक बड़े वर्ग को जिसमें महिला या पुरुष कोई भी हो सकता है, उन सबको महिला का इन विषयों के बारे में लिखना या बोलना खटकता है। 

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आखिर क्यों उन्हें यह बात खटकता है? क्या महिलाएं देश, समाज और राजनीति की समझ नहीं रखती या महिलाएं देश और समाज को नहीं बनाती? क्यों महिलाओं को अपने विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता नहीं है या फिर महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम बुद्धिमान समझा जाता है? महिलाएं क्या लिखें- क्या न लिखें, कैसे लिखें -कैसे न लिखें, कब लिखें और कब न लिखें, ये सब पुरुष अथवा स्थापित वर्ग क्यों तय करता है। साथ ही उस स्थापित वर्ग की न मानने पर लेखक महिलाओं पर तंज क्यों कसे जाते हैं। लेखक महिलाओं को फ़ोन किए जाते हैं, उनसे सवाल पूछे जाते हैं, ये भी कह दिया जाता है कि वो कुछ ठीक नहीं कर रही हैं। बेहतर होगा कि लेखक महिलाएं सिर्फ महिला के मुद्दों पर लिखें या बच्चों की बात करें।

लेखकों के समूह में महिला लेखक अपनी सोच, समझ और विचारधारा होने के बावजूद समाज में लिखने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं। एक प्रकार से महिला लेखकों को यह निरंतर बताने की कोशिश की जा रही है कि आपका एक दायरा है और उस दायरे से बाहर की बातचीत और विश्लेषण के लिए पुरुष वर्ग है। इसके साथ महिलाओं को यह भी बताने की कोशिश की जा रही है कि वे सोचने, समझने में पुरुष वर्ग से कमतर हैं। समाज का एक बड़ा दायरा महिलाओं पर ‘नारीवाद’ का लेबल लगा कर लगातार यह कोशिश कर रहा है कि महिलाओं को महिलाओं पर लिखने देते हैं, पढ़ने देते हैं। जबकि नारीवाद का अर्थ भी सिर्फ महिलाओं की बात करना नहीं है। समावेशी नारीवाद में जाति, धर्म, वर्ग, यौनिकता, विशेषाधिकार आदि भी शामिल हैं।

पुरुषों की तरह महिलाओं को भी आज़ादी हैं कि वो किसी भी मुद्दे के बारे में अपने विचार स्वतंत्र रूप से रख सकें।  

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किसी महिला की सलाह या उसका बड़े ओहदे पर होना आज भी समाज के लोगों को पसंद नहीं है। शायद इसलिए हम महिला के बड़े पद पर होने को सेलिब्रेट करते हैं। यदि महिला का बड़े पद पर होना सामान्य बात नहीं है ,यदि सामान्य बात होती तो सेलिब्रेशन कैसा। पुरुष का बड़े ओहदे पर होना, साथ ही परामर्श देना सामान्य बात है। जब एक समूह पुरुष को बड़े ओहदे पर होने की वजह से उसकी सुनता है तो समाज को लगता है बड़ा जानकार आदमी है। महिलाओं के बड़े ओहदे पर होने के बावजूद परामर्श की जब बात आती है तो अधिकतर पुरुष वर्ग और समाज महिलाओं को असमर्थ या कम बुद्धिमत्ता की नज़र से देखते हैं । इस प्रकार महिला लेखक भी जब केवल महिलाओं पर न लिख कर अन्य विषय पर लिखती हैं तो पुरुष वर्ग और समाज को लगने लगता है कि महिलाएं उनको राजनीतिक और सामाजिक ज्ञान दे रही हैं । इस प्रकार पुरुष वर्ग महिलाओं के लेख या कविताओं पर अप्रत्याशित टिप्पणी करते हैं। जबकि लिखने, बोलने और अपने मत रखने का सबको समान अधिकार है। पुरुषों की तरह महिलाओं को भी आज़ादी हैं कि वो किसी भी मुद्दे के बारे में अपने विचार स्वतंत्र रूप से रख सकें।  

जब महिलाएं सोशल मीडिया पर महिलाओं के विषय में कोई पोस्ट लिखती हैं, लाइक करती हैं, टैग करती हैं या अन्य महिला मित्र द्वारा टैग की जाती हैं, तो महिला के परिवार वाले  महिला को बोलते हैं कि फलां पोस्ट क्यों की या क्यों लाइक की। साथ ही उन्हें सुनने को मिलता है, ‘आज कल बड़ी नारीवादी हो गई हो।’ जबकि सच तो यह है कि नारीवादी होने का किसी के लिंग से कोई लेना देना नहीं है। नारीवादी होने का मतलब पुरुष विरोधी होना नहीं है। अपनी किताब ‘फेमिनिज़म इज़् फॉर एवरीबॉडी’ में बेल हुक्स ने लिखा भी है,”नारीवाद लिंगवाद, यौन शोषण और उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए एक आंदोलन है।” यह स्पष्ट है कि लिंगभेद के कारण समस्या मौजूद है और हम सभी का बचपन से जो समाजीकरण किया गया है उसमें महिला-विरोधी विचार मौजूद हैं। बेल हुक्स इसी किताब में लिखती हैं कि “पितृसत्ता संस्थागत लिंगवाद के नामकरण का एक और तरीका है।” इसलिए हम सभी को वर्चस्व की व्यवस्था के रूप में पितृसत्तातमक सोच पर सवाल उठाना चाहिए। साथ ही पितृसत्ता कैसे संस्थागत हो गई और इसे कैसे बनाए रखा गया इस पर भी विचार करना चाहिए। 

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तस्वीर साभार : thestatesman

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