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प्रीति

साल 2020 के आने की खुशी का जश्न मनाते वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि आने वाला नया साल एक वायरस के इर्द-गिर्द सिमट कर रह जाएगा। इस तरह का हस्तक्षेप मानव जाति के लिए किसी हाहाकार से कम नहींं है। अधिकतर देश प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं और देखभाल के अभाव में असहाय और परेशान दिखाई दिए। कोरोना वायरस के कारण लागू हुए लॉकडाउन के बीच भारत में स्थितियां काफी जटिल और गंभीर रही। लॉकडाउन खुलने के बाद भी स्थिति और बदतर हुई है जिसका प्रभाव लंबे वक्त तक बना रह सकता है। इस वायरस ने समाज में पहले से व्याप्त असमानताओं को और अधिक गहरा कर दिया। भारतीय समाज चरम असमानताओं और लैंगिक विषमता से भरा एक पितृसत्तात्मक समाज है। महामारी के दौरान ही स्त्री-पुरुष संबंध जिस तरह से प्रभावित हुआ उससे गंभीर चुनौतीयां खड़ी हो गई हैं। कोरोना महामारी ने लैंगिक असमानता की खाई को और ज्यादा गहरा कर दिया है। इस असमानता के चलते महिलाओं को अपने अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा है और पुरुषों के जीवन पर प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष गंभीर प्रभाव दिखने लगे हैं।

कोरोना से निपटने के लिए कई देशों ने लॉकडाउन लागू किया भारत में भी लॉकडाउन का हुआ जिसने स्थिति को संभालने की जगह नई-नई समस्याओं को ही पैदा किया। सभी विदेशी मीडिया संस्थानों ने रेखांकित किया है कि लॉकडाउन के दौरान भारत नागरिक अधिकारों के अपमान में दुनिया मे अव्वल रहा। यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भारत का कोरोना वायरस लॉकडाउन दुनिया में सबसे कठोर रहा। भारत में लॉकडाउन को ही इतना बड़ा और महत्वपूर्ण मान लिया गया कि और अन्य गतिविधियां मानो अपराध सिद्ध हो गई थी। 

पितृसत्तात्मक समाज में परिवार की भूमिका, मानसिक स्वास्थ्य पर इस वायरस और इससे उपजी स्थितियों का जो प्रभाव पड़ा हैं इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। निम्न वर्ग हो या मध्यम वर्ग स्त्री-पुरुष व्यवहार, मानवीय संबंध सभी इस महामारी से प्रभावित हुए हैं। यह कहना ज्यादा सही होगा की महामारी एक एक्सरे में बदल चुकी है जिससे जाति, वर्ग, धर्म और लैंगिक असमानता जिनसे हमारा समाज पहले से ग्रस्त हैं अब साफ-साफ दिखने लगे हैं। दुनिया भर में नस्लीय भेदभाव, अल्पसंख्यकों, अप्रवासी समुदायों के प्रति व्यवहार भेदभाव पूर्ण रहा है। भारत में भी मुस्लिम, मजदूर और दलित समाज के लोगों से दुर्व्यवहार, भेदभाव महिलाओं के प्रति सामाजिक- मानसिक शोषण का ग्राफ इस दौरान बढ़ता गया है। बीते कुछ महीनों पर ही गौर करें तो पाएंगे मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत गंभीर रूप से उभरकर आई हैं। सामाजिक रूप से सहयोग न मिलने और बुनियादी जरूरतों की सीमित पहुंच ने इंसान को और ज्यादा तनावग्रस्त और बीमार बना दिया। अवसाद, निराशा, घर के कामों में सहयोग न मिलना, घरेलू हिंसा, संबंधों का तनाव ऊपर आने लगे हैं।

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वर्ल्ड इकनॉमी फोरम की एक स्टडी के मुताबिक ग्लोबल जेंडर गैप के मामले में 135 देशों की सूची में भारत 87वें पायदान पर है। महामारी के बाद जेंडर विषमता की खाई कितनी गहरी हो चुकी होगी उसके निवारण के लिए क्या कदम होना चाहिए यह विचारणीय प्रश्न होना चाहिए। मजदूर, दलित, आदिवासी स्त्री उनके वर्गीय सरंचना को समझे बगैर इस महामारी से उत्पन्न चुनौतियों के प्रभाव को देखना समस्या का और सरलीकरण करके देखना होगा। 

लॉकडाउन और महिलाएं

लॉकडाउन के दौरान लाखों महिला श्रमिकों ने सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की परवाह किए बगैर मीलों का सफर पैदल ही तय किया। पीरियड्स के बीच, बीमारी में, गर्भावस्था की हालत और शौचालय के अभाव में भी उनका चलना जारी रहा। महिलाओं के स्वास्थ और सुरक्षा के प्रति बेपरवाही हमारे समाज में पहले से ही हैं। महिलाओं को या तो समय रहते सुविधाएं नहीं मिल पाती या उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे अपने आप ही ठीक हो जाएंगी। लॉकडाउन के दौरान गर्भवती महिलाओं को वक्त पर सुविधाएं न मिलने से उन्हें भी कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। एक अनुमान के मुताबिक महामारी की वजह से 65 फीसद महिलाएं गर्भनिरोधक उपायों का इस्तेमाल नहीं कर पाई या फिर उन्होंने पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल किया। इस बीच सेनेटरी नैपकिन्स, जरूरी दवाइयों का अभाव भी रहा।

सेल्फ क्वारंटीन, आइसोलेशन, लॉकडाउन ये बड़े बड़े- बड़े शब्द तो अब ज़बान पर चढ़े हैं महिलाएं तो सदियों से इस अवस्था में जी रही थी और कोई नई बात नहीं हैं महामारी के बाद भी उनके लिए लॉकडाउन जैसी स्थितियां बनी रहेगी

स्त्री पहले भी एक बंद, प्रतिबंधित ,एकांत भरे कारगार जीवन के बीच सांस लेती दिख जाती थी। लेकिन लॉकडाउन ने जैसे उन सभी खिड़कियों को भी बंद कर दिया जिनके भरोसे वह सांस ले रही थी। घर के भीतर बने रहना, सब सदस्यों के बीच नजरबंदी की स्थिति उनके आंतरिक-मानसिक स्वतंत्रता पर भी अतिक्रमण करने जैसा रहा। लॉकडाउन के चलते घरों के भीतर होने वाले अपराध, यौन हिंसा के मामलों में बढ़त हुई। महिलाएं घरों के भीतर दोहरी मार झेलने लगी। घरेलू हिंसा, उत्पीड़न, मारपीट के कई मामले तो सिर्फ और सिर्फ इन चार महीनों में अपने चरम पर रहे। यह शोषण की पराकाष्ठा ही है कि स्त्रियां अपने ही शोषकों के साथ रहने को मजबूर हैं। हाल ही में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने जानकारी दी हैं कि 1 मार्च से 18 सितंबर के बीच रेप, गैंगरेप और पोर्नोग्राफ़ी से संबंधित 13,244 शिकायतें दर्ज की गई। घरेलू हिंसा की 4,350 शिकायतें हुई। यह आंकड़े भी वह है जिनकी शिकायत दर्ज हो सकी ऐसी कई शिकायतें जो दर्ज ही नहीं हो सकी उन्हें जोड़े तो स्थिति बहुत चिंताजनक हैं।

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कोरोनाकाल में वर्क फॉर होम और वर्क फ्रॉम होम इन दोनों के बीच संतुलन भी एक नई चुनौती थी। घर और ऑफिस के बढ़ते काम की पूरी जिम्मेदारी स्त्रियों के जिम्मे रही और उनसे अपेक्षाएं काफी थी। घर के कभी खत्म न होने वाले काम, ऑफिस के काम ने उनके दिनचर्या को बांधकर रखा दिया।। घर में खाने, सफाई के अलावा बच्चों और बुजुर्गों की जिम्मेदारी महिलाओं पर ही होती है।             

महिलाओं को पहले ही हर जगह लैंगिक असमानताओं का सामना करना पड़ता है। वह नौकरी से निकाले जाने के लिए पुरुषों के मुकाबले ज्यादा आसान लक्ष्य भी रहती हैं। विश्व आर्थिक मंच की एक रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य एवं समाजिक क्षेत्र के कुल कामगारों में 70% लगभग महिलाएं ही हैं। 2020 की जेंडर गैप रिपोर्ट के अनुसार महिलाएं कम से कम एक सदी के लिए समान अधिकार हासिल नहीं कर पाएंगी। संगठित और गैर संगठित क्षेत्र में काम वाली लाखों महिलाएं को बेरोज़गारी का सामना करना पड़ रहा है। जिससे महिलाओं की गरीबी दर में वृद्धि आई है। यह चिंताजनक स्थिति है कि अब दुनियाभर में घर से बाहर महिलाओं का प्रतिनिधित्व पहले के मुक़ाबले कितना कम हो जाएगा और उन खाली जगहों को भरने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे इसकी कोई ठोस रूपरेखा अब तक नहीं बनी।

सेल्फ क्वारंटीन, आइसोलेशन, लॉकडाउन ये बड़े बड़े- बड़े शब्द तो अब ज़बान पर चढ़े हैं महिलाएं तो सदियों से इस अवस्था में जी रही थी और हो सकता है कि महामारी के बाद भी उनके लिए लॉकडाउन जैसी स्थितियां बनी रहेगी। महामारी में घर के अंदर रहना पुरुषों के लिए भी कम चुनौतिपूर्ण नहीं रहा। उन्हें एक अदृश्य दुनिया का भी अंदाजा लगा है जो उनके नाक के नीचे रहती थी लेकिन कभी उसमें प्रवेश नहीं किया। जो स्त्रियों के परिश्रम और योगदान को यह कहकर अनदेखा करते रहे हैं कि औरतें घर में करती ही क्या हैं? अपवाद स्वरूप कई पुरुषों ने महिलाओं के हीन समझने वाले उन अवैतनिक कार्य के प्रति नज़रिया बदलने की कोशिश भी की। स्त्रियों के परिश्रम और योगदान को समझते हुए इस लॉकडाउन को एक अवसर की तरह लेते हुए किचन का अनुभव भी किया, सफाई में हाथ बंटाया लेकिन अनलॉक की प्रक्रिया शुरू होते ही सब अपनी-अपनी भूमिकाओं में पहले की तरह लौट गए। घर के भीतर सहयोग और बराबरी जो पनप रही थी उसे बढ़ाने की कोशिश बहुत कम ही लोग दिखाएंगे। पुरूषों का सहयोग और उनका बदलता हुआ यह रूप सकारात्मक प्रभाव रखेगा इसमे कोई दो राय नहीं लेकिन ऐसे पुरुषों की संख्या अभी बहुत कम हैं।

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इस बीच ऑनलाइन शिक्षा के विकल्प ने लड़के लड़कियों की पढ़ने की बची हुई रुचियों को भी किनारे रख दिया। गांव-देहात में शिक्षा का प्रश्न फिर से हाशिये पर जा चुका है। जीवित बचे रहने की लड़ाई में परिवार के सदस्यों के साथ-साथ बच्चों का भी अलग संघर्ष जारी है। कोठरीनुमा कमरे में इकलौते फोन से जहां लड़के की पढ़ाई जारी रखना चुनौती हो वहां लड़कियों की शिक्षा जारी रह सके इसकी कल्पना कैसे की जा सकती है। सीमित संसाधनों, जीवन की अन्य प्राथमिकताओं को जुटाने  में लगे परिवारों के लिए पहले पहल स्त्रियों और लड़कियां की जरूरतों और सुविधाओं से समझौते किए जाते हैं। लॉकडाउन में मिली छूट मिलने के बाद भी लड़कियों को बाहर न निकलने की पाबन्दियां जकड़ी हुई हैं। सार्वजनिक जीवन में लौटना अभी भी एक नई चुनौती हैं। जब तक उनके लिए नौकरी के नए अवसर या शिक्षा सुविधाएं सुचारु रूप से न चलने लगे यह पाबंदियां तब तक जारी रहेंगी। 

लॉकडाउन और मानसिक स्वास्थ्य

भारतीय समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो अपनी पितृसत्तात्मक, सामंती नज़रिये के अनुकूल जीने का आदि है। इस महामारी में परिवार और घर की भूमिका स्पष्टता से रेखांकित हुई। घर जिसे व्यक्ति के सुविधा और सपोर्ट सिस्टम कि भूमिका निभाना था वह अब ज्यादा क्रूर कारगार बन चुके हैं। यह सब एकाएक नहीं घटा है। महामारी से पहले भी यह समस्याएं रही हैं लेकिन वह मुद्दा नहीं बनती थी क्योंकि हमारी  मानसिकता हमे बताती हैं यह कोई समस्या है ही नहीं, यह सबके साथ होता हैं और इसे जीवन की अन्य समस्याओं की तरह स्वभाविक मान लिया जाना चाहिए है जिसे कभी बदला भी नहीं जा सकता। स्त्री हो या पुरुष दोनों इससे भयंकर रूप से ग्रसित हैं लेकिन इसे बदलने की कोशिश नहीं हो रही है।

अन्य देशों में मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं के प्रति जागरूकता  दिखती है। इसे लेकर लोग संवेदनशीलता भी नज़र आते हैं। अमरीका में जून का महीना मर्दों के मानसिक स्वास्थ्य को समर्पित रहता हैं। भारत की बात करे तो यहां मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अनेक भ्रांतियां हैं। डिप्रेशन और एंग्जायटी का नाम भी लेना सहज नहीं हैं। ऐसी किसी बीमारी को व्यक्ति की कमज़ोरी बताया जाता हैं और आत्महत्या को कायरता। समाज के निर्धारित मापदंडों के दबाव में पुरुष अपने मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बोल भी नहीं पाते तो औरतों के मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा तो दूर की बात हैं।

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महामारी से उपजी अर्थव्यवस्था, आर्थिक तंगी और बेरोजगारी से ठप्प पड़ी जिंदगी अंदर के भरे अवसाद, झुंझलाहट को ऊपर लाना शुरू कर दिया है। इस प्रतिकूल समय मे पुरुषों पर भी उतना ही दबाव आया जितना स्त्रियों की जिंदगी पर। महामारी के बीच अपने परिवार की जरूरतों को न पूरा कर पाने की विवशता और बेरोज़गारी की भावना से आहत वह आत्महत्या करने को मजबूर हुए। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) के अनुसार कोरोना महामारी से भारत में लगभग 10 करोड़ लोगों ने आजीविका खोई है। इससे आर्थिक और श्रम संकट भी गहरा हो गया हैं। बेरोजगारी और निर्धनता, भुखमरी के साथ-साथ हिंसा, आत्महत्या, अपराध में भी बढ़ोतरी देखने में आई हैं। जीवन का बदलता स्वरूप हो या संबंधों का तनाव हो या अकेलेपन की भावना मानसिक तनाव के कई कारण गिनाए जा सकते हैं। दुनिया खत्म होने की कोरी भविष्यवाणी के बीच अपने सब काम निपटाने की जल्दबाजी ने लोगो के मन मे एक अजीब सी शंका पैदा कर दी हैं। भारतीय परिवारों में यह बेचैनी लड़की के विवाह को लेकर ज्यादा दिखाई दी। सिर्फ लॉकडाउन के बीच ही लड़कियों की शादी को लेकर बेचैनी इतनी ज्यादा देखने को मिली जिसने लड़कियों के मनोस्थितियों पर बुरा प्रभाव डाला। परिवारों ने मौका पाते आनन-फानन में जो शादियां करवाई उनमें भी अब आपसी तकरार, मनमुटाव, दहेज से असंतुष्टि, पैसों की मांग जैसे कई समस्याएं पैदा हो गई हैं।

महामारी दुनिया को देखने का नया नज़रिया लेकर आई है। सामाजिक ढांचे की इन ख़ामियों पर सही नीतियां और कुछ ठोस कदम उठाने की जरूरत है। जरूरत है परस्पर सहयोग की भावना वाले परिवेश की, आत्मीयता और समानता पूर्ण रिश्ते बनाने की। प्रकृति और मानव के पारस्परिक संबंध ही नहीं स्त्री- पुरुष संबंधों को भी परिस्कृत करने की जरूरत हैं। महामारी से होने वाली कई समस्याएं और चुनौतियां मुंह बाये खड़ी हैं। यह चुनौतियां बहुत नई नहीं होगी लेकिन इनका विस्तार हमारी कल्पना से भी बड़ा होगा। जिन पर ध्यान दिए बिना, उन्हें फिर से परिभाषित किए बिना न हम प्रकृति के साथ न्याय कर सकते है न ही स्त्री-पुरुष एक दूसरे के साथ।

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(यह लेख प्रीति ने लिखा है जो दिल्ली विश्वविद्यालय की शोधार्थी हैं।)


तस्वीर साभार : Quint

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1 COMMENT

  1. लिखने की अच्छी शैली का प्रयोग । आकड़ो का उचित प्रयोग जिस से लेख सर्गभित हो रहा है।

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