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“लड़की की उम्र क्या है? ओह! 30 साल ,अभी तक उसकी शादी नहीं हुई? देर मत करो अब जल्दी से कोई देखकर लड़की को बस उसके घर विदा कर दो।”

ऐसी बातें कभी ना कभी हर लड़की और महिला को अपनी जिंदगी में सुनने को मिलती रहती हैं। हो सकता है यह मुद्दा या ये बातें आपको नई न लगती हो लेकिन शादी का यह मुद्दा हमेशा महिलाओं और लड़कियों के जीवन को प्रभावित करता रहा है। आज लड़कियों की शिक्षा को कई परिवार महत्व देते हैं। आज उच्च शिक्षा तक भी लड़कियां पहले के मुकाबले अधिक पहुंच रही हैं। शहरों में फर्क देखने को मिल रहा है कि लड़की की शादी की ‘आदर्श उम्र’ 25 से बढ़कर 30 हो गई है। फिर भी शादी उनके जीवन में एक बाधा के रूप आज भी पहले की तरह ही मौजूद है। यही सोच हमारी आधुनिक होते भारतीय समाज की पोल खोलता है। पितृसत्ता समय और जगह या यूं कहें अपने संदर्भ के साथ-साथ अपना रूप बदलता है। पितृसत्ता को खुद को परिस्थितियों के अनुसार ढालना बखूबी आता है इसलिए आज तक यह हमारे समाज में मौजूद है। साथ ही पितृसत्ता की जड़ें समय के साथ बहुत गहरी हो गई हैं। 

शादी आज हमें पहले के मुकाबले अपने विकराल रूप में अधिक दिखाई देती है क्योंकि आज पितृसत्ता के साथ-साथ बाजार भी जुड़ गया है जिसने शादी जैसी संस्था की संरचनाओं को और अधिक जटिल बना दिया है। जहां पहले दहेज के तौर पर सामान लिया और दिया जाता था उसे आज बड़े गर्व से उपहार का नाम देकर बेशर्मी से दिया जा रहा है। जिनके पास धन-संपत्ति है वे दहेज देने के लिए तैयार होते हैं लेकिन लड़की को पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं दे सकते। विडंबना देखिए समाज की, जिन लोगों के पास देने के लिए कुछ नहीं भी होता, वे भी अपना सब कुछ लुटाकर बेटी को विदा करना चाहते हैं। लोग कर्ज़ लेकर बड़े स्तर पर शादी संपन्न करना चाहते हैं, चाहे बाद में कितनी भी मुश्किलों का सामना क्यों न करना पड़े। यहां हमें थोड़ी गहराई से समझना होगा कि परिवार में लड़की की शिक्षा पर ज्यादा निवेश नहीं किया जाता था और ना ही ज्यादा महत्व दिया जाता था क्योंकि परिवारों की सोच होती है कि अगर लड़की की शिक्षा में खर्च करेंगे तो उसका दहेज कैसे देंगे। 

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लेकिन आज शहरों में खासकर मध्यवर्गीय दलित परिवार भी उच्च शिक्षा पर निवेश करने की ओर आगे बढ़ा ही था कि उसे फिर से दहेज जैसी सामाजिक बुराई ने घेर लिया है। अब शैक्षणिक स्तर को बनाए रखते हुए दान दहेज जुटाया जा रहा है क्योंकि अब पढ़ी-लिखी लड़की के लिए पढ़ा-लिखा लड़का चाहिए। अब इस पढ़े-लिखे लड़के के अभिभावक ने उसकी शिक्षा पर खूब पैसा लगाया है डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर या इंजीनियर बनाने के लिए। लड़के की शिक्षा पर खर्च हुए उन पैसों की पूर्ति लड़के वाले  दहेज के तौर पर करना चाहते हैं ताकि उनका आर्थिक स्तर और बेहतर हो सके। कभी-कभी तो ऐसा भी देखने को मिलता है लड़के के पास कोई रोज़गार भी नहीं होता है या वह कम पढ़ा-लिखा होता है लेकिन उसके पास पैतृक घर संपत्ति है या फिर पिता की सरकारी नौकरी है।

शादी आज हमें ज्यादा अपने विकराल रूप में दिखाई देती है क्योंकि आज पितृसत्ता के साथ-साथ बाजार भी जुड़ गया है जिसने शादी जैसी संस्थाओं की संरचनाओं को और अधिक जटिल बना दिया है।

ऐसी परिस्थितियों में भी लड़कियों की शादी कर दी जा रही है। यहां हम देख सकते हैं कि लड़कों के कम पढ़े-लिखे होने के कारण भी कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है लेकिन इसका सीधा प्रभाव लड़कियों पर पड़ रहा है। कम पढ़े-लिखे लड़कों या बेरोजगारों की शादी पढ़ी-लिखी लड़कियों से की जा रही है क्योंकि पढ़े-लिखे लड़कों की संख्या या तो कम है या उनकी मांग बहुत ऊंची है। यही पितृसत्तात्मक समाज का दोहरापन है जो स्त्री और पुरुष दोनों के लिए जीवन जीने के लिए अलग-अलग मापदंड रखता है, शिक्षा के अलग-अलग उद्देश्य रखता है और यहां तक कि शादी की उम्र भी अलग-अलग रखता है। 

आज भी उसी तरह की परिस्थितियां ही देखने को मिलती है जो आज़ादी से पहले ब्रिटिश गुलामी में जी रहे भारत में महिलाओं की शैक्षणिक स्थिति थी। उस वक्त जिस तरह भारत में महिलाओं की शिक्षा के मुद्दे को उठाया गया जो उनकी खुद की उन्नति और प्रगति को ध्यान में रखकर नहीं किया गया बल्कि घर-परिवार के लिए और एक नई तरह की पत्नी को गढ़ने को ध्यान में रखकर किया गया। आज भी परिस्थितियां कुछ अलग नहीं है। आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी समाज की बुनियादी सोच में ज्यादा फर्क देखने को नहीं मिलता। लड़की और लड़के दोनों को शिक्षा देने या ना देने के उद्देश्य आज भी अलग-अलग हैं और बहुत स्पष्ट हैं।

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जब कोई महिला या लड़की उच्च शिक्षा तक पहुंचती है तब उसकी बुनियादी सोच में एक अंतर आने लगता है। वह अपनी खुली सोच और खुले विचारों को बिना किसी डर के, बिना किसी रूकावट के अभिव्यक्त करने लगती है। वह रूढ़िवादी, दकियानूसी रीति-रिवाजों का विरोध करने लगती है तब समाज के ठेकेदारों को अपनी पितृसत्ता की जड़ें हिलती दिखने लगती हैं जिसके चलते मध्यवर्गीय दलित परिवार भी दोबारा उसी रूढ़िवादी विचारों को अपनाने को विवश हैं कि लड़की की शिक्षा पर कम खर्च किया जाए और कम उम्र में ही शादी की जाए। यहां हम देख सकते हैं कि शिक्षा और ज्ञान ही वह रास्ता है जो आलोचनात्मक सोच को विकसित कर सकता है, पितृसत्ता के खिलाफ खड़ा हो सकता है। यही सोच समाज में धीरे-धीरे ही सही लेकिन बुनियादी बदलाव ला सकती है। शिक्षा ही महिलाओं को ताकत दे सकती है जिसके आधार पर वह अपने संघर्ष का रास्ता तय कर सकती हैं।

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तस्वीर साभार : सुश्रीता भट्टाचार्जी

मुझे यात्राएं करनी पसंद है क्योंकि उन यात्राओं से हम हमेशा कुछ नया सीखते हैं साथ ही मुझे गढ़े हुए शब्द तथा उनसे जुड़े हुए सामाजिक संदर्भ या जेंडर संबंधों को चुनौती देना पसंद है।

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