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“मैंने अपनी बेटी/बेटे की शादी पर बहुत खर्च कर दिया”, “लड़केवालों की जो मांग है उसे तो पूरी करनी ही है”, “अच्छा! ये दहेज़ नहीं, गिफ्ट है”, “शादी करना है तो रीति-रिवाज़ करने ही होंगे और इसमें खर्चे तो होंगे ही”, “यह धर्म का मामला है”, “लड़की की शादी मतलब कन्यादान फिर लड़की किसी और की हो जाती है।” शादी में होने वाले खर्च और उपहार की आड़ में दिए जाने वाले दहेज के आदान-प्रदान को समाज ने खुद धर्म, जाति और पितृसत्तात्मक संरचना के आधार पर बनाया है। यह जिस तरह से बनाया गया है उसका संविधान में कहीं उल्लेख नहीं है बल्कि दहेज़ लेना और देना तो कानून की नज़र में तो एक दंडनीय अपराध है। लेकिन हमारे समाज में आज भी कई धर्म और जाति के लोग शादी के लिए इतना क़र्ज़ लेते हैं जो उनके लिए ही चुका पाना मुश्किल होता है। लड़की के जन्म लेते ही शादी के लिए संपत्ति, दान-पुण्य, दहेज़ जोड़ना माता-पिता अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं। कई परिवार अपने जीवन भर की कमाई बेटियों की शादी के लिए बचाकर रखते हैं। साथ ही अधिक दहेज़ या उपहार ना दे पाने की स्तिथि में खुद को शर्मिंदा महसूस करते हैं।

लड़की के जन्म के बाद ही उनकी शादी के बारे में सोचना यह दर्शाता है कि लड़कियों की अपनी कोई इच्छा नहीं हो सकती, ना ही शादी के रीति-रिवाज़ों की संरचना में बदलाव को लेकर और ना ही शादी करना है या नहीं करना है इस फैसले को लेकर। लड़की के जन्म के बाद दो चरण ऐसे हैं जो समाज लड़कियों से बिना पूछे ही तय कर लेता है। पहला चरण है लड़की की शादी होना और दूसरा चरण है उसका मां बनना। जबकि यह लड़की की पसंद और चुनाव है कि वह खुद शादी ना करना चाहे या मां ना बनना चाहे। यह भी मुमकिन है कि सहमति से शादी करने वाले दो लोग धार्मिक अनुष्ठानों को ख़ारिज कर, बिना दहेज़ और उपहार के शादी के लिए सिर्फ कानूनी रूप से पंजीकरण करें।  

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शादी में होने वाले खर्च, श्रम और पर्यावरण को होने वाले नुकसान पर भी विचार करने की ज़रूरत है। मैं इसको सरल भाषा में कहूं तो शादी में होने वाला खर्च दिवाली के लिए खरीदे जाने वाले पटाखे जैसा ही है, जिसे कुछ ही घंटों में जला दिया जाता है। बार- बार बाज़ार जाना, सामान लाना, सबकी पसंद नापसंद का ध्यान रखना, खाने की व्यवस्था देखना और खाना बर्बाद ना हो इस पर विशेष ध्यान देना, बड़ी मात्रा में कागज़ के कार्ड प्रिंट करवाना, महंगे से महंगे कपड़े खरीदना और उनको बाद में बहुत कम या ना के बराबर इस्तेमाल करना। इसके साथ ही शादियों से निकलने वाला कूड़ा-कचरा जैसे प्लास्टिक की बोतलें, गिलास, थर्माकोल के बने सामान, बड़ी मात्रा में दूसरे यूज़ एंड थ्रो मटेरियल, शादी के कार्ड्स मतलब कागज की बर्बादी आदी पर्यावरण की दृष्टि से बहुत ही हानिकारक हैं। शादी में होने वाले खर्च को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ दिया जाता है। अगर तार्कित रूप से सोचें तो क्या सच में हमें लोगों को यह बताने की ज़रूरत हैं कि किसने घर की शादी में कितना खर्च किया, या लड़के को क्या-क्या मिला और लड़की को क्या-क्या दिया गया।

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शादी चाहे अरेंज हो या लव, जिस शादी के बाद जीवन के बारे में ही कुछ तय नहीं है उस शादी पर अधिक खर्च करना एक बड़ा आर्थिक नुकसान है। सोचने वाली बात यह भी है कि क्या सचमुच दुनिया में सबकी शादी एक ही बार ही हुई है?, क्या सभी जोड़े शादी में बड़ा खर्च करने के बाद आपस में खुश हैं?

यहां पर एक बात पर और ध्यान देने की ज़रूरत है- शादी में दहेज़ या उपहार दिया लड़की को दिया जाता है पर मिलता लड़के को है। अगर हम पितृसत्तात्मक नज़रिये से देखें तो शादी में लड़की को दिया तो बहुत कुछ जाता है पर अधिकार उसका शायद ही किसा सामान पर होता है। जो कुछ भी है वह अपने घर से मिलता है और बाद में उस पर हक ससुरालवालों का हो जाता है। सालों से शादी पर होने वाला खर्च, शादी में आए लोगों के लिए की गई व्यवस्थाओं और लड़का-लड़की के परिवारों में लेन-देन के चश्मे से देखा जाता है। मज़े की बात ये भी है कि अधिकतर लोग देन-लेन से जुड़े रीति-रिवाज़ों को धर्म से जोड़कर सही ठहराते हैं। अक्सर कहते हैं कि ऐसा नहीं करने से पूर्वज नाराज़ होंगे जबकि पूर्वज नाराज़ होने वाली बात वैज्ञानिक रूप से तो कभी साबित नहीं हुई है। रीति-रिवाज और लेन-देन को सही ठहरने वाले लोग वही लोग हैं जो पीठ पीछे बोलते हैं किसने क्या दिया, कमी कहां रह गई, खाने में क्या अच्छा था क्या बुरा, इंतज़ाम में कुछ तो कमी थी, बहुत ज्यादा दिया है लड़की को, बहुत मिला है लड़के को। शादी चाहे अरेंज हो या लव, जिस शादी के बाद जीवन के बारे में ही कुछ तय नहीं है उस शादी पर अधिक खर्च करना एक बड़ा आर्थिक नुकसान है। सोचने वाली बात यह भी है कि क्या सचमुच दुनिया में सबकी शादी एक ही बार ही हुई है?, क्या सभी जोड़े शादी में बड़ा खर्च करने के बाद आपस में खुश हैं?

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अधिकतर लोग शादी में होने वाले खर्च को अपनी भावनाओं से जोड़ कर देखने लगते हैं। जबकि सामाजिक विज्ञान यह मानता है कि हमारी भावनाएं भी सामाजिक रूप से बनाई गई हैं यानी सोशली कंस्ट्रक्टेड हैं। सालों से एक धर्म या जाति के लोग जो करते आए हैं, हम उन्हीं रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों को सही ठहराकर उसमें दुखी होते हैं या जश्न मनाते हैं। भावनाओं के समाजीकरण को हम रूप कंवर के उदाहरण से समझ सकते हैं। रूप  कंवर, भारत की आखिरी स्त्री थी जिनकी 1987 में सती प्रथा ने जान ली। सती प्रथा को भी लोग स्त्री के त्याग और वीरता से जोड़कर देखते हैं। इस तरह बहुत से लोगों को ये प्रथा कुरीति नहीं लगती थी। जिनके यहां महिलाएं सती प्रथा के कारण मार दी जाती थीं, वे अभी भी खुश होते हैं और अपने परिवार की वीरता का बखान करते हैं। सती निवारण कानून 1987 में पारित किया गया। जो सालों से सती प्रथा को सही बता रहे थे, उनकी भावनाएं सती निवारण कानून से आहत हुई होंगी, पर इन भावनाओं का सामाजिक आधार ही गलत है। इस प्रकार अगर हम देखें तो भावनाओं का समाजीकरण कर दिया जाता है। जिसके तहत हम सालों से जो करते हैं वही हमको सही लगता है। जबकि ऐसा ज़रूरी नहीं है कि हम जो भी सालों से कर रहे हैं वो सही ही है।

ई.वी.रामासामी पेरियार: दर्शन-चिंतन और सच्ची रामायण में लिखा भी है कि “मैं शादी या शादी जैसे शब्दों से सहमत नहीं हूं। मैं इसे केवल जीवन में सहचर्य के लिए एक अनुबंध मानता हूं। इस तरह के अनुबंध में मात्र एक वचन और अगर आवश्यकता हो, तो अनुबंध के पंजीकरण के एक प्रमाण की ज़रूरत है, अन्य रस्मों-रिवाजों की कहां आवश्यकता है? इस लिहाज से मानसिक श्रम, समय, पैसे, उत्साह और ऊर्जा की बर्बादी क्यों?” शादी एक पंजीकरण है जो साथ रहने का अधिकार देता है। अगर वे बाद में साथ ना रहना चाहें तो शादी का पंजीकरण ही बाद में दोनों को एक दूसरे से कानूनी रूप से अलग होने में मदद करता है। शादी में अधिक धन संपत्ति, श्रम, संसाधन खर्च करना न करना शादी करने वाले जोड़े पर निर्भर करता है। अगर लड़का-लड़की चाहें तो शादी की संरचना में बदलाव करके समाज में भी एक बदलाव कर सकते हैं क्योंकि शादी और शादी के तौर तरीके केवल उनसे जुड़े हुए नहीं हैं, यह आज के समाज और आने वाले समाज की संरचना को भी बुनते हैं।

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तस्वीर : सुश्रीता भट्टाचार्जी

Ritika Srivastava has completed her M.Phil. in Education from Tata Institute of Social Sciences, Hyderabad. Presently She is pursuing Ph.D. in Education from the same institute. After M.Phil., She worked in the Regional Institute of Education (NCERT) Bhopal as Assistant Professor in Education. She likes to work with children and teachers. She likes to read, write, and discuss contemporary equity and equality issues of education and society.

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