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एडिटर्स नोट: यह लेख फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी के प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ी लड़कियों द्वारा लिखे गए लेखों में से एक है। इन लेखों के ज़रिये बिहार और झारखंड के अलग-अलग इलाकों में रहने वाली लड़कियों ने कोविड-19 के दौरान अपने अनुभवों को दर्शाया है। फेमिनिज़म इन इंडिया और फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी साथ मिलकर इन लेखों को आपसे सामने लेकर आए हैं अपने अभियान #LockdownKeKisse के तहत। इस अभियान के अंतर्गत यह चौथा लेख झारखंड के गिरीडीह ज़िले की खुशी ने लिखा है।

सीमा मेरी बचपन की दोस्त है जो झारखंड के गिरिडीह जिले की रहनेवाली है। उसका जन्म एक मज़दूर परिवार में हुआ है। उसके पापा एक फैक्ट्री में काम करते हैं। उसके जन्म पर सब खुश थे, बस सीमा के दादा को छोड़कर, उन्हें पोता चाहिए था पर पोती हो गई। ऊपर से उसका रंग भी काला था। बच्ची के जन्म के साथ ही उसके दादा तो इस बात से परेशान हो गए कि इसकी शादी में समस्या होगी। यह तो वही बात हो गई कि गांव बसा नहीं कि लुटेरों के बारे में सोचकर गांव बसाने से ही डरने लगे। सीमा के दादा ने बहुत महीनों तक अपनी पोती को परिवार के सदस्य के रूप में नहीं अपनाया। दादा सीमा को गोद भी नहीं लेते थे। सीमा की मां सब समझ रही थी फिर एक दिन उन्होंने सीमा को दादा की गोद में जबरदस्ती दे दिया, तब से वह सच्चाई को अपनाने लगे थे। फिर सीमा के बाद उसके दो भाइयों का भी जन्म हुआ। अब दादा को तसल्ली हो गई कि उनके दो पोते तो हैं। इस तरह सीमा का बचपन बीता लड़की होने के एहसास के साथ। वह शुरू से ही कम बोलनेवाली लड़की है। उसके परिवारवाले भी उसको अधिक बोलने नहीं देते। 

सीमा हमेशा पढ़ाई में अच्छी थी जब भी उसकी परीक्षा के परिणाम आते तो उसके दादा एक बात कहते,  “अगर तुम इस घर का बेटा होती तो अच्छा होता।” यह वाक्य सीमा हमेशा अपने लिए दादा से सुनती, पर समझती नहीं। मुस्कुराकर वहां से चली जाती थी। उसका मनाना था कि उसके परिवारवाले जो भी करेंगे वह सही होगा उसके लिए। हमेशा परिवार के लोगों की बात माननेवाली और घर में रहनेवाली लड़की थी सीमा। वह उनसे कभी कोई सवाल नही करती थीं। सीमा की दादी उसे सिखाती थी कि हमेशा नज़रें झुकाकर चलना, जबकि वह इसके पीछे की वजह कभी नहीं बताती थी। सीमा उनकी यह बात मान लेती थी क्योंकि उसने अपनी बुआ को भी यही करते देखा था। उसकी बुआ की जब तक शादी नहीं हुई थी तब तक उसने अपने भाई और पापा की पगड़ी की इज्ज़त का बोझ उठाया था और शादी के बाद अपने पति की उठा रही है।

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परिवारवालों, खासकर सीमा के पापा और मम्मी दोनों का सपना था कि उनके दोनों बेटे अपने घर की जिम्मेदारी उठाएं और बेटी अपनी ससुराल को संभाले पर सीमा के सपने अलग थे। वह चाहती थी कि वह आत्मनिर्भर बनें। वह अपनी कमाई के पैसे से फोन लेना चाहती थी, अपने घर में आर्थिक सहयोग देना चाहती थी। जब सीमा आठवीं कक्षा में थी तब भी वो ट्यूशन पढ़ाकर अपने ट्यूशन का खर्च निकालती थी। सीमा के घर के हालात कितने भी खराब क्यों ना हो, पर उसके परिवारवाले कभी पढ़ाई में रोक-टोक नहीं करते थे। चूंकि सीमा की मां एक खुले विचारों वाली महिला थी, वह चाहती थी कि उनके तीनों बच्चे अपनी पढ़ाई पूरी करें। खुद उनकी शादी बहुत कम उम्र में हुई थी और वे बहुत कठिनाइयां झेल चुकी थी। साहू समुदाय के ऐसे समाज में सीमा पली है, जहां बगल के घर की कोई लड़की प्रेम विवाह कर ले तो उसके घर की बाकी लड़कियों को अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए परिवारवालों को बहुत मनाना पड़ता था। अगर परिवारवाले मान जाएं तो ठीक, वरना वह शादी के बाद ही अपने पांव घर से बाहर रख पाती थी।

जब सीमा आठवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी करनेवाली थी तब ट्यूशन जाते वक्त उसे एक महिला के ज़रिये पता चला कि यहां टेक सेंटर खुल रहा है जो लड़कियों को मुफ्त में कंप्यूटर सिखाएगा। बस फिर क्या था, अगले ही दिन सीमा अपने दोस्तों के साथ फॉर्म भरने के लिए आ गई। सभी बहुत खुश थे। वहां जाने के बाद पता चला कि जो दीदी उन लोगों को कंप्यूटर सिखाने वाली थी वह सीमा के गांव की ही हैं। उनलोगों के लिए यह बात सोने पर सुहागा वाली बात थी। कुछ दिनों तक लड़कियों के चुनाव की प्रक्रिया चली और उनलोगों को बोला गया कि चुनाव होने के बाद आपको कॉल जाएगा। जिस वक्त सीमा को कॉल गई कि वह कंप्यूटर सीखने के लिए आ सकती है, उस वक्त वह बीमार थी। यह बात सुनकर कि वह कंप्यूटर सीखने वाली है मानो उसके शरीर में एक नई ऊर्जा और आंखों में नए सपने आ गए। इस कंप्यूटर क्लास से सीमा की उम्मीद बस इतनी थी कि वह वहां पर सिर्फ कंप्यूटर सीखने आएगी।

फैट (FAT) संस्था का टेक सेंटर एक ऐसी जगह है जहां तकनीक के प्रति लड़कियों के मन में जो डर है उसे दूर किया जाता है। उन्हें कंप्यूटर सिखाया जाता है। हम लड़कियों को तो घर में एक बल्ब तक लगाने की इजाज़त नहीं दी जाती। गलती से अगर बल्ब टूट जाए तो यही सुनने को मिलता है कि बोला था मत लगा, पर नहीं सुना तूने। अब आगे से छूना नहीं, यह तेरे बस की बात नहीं। एक तरफ वह टेक सेंटर है जहां शुरुआत में जब लड़कियों को कंप्यूटर सिखाया जाता था तो अगर कोई कुछ नहीं कर पा रही या किसी ने कुछ ग़लत कर दिया तो यह देखा जाता था कि आखिर गलती कहां हुई। घर में तो ना खुलकर हंस सकते हैं न रो सकते हैं, पर वहां सेंटर में जगह दी गई ताकि हम खुलकर हंस सकें, नाच सकें और रो सकें। 

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हम युवा हैं, युवावस्था के दौरान हमारे शरीर में जो बदलाव होते हैं उनके बारे में घर में हमें कोई जानकारी नहीं दी जाती। पर सेंटर में इन मुद्दों पर चर्चा होती है जिससे हम घबराते नहीं, चीजों को समझते हैं। अगर किसी को कोई समस्या है या वह परेशान है, तो क्या कर सकते हैं जिससे उसकी समस्या दूर हो जाए। वहां कोई एक परिवार से नहीं है और ना ही कोई एक दूसरे को बहुत अच्छे से जानते हैं, पर फिर भी देखते-देखते सबसे सीमा का एक आत्मीय रिश्ता बन गया। लोग कहते हैं कि लड़कियां एक दूसरे से जलती हैं पर सेंटर में ऐसा बिल्कुल नहीं है। लड़कियों के इस रिश्ते में ना कोई रोक टोक है ना कोई जलन। बस यहां है तो एक दूसरे के प्रति सम्मान और एक दूसरे की चिंता। यहां लड़कियों की नेतृत्व क्षमता पर काम किया जाता है। लड़कियों को अलग-अलग मुद्दों पर जानकारी दी जाती है। जैसे पितृसत्ता, यौनिकता, उन्हें मोल- भाव करना सिखाया जाता है ताकि लड़कियां अपने जीवन में अपने लिए निर्णय ले सकें, वे दबें नहीं, खुलकर जी सकें, अपने अंदर के कौशल को दिखा सकें।

सीमा को यही चाहिए था। वह अपने घर में लोगों को समझाने की कोशिश कर रही है। वह अब दादाजी की बातों पर सवाल भी उठाती है और उनका जवाब भी देती है। यह सीमा पहले वाली सीमा से काफी अलग है। अब तो सीमा बोलने लगी है, वह अब कार्यक्रमों में भाग लेती है, स्टेज पर भी बोलती है। यह सीमा अकेले बाहर जाती है जबकि पहले वाली सीमा बाहर नहीं जाती थी। सेंटर जाने के बाद सीमा के अंदर जो आत्मविश्वास आया वह पहले नहीं था। सेंटर के बारे में जितना बोलो उतना कम है। मैं यही कहना चाहूंगी कि “लड़कियों को प्यास लगी थी, पर पानी मिल नहीं रहा था और यह सेंटर पानी बन कर लड़कियों के पास आया”। यह पानी उसे मिले इसके लिए सीमा ने भी मेहनत की। कोई भी गतिविधि होती तो उसमें सीमा बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेने लगी। चीजों को अपने जीवन में उतारने लगी। इधर सीमा के पापा की तबीयत खराब रहने लगी थी जिसके कारण घर में खाने-पीने का सामान जुटाने में भी समस्या होने लगी। सीमा को सेंटर में इंटर्नशिप करने का मौका मिला। इस इंटर्नशिप से जो पैसे आते वह उससे घर के ज़रूरी सामान लाती । 

सीमा हमेशा पढ़ाई में अच्छी थी जब भी उसकी परीक्षा के परिणाम आते तो उसके दादा एक बात कहते,  “अगर तुम इस घर का बेटा होती तो अच्छा होता।”

सब चीजें संभल रही थी कि एक आहट ने उनचीजों को नए सिरे से अस्त-व्यस्त कर दिया। सेंटर की लड़कियां बहुत खुश थीं क्योंकि सब 15 दिनों के लिए पटना जानेवाले थे। यह लड़कियों के लिए बहुत बड़ा मौका था। हम लड़कियां जब भी कहीं जाती हैं तो अपने परिवार के साथ ही जाती हैं। यह पहला मौका था अपने दोस्तों के साथ जाने का और सब लड़कियों के परिवारवाले भी मंजूरी दे चुके थे। लड़कियों के सफ़र की पूरी तैयारी हो चुकी थी। अचानक पता चलता है कि कोरोना नाम का एक वायरस कोरोना फैल रहा है जो बिहार भी दस्तक दे चुका है। इसलिए हमें पटना जाना रद्द करना पड़ रहा है, यह सुनकर लड़कियों की हालत ऐसी हो चुकी थी जैसे कोई मुंह के पास लाकर गोलगप्पे छीन ले। फिर सुनने में आया कि एक दिन के जनता कर्फ्यू से यह वायरस जहां है वहीं रुक जाएगा। तब लगा चलो एक दिन सब बंद रहेगा तो वायरस फैलेगा नहीं, रुक जाएगा। इस दिन को हमलोगों ने मौज मस्ती में काट सिया लेकिन फिर पता चलता है कि 15 दिनों के लिए पूरे देश में लॉकडाउन रहेगा। सबकुछ बंद हो चुका था स्कूल, कॉलेज सेंटर सब। सब घर में रहने के लिए मजबूर हो चुके थे। ये सब इतना अचानक हुआ कि लोग समझ नहीं पा रहे थे कि अब क्या करें। उसी समय दुकानों में सभी चीजों की कीमत भी बढ़ गई। जैसे-तैसे तो 15 दिनों तक घर चल गया, पर सीमा के पापा को चिंता थी कि अगर आगे भी लॉकडाउन रहा तो कैसे क्या करेंगे।

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फैट संस्था के “कोरोना नहीं करुणा कैंपेन” में सीमा जुड़ने लगी। इस अभियान में कोरोना वायरस से जुड़ी जानकारी देना, एक दूसरे से बात करना, उनके साथ क्या हो रहा है और वो कैसा महसूस कर रहे हैं, यह जानना होता था। अभी क्या अफ़वाह फैल रही है, लोग किन-किन समस्याओं का सामना कर रहे हैं और उनकी कैसे मदद की जा सकती है, ये सारी बातें अभियान में होती थी। लड़कियां अफवाहों को फैलने से रोकने से लेकर राशन बांटने का काम कर रही थी। कोरोना काल में जहां सब कुछ बंद हो चुका था वहां लोगों की जरूरत तो ख़त्म नहीं हुई थी। कोरोना काल में भी लोगों की ज़रूरतें पहले जैसी ही थी, पर लोगों के पास ज़रूरत पूरी करने के लिए संसाधन नहीं थे। आय का स्रोत खत्म हो गया था, घर में राशन नहीं था। उसी समय राहत पहुंचाने की बहुत सारी योजनाएं बन रही थी। इस बारे में सीमा को जानकारी थी और लोगों की मदद करने की इच्छा भी थी। उसने अपने समुदाय में जिनको राशन में दिक्कत हो रही थी उनको राशन दिलाने में मदद की। खुद उसके घर में भी राशन की दिक्कत हो रही थी तो फैट संस्था ने कोविड रिलीफ फंड से उसकी मदद की। फैट चाहता था कि उसके साथ जितनी भी लड़कियां जुड़ी हैं उनके घर में कोई भूखा ना सोए। फैट से सीमा को भी मदद मिली, पर सीमा और उसका परिवार बहुत डर में जी रहा था क्योंकि उसका आधा परिवार मुंबई में है और आधा गांव में। सभी को अपनी और अपने परिवार के सदस्यों की सुरक्षा की चिंता रहती है। लोग घर से बाहर नहीं निकल पा रह हैं और घर पर रहते-रहते लोग चिड़चिड़े हो गए हैं। वे सुस्त हो गए हैं मानो सब लोग दिन भर कुछ सोच रहे हो पर सोच क्या रहे हैं, वह पता नहीं। 

लॉकडाउन का सीमा के जीवन में एक सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। घर में लोग सीमा को समझने लगे हैं कि वह क्या कर रही है। अभी सारे काम वह घर पर रहकर ही कर रही है। साथ ही पहले अगर सीमा के परिवार के सदस्यों के बीच झगड़े होते थे तो लोग इधर-उधर चले जाते थे, झगड़े को खत्म नहीं करते थे। इस वजह से उनके बीच कड़वाहट बनी रह जाती थी पर अब सारे लोग घर में रहते हैं, कहीं जा नहीं सकते तो जब झगड़ा होता है तो उसे उसी वक्त सुलझा लिया जाता है। एक बार सीमा की मां और बुआ में झगड़ा हो गया था। लॉकडाउन से पहले जब भी सीमा की बुआ आती तो उसकी मां कहीं और चली जाती और जब मां घर में रहती तो बुआ कहीं चली जाती। फिर एक बार लॉकडाउन में बुआ घर आईं, चूँकि उनका घर ज्यादा दूर नहीं था तो वह आसानी से आ गई। इधर सीमा की मां को मास्क लगाकर कहीं जाना पसंद नहीं था तो वह कहीं नहीं जा पाई, बस सब झगड़ा खत्म वहीं पर। फिर भी समस्या थी कि दोनों के मन में जो एक दूसरे के प्रति धारणा बनी हुई थी वह नहीं टूटी। दोनों एक दूसरे पर आरोप लगाने लगी। कोई एक दूसरे को सुन नहीं रहा था, बस खुद को सही ठहराने में सब लगे हुए थे। इस पर सीमा ने कहा कि पहले एक व्यक्ति बोले और जब कोई बोले तो कोई दूसरा बीच में कोई ना बोले। इस नियम को लागू करने में मुश्किल हो रही थी। फिर भी उसने सबकी बातों को सुन के बांधा और एक दिशा दी। अब सीमा तो छोटी है, उसकी भला कोी क्यों सुने। आखिर सीमा ने सबके सवालों का जवाब दिया और सबसे एक सवाल भी किया कि क्या वह सही है या गलत।

अगर साल 2019 में लोगों को कहा जाता कि आपको एक पूरा दिन घर में ही रहना है, बाहर नहीं जाना है तो लोग नहीं मानते। लेकिन आज ऐसी स्थिति आ गई है कि हम कई महीनों से अपने घरों में बंद हैं। लोगों की मन की स्थिति क्या है, शायद मैं इसकी कल्पना कर सकती हूं क्योंकि मैं भी अभी उसी स्थिति में हूं। लोग हर एक दिन डर के साये में जी रहे हैं। एक दिन निकल जाने के बाद लगता है कि आज हम सुरक्षित थे और जैसे ही सवेरा होता है फिर वही डर। शायद मैं अपनें शब्दों में अपनी मन की स्थिति का वर्णन ना कर पंऊँ, पर मैं इतना जरूर कहना चाहती हूं कि चारों ओर निराशा फैली है। अपने-अपने नहीं लगते, होठों पर हंसी नहीं है। बस उम्मीद यही है कि ये काले बादल जल्दी हटेंगे। मुझे लॉकडाउन में एक बात बहुत अच्छी लगी कि जब हम अपने घर में बंद हैं तो पंछी उड़ान भर रहे थे नीडर हो कर। जब मैं छत पर जाती हूं तो पंछियों की आवाज कानों में मिठास घोल देती है। मेरी हर सुबह उनकी आवाज़ के साथ होती और एक सुकून मिलता है कि कोई तो है जो लॉकडाउन में खुश है, अपनों के साथ है। 

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