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एडिटर्स नोट: यह लेख फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी के प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ी लड़कियों द्वारा लिखे गए लेखों में से एक है। इन लेखों के ज़रिये बिहार और झारखंड के अलग-अलग इलाकों में रहने वाली लड़कियों ने कोविड-19 के दौरान अपने अनुभवों को दर्शाया है। फेमिनिज़म इन इंडिया और फेमिनिस्ट अप्रोच टू टेक्नॉलजी साथ मिलकर इन लेखों को आपसे सामने लेकर आए हैं अपने अभियान #LockdownKeKisse के तहत। इस अभियान के अंतर्गत यह पहला लेख बिहार के बक्सर ज़िले की आरती ने लिखा है।

प्रतिमा कुमारी की उम्र 15 साल है। उसका परिवार इतना गरीब है कि क्या कहा जाए। उसके परिवार में दो बहनें हैं, दादा-दादी और मां हैं। प्रतिमा की बड़ी बहन की उम्र 18 साल है और उसके दादा-दादी बहुत ही बूढ़े हो चुके हैं। प्रतिमा की मां का नाम चांदी देवी है और उसके पिता की मौत हो चुकी है। उसके पिता की मौत साल 2009 में हो गई थी। वह बहुत शराब पीते थे, शायद शराब पीने के कारण ही उन्हें कैंसर हो गया था। कैंसर की वजह से ही उनकी मौत हो गई। पिता की मौत के बाद प्रतिमा के परिवार का सहारा कोई नहीं है। घर की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण वह अपने गांव के स्कूल तक और आठवीं कक्षा तक ही पढ़ पाई। वह आगे पढ़ना चाहती थी पर वह आगे नहीं पढ़ सकी।

प्रतिमा बक्सर ज़िले से है। उसका गांव बक्सर ज़िले से 15 किलोमीटर दूर है। प्रतिमा के परिवार की एक छोटी सी ऊन-कढ़ाई के धागे की दुकान थी। प्रतिमा की मां बक्सर के बाज़ार से ऊन लाने जाती थी और वहां से लाकर गांव में बेचती थी। उनकी दुकान कोई बड़ी दुकान नहीं थी। ऐसे ही पांच-छह किलो तक ऊन और धागे लाकर वह दुकान में रख देती थी। प्रतिमा और उसकी मां दोनों मिलकर ऊन और धागे बेचती थी। इन धागों और ऊन से कढ़ाई-बुनाई करते हैं। जैसे चांदर या पर्दे पर कढ़ाई करते हैं, स्वेटर भी बनाते हैं और यह ऊन और धागा हर मौसम में बिकता है। ठंड में भी और गर्मी के मौसम में भी बिकता है मतलब पूरे साल लोग धागा और ऊन खरीदते हैं। गांव के जिन लोगों को ज़रूरत पड़ती थी वे प्रतिमा की दुकान से ले जाते थे। उसी दुकान से प्रतिमा के घर का खर्चा निकलता था।

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कोविड-19 के कारण देशभर में लागू हुए लॉकडाउन के दौरान प्रतिमा की दुकान बंद पड़ गई क्योंकि कोविड-19 के दौरान आस-पड़ोस के लोगों ने भी अपनी-अपनी दुकानें खोल ली। प्रतिमा की दुकान के मुकाबले उनके पास ज्यादा माल रहता है जबकि प्रतिमा की दुकान में बहुत कम है। इसके कारण प्रतिमा की दुकान की बिक्री घटने लगी थी। धीरे-धीरे उसकी दुकान बंद भी हो गई। प्रतिमा की मां के पास बाज़ार जाने के लिए अपना कोई साधन नहीं है, तो वह बेचने के लिए बक्सर से सामान कैसे लाती? पहले वे रोडवेज़ की गाड़ी के भरोसे बक्सर के बाज़ार आया-जाया करती थी जबकि पड़ोसियों के पास अपने साधन मौजूद हैं। बाज़ार जाने के लिए उनके पास घर की गाड़ी है, तो वे लॉकडाउन में ही चोरी-चुपके से जाकर बाज़ार से ऊन-धागा लाते हैं और बेच देते हैं। लॉकडाउन के दौरान रोडवेज़ की बसें और टेम्पो भी नहीं चल रहे थे लेकिन छिपा-छिपाकर प्राइवेट गाड़ी थोड़े-बहुत लोग चला रहे थे।

लॉकडाउन में प्रतिमा की हालत बहुत ही खराब हो गई थी, फिर भी वह मेहनत कर रही है। लॉकडाउन के दौरान प्रतिमा मशीन लेकर गांव-गांव और घर-घर में जाकर सेवई बनाती है।

प्रतिमा अपनी दुकान पर मदद करने के साथ-साथ खेतों में भी काम करती थी। उसके दादाजी बाज़ार में आलू बेचते हैं। प्रतिमा अपने दादाजी के साथ बाज़ार जाकर आलू भी बेचती है। एक दिन की बात है। प्रतिमा बाजार नहीं गई थी। ठंड का मौसम और शाम का समय था। लगभग 6-7 बज गए थे। उसके दादाजी बाज़ार से आ रहे थे। उन्होंने कुछ आलू भी लिए हुए थे। अचानक वे रोड पर गिर पड़े। उस समय रास्ते में मेरे और मेरी मां के अलावा कोई नहीं था। मैंने प्रतिमा के दादाजी को सड़क पर गिरा हुआ देखा तो मैंने जाकर उनको उठाया और उनके घर पहुंचा आई। 

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प्रतिमा को मैं अच्छी तरह से जानती हूं। प्रतिमा मेरी सहेली की छोटी बहन है। हमारे पड़ोस में ही उसका घर है। मैं उसके घर जाती भी हूं। प्रतिमा का दुख देखकर मुझे बहुत ही बुरा लगता है। उसकी परेशानियां देखकर मुझे भी दुख महसूस होता है। जब उसकी दादी का पैर टूट गया था उस वक्त प्रतिमा की मां बहुत ही परेशान थी। उनका इलाज करवाने वाला भी कोई भी नहीं था और प्रतिमा और उसकी बहन को इस बारे में ज्यादा जानकारी ही नहीं थी। मदद करने वाला कोई नहीं था, ना पापा थे और ना भाई था, पैसा भी नहीं था। तब प्रतिमा की मां ने अपनी बहन से पैसे मांगे और तब जाकर प्रतिमा की दादी का इलाज करवाया। उसकी दादी इतनी बूढ़ी और लाचार हैं कि कोई काम कर नहीं पाती हैं। प्रतिमा भी अपने परिवार की देखभाल करने में लगी रहती है। मेरी सहेली जो प्रतिमा की बड़ी बहन है वह खेतों में तो काम करने जाती है, पर घर में कुछ नहीं करती है। 

लॉकडाउन में प्रतिमा की हालत बहुत ही खराब हो गई थी, फिर भी वह मेहनत कर रही है। प्रतिमा के घर में एक छोटी सी मशीन है। उस मशीन से सेवई बनती है। लॉकडाउन के दौरान प्रतिमा मशीन लेकर गांव-गांव और घर-घर में जाकर सेवई बनाती है। वह एक किलो आटे पर 5 रुपये सेवई की बनाई लेती है। मशीन की कमाई से वह अपने घर का खर्चा चलाती है। उसके दादा-दादी को वृद्धावस्था पेंशन नहीं मिलती है। उसकी मां को जो विधवा पेंशन मिलती थी लॉकडाउन में वह विधवा पेंशन भी रुक गई। लॉकडाउन के दौरान उन्हें एक पैसा नहीं मिला। एक दिन प्रतिमा की मां ने मुझसे कहा कि बहुत दुख हो रहा है खाने और पैसे को लेकर तो मैंने दो बार राशन देकर उनकी मदद की है। उनकी आवाज़ में बहुत तकलीफ थी। वे बहुत ही घुटन महसूस कर रही है। उन्हें लग रहा है कि अब विधवा पेंशन हमेशा के लिए बंद हो गई है। वह बार-बार मुझसे पूछ रही थी कि क्या हमें विधवा पेंशन नहीं मिलेगा। मैंने उनसे कहा कि मिलेगा, आप भरोसा रखिए। लॉकडाउन के चलते अभी बहुत सारे ऑफिस बंद हैं। लॉकडाउन खुलेगा तो विधवा पेंशन भी चालू हो जाएगी और आपको ज़रूर मिलेगी।

प्रतिमा के गांव में कोविड-19 को लेकर खूब अफवाह फ़ैली थी। लोग कह रहे थे कि कोविड-19 की पूजा करो। बताया जा रहा था कि 9 मोतीचूर के लड्डू, 7 फूल और अगरबती से पूजा करने से कोरोना भाग जाएगा। इस अफ़वाह पर विश्वास करके बहुत सारे लोगों ने कोरोना की पूजा की भी थी। ‘कोरोना मइया’ के नाम से पूजा होती थी। लोग कह रहे थे कि थाली बजाने और आटे का दीया बनाकर अपने दरवाज़े पर जलाकर रख देने से कोरोना भाग जाएगा। एक अफ़वाह यह भी थी कि कोरोना को भगाने के लिए 5 घरों से भीख मांगो और लाल चूड़ी खरीदकर पहनो। भीख भी वही औरत मांगेगी जिसे बेटा होगा। प्रतिमा और मेरे गांव में बहुत सारी औरतों ने भीख मांगकर चूड़ियां पहनी थीं। मैंने तो अपने घर में यह सब नहीं करने दिया। प्रतिमा के घर में भी कोरोना मइया की पूजा नहीं हुई थी। प्रतिमा इन अफवाहों पर हंसती है। इन अफ़वाहों पर उसकी हंसी मुझे अच्छी लगती है।

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