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आज समाज में हर रोज़ हज़ारों-लाखों लोग किसी ना किसी तरह के उत्पीड़न का सामना कर रहे होते हैं जिसमें बच्चे, व्यस्क, महिलाएं, पुरुष लगभग सभी आयु के लोग होते हैं। ये उत्पीड़न कई तरह के हो सकते हैं जैसे यौन उत्पीड़न, भावनात्मक या मानसिक उत्पीड़न। किसी का मानसिक रूप से शोषण करने से तात्पर्य है कि किसी व्यक्ति की भावनाओं को ठेस पंहुचाकर उसके मस्तिष्क पर खुद का नियंत्रण स्थापित करना। इसमें व्यक्ति का निरंतर अपमान करके उसे तुच्छ और छोटा महसूस कराया जाता है ताकि उसके अंदर खुद के प्रति ही द्वेष और नफरत पैदा हो जाए और वह अपने साथ रह रहे व्यक्तियों, खासकर जो उसका मानसिक शोषण करते आ रहे होते हैं, उनके प्रति खुद को ऋणी महसूस करे।

समाज में स्त्रियों का भावनात्मक शोषण एक आम बात है। हमारे समाज में औरतों को दोयम दर्जे का महसूस करा कर उनके जीवन पर स्वामित्व हासिल करने का प्रयास किया जाता है। बचपन से ही स्त्रियों के मन में यह बात डाल देना कि ये काम लड़कियों के बस का नहीं, तुम पढ़-लिखकर क्या कर लोगी, आखिर संभालना तो तुम्हें चूल्हा चौका ही है। कई बार तो परिवार वाले खुद ही बेटा और बेटी में इतना फर्क करते हैं और बेटी के जन्म से ही उसे बोझ मानकर उसे पालते हैं। वे अपनी बेटी के प्रति अपनी इस कड़वाहट को अपने अंदर नहीं रख पाते और बचपन से ही उसे उसके जन्म को लेकर ताने कसते हैं और लैंगिक भेदभाव को बढ़ावा देते हैं। पल-पल उसे यह एहसास कराया जाता है कि वह कुछ नहीं कर सकती। ऐसी भावना उनके मानसिक स्वास्थ्य पर काफी दुष्प्रभाव डालती है और मानसिक और भावनात्मक रूप से उन्हें कमज़ोर कर देती है। किसी भी अन्य शोषण की शुरुआत भावनात्मक शोषण से ही होती है। यह उल्लेखनीय है कि ज़रूरी नहीं कि हर भावनात्मक शोषण हिंसक नहीं हो पर हर हिंसक उत्पीड़न में भावनात्मक शोषण ज़रूर होता है।

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ऐसे उत्पीड़न व्यक्ति के मानसिक संतोष को हिलाकर रख देते हैं। ये मानसिक रोगों की वजह बनते हैं, व्यक्ति डिप्रेशन, एंग्ज़ायटी जैसी बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं।
भारत में स्त्रियों की मानसिक दशा पुरूषों की अपेक्षा अधिक बिगड़ी हुई है। स्त्रियों में डिप्रेशन और एंग्जायटी आम बात देखने को मिलती है। साथ ही स्त्रियों के मामले में उन्हें ये शोषण बचपन से ही झेलना पड़ता है कभी लैंगिक असमानता तो कभी यौन हिंसा के रूप में। ऐसे उत्पीड़न के चलते स्त्रियों का मानसिक संतोष चला जाता है और वे डिप्रेशन से जूझने लगती हैं। हमारे देश भारत में मानसिक रोग के मामले लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं और स्थिति यह है कि हर सात में से एक व्यक्ति मानसिक रोग से पीड़ित है यानी करीब 19.7 करोड़ लोग किसी न किसी मानसिक रोग से जूझ रहे हैं। इस विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक हमारे देश में करीब 3.9 फ़ीसद महिलाएं एंग्जाइटी और डिप्रेशन का सामना करती हैं, जबकि केवल 2.7 फ़ीसद पुरुषों में ही एंग्जाइटी नामक मानसिक रोग देखा गया है।

स्त्रियों के इस मानसिक असंतोष का बहुत बड़ा कारण पितृसत्ता भी रहा है। पितृसत्ता के कारण ही बचपन से उनके मन में खुद के लिए नफरत भर दी जाती है और उनका आत्मविश्वास हमेशा ही तोड़ने का प्रयास किया जाता है।

‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम’ वेबसाइट के अनुसार महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक डिप्रेशन की शिकार होती हैं और न सिर्फ डिप्रेशन बल्कि महिलाओं में एंग्जाइटी, बाइपोलर डिसऑर्डर और स्किजोफ्रीनिया जैसे मानसिक रोग भी एक आम बात होती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में डिप्रेशन एक सामान्य बीमारी बनती जा रही है और मौजूदा वक्त में करीब 35 करोड़ लोग डिप्रेशन की चपेट में आ चुके हैं। ‘द लांसेट’ में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक डिप्रेशन से ग्रस्त महिलाओं द्वारा आत्महत्या के कदम उठाना आम बात है। रिसर्च में कहा गया है कि साल 1990 से 2017 के बीच हमारे देश में मानसिक स्वास्थ्य संबधी बीमारियां लगभग दोगुनी तेज़ी से बढ़ गई हैं।

कई ऐसे कारण हैं जो औरतों को डिप्रेशन का शिकार बनाते हैं। ये कारण कुछ ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ एक औरत ही महसूस कर सकती है। उदाहरण के तौर पर लैंगिक असमानता, लैंगिक हिंसा, समाज में बराबरी का दर्जा न मिलना, सैलेरी में अंतर, सामाजिक और पारिवारिक दबाव, काम के साथ परिवार की ज़िम्मेदारी और अपनी व्यक्तिगत समस्याएं आदि महिलाओं में बढ़ते डिप्रेशन का कारण रही हैं। स्त्रियों के इस मानसिक असंतोष का बहुत बड़ा कारण पितृसत्ता भी रहा है। पितृसत्ता के कारण ही बचपन से उनके मन में खुद के लिए नफरत भर दी जाती है और उनका आत्मविश्वास हमेशा ही तोड़ने का प्रयास किया जाता, जिस उम्र में आत्मविश्वास बनना शुरू होता है उस उम्र में आत्मग्लानि जैसे भाव पैदा कर दिए जाते हैं। उनके आत्मविश्वास को कभी पनपने का अवसर ही नहीं दिया जाता। ये पितृसत्ता की औरतों पर अपना हक ज़माने और उन्हें शारीरिक रूप से ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी उनपर अपना स्वामित्व स्थापित करने यानि उनके दिमाग़ पर भी कब्ज़ा कर लेने के प्रयास में सोची-समझी साज़िश होती है। औरतों की मानसिक स्वतंत्रता भी छीन ली जाती है जिससे वे कभी पितृसत्ता के खिलाफ बगावत न कर सके और उनके मस्तिष्क पर इस तरह कब्ज़ा किया जाता है जिससे ना उन्हें स्वयं के लिए स्वतंत्रता की कोई चाहत ही जगे।

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तस्वीर साभार: The Presentation Project

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