FII Hindi is now on Telegram

हमारे भारतीय समाज ने महिलाओं को लेकर कई नियम बना रखे हैं। उदाहरण के तौर पर, एक महिला का ऐसा व्यवहार होना चाहिए, उसे तेज नहीं बोलना चाहिए, उसे एक आदर्श बेटी, बहु, मां, बहन होनी चाहिए। वह हमेशा त्याग की मूरत होनी चाहिए, अगर कहीं घर-समाज से लड़कर उसने खुद के बारे में सोचा तो वह खुदगर्ज़ और मतलबी औरत कही जाएगी। हमारे इस पितृसत्तात्मक समाज में महिला सशक्तिकरण शब्द सिर्फ भाषणों में प्रभाव लाने और फिल्मों की रेटिंग बढ़ाने का ज़रिया बन गया है। बाकी असल मायनों में यहां इसका कोई अस्तित्व नहीं है। बातें तो सभी करते हैं कि महिलाओं को बराबरी दी जानी चाहिए, लेकिन असलियत तो ये है कि ये भारतीय मर्द महिलाओं को परंपरागत काम करते देखने के अभ्यस्त हैं और ये उन्हें उसी तरह ही देखना चाहते हैं। किसी महिला को अपने बराबर देखने की तो बात छोड़िए, ऐसा सोचने से भी ये डरते हैं। ये डरते हैं महिलाओं की तरक्की से, ये डरते हैं उनकी आज़ादी से।

आदर्श भारतीय महिला की क्या परिभाषा है? कुछ एकाध साल पहले बनारस के एक स्टार्टअप ने लड़कियों को आदर्श बहू बनने की ट्रेनिंग देने की पेशकश की थी। ऐसी ही ट्रेनिंग कथित पत्रिकाएं भी देती रहती हैं, जैसे नारी धर्म, स्त्री के लिए कर्तव्य दीक्षा, भक्ति नारी, नारी शिक्षा, दांपत्य जीवन के आदर्श, गृहस्थ जीवन में कैसे रहें आदि। ऐसा ही एक आदर्श गुवाहाटी कोर्ट ने सेट किया है। स्त्री अगर सिंदूर न लगाए तो वह शादीशुदा जिंदगी से खुश नहीं। ऐसे सवाल हमेशा औरतों की ओर ही क्यों उछाले जाते हैं? क्योंकि समाज ने स्त्री को बस एक आठ मीटर की साड़ी और संस्कार के साथ सभ्यता और शिष्टता के आचरण में ढाले देखना चाहा है। वह कभी भी मायूस नहीं हो, उसके चेहरे पर हर वक्त मुस्कराहट रहे। एक तरफ, वह अपने घर के कर्तव्यों का पालन भी करे और दूसरी तरफ, दुनिया भर के ताने भी शांति से सुनती रहे। ऐसी औरत ही एक ‘आदर्श’ भारतीय नारी कहलाती है। महिलाओं को लेकर समाज ने जो देवी वाली छवि बना रखी है उसमें कहीं न कहीं भारतीय सिनेमाजगत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। फ़िल्म में महिला सशक्तिकरण को लेकर कहानी की शुरुआत तो होती है लेकिन औरत को आर्दश रूप में दिखाने की होड़ में उस सशक्तिकरण से हटकर पितृसत्तात्मक सोच की ओर बढ़ने लगते हैं।

और पढ़ें : महिला-विरोधी फिल्मों के बीच पितृसत्ता की बेड़ियां तोड़ती ‘द लास्ट कलर’

भारतीय सिनेमा महिलाओं की स्थिति को एक हद तक समझता तो है और उनपर काम करने की सोचता भी है लेकिन उन्हें आदर्श दिखाने की होड़ में जो अहम् मुद्दे है उनसे भटक हो जाता है और इसी वजह से फिल्म का उद्देश्य कारगर साबित नहीं होता है।

हाल ही में OTT प्लेटफ़ॉर्म पर एक फिल्म आती है ‘पगलैट।’ कहानी कुछ इस तरह से है कि संध्या गिरी का पति गुजर गया है, पति की मौत से उसकी तेरहवीं तक की कहानी फिल्म ‘पगलैट’ में दिखाई गई। फिल्म दर्शाना तो यह चाहती है कि एक विधवा औरत के लिए समाज में स्थिति विकट हो जाती है, लेकिन कहानी महिला सशक्तिकरण से हट कर आखिर तक आते आते संध्या को आदर्श बहु दिखाने में सफल रहती है। उमेश बिष्ट ने अपनी कहानी कहने के लिए मध्यमवर्गीय उत्तर भारतीय परिवार को चुना। किस तरह से रिश्तेदार मौत पर आंसू बहाने के नाटक करते हैं ये बात उन्होंने अपनी फिल्म के जरिये कही है। कहानी का विषय दमदार है और नाम भी लेकिन विषय की क्षमता का पूरा उपयोग नहीं किया गया। सिनेमाजगत का समाज पर बहुत प्रभाव पड़ता है क्योंकि सिनेमा की पहुंच समाज के बहुत बड़े वर्ग तक है, इसीलिए मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक दायित्व निभाने का सवाल भी यहां जुड़ जाता है।

Become an FII Member

भारतीय सिनेमा महिलाओं की स्थिति को एक हद तक समझता तो है और उनपर काम करने की सोचता भी है लेकिन उन्हें आदर्श दिखाने की होड़ में जो अहम् मुद्दे है उनसे भटक हो जाता है और इसी वजह से फिल्म का उद्देश्य कारगर साबित नहीं होता है। भारतीय सिनेमा अपनी पितृसत्तात्मक सोच को रखते हुए फिल्म बनाते है जिसमें महिलाओं के सशक्तिकरण मुद्दे तो होते है पर आखिरकार छाप वह पितृसत्तात्मकता सोच की ही छोड़कर जाता है। फिल्म में महिलाओं की स्थिति कुछ इस तरह से दिखाई जाती है, वह घर के काम के साथ सारे समझौते करती नज़र आएंगी, ये किरदार पितृसत्तात्मक सोच से ही बंधे होते हैं। औरतों को हमेशा ही पुरुषों की उम्मीदों से बंधा दिखाया जाता है। समाज की सोच जिस तरह से पितृसत्तात्मक है,उसमें महिलाओं को अपने हक के लिए रोज ही लड़ना पड़ता है। क्या ऐसे समाज में फिल्मों के ज़रिये भी इस सोच को बढ़ावा देना ज़रूरी है?

और पढ़ें : पगलैट : विधवा औरतों के हक़ की बात करती फिल्म कहीं न कहीं निराश करती है

सिनेमा समाज में स्त्री की स्थिति और समय के साथ उसकी बदलती भूमिका को दिखाने की कोशिश तो करता रहा है पर स्त्री को हमेशा ही उसी तथाकथित ‘आदर्श’ रूप में भी प्रस्तुत करता रहा है। सिनेमा के शुरुआती दौर में ऐतिहासिक, धार्मिक और पौराणिक फिल्मों के अनुरूप ही स्त्री किरदार उन्हीं पारंपरिक आदर्श भूमिकाओं में रही। आज के नए दौर में सिनेमा में नायिकाओं का जो मुखर रूप सामने आया है वह न दर्शक कभी सोच सकता था और ही न समाज। भारतीय सिनेमा ने सालों तक औरत की वही तस्वीर दिखाई की जिस आदर्श तस्वीर की अपेक्षा पितृसत्तात्मक समाज को हमेशा रहती है। महिला के जीवन की सार्थकता इस बात में है कि वह प्रेम को महत्व न देकर संस्कारों और परंपराओं को महत्व दे, पति और बच्चों के लिए व्रत, त्याग, तपस्या करे, समर्पित रहे। जो स्त्री इन मानकों के साथ अपना जीवन-यापन नहीं करती उसे खलनायिका का रूप दे दिया गया।

खलनायिका वह औरत होती थी जो जीवन को अपने शर्तों के मुताबिक जीती है। जो क्लब या डिस्को में नाचती है, पुरुषों से खुलकर बात करती है, उन्हें रिझाती भी है, अपनी मर्ज़ी के कपड़े पहनती है और अपनी सेक्सुअल जरूरतों को प्राथमिकता देती है। इस तरह सिनेमा में दो तरह की चारित्रिक विशेषताओं के साथ औरत के चरित्र और उसके अच्छे बुरे होने का सर्टिफिकेट जारी कर दिया गया और फिल्मों में वैसा ही दिखाया भी जाने लगा। समाज में महिलाओं के जितने मुद्दे हैं, समस्याएं हैं उसके प्रतिबिम्बों को सिनेमा में दिखाने की कोशिश की जानी चाहिए। इसका मतलब ये नहीं कि यह कोशिश की नहीं गई पर महिलाओं को लेकर जिस आदर्श रूप की यह समाज अपेक्षा करता है उसपर काम करने की ज़रूरत है। भारतीय सिनेमा हो या भारतीय समाज, “नायिका या महिलाओं” को पतिव्रता और संस्कारी, सिंदूर लगाए, करवाचौथ करते, एक आदर्श महिला के रूप में दिखाना आवश्यक नहीं है। सिनेमा ने अभी तक जो परोसा गया है उससे बदलने की ज़रूरत है।

और पढ़ें : आदर्श महिला से सुपर वीमेन के बीच महिला स्थिति का सवाल| नारीवादी चश्मा


तस्वीर साभार : Rediff

Shikha Singh is a social activist and feminist who is associated with the NGO 'Nayi Subah' that works for the welfare of Women and Children. She is also associated with Narmada Bachao Andolan . A computer engineer by profession, she devotes equal time to reading and writing blogs. She has post-graduate in Cyber Law, MCA, MSW and aims to complete her PhD in Social Work. She is an optimistic personality who constantly takes jibe on socio-political conditions of society. A writer by passion, Shikha Singh dreams of combining all her writings into a book one day.

Follow FII channels on Youtube and Telegram for latest updates.

नारीवादी मीडिया को ज़रूरत है नारीवादी साथियों की

हमारा प्रीमियम कॉन्टेंट और ख़ास ऑफर्स पाएं और हमारा साथ दें ताकि हम एक स्वतंत्र संस्थान के तौर पर अपना काम जारी रख सकें।

फेमिनिज़म इन इंडिया के सदस्य बनें

अपना प्लान चुनें

Leave a Reply