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“नंद के कुमार कुरबान तेरी सूरत पै, हूं तो मुगलानी हिंदूआनी ह्वे रहूंगी मैं

आज के संदर्भ में ताज की उपर्युक्त पंक्तियां धार्मिक कट्टरवादियों के धार्मिक उन्माद का निशाना बन जाती किंतु आज से सात सौ वर्ष पूर्व ताज बेगम की यह पंक्तियां भारतीय धार्मिक समरसता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती है। मध्यकाल में लोक और परलोक के द्वंद में घिरे मनुष्य को अपनी पीड़ा से मुक्ति ईश्वर भक्ति के रूप में दिखाई दी लेकिन भक्ति के अधिकार को लेकर यहां भी द्वंद्व था। मध्यकालीन समाज में भक्ति का अधिकार पुरुषों को तो सहज ही प्राप्त था लेकिन स्त्रियों को कुल की लाज का हवाला देकर उनसे यह अधिकार छीन लेने की कोशिशें होती रही क्योंकि उनका मानना था स्त्री का आकर्षण उनकी साधना में बाधक बनती है इसलिए ‘नारी की झाई पडत अंधा होत भुजंग’, कहकर उससे दूर रहने की बात की जाती हैं। हालांकि कृष्ण भक्तिकाव्य धारा में वात्सल्य और शृंगार की अभिव्यक्ति को भक्ति कहकर कृष्ण की बाल लीलाओं में मातृत्व की अनुभूति, किशोर कृष्ण की लीलाओं में आनंद लेने की स्वतंत्रता और प्रेम की अनन्यता की शर्त के साथ स्त्रियों के लिए भक्ति द्वार खोल दिए गए।

कृष्ण भक्त ऐसी स्त्री की कामना करते हैं जो प्रेम के लिए सब-कुछ छोड़ कर कृष्ण की दीवानी बन जाए। सावित्री सिन्हा के शब्दों में कहा जाए “माधुर्य और वात्सल्य दो ऐसी वृतियां है जो प्रकृति की ओर से वरदान स्वरूप नारी को प्राप्त है। जिस समर्पण और त्याग की साधना भक्तों का ध्येय था। जिन अनुभूतियों की कल्पना भक्त कवि अपने पौरुष की कठोरता में नारी की कोमलता का आरोपण करके कर रहे थे वह नारी ह्रदय की मूल प्रकृति थी। इसलिए भारतीय नारी के लिए निर्गुण की दुरूह साधना की अनुभूति का अनुमान भी कठिन था। कृष्ण के आकर्षण के साथ वातसल्य और प्रेम की अनुभूति की प्रधानता ने नारी को स्वत: ही अपनी और आकर्षित किया। लौकिक जीवन की प्रधान अनुभूतियों के अध्यात्मिक आरोपों में उसे अपने जीवन की एक झलक दिखाई दी।” यानि मध्यकाल में कृष्ण के प्रति प्रेम की अनन्यता और भक्ति के शर्त के साथ स्त्री अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र थी। शायद यही वजह थी कि अन्य भक्ति की तुलना में कृष्ण भक्ति में कई स्त्री भक्तों को सम्मान के साथ स्थान मिला। लेकिन यह इतना आसान भी नहीं था, प्रेम का आकर्षण भले ही वह अलौकिक ही क्यों न हो स्त्री के लिए सहज सुलभ नहीं था इसलिए मीरा को कहना पड़ा था, “बरजी  मैं काहू की नाहि रहूं, साध संगति करी हरि सुख ले, जगसूं मै दूरी रहूं ,तन धन मेरो सब ही जावो, भल मेरो सीस लहूं, मन मेरो लागो सुमिरन सेती सबको मैं बोल सहूं।”  सीस देकर और सबके बोल सहने की दृढ़ता के बाद ही मीरा ने स्त्रियों के लिए भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया।

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मध्ययुगीन समाज में सामाजिक ,आर्थिक, पारिवारिक परतंत्रता के बीच स्त्री के लिए भक्ति का अधिकार पुरुष वर्चस्व को चुनौती देने के बराबर था। कृष्णभक्त मीरा का नाम सब जानते हैं लेकिन मीरा के समान ताज भी कृष्ण की अनन्य भक्त थी इसके बारे में सब नहीं जानते। अनुमानित तिथि के अनुसार इनका समय 1400 ईसवी के आसपास माना जाता है। मुस्लिम स्त्री होने के कारण मीरा की तुलना में ताज की मुश्किलें दोगुनी थीं। लिंग और धर्म की चुनौतियों को पार करते हुए ताज ने स्पष्टता और निर्भिकता के साथ कृष्ण भक्ति के वरण की घोषणा करते हुए साफ शब्दों में कहा था ‘मैं जन्म से भले ही मुगलानी हूं लेकिन कृष्ण के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर मैं खुद को हिन्दुस्तानी मानती हूं। ‘नंद के कुमार कुरबान तेरी सूरत पै।/ हूं तो मुगलानी हिंदूआनी ही रहूंगी मैं‘, ऐसी निर्भिकता शायद आज भी देखने को न मिले। उस युग में ताज की इस स्वीकारोक्ति का क्या परिणाम हुआ होगा उसे कट्टरपंथियों का कितना विरोध सहना पड़ा होगा यह अनुमान से परे है।

कृष्णभक्त मीरा का नाम सब जानते हैं लेकिन मीरा के समान ताज भी कृष्ण की अनन्य भक्त थी इसके बारे में सब नहीं जानते।

“कहत है ताज कृष्ण सों पैजकर,/वृन्दावन छोड़ अब कितहूँ न जाउंगी।। बांदी बनूंगी महारानी राधा जू की, /तुर्कनी बहाय नाम गोपिका कहाउंगी।।

तुरकनी के स्थान पर गोपी कहलाने को आतुर ताज के अदम्य साहस को इतिहास ने क्यों भुला देने की कोशिश की यह एक खोज का विषय है। आज भारतीय समाज धर्म के आधार पर बंटने के लिए विवश भले ही हुआ लेकिन मध्यकाल में भक्ति साहित्य धार्मिक समरसता और एकता का अनुपम मिसाल पेश करता है। खुसरों और रसखान के साथ ताज का साहित्य इसका सुंदर उदाहरण है। यह ठीक है कि समय के प्रवाह और पुरुषों के वर्चस्व के कारण पुरुषों की रचनाओं का प्रचार-प्रसार जितना किया गया उसकी तुलना में स्त्रियों का साहित्य उपेक्षित रहा। मध्यकाल में स्त्रियां घरेलू और भक्ति के माहौल में लिखते हुए गुमनाम रहीं। अंधेरे में रहकर स्त्रियां धार्मिकता और भक्ति की आड़ में ही अपनी अभिव्यक्ति के लिए बाध्य थी। भक्ति के आवरण को ओढ़कर वह पुरुषों से समानता की मांग कर रही थी। पारिवारिक मर्यादा और सामाजिक बंधनों में जकड़ी स्त्रियां कृष्ण भक्ति के बहाने अपने लिए स्वाधीनता की मांग कर रही थीं। कारण धर्म ,जाति ,वर्ग के आधार पर विभाजित मध्यकालीन समाज में पराधीनता का दंश सहती स्त्रियां यथार्थ में न सही लेकिन कल्पना लोक के सहारे स्वतंत्रता का स्वाद चखना चाहती थी। भक्ति करते हुए कृष्ण से एकांत में मिलने की कामना वास्तव में वैवाहिक जीवन की कुंठाओ से मुक्ति की चाह थी। भक्ति में ही मुक्ति का स्वप्न लिए वह भक्ति की राह चुनकर अपने अस्तित्व को खोज रही थी। मध्यकालीन स्त्री भक्तों का साहित्य इसका प्रमाण है। ताज की भक्ति भावना का आधार कृष्ण का माधुर्य और विराट रूप है। अलौकिक पुरुष के रूप में कृष्ण उनके आराध्य हैं।

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“मुसक्यान तिहारी जो मैंने लखी/ लखि के मन में अति नेह जुटानो/ जो तुम चाहत एक विसे/ हम एक के बीस विसे नहि मानो / राह बड़ी है जो प्रेम के पंथ की चातुर होय सोई चित आनों।”

राधा और गोपियों के साथ कृष्ण की भक्ति मे आनंद और उल्लास का अनुभव करते हुए ताज स्त्री मर्यादा को नहीं भूलती। प्रेम की गंभीरता से उनका हृदय परिचित है।कृष्ण के रूप आकर्षण के उन्माद में उनकी भावनाओं का बांध टूटता नहीं। किसी से कोई शिकायत न करते हुए इन्होंने अपने पदों में अपने समकालीन समाज के यथार्थ के स्थान पर अपने व्यक्तिगत जीवन अनुभवों को ही अभिव्यक्त किया है। कारण साफ है व्यक्तिगत प्रतिरोध की ही सामाजिक प्रतिरोध में परिवर्तित होता है। सुधार की शुरुआत घर से की जानी चाहिए। ताज भारतीय संस्कृति ,धर्म ,दर्शन का पूरा ज्ञान रखतीं थी। उनके बारे में कुछ दंत कथाएं प्रचलित हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि वह कृष्ण की परम भक्त थी। धर्म और जाति की सीमाओं को तोड़कर कृष्ण की भक्ति करने वाली ताज उस युग की निर्भीक स्त्री भक्त होने का परिचय देती हैं। कृष्ण भक्ति भावना के अतिरिक्त हिंदू धर्म के अनेक सिद्धांतों का प्रतिपादन भी उनकी रचनाओं में मिलता है। कर्मकांड भारतीय दर्शन में सदैव से मुख्य विषय रहा है ताज ने इसकी विवेचना करते हुए अनेक पद लिखे हैं। 

माना जाता है कि उनके मन को कृष्ण की भक्ति में ही शांति मिली यही कारण है कि उनके काव्य में रागात्मक अनुभूतियों के साथ गंभीर दार्शनिकता वाले विचारों की सरल अभिव्यंजना देखी जा सकती है। भाव और शिल्प की कसौटी पर उनकी रचनाएं किसी भी पुरुष भक्त से कमतर नहीं कही जा सकती। ताज की शुरुआती रचनाओं में पंजाबी और फारसी प्रभावित हिंदी का ही उपयोग दिखाई देता है। ताज पंजाब की निवासिनी थी उनकी कुछ कविताओं में पंजाबी (साडे,गुल्ले ) और उर्दू के शब्दों ( दिलानी ,बदनामी ,कलमा,कुरान ) का प्रभाव भी देखा जा सकता है। 

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“सुनो दिलजानी मेरे दिल की कहानी ,तुम दस्त ही बिकानी बदनामी भी सहूंगी मैं /देव पूजा ठानों में निवाज हूं भुलानी तजे कलमा कुरान साडे गुगन गहूंगी मैं।/ स्यामला सलोना सिर ताज सिर कुल्ले दिये /तेरे नेह दाग में निदाग हो दहूंगी मैं।/नंद के कुमार कुरबान तोरी सूरत पै/ तवाढ़ नाल प्यारे हिंदुस्तानी ह्वे रहूंगी मैं ” 

अपनी कृष्ण भक्ति के कारण हो सकता है कि हो मुस्लिम समाज में उनका बहिष्कार भी किया हो और इसी प्रकार हिन्दू समाज में स्थान पाने के लिए भी भारी विरोध भी सहना पड़ा हो लेकिन ताज के ‘कृष्ण हमारा है ‘ की रटना के आगे कट्टरपंथियों को झुकना पड़ा होगा क्योंकि उनका विश्वास था कि अटल भक्ति का आधार कृष्ण ही ‘ताज’ के तारणहार है।  स्पष्ट है कि कृष्ण के प्रति एकनिष्ठता तथा प्रेम की अनन्यता के कारण ताज ने कभी किसी की परवाह नहीं। यहीं एक प्रश्न उठता है कि कृष्ण भक्ति करने वाले पुरुष कवियों को जितना सम्मान और प्रसिद्धि मिली उतना स्त्री भक्तों को क्यों नहीं मिली। मीरा इसका अपवाद हैं, लोक स्मृतियों ने उन्हें मिटने नहीं दिया वह रानी थी जो जोगन बनकर जीतीं रही। लोक के लिए यह असाधारण घटना थी लेकिन ताज एक साधारण स्त्री थी इसलिए उन्हें भुला देना आसान रहा होगा। काव्य शिल्प के आधार पर भी यदि देखें तो जैसे खुसरो और रसखान जैसे उच्च कोटि के रचनाकारों से भक्ति साहित्य सुशोभित हुआ ठीक इसी प्रकार मुसलमान स्त्री भक्तों में ताज का योगदान भी कमतर नही कहा जा सकता। ताज की रचना भक्ति पूर्ण और सरस है। उनकी काव्य कला का प्रमाण उनकी रचनाएं है।

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“छैल जो छबीला, सब रंग में रंगीला /बड़ा चित्त का अड़ीला, कहूं देवतों से न्यारा है।/माल गले सोहै, नाक-मोती सेत जो है /कान कुण्डल मन मोहै, लाल मुकुट सिरधारा है।/दुष्टजन मारे, सब संत जो उबारे ताज,/चित्त में निहारे प्रन, प्रीति करनवारा है।/नन्दजू का प्यारा, जिन कंस को पछारा,/वह वृन्दावन वारा, कृष्ण साहेब हमारा है।”

कृष्ण काव्य की कविताओं में कला सौष्ठव की दृष्टि से मीरा के पश्चात ताज का ही स्थान आता है।ताज की अनुभूतियां ह्दय की सत्यता के साथ भक्ति के माध्यम से अभिव्यक्त हुई हैं।यह कहना अनुपयुक्त ना होगा कि ताज अपने युग की ऐसी भक्त कवयित्री थी जिनके पास भाव भी थे और भाव को अभिव्यक्ति करने की शैली भी थी। लेकिन अवसरों की कमी और पितृसत्तात्मक मानसिकता के कारण ताज की रचनाएं उस युग से लेकर आज भी उपेक्षा का शिकार हैं। अभी भी उनके जीवन साक्ष्यों के खोज की ओर किसी ने विशेष ध्यान नहीं दिया। बहुत समय तक तो इनके स्त्री या पुरुष होने पर विवाद रहा क्योंकि वैष्णव धर्म में कृष्ण की उपासना सखी भाव से किए जाने की परंपरा के कारण पुरूष और स्त्री भक्तों की रचनाओं में अंतर करना कठिन था। साथ ही लिंगभेदक नाम न होने के कारण ताज की रचनाओं को किसी पुरुष की रचना के रूप में देखा गया लेकिन जब मिश्र बंधुओं और शिवसिंह सरोज ने इनकी पहचान मुसलमान स्त्री के रूप में की तब से ताज की ओर विद्वानों ने ध्यान देना शुरू किया। ताज के बारे में अभी भी बहुत कुछ खोजा जाना बाकी है। संरक्षण के अभाव में इधर-उधर बिखरी उनकी रचनाओं को संग्रहित कर मध्यकालीन स्त्री भक्तों के संदर्भ में ताज के अवदान को रेखांकित करने की जरूरत है।

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संदर्भ ग्रंथ 

मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियां – डॉ सावित्री सिन्हा -हिन्दी अनुसंधान परिषद,दिल्ली विश्वविद्यालय, आत्माराम एंड संस से प्रकाशित -1956

हिन्दी के मुसलमान कवि -गंगा प्रसाद सिंह विशारद द्वारा संग्रहित -प्रोप्राइटर लहरी बुक डिपो ,काशी से प्रकाशित-1928

स्त्री कवि कौमुदी- ज्योतिप्रसाद मिश्र निर्मल -गांधी हिंदी पुस्तक भंडार से प्रकाशित-1931

स्त्री काव्यधारा -संकलन -जगदीश्वर चतुर्वेदी,सुधासिंह- अनामिका पब्लिशर्स एंड ड्रिस्ट्रीब्यूटर्स प्राईवेट लिमिटेड दिल्ली -2006


तस्वीर साभार : langecole

डॉ विभा ठाकुर, 15 वर्षों के शैक्षणिक अनुभव के साथ वर्तमान में कांलिंदी महाविद्यालय ,पटेल नगर, दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से एमए , एमफिल , पीएचडी, और कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय से मास कॉम में एमए किया है।

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