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यशिका दत्त को साल 2021 में उनकी किताब ‘कमिंग आउट एज़ अ दलित’ के लिए साहित्य अकादमी का युवा पुरस्कार से नवाज़ा गया है। यह क़िताब अंग्रेज़ी में लिखी गई है। यशिका दत्त एक भारतीय पत्रकार और लेखिका हैं जो फ़िलहाल न्यूयॉर्क में रहती हैं। वह जातीय और लैंगिक पहचान के कारण होने वाले भेदभाव पर लगातार लिखती रही हैं। dalitdiscrimination.tumblr.com जो कि एक एक टम्बलर ब्लॉग पोर्टल है, यह ब्लॉग जाति के आधार पर दलित समुदाय के साथ होने वाले भेदभाव की कहानियां डॉक्यूमेंट करता है, यशिका इस ब्लॉग की संस्थापक है। पढ़िए, फेमिनिज़म इन इंडिया से उनकी ख़ास बातचीत जिसमें वह अपनी क़िताब के हिस्सों, भारतीय नारीवाद और सवर् एस्थेटिक के अलावा कई बिंदुओं पर अपने अनुभव और अपनी राय रख रही हैं।

फेमिनिज़म इन इंडिया : आपकी किताब का नाम है ‘कमिंग आउट एज़ अ दलित’, इसमें आप बात करती हैं कि कैसे आप ने अपनी जातिगत पहचान लंबे समय तक जाहिर नहीं होने दी क्योंकि अपने साथ आप ‘कोटा’ शब्द के जुड़ने से बचना चाहती थी या अपनी रोज़मर्रा के जिंदगी में जाति आधारित भेदभाव का सामना नहीं करना चाहती थीं। अगली बात, हम आज भी भारत की, ख़ासकर उत्तर भारत मेंकई बार गाड़ियों के पीछे देखते हैं कि ‘ब्राह्मण’ ‘राजपूत’ जैसे शब्द या तथाकथित ऊंती जाति के सरनेम गर्व के साथ लिखा देखते हैं। सरनेम या जाति छिपाने या छिपाने की चाह रखने या उसे खुलेआम जताने की राजनीति को आप किस तरह से देखती हैं?

यशिका दत्त : पहली बात तो यह बहुत ही बढ़िया सवाल है। क्या है ये पॉलिटिक्स और कैसे ये मैनिफेस्ट होती है। देखिए, राजपूत या ब्राह्मण जब नंबर प्लेट पर अपनी जाति लिखवाते हैं तो वह कास्ट प्राइड के नज़रिये से अपनेआप को ज़ाहिर कर रहे हैं। वे ये बताना चाह रहे हैं कि देखिए हम राजपूत हैं, हम ब्राह्मण हैं। आप भी जानते हैं, हम भी जानते हैं, पूरा समाज जानता है यह पहचान ऊंचे दर्ज़े की पहचान है, ये एक श्रेष्ठता का बोध है। वह उस आइडेंटिटी को जब उज़ागर करना चाह रहे हैं तो वे कह रहे हैं, “वी आर प्राउड ऑफ इट” (हमें इसपर गर्व है), हमारी पहचान हमारी जाति की वज़ह से है और हम अपने कास्ट प्राइड को हाइलाइट कर रहे हैं। कास्ट प्राइड को आप अलग नहीं देख सकते हैं। इसका मतलब ये भी है कि वे जाति व्यवस्था को मानते हैं। जब वे राजपूत शब्द अपनी गाड़ी पर लिख रहे हैं तो वो एक शब्द नहीं है, वो एक पेंडोरा बॉक्स की तरह है जिसके कई मतलब निकलते हैं। पहला तो ये कि वे जातिवाद में भरोसा करते हैं, वो ये मानते हैं कि क्योंकि उनकी पहचान बड़े दर्ज़े की है। जो दलित लोग हैं, हम जैसे लोग हैं, जो भंगी हैं, चमार हैं ये लोग उनसे कम हैं। इन जातियों के नाम वे लोग एक गाली की तरह, एक स्लर की तरह इस्तेमाल करते हैं। अपनी गाड़ी पर अपनी जाति लिखकर वो जाति व्यवस्था को मज़बूत करना चाह रहे हैं। वे ये बताना चाहते हैं कि जातिगत भेदभाव, छुआछूत हमारी समाज से ख़त्म नहीं हो गई है, वो अभी भी है। वो जो ‘राजपूत’, ‘ब्राह्मण’ शब्द लिखा होता है एक साफ़ तौर पर यह बताता है कि जाति आप भूल सकते हैं, मान सकते हैं कि हमारे आसपास कई बार जाति गायब हो गई है पर वह एक शब्द जाति व्यवस्था को दिखाता है। जो व्यवस्थित और संस्थागत भेदभाव को उज़ागर करता है जिसे हम देख नहीं पाते।

हम जैसे लोग, जैसे मैं भंगी हूं अगर अपनी जाति छिपाकर रहना चाहती हूं तो वह मेरे बचाव के लिए है। जैसे अगर मैं अपनी गाड़ी पर भंगी लिख दूं तो पहली बात मेरे गाड़ी के शीशे टूट जाएंगे, उस पर पत्थर फेंके जाएंगे, कीचड़ फेंकेंगे। दिल्ली में बंदूक हिंसा भी काफी रहती है तो क्या पता कोई अपने बंदूक का इस्तेमाल करें हम पर क्योंकि भंगियों की जो पहचान है वह कोई ऊंची पहचान नहीं है। यह एक नीची जाति की पहचान है, भंगी शब्द को लोग गाली के रूप की तरह इस्तेमाल करते हैं। तो अगर कोई भंगी लिखेगा अपनी गाड़ी पर तो उस गाड़ी को भी वह गाली की तरह ही देखेंगे। यह बात बहुत साफ है भारतीय समाज में कि कौन अपनी जाति की पहचान दिखा सकता है और किस को अपनी जाति की पहचान को लेकर शर्मसार होना चाहिए। जब मैं बताती हूं कि मैं दलित हूं और मैं अपनी पहचान के साथ थोड़ा गर्व महसूस करना चाहती हूं, तो लोग कहते हैं कि तुम क्यों बता रही हो कि तुम दलित हो। यह बोलकर कि तुम दलित हो, तुम समाज को बांट रही हो। यह बात बोलकर तुम खंडित कर रही हो समाज को। उनका यह कहना है कि तुम बोलो ही मत, तुम चुप रहो। यह जो व्यवस्थित भेदभाव है, जो सत्ता के स्तर पर काम करता है, प्रशासन के स्तर पर काम करता है, अकादमिक पर काम करता है, तुम चुपचाप उसे सहती जाओ। जब हम अपनी पहचान बताते हैं कि हम दलित हैं, तब हम हम ख़ुद पर हिंसा को न्योता देते हैं। हम ख़ुद के साथ हिंसा की संभावना को स्वीकार करते हुए या बात बोलते हैं। यहीं पर पहचान छिपाने या जताने की राजनीति काम करती है।

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जैसे मैं भंगी हूं अगर अपनी जाति छिपाकर रहना चाहती हूं तो वह मेरे बचाव के लिए है। जैसे अगर मैं अपनी गाड़ी पर भंगी लिख दूं तो पहली बात मेरे गाड़ी के शीशे टूट जाएंगे, उस पर पत्थर फेंके जाएंगे, कीचड़ फेंकेंगे।

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फेमिनिज़म इन इंडिया : आप अपनी किताब में टीना डाबी का ज़िक्र करते हुए इस बारे में बताती हैं कि कैसे सवर्ण समुदाय या ऊंची जाति के लोग एक उस दलित का उदाहरण बार-बार देते हैं जो ठीकठाक अमीर है, जिसके पास ढंग की नौकरी है यह बताने के लिए कि अब दलित शोषित नहीं हैं। जिस तरह से ऐसे लोग व्यवस्थित शोषण को नजरअंदाज करते हैं इसे आप उनके घमंड की तरह देखती हैं या चालाकी के प्रोपगेंडा की तरह?

यशिका दत्त : देखिए किसी के दिमाग में क्या चलता है वह मैं बोलना नहीं चाहूंगी। मैं जर्नलिस्ट हूं, हम इस बात को समझते हैं कि कौन क्या सोचकर क्या बर्ताव कर रहा है लेकिन हमें उसे लेकर कोई धारणा नहीं बनानी चाहिए। एक जर्नलिस्ट के रूप में मैं यह मानती हूं कि जब तक मुझसे कोई इंसान कोई बात सामने से ना बोले, मैं इस बात की धारणा नहीं रखना चाहती हूं कि उसके दिमाग में क्या चल रहा है पर इतना जरूर है कि यह जो व्यवस्थित विशेषाधिकार उनके पास हैं इससे उनको फायदा खूब होता है और उन्हें इस फायदे के बारे में अच्छी तरह से मालूम भी है। वह गरीब ब्राह्मण जरूर हो सकते हैं लेकिन उन्हें मालूम है कि कोई उनके साथ वैसा भेदभाव नहीं करेगा जैसा एक भंगी के साथ होता है। प्रिविलेज़ का मतलब यह नहीं होता है कि आपने अपने जीवन में कभी दुख नहीं देखे हो या पैसे की परेशानी ना देखी हो। प्रिविलेज़ का मतलब यह होता है कि जब आप कोई काम करने निकलेंगे तो आपको उसमें परेशानियां या रुकावटे नहीं मिलेंगी क्योंकि आप एक ऊंची जाति से हो। जैसे आप अगर ब्राह्मण हो और आप कहीं जाते हो तो आपको उस डिपार्टमेंट में 50 ऐसे ब्राह्मण मिलेंगे जो आपको आगे खींच सकते हैं। जो आपका साथ देंगे, जो आपसे कहेंगे “अरे शर्मा जी आइए बैठिए” जो आपकी इज्जत करेंगे। आप गरीब ब्राह्मण होंगे लेकिन फिर भी आपको यह इज्जत मिलेगी, आप फिर भी ‘शर्मा जी’ ही रहेंगे। लेकिन जो अमीर टीना डाबी है या जो अमीर निचली जाति के लोग हैं उन्हें इज्ज़त तो भूल जाइए बराबरी भी नहीं मिलेगी। मैं शुक्रगुज़ार हूं आपका कि आपने जिस तरह से सवाल फ़्रेम किया है वह यह नहीं है कि “आप इस बारे में क्या बोलना चाहेंगी कि समाज में कुछ दलित ठीकठाक पैसे भी कमाते हैं” बल्कि आप मुझसे यह पूछ रही हैं कि जब सवर्ण समुदाय जाति व्यवस्था को नजरअंदाज करता है, तो उसका क्या कारण है, इसके लिए बधाई।

दूसरी बात, व्यवस्थागत भेदभाव को जब नज़रअंदाज़ किया जाता है तो वह चालाकी भी है और कई बार यह भी है कि उन्हें पता नहीं है। काफी जो युवा सवर्ण हैं, जो स्कूल-कॉलेज के लोग हैं, मैं धारणा नहीं बनाना चाहती पर ये मेरा अनुभव रहा है। मैंने कई इंटरव्यू में इस बारे में बात भी की है, उन्हें यही नहीं पता कि ऐसा कुछ समाज में है भी, जो दिखता है वही बिकता है। वह आपको कहेंगे तुम अमीर तो हो तुम्हें क्या दिक्कत है, तुम पैसे कमा तो रहे हो, वह उदाहरण देंगे कि हम एक गरीब ब्राह्मण को जानते हैं वह तो नहीं है आईएएस ऑफिसर, तुम तो बन गए आईएएस ऑफिसर। इसलिए वह गरीब ब्राह्मण तुमसे ज्यादा शोषित है। उनके लिए भेदभाव या शोषण सिर्फ आर्थिक रूप में मौजूद होता है। वह यह नहीं देख पाते कि आर्थिक क्षमता नतीजा है सामाजिक विशेषाधिकार का, सांस्कृतिक और जाति के विषेषाधिकार का। सालों से, सदियों से परंपरा चलती आ रही है भूमि अधिग्रहण की। मैं टीना डाबी को पर्सनली तो नहीं जानती लेकिन उनके परिवार ने यह देखा होगा क्योंकि आज़ादी के पहले दलितों को जमीन रखने की इजाज़त नहीं थी। दलितों को ज़मीन पर मालिकाना हक़ से बाहर रखा जाता था। ऊंची जाति वालों के पास, जमींदारों के पास जो सदियों से घर हैं वह हमारे लिए कभी विकल्प ही नहीं थे। सदियों से उनके पास शिक्षा है, वह पढ़े-लिखे हैं, दलितों के पास पढ़ाई-लिखाई अब जाकर आई है।

हमें तो कहा जाता था कि तुम किताबें छुओगे तो किताबें गंदी हो जाएंगी। आप मेरी बात समझ रहे हैं ना। इस भेदभाव को ना देखना घमंड भी कहा जा सकता है, चालाकी भी कही जा सकती है लेकिन मुद्दा ये है कि ऐसा होता रहा है लेकिन फिर आप देखिए कि आरक्षण पर जिस तरीके से उन्होंने मुद्दे को घुमाया, वह कभी यह नहीं बताते हैं कि आरक्षण क्यों लाया गया था या अभी भी आरक्षण क्यों जरूरी है, उन्होंने बस यह कहा कि आरक्षण की जरूरत नहीं है तो मुद्दे को घुमाकर उसका नैरेटिव बदलना चालाकी है। सवर्ण समुदाय पर बात करते हुए यहां मानना होगा कि मीडिया की बहुत हद तक ज़िम्मेदारी दिखती है। जाति को लेकर जो विचार हमारे पास है वह हमारी मीडिया, फिल्म, संस्कृति ने ही बनाए हैं।

जब हम अपनी पहचान बताते हैं कि हम दलित हैं, तब हम हम ख़ुद पर हिंसा को न्योता देते हैं। हम ख़ुद के साथ हिंसा की संभावना को स्वीकार करते हुए या बात बोलते हैं। यहीं पर पहचान छिपाने या जताने की राजनीति काम करती है।

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फेमिनिज़म इन इंडिया : मेरा अगला सवाल मंडल कमीशन के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शनों को लेकर है। आप दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ी हैं। हमें मालूम है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में भी ऐसे प्रदर्शन हुए थे। मिरांडा हाउस की तब की स्टूडेंट यूनियन की प्रेसिडेंट ने ऑन रिकॉर्ड कहा था कि वह रिजर्वेशन के खिलाफ हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह एक राजनीतिक चाल है। मिरांडा हाउस जैसे कॉलेज से कई नारीवादी विचारक निकली हैं। मेरा सवाल ये है कि केवल महिलाओं का कोई स्पेस, एक महिला विद्यालय जो जेंडर को लेकर संवेदनशील होने की कोशिश में है, लेकिन जाति और उसके साथ आने वाले विशेषाधिकार और संघर्ष को नहीं कबूलना चाहती हो तो उसके नारीवाद की अवधारणा में क्या चूक रह जाती है?

यशिका दत्त : देखिए नारीवाद की अवधारणा भारत के संदर्भ में एक उच्च जातीय नारीवाद है, अभी तक तो कम से कम है। हमने नारीवाद के जो मुद्दे देखे हैं जो सॉलिडेरिटी देखी है उसमें निचली जाति की महिलाएं नहीं हैं। आप भवंरी देवी का उदाहरण देख लीजिए। मिरांडा हाउस की प्रेसिडेंट ऐसी अकेली नहीं हैं, एंटी-मंडल कमीशन में ऐसी कई नारीवादी थी जो यह कह रही थी कि वे आरक्षण के खिलाफ हैं क्योंकि वे जिन लड़कों से शादी करना चाहती हैं उन्हें आरक्षण के कारण नौकरी नहीं मिलेगी। उन्हें नौकरी नहीं मिलेगी तो उनकी शादी कैसे होगी, उनकी ज़िंदगी बर्बाद हो रही है। उनका यह लॉजिक पूरी तरह एंटी फेमिनिस्ट है। यह इतनी प्रॉब्लमैटिक बात है कि अगर हम इसे खोलने करने बैठेंगे तो पूरा समय इसी में निकल जाएगा। फेमिनिस्ट मूवमेंट में इंटरसेक्शनैलिटी (समावेशिता) की कमी बहुत ज्यादा है और यह कमी हमेशा से रही है। ‘फेमिनिज़म इन इंडिया’ जिसके लिए आप यह इंटरव्यू कर रही है, मैंने उनका काम देखा है मैं उनके फाउंडर को जानती हूं, मैंने देखा है कि आपकी कोशिश रही है कि आप दलित, आदिवासी, ग्रामीण नज़रिये को शामिल करें, बाकी जो अपर कास्ट फेमिनिस्ट डिसकोर्स रहा है वह तो दलित फेमिनिस्ट को शामिल करता ही नहीं है। बल्कि वह यह बोलता है कि आप दलित महिला हैं तो एक तरह से आपको ज्यादा आजादी मिली है सवर्ण महिलाओं की तुलना में क्योंकि सवर्ण महिला घर पर रहती है और आपको तो कम से कम बाहर जाने का मौका मिलता है। उनकी फ्रेमिंग इतनी संकीर्ण है कि वह यह बात नहीं कर पाए कि दलित महिला अगर बाहर काम करने जा रही है तो उनके साथ कितना भेदभाव हो रहा है। उनकी जाति को लेकर उनके साथ भेदभाव हो रहा है, उनके साथ यौन हिंसा हो रही है।

जो हाथरस में केस हुआ था वह भी कार्यस्थल पर यौन हिंसा का केस था क्योंकि जो दलित पीड़िता थी उसे यह जानते हुए वहां काम करना पड़ा कि उसके आसपास जो ऊंची जाति के पुरुष हैं वह उसका यौन उत्पीड़न करना चाहते हैं पर उसके पास कोई विकल्प नहीं था। ऊंची जाति से आने वाले नारीवादी समावेशी नारीवाद को मानते ही नहीं, यह कहते हैं कि अगर कहीं किसी महिला का रेप हुआ है, कोई यौन हिंसा हुई है तो उसमें जाति की कोई बात ही नहीं है। जैसे हाथरस में हुआ था। यह अच्छा हुआ कि यह बात बाहर आई कि उसमें एक दलित महिला थी और अगर उसके साथ शोषण हो रहा है तो उसमें उसका जाति मौजूद थी। सवर्ण नारीवादी ने तो इसे एक ऑल विमेन ईशु (सभी महिलाओं की समस्या) बना कर दिखाया था। जैसे कि हम अमेरिका में देखते हैं कि बोला जाता है “ब्लैक लाइव्स मैटर” फिर कुछ लोग कहते हैं “ऑल लाइव्स मैटर” वो रेसिजम की समस्या को नहीं समझते। उसी तरह भारत में सवर्ण नारीवादी कहती हैं कि आप क्यों कहती हैं कि यह दलित औरतों का मुद्दा है, आप इसे सारी औरतों का मुद्दा कहिए। इंटरसेक्शनैलिटी के लिए मूवमेंट में दलितों का नज़रिया शामिल होना बहुत ज्यादा ज़रूरी है।

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तस्वीर साभार : Wire

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