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बीते मंगलवार को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानि सीबीएसई ने कोरोना महामारी की गंभीरता और विद्यार्थियों को उससे होने वाले ख़तरे को मद्देनज़र रखते हुए बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा रद्द कर दी। साथ ही यह भी कहा गया कि कोई माकूल तरीका निकालकर इन विद्यार्थियों का रिज़ल्ट तैयार किया जाएगा। इस खबर के बाहर आने के साथ ही सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गईं। कुछ लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया तो वहीं, बड़ी तादाद में लोगों ने इस फ़ैसले को अपरिपक्व और बेवकूफ़ाना करार दिया। खै़र, ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। पिछले साल जब कोरोना वायरस की पहली लहर के कारण स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को बंद करना पड़ा था और विद्यार्थियों को बिना परीक्षा के प्रमोट करने का फैसला लिया गया था, तब भी न सिर्फ आम लोगों बल्कि यूनिवर्सिटी के जाने-माने प्रोफ़ेसर्स और शिक्षाविदों की तरफ़ से भी भारी चिंता ज़ाहिर की गई थी। सवाल यह था कि बिना परीक्षा और ग्रेडिंग के भला कैसी तालीम?

यह सवाल बेहद दिलचस्प है। खैर, यह सवाल करना इन लोगों की गलती नहीं है, यह सालों से बोये गए एक निहायती ज़हरीले बीज के फल हैं जिनका स्वाद हमें अब महामारी के दौरान चखने को मिला है। यह फल असल में कितने ज़हरीले हैं इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब पूरा हिंदुस्तान कोरोना वायरस की दूसरी लहर की तबाही का सामना कर रहा था, हमारे मुल्क की कई जानी-मानी यूनिवर्सिटीज़ अपने विद्यार्थियों की परीक्षाएं ले रही थीं। असल में हमारी शिक्षा व्यवस्था परीक्षाओं, नंबरों और ग्रेडिंग को सबसे अधिक महत्व देती है।

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शिक्षा की समझ तो यही कहती है कि वह अपने आप में एक अंत है, नौकरी, परीक्षा, ग्रेडिंग से परे उसकी अपनी अहमियत है। शिक्षा वह है जिसे हासिल करने वाला इंसान ज़िन्दगी में आनेवाली चुनौतियों से बेहतरी से निपट सके, बेहतर से बेहतरीन इंसान बन सके और समाज में चल रही समस्याओं के समाधान खोज सके। लेकिन यहां तो उल्टी गंगा बह रही है। परीक्षाएं और नंबर, जो शिक्षा हासिल करने के माध्यम मात्र होने चाहिए, वे अब अपने आप में अंत बन गए हैं इस हद तक बन गए हैं कि अब विद्यार्थियों के सीखने या न सीखने से कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है तो सिर्फ उसके ऊपर लगे ग्रेड के टैग से। क्या कभी किसी ने सोचा है कि असल में यह कितना अपमानजनक है कि हम जिंदा इंसानों पर ‘ए’, ‘बी’, ‘सी’, ‘एफ़’ जैसे लेबल लगाते हैं। यह मात्र कुछ अक्षर या नंबर नहीं होते, इनकी एक अपनी अलग दुनिया होती है जहां इंसान होने की अहमियत इससे तय की जाती है कि किस पर ग्रेड्स का कितना भारी लेबल लगा है।

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जब पूरा हिंदुस्तान कोरोना वायरस की दूसरी लहर की तबाही का सामना कर रहा था, हमारे मुल्क की कई जानी-मानी यूनिवर्सिटीज़ अपने विद्यार्थियों की परीक्षाएं ले रहीं थी। असल में हमारी शिक्षा व्यवस्था परीक्षाओं, नंबपों और ग्रेडिंग को सबसे अधिक महत्व देती है। 

मुझे आज भी याद है जब मैं स्कूल में थी, मेरे शहर की सारी मुख्य सड़कों पर बड़े-बड़े पोस्टर लगे होते थे। उन विद्यार्थियों के जिन्होंने बोर्ड की परीक्षाओं में नब्बे से सौ प्रतिशत तक अंक हासिल किए होते थे। आज जब मैं पीछे जाकर सोचती हूं कि उस समय जो बच्चे पचास प्रतिशत अंक लाकर जैसे-तैसे बस उस इम्तिहान के जाल से निकल जाया करते थे। उन्हें और उनके परिवारों को यह पोस्टर देखकर कैसा महसूस होता होगा। नंबरों और ग्रेड्स का जुनून आज यहां तक तय करता है कि समाज किस इंसान और किस परिवार को कितनी अहमियत देगा। जो लेबल्स विद्यार्थियों के माथे पर दिन-रात, सालों-साल चिपकाये जाते हैं वे सिर्फ कुछ अक्षर या अंक नहीं हैं, वे हैं ‘स्टेटस सिंबल।’ मुझे ताज्जुब होता है यह देखकर कि मुल्क के बड़े-बड़े विश्वविद्यालय जो बराबरी की बातें करते नहीं थकते वहां के प्रोफेसर्स भी ग्रेडिंग को लेकर कितने गंभीर होते हैं। मैंने अक्सर उन्हें ‘एकेडेमिक एक्सीलेंस’ यानि अकादमिक श्रेष्ठता की बातें करते सुना है लेकिन कभी तो उनसे भी पूछा जाना चाहिए कि आप यह ‘श्रेष्ठता’ तय कैसे करते हैं? इसी से न कि इम्तिहान में आपके किस विद्यार्थी ने ‘अंग्रेज़ी’ में कितनी ‘खूबसूरती’ से लिखा है? इसी से न कि उसके टर्म पेपर में कितने ‘अनैलिटिकल’ और ‘ऑरिजिनल’ विचार थे? साथ ही इस से भी कि वह क्लास में होनेवाली चर्चाओं में कितना शामिल होता है? अगर यही सब छात्रों को लेबल देने के पैमाने हैं तो धत्त! आपकी ‘श्रेष्ठता’ तो जातीय और वर्गीय ग़ैरबराबरी के कंधे पर सवार होकर आती है।

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किसकी अंग्रेज़ी बेहतर होगी, किसकी लेखनी अच्छी होगी, कौन आत्मविश्वास के साथ बोल पाएगा। ये सब तो आज भी हमारी जाति, हमारा जेंडर और आर्थिक वर्ग तय करते हैं। आज हालत ये है कि कक्षा में फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोल रहे, इलीट स्कूलों और कॉलेजों से पढ़-लिखकर आए लोगों को, बड़े-बड़े अक्षरों में उनके ग्रेड और नंबर देखकर गांव-देहात से पढ़कर आया इंसान कांपने लगता है। जिन लोगों के आत्मविश्वास पर सदियों से चोट की गई हो उसके आत्मविश्वास पर ग्रेडिंग की जा सकती है क्या? जिन औरतों को कभी घरों में मुंह खोलने का या अपनी ओर से कुछ सोचने तक का मौका नहीं दिया गया, उसके लिखे हुए में एकदम ‘ऑरिजिनल’ खोजने की कोशिश करेंगे तो निराशा ही हाथ लगेगी। अलग-अलग बिंदुओं से शुरू करने वाले लोगों को एक ही पैमाने पर नापने का जो ‘सिस्टम’ है यह निहायती अमानवीय और क्रूर है। जब यह मांग की जाती है कि एक विद्यार्थी को सब पहले से ही पता होना चाहिए तो शिक्षा व्यवस्था की भूमिका क्या रह जाएगी। असल में यह ‘ए’, ‘बी’, ‘सी’ ‘डी’ जैसे ग्रेड्स दिखाते क्या हैं? कुछ भी नहीं, सिवाय यथास्थिति के। यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिए कि क्या इंसानों को ग्रेड किया जा सकता है? 

आज जब कोरोना वायरस महामारी के चलते पूरी शिक्षा व्यवस्था के अस्तित्व पर ही प्रश्नवाचक चिन्ह लग गया है, ऐसे में बेहद ज़रूरी है कि सालों से चली आ रही ग़ैरबराबरी से ग्रसित इस शिक्षा व्यवस्था को ही उखाड़ फेंका जाए। पूंजीवाद के भीतर पनप रही इस शिक्षा व्यवस्था ने मुकाबले को इतना महत्त्वपूर्ण बना दिया है कि आज एक इंसान दूसरे इंसान के सामने आकर खड़ा हो गया है। हालांकि शिक्षा की सही समझ तो यही कहती है कि शिक्षा हासिल करना एक सामूहिक प्रक्रिया है, जिसमें लोग एक दूसरे का सहयोग करके सीखते हैं। लेकिन यहां तो बाज़ार-ए-तालीम के हालात ये हैं कि लोग एक दूसरे को अपना दुश्मन समझते हैं। एक अंग्रेजी का शब्द है, ‘कट-थ्रोट कॉम्पीटीशन,’ यह स्कूली शिक्षा से लेकर यूनिवर्सिटी और फिर इंसान की पूरी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया है लेकिन याद करें कि यह तो शिक्षा के उद्द्देश्य के बिलकुल विपरीत है।

आज लोग एक दौड़ में हैं, जिसका अंत कोई शायद कुछ भी नहीं है। अभी के दौर में इसका सबसे महत्त्वपूर्ण उदाहरण है कोरोना वायरस वैक्सीन को लेकर चल रही मारामारी। अमीर देशों की बड़ी-बड़ी कंपनियां दुनिया के ‘ग़रीब’ देशों के साथ वैक्सीन का फार्मूला साझा करने से इनकार कर रही हैं। जब इसका जवाब मांगा जाता है तो वही ‘इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स’ और ‘स्टैंडर्ड्स’ का रोना। असल में तो ज्ञान पर कुछ लोगों का एकाधिकार है और वह भी इस घमंड के साथ कि दुनिया अगर खत्म होती है तो बेशक हो लेकिन इनका आधिपत्य नहीं टूटना चाहिए। अगर इन सब की जड़ में झांककर देखा जाएगा न तो यही मिलेगा कि हमारी शिक्षा व्यवस्था हमेशा से बेहद असंवेदनशील रही है। अगर संकट की इस घड़ी में भी यह नहीं सोचा गया, तो मुझे डर है कि न तो हम आगे आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लायक भी नहीं बचेंगे आने वाली पीढ़ियां अपने सवालों के जवाब मांगेंगी सो अलग। जितना जल्दी निज़ाम-ए-तालीम की सनक खत्म हो, उतना इंसानियत के लिए बेहतर होगा।

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तस्वीर साभार : Yahoo

Khushbu Sharma is a Masters student of Political Science at the Centre For Political Studies, JNU. She is a reading enthusiast and enjoys writing on various contemporary issues like Gender, Politics, Education, Popular Movements and Caste-based Exclusion. A strong supporter of Rights of Oppressed Sections including Women, Minorities, Backward Castes, Sexual minorities, she has been raising her voice for democracy and socialism through her writings. She has completed her graduation in Chemical Sciences from Central University of Rajasthan and was awarded Inspire Scholarship by the Department of Science and Technology, Government of India in 2014.

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