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‘एक साथ सब मुर्दे बोले, सब कुछ चंगा-चंगा’

साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा
ख़त्म हुए शमशान तुम्हारे, ख़त्म काष्ठ की बोरी

थके हमारे कंधे सारे, आंखें रह गई कोरी
दर-दर जाकर यमदूत खेले

मौत का नाच बेढ़ंगा
‘साहेब तुम्हारे रामराज में शव-वाहिनी गंगा’

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ये कवितांश है लेकिन आप में से अधिकांश लोगों ने ‘शव-वाहिनी गंगा’ यह कविता की चर्चा ज़रूर सोशल मीडिया पर हाल के कुछ दिनों में देखी होगी। गुजराती कवयित्री पारुल खाखर की कविता ‘शव-वाहिनी गंगा’ कविता का ये हिंदी अनुवाद किया है इलियास शेख़ ने। यह कविता 11 मई को पारुल खाखर ने अपने फेसबुक हैंडल से शेयर की और दो दिनों के अंदर वायरल हो गई जिसका अनुवाद फिर आसामी, हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, भोजपुरी, मलयालम और बंगाली भाषा में हुआ। उन्होंने यह कविता कोरोना वायरस की दूसरी लहर के दौरान उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ ज़िलों में गंगा में उतराती लाशों पर लिखी गई है। कविता के वायरल होने के बाद पारुल को इस पोस्ट पर हज़ारों गालियां दी गईं, भद्दी महिला-विरोधी टिप्पणियां की गईं। उनकी इस कविता को बुरी तरह ट्रोल किया गया। इसके बाद पारुल ने अपना पब्लिक हैंडल लॉक कर लिया लेकिन द वायर के अनुसार उनके कुछ दोस्तों का कहना है कि कविता अभी भी उनकी फेसबुक वॉल पर है और रहेगी जिसके लिए वह एकदम दृढ़ हैं।

पारुल खाखर की यह कविता एक तरह से उनकी पहली प्रोटेस्ट पोएट्री है। वह हमेशा से भगवान कृष्ण, राधा पर भजन लिखती रही हैं और वह अपनी भक्ति कविताओं के लिए प्रसिद्ध हैं। लेकिन हाल ही में जून के अपने संपादकीय संपादकीय में गुजराती साहित्य अकादमी के चेयरपर्सन विष्णु पंड्या ने अपने लेख में कविता का बिना नाम लिए ‘अराजक’ शब्द का इस्तेमाल किया है। उन्होंने इस कविता के लिए ‘साहित्यिक नक्सली’ शब्द का भी इस्तेमाल किया और कविता को प्रसारित करने वाले लोग ‘साहित्यिक नक्सली’ हैं और इस कविता का उन लोगों द्वारा गलत इस्तेमाल किया गया है जो केंद्र और उसकी राष्ट्रवादी विचारधारा के खिलाफ़ हैं।

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इस पूरे प्रकरण में देखें तो पारुल खाखर ने जब तक ईश्वर पर, भक्ति पर, स्त्री के घरेलू जीवन पर कविताएं लिखीं तब तक उन्हें तमाम दक्षिणपंथी साहित्यकारों द्वारा, गुजराती साहित्य अकादमी द्वारा गुजराती कविता के क्षेत्र में एक बड़े नाम के रूप में सराहा जाता रहा। हालांकि पारुल की इस कविता में सत्ता की आलोचना के साथ-साथ इस बात का भी ज़िक्र है कि गंगा नदी जो इतनी पूजनीय है, तमाम रीति रिवाजों का केंद्र है उसमें कोविड-19 की दूसरी लहर से मारे गए लोगों की लाशें बह रही हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनके पास तमाम स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं थीं और सरकार ने कोविड-19 की दूसरी लहर से लड़ने के लिए कोई पुख्ता तैयारियां नहीं की थीं। यह कविता इस समय की ज़रूरत के हिसाब से कवियों द्वारा जनता के साथ खड़े होकर, शासन-प्रशासन की लापरवाही को दिखाती, विरोध करती नज़र आती है।

साहित्य किसी भी समाज का दर्पण और इतिहास दोनों होता है। लोग साहित्य के माध्यम से जनमानस की यथास्थिति में भावना, सामाजिक व्यवस्थाएं, आदि के बारे में जानते हैं और किसी भी विशेष समय में समाज के विभिन्न क्षेत्रों के इतिहास का मूल्यांकन करते हैं। इसीलिए पारुल खाखर की यह कविता जब भी आगे चलकर लोग पढ़ेंगे तो जानेंगे कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में कोविड-19 जैसी भयंकर महामारी से मारे गए लोगों के शव गंगा में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी की वजह से तैर रहे थे। जब जनता को स्वास्थ्य सुविधाओं की ज़रूरत थी तह सत्तारूढ़ राजनीतिक दल चुनावी रैलियां कर रहा था, बुद्धिजीवियों को, सवाल उठानेवालों को जेलों में डाल रहा था, राम मंदिर के लिए चंदा इकट्ठा कर रहा था, वह बाकी सबकुछ कर रहा था लेकिन जिस जनता ने वोट देकर जिताया उसके लिए समय रहते कोई भी इंतजाम नहीं कर रहा था। महामारी में पूरी जनता को मरने के लिए छोड़ दिया था। जब आने वाले वक़्त में लोग यह कविता पढ़ेंगे तब वे ऐसी सत्ता के पक्ष में खड़े नहीं होंगे। सोचिए ऐसी कविताएं या लेख न लिखे जाएं सिर्फ सत्ता की तारीफें लिखी जाएं, अख़बारों को ‘शानदार रैली’ की हेडलाइंस से पोत दिया जाए, मरती जनता की ख़बरें कहीं भी न हो तब समाज किस ओर अग्रसर होगा? वह बेशक सच्चाई जाने बगैर जिधर को सत्ता, राजनीतिक दल उन्हें हांक लेंगे वे वहीं के हो जाएंगे।

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गुजराती साहित्य अकादमी के चेयरपर्सन की लिखी बातें और पारुल की कविता का विरोध करते हुए ऐसी कविताओं को पढ़ने, प्रसारित करने वाले लोगों को ‘साहित्यिक नक्सली’ कहना ठीक वैसा है जब इस देश के आदिवासी अपने अधिकारों, ज़मीन को बचाते हैं तब नक्सली कहकर उनके लिए बाकी लोगों में इतनी संवेदनहीनता भर दी जाती है कि लोगों को आदिवासियों के साथ होनेवाली हिंसा का दुख नहीं होता, वे उनके लिए आवाज़ नहीं उठाते। अपने ऊपर हो रहे शोषण का विरोध करते दलितों, मुसलमानों, अल्पसंख्यकों को देशद्रोही कहकर, महीनों और कभी-कभी जीवन भर जेल में सड़ा दिया जाता है तब भी बाकी लोग इसका विरोध नहीं करते। इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। इसका मतलब ये समझा जा सकता है कि जब किसी भाषा की साहित्य अकादमी में शामिल साहित्यकार सत्ता का पक्ष लेते हुए विरोध के स्वर की कविताओं को पढ़ने, प्रसारित करने वाले लोगों को साहित्यिक नक्सली कह रहे हैं तब ऐसी कविताएं लिखनेवालों के साथ अगर हिंसा होती है तो वे भी चुप्पी साध लेंगे। इस दौर में जब जनता को अपना दुख कह सकने वाले, लेखकों की, साहित्यकारों की ज़रूरत थी तब गुजरात साहित्य अकदामी सत्ता के सामने घुटने टेके नज़र आई।

अपने ही देश का उदाहरण लेते हैं जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधीू ने इमरजेंसी लगाई, मीडिया, प्रेस पर लिखने, बोलने की पाबंदी लगाई तब साहित्य वह ज़रिया बना जिससे लोगों को 1970 के दशक के बारे में पता चला। तब कवि भवानी प्रसाद मिश्र ने “त्रिकाल संध्या” नाम से काव्य संग्रह में आपातकाल के विरोध में कविताएं लिखीं, साहित्यकार धरमवीर भारती ने “मुनादी” नाम से कविता लिखी, फणीश्वरनाथ रेणु ने जेपी आंदोलन में सहभागिता की और रचनाएं लिखीं। ये सभी नाम साहित्य में बहुत अहम जगह रखते हैं। वहीं, सोचिए आपातकाल की स्थिति का ज़िक्र कोई नहीं करता और बात होती सिर्फ फूलों की, प्रेम की, तारों भरी रात की, गंगा के घाट की तब क्या हम ये सवाल साहित्यकारों से नहीं करते कि उन्होंने उस दौर को अपनी लेखनी में जगह क्यों नहीं दी? उन्होंने लोगों की कैद के बारे में क्यों नहीं लिखा? हम बेशक ये सवाल करते लेकिन उस वक़्त के कई साहित्यकारों ने आपातकाल के विरोध में लिखा और हम आज उनका नाम गर्व से लेते हैं और जन लेखक, जनकवि कहते हैं। वे साहित्यकार जो इस समय जनता के मुद्दों पर मुखर नहीं हैं, लिख नहीं रहे हैं, लाशों के ढेर जिन्हें परेशान नहीं कर रहे हैं। वे प्रेम तो लिख रहे हैं लेकिन प्रेम करने  पर हत्याओं के बारे में नहीं लिख रहे हैं। वे खुद को चाहे इसी जनता के प्रति जो इन्हें पढ़ती है जवाबदेह ना समझते हो लेकिन आने वाली पीढ़ियां उनकी रचनाओं को कभी गर्व से याद नहीं करेंगी।

बस्तर में आदिवासी लगातार संघर्ष कर रहे हैं, बेगुनाहों को नक्सली बताकर मार दिया जा रहा है। किसान आंदोलन महीनों से चल रहा है, दलितों, मुसलमानों के साथ आए दिन हिंसा हो रही है लेकिन साहित्यिक वर्ग का एक बड़ा हिस्सा आज सत्ता की तरफ से बोल और लिख रहा है। जनलेखन के साथ समझौता कर लिया गया है। उदाहरण के तौर पर तमाम सवर्ण वर्ग से आते साहित्यकारों ने जाति को कभी अहम मुद्दा नहीं माना और अपनी लेखनी में जगह नहीं दी इसीलिए दलित साहित्यकार और पाठक उनके हमेशा से आलोचक रहे हैं, संदेह की नज़र से देखते हैं जो कि अपनी जगह एकदम सही भी है। बहरहाल सामान्य बड़े स्तर पर जनता के मुद्दों को जिन भी लेखकों, लेखिकाओं ने लिखा उनकी शाख कम नहीं हुई, वे लंबे वक़्त तक याद किए जाते रहे हैं, आंदोलनों में याद किए जाते हैं। हम जनमानस की भी ये ज़िम्मेदारी है कि हम उस लेखन को तरजीह दें जो हमारे मुद्दों पर लिखा जाता है, जिसका हमारे जीवन की हर स्थिति से लेना-देना है चाहे महामारी हो, रोज़गार हो, नरसंहार हो या प्रेम हो। इसीलिए जब दक्षिणपंथी साहित्यकार आज पारुल खाखर की कविता का विरोध कर रहे हैं, उन्हें गालियां दी जा रही हैं तब हमें एक अच्छे पाठक के नाते उनके साथ खड़े होने की जरूरत है ताकि उन्हें भी यह महसूस हो कि उन्होंने जिनकी बात कही है वे भी यही चाहते हैं कि पारुल मुद्दों का साहित्य लिखती रहें, तमाम नामी गिरामी साहित्यकार उन्हें सराहे या नहीं लेकिन उनके पाठक उन्हें सराहते हैं।

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