समाजराजनीति कोविड-19 की दूसरी लहर के बीच राजनीतिक बंदियों की रिहाई क्यों एक अहम मुद्दा है

कोविड-19 की दूसरी लहर के बीच राजनीतिक बंदियों की रिहाई क्यों एक अहम मुद्दा है

बीती 9 मई को महावीर नरवाल ने अपनी आखिरी सांस ली। वह कोरोना वायरस से संक्रमित थे। जेल में बंद छात्र और पिजड़ा तोड़ की एक्टिविस्ट नताशा नरवाल ने अपने बीमार पिता से मिलने के लिए अर्ज़ी दाखिल की थी, जिस पर सोमवार को सुनवाई होनी थी। जब नताशा के पिता ने अपनी आखिरी सांसें लीं तो अदालत ने नताशा को अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए तीन हफ्ते की अंतरिम ज़मानत दी। अपने एक इंटरव्यू में महावीर नरवाल ने यह अंदेशा जताया था कि उनकी उम्र ढल रही है, अगर नताशा लंबे समय तक जेल में रहीं तो हो सकता है वह उनसे मिल भी न पाए। इन शब्दों के ज़रिये महावीर नरवाल उसी डर की संभावना जता रहे थे जिसका सामना आज नताशा कर रही हैं। 

नताशा का नाम उन राजनीतिक बंदियों में शामिल है जो इस सत्ता के दमनकारी रवैये के कारण कोविड-19 महामारी के दौरान भी अपने परिवारवालों से अलग हैं। बीते साल मई के में नताशा नरवाल और देवांगना कलिता को फरवरी में हुए दिल्ली दंगों के सिलसिले में गिरफ़्तार किया गया था। उन पर आईपीसी की अलग-अलग धाराओं के तहत दंगे करने, गैर-कानूनी रूप से इकट्ठा होने, हत्या की कोशिश के साथ-साथ यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। इन एक्टिविस्टों को जेल में कैद हुए लगभग एक साल होने को आया है। इस बीच नताशा ने अपने पिता को खो दिया। नताशा के पिता की मौत सिर्फ कोरोना से हर रोज़ हो रही मौत में शामिल नहीं है। कोरोना से जिनकी मौत हो रही वे सरकार की लापरवाही, असंवेदनशीलता, क्रूरता के शिकार तो हैं, लेकिन महावीर नरवाल जैसे कई अन्य राजनीतिक बंदियों के परिवारवाले सरकार की क्रूरता और कोराना वायरस की दोहरी मार झेल रहे हैं।

भारत में कोरोना महामारी की दूसरी लहर एक प्रलय के रूप में हमारे सामने है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक तो हर दिन चंद हज़ार लोगों की मौत हो रही है लेकिन अलग-अलग राज्यों से आती रिपोर्ट्स, यूपी-बिहार में नदियों की रेत में दफ्न लाशें कुछ और तस्वीर पेश कर रही हैं। यह वायरस भारत की जेलों में भी तेज़ी से फैला है। इस स्थिति में जब दूसरे देश कैदियों को रिहा करने जैसे कदम उठा रहे हैं। वहीं, भारत में सामान्य कैदियों की बात तो दूर, राजनीतिक कैदियों को उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है। इस महामारी के कारण न सिर्फ नताशा नरवाल बल्कि सुधा भारद्वाज, हैनी बाबू, जीएन साईंबाबा, उमर खालिद, देवांगना कलिता, सिद्दिकी कप्पन, आनंद तेलतुम्बडे, स्टैन स्वामी, मीरान हैदर, खालिद सैफ़ी, गौतम नवलखा जैसे कई राजनीतिक बंदी इस वक्त जेल में ही हैं। इनमें से अधिकतर राजनीतिक बंदी नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ हुए प्रदर्शन, दिल्ली दंगों और भीमा कोरेगांव से संबंधित मामलों के तहत कैद हैं। इस दौरान कई हैनी बाबू, उमर खालिद समेत कई राजनीतिक बंदी कोरोना से संक्रमित हुए। इसमें से अधिकतर लोग तो उम्रदराज़ हैं और पहले से ही अलग-अलग बीमारियों से जूझ रहे थे लेकिन इन्हें ज़मानत मिलना तो दूर, सामान्य स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। 

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अगर हम परिभाषा पर जाएं तो हर वह कैदी राजनीतिक बंदी है जिसे उसके राजनीतिक विचार या काम के लिए जेल में बंद किया गया है। मौजूदा सत्ता की डिक्शनरी में अभिव्यक्ति, आलोचना आदि की जगह शुरू से ही नहीं रही। ऐसे में जेल में बंद राजनीतिक कैदियों की संख्या कितनी है इसका अंदाज़ा लगाना एक मुश्किल काम है।

हैनी बाबू दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हैं, उन्हें भी भीमा कोरेगांव से जुड़े मामले में बीते साल जुलाई में गिरफ्तार किया गया था। याद दिला दें कि जुलाई वह वक्त था जब भारत कोविड-19 की पहली लहर का सामना कर रहा था। गिरफ्तारी के बाद उन्हें मुंबई के तलोजा जेल में रखा गया।  हाल ही में वह भी कोरोना संक्रमित पाए गए। हालत बिगड़ने पर उन्हें मुंबई जेजे अस्पताल शिफ्ट किया गया। ऐसा उनकी पत्नी और वकील द्वारा लगातार की गई अपील पर किया गया। उनकी पत्नी जेनी द्वारा जारी किए गए एक बयान के मुताबिक 3 मई को हैनी बाबू की आंख में गंभीर इन्फेक्शन हो गया जिससे उनकी देखने की क्षमता भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। उन्होंने जेल प्रशासन से इलाज की गुहार लगाई थी पर उन्हें समय पर इलाज नहीं मिला। बाद में वकीलों द्वारा लिखे गए मेल के बाद उन्हें इलाज के लिए ले जाया गया। डॉक्टर से परामर्श लेकर लौटे हैनी बाबू की तबीयत में कोई सुधार नहीं आया और उनकी स्थिति गंभीर होती गई। उनकी वकील पायोशी रॉय की तमाम कोशिशों के बाद जाकर 12 मई को हैनी बाबू को अस्पताल में भर्ती किया गया।

भीमा कोरेगांव से ही संबंधित मामलों में साल 2018 में गिरफ्तार हुईं 60 वर्षीय सुधा भारद्वाज की बेटी ने भी उनके स्वास्थ्य की स्थिति का हवाला देते हुए उनकी अंतरिम ज़मानत के लिए याचिका दाखिल की है। वेबसाइट लाइव लॉ के मुताबिक सुधा भारद्वाज हाईपरटेंशन, डायबटीज़, हृदय रोग जैसी बीमारियों से ग्रसित हैं। याचिका में कहा गया है कि जिस बैरक में सुधा को रखा गया है उसमें 50-60 कैदी मौजूद हैं, और इन सभी कैदियों के लिए सिर्फ तीन बाथरूम ही हैं। ऐसी स्थिति में सोशल डिस्टेसिंग तो दूर बुनियादी साफ-सफाई भी मौजूद नहीं हैं। उन्हें बायकुला महिला जेल में रखा गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को सुधा भारद्वाज की मौजूदा मेडिकल रिपोर्ट सौंपने को कहा है। यह तो सिर्फ एक उदाहरण है जो भारत की भरी हुई जेलों की स्थिति को दर्शा रहा है।

बीते 15 मई को भीमा कोरेगांव मामले में बंद 15 राजनीतिक बंदियों के परिवारवालों ने एक ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस के ज़रिये कई गंभीर मुद्दे उठाए।  भीमा कोरेगांव के मामले में ही कैद स्टैन स्वामी की तबीयत के बारे में फादर ज़ोसेफ़ ज़ेवियर ने जानकारी दी कि 83 वर्षीय स्टैन स्वामी खांसी, बुखार और खराब पेट जैसी बीमारियों का सामना कर रहे हैं। उन्हें जेल में एंटीबायॉटिक्स दिए गए हैं लेकिन वह बेहद कमज़ोर महसूस कर रहे हैं। याद दिला दें कि स्टैन स्वामी पारकिंसन रोग से भी पीड़ित हैं। बीते साल उन्होंने अपने लिए एक स्ट्रॉ और सिपर की मांग रखी थी। एक 83 साल का बुज़ुर्ग जो कई तरह की बीमारियों का सामना कर रहा है, उसे स्ट्रॉ और सिपर तो दे दिया गया लेकिन इस महामारी के गंभीर दौर में उसकी रिहाई की उम्मीद दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही है। बीते साल ही उत्तर प्रदेश में राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किए गए पत्रकार सिद्दिकी कप्पन की तबीयत बिगड़ने पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उन्हें मथुरा से दिल्ली के एम्स अस्पताल लाया गया। सिद्दिकी कप्पन के परिवारवालों का आरोप है कि उन्हें बिना बताए गुप्त तरीके सिद्दिकी को वापस मथुरा जेल शिफ्ट कर दिया गया, जबकि उनका इलाज भी पूरा नहीं हुआ था।  

हम पहली लहर से जानलेवा दूसरी लहर के दौर में आ गए। राजनीतिक बंदी कोरोना से संक्रमित होने लगे हैं तो किसी कैदी का पिता अपनी बेटी से मिलने की उम्मीद के साथ चल बसा। यह दमन की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है।

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जिन मामलों की चर्चा हमने की वह तो सिर्फ चंद उदाहरण हैं। इन सभी मामलों में देखें तो हम पाएंगे की राजनीतिक बंदियों की स्थिति गंभीर होने, उनके परिवार के बार-बार गुहार लगाने पर ही उन्हें स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवाई गईं। जेल में बंद अपने बीमार परिजनों की खोज-खबर भी इन्हें कड़ी मशक्कत के बाद मिली। यहां तो हमने सिर्फ उन लोगों की बातें की जिनके मामले को थोड़ी-बहुत कवरेज नसीब होती है। लेकिन हमारे देश की जेलों में ऐसे राजनीतिक बंदियों की शायद ही कोई कमी हो। अगर हम परिभाषा पर जाएं तो हर वह कैदी राजनीतिक बंदी है जिसे उसके राजनीतिक विचार या काम के लिए जेल में बंद किया गया है। मौजूदा सत्ता की डिक्शनरी में अभिव्यक्ति, आलोचना आदि की जगह शुरू से ही नहीं रही। ऐसे में जेल में बंद राजनीतिक कैदियों की संख्या कितनी है इसका अंदाज़ा लगाना एक मुश्किल काम है।

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वहीं, कोविड-19 लॉकडाउन से पहले ही लॉकडाउन का सामना कर रहे कश्मीरी राजनीतिक बंदियों की ओर तो शायद ही किसी का ध्यान जाता है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद गिरफ्तार किए गए अभी भी कई लोग जेल में ही हैं। कोविड-19 की दूसरी लहर को देखते हुए यूसूफ़ तारिगामी समेत कश्मीर के कई नेताओं ने जेल में कैद कश्मीरी राजनीतिक बंदियों की रिहाई की अपील की है। वेबसाइट द फेडरल के मुताबिक, पिछले साल मार्च में गृह मंत्रालय ने राज्य सभा में बताया था कि अनुच्छेद 370 हटाने के बाद 7,375 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। साथ ही बताया गया कि गिरफ्तार किए गए 451 कैदियों के अलावा सबको रिहा कर दिया गया है। हालांकि कश्मीर में काम करने वाली संस्थान जम्मू-कश्मीर कोलिशन ऑफ सिविल सोसाइटी ने इन आंकड़ों पर आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि लगभग 1000 लोग अभी भी अलग-अलग जेलों में कैद हैं। बीते साल महामारी की पहली लहर के दौरान ही संयुक्त राष्ट्र ने कहा था कि इस महामारी के दौरान राजनीतिक कैदियों को सबसे पहले रिहा किया जाना चाहिए। वहीं पिछले साल 375 से अधिक स्कॉलर्स, लेखक, कवियों और एक्टिविस्ट्स ने महामारी की स्थिति को देखते हुए इन राजनीतिक कैदियों की रिहाई की मांग उठाई थी, लेकिन उस मांग का नतीजा क्या हुआ यह हम सबके सामने है।

हम पहली लहर से जानलेवा दूसरी लहर के दौर में आ गए। राजनीतिक बंदी कोरोना से संक्रमित होने लगे हैं तो किसी कैदी का पिता अपनी बेटी से मिलने की उम्मीद के साथ चल बसा। यह दमन की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है। वैसे हम राजनीतिक बंदियों की रिहाई की उम्मीद कैसे करें जब एक पोस्टर लगाने पर देश की राजधानी में लोगों को गिरफ्तार कर लिया जा रहा है। एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक 17 लोगों को दिल्ली पुलिस ने सिर्फ इसलिए गिरफ्तार किया क्योंकि उन्होंने पोस्टर लगाए थे जिसमें लिखा था, “मोदी जी, हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेश क्यों भेज दिया?” एक मासूम, सीधा सा सवाल था जो प्रधानमंत्री मोदी से जनता ने किया लेकिन जवाब की जगह उन्हें गिरफ्तारी का सामना करना पड़ा। यह घटना सरकार की उस आलोचना को और पुख्ता करती है जिसमें कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार लोगों को बचाने से अधिक ‘हेडलाइन मैनेजमेंट और अपनी छवि को पॉज़िटिव’ रखने में व्यस्त है। हर दिन जान गंवाती जनता का सवाल पूछना भी इस सरकार को अपने प्रिय प्रधानसेवक के ख़िलाफ़ एक षड्यंत्र नज़र आता है।  

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तस्वीर : फेमिनिज़म इन इंडिया

About the author(s)

Ritika is the Managing Editor at Feminism in India (Hindi). Ritika is an award-winning multimedia journalist with over five years of experience. She is a passionate advocate for social justice and gender rights, and has been awarded the prestigious UN Laadli Media Awards twice and Breakthrough Reframe Media Awards for her gender-sensitive writing and reporting. She is also a fellow of Rise Up (Youth Championship Initiative).

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