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इतिहास के वे सभी आंदोलन जो नस्लभेद, लिंगभेद के ख़िलाफ़ लड़े गए उनमें शोषित वर्ग लड़ाई के अगुवा रहे हैं। अपनी लड़ाइयां जब शोषित वर्ग लड़ता है तब भोगे हुए शोषण की आवाज़ साथ लड़ता है। उससे जुड़े क्या-क्या बदलाव उसे चाहिए उन्हें भी सोचकर लड़ता है। जिस तरीके से पश्चिमी देशों में नस्लभेद के ख़िलाफ़ लड़ाई जारी है, भारत में वही लड़ाई जाति विरोधी आंदोलन है। हालांकि, भारत में शोषक वर्ग (सवर्ण)  में एक समूह ऐसा भी है जो यह दिखाता है कि वह चाहता है कि जाति व्यवस्था और उससे जुड़े तमाम शोषण ख़त्म हो, इसीलिए जाति विरोधी आंदोलन में वह अपनी सहभागिता पूर्ण रूप से देखना चाहते हैं। लेकिन इस बीच वे अक्सर सवर्ण सेवियर कॉम्प्लेक्स से जूझते हैं यानि कि उन्हें लगता है जाति विरोधी आंदोलन में शामिल होकर, दलित,बहुजन,आदिवासी को दोस्त बनाकर, उनके साथ रहकर वे एहसान कर रहे हैं जिसके लिए उनकी कद्र, सम्मान होना चाहिए। साथ ही उन्हें इस नज़र से देखा जाना चाहिए कि उनका आंदोलन में शामिल होना एक तरह से उनका बड़प्पन है। आज हम ऐसे ही कुछ तरीकों की बात करेंगे जिससे आप इस सवर्ण सेवियर कॉम्प्लेक्स से ना जूझें और खुद के जाति विरोधी आंदोलन में शामिल होने को बहुत महान दृष्टि ना देखें।

1. सिर्फ आरक्षण का पक्षधर होना ही जाति-विरोधी होना नहीं है

आप अपने सवर्ण या दलित,बहुजन,आदिवासी स्पेस में ये बात बहुत विश्वास और ज़ोर से कहते हैं कि आप आरक्षण के पक्षधर हैं इसीलिए दलित बहुजन आदिवासी आपको अच्छी दृष्टि से देखते हैं लेकिन आरक्षण के पक्ष में खड़े होकर आपके सवर्ण दोस्त, घरवाले, अन्य साथी आपको बुरा भला कहते हैं। ऐसा कहे जाने का वर्णन आप बड़े दुखी होकर अन्य लोगों से साझा करते हैं, बता दें कि आरक्षण जो कि एक संवैधानिक अधिकार है, और आपका उसके पक्ष में खड़ा होना यह दिखाता है कि आप संविधान में विश्वास करते हैं जो कि एक सामान्य बात होनी चाहिए। जैसे किसी पंछी को पानी देना, किसी की मदद करना एक मानव चेतना से भरा बोध है। ठीक उसी प्रकार आरक्षण के पक्ष में होना संविधान में विश्वास करनेवाले नागरिक होने का बोध है। इसीलिए आरक्षण का समर्थन करना आपको प्रशंसा के योग्य नहीं बनाता, यह आपको जाति-विरोधी नहीं बनाता है।

2. अपने विशेषाधिकार को पहचानना

इस समाज में रहते हुए बहुत ऐसे विशेषाधिकार हैं जो पहचान से जुड़े हैं। वह पहचान जाति, लिंग, वर्ग किसी भी आधार पर हो सकती है। तथाकथित उच्च जाति से आने पर आपको कई विशेषाधिकार मिलते हैं। सम्मान मिलना उसका सबसे बड़ा विशेषाधिकार है इसके अलावा पूंजी, सत्ता जैसे विशेषाधिकार भी मिलते हैं यानि आप नहीं भी चाहेंगे तब भी आपके नाम, जाति भर के ज़िक्र से ही आपके बहुत काम बिना कुछ कहे हो जाएंगे। वहीं, दलित, बहुजन, आदिवासी अस्मिता से आने पर वही काम होने के मौके बहुत कम होते हैं। सम्मान की बजाय दलित बहुजन आदिवासी अस्मिता को गाली बना देना इस जाति व्यवस्था का क्रूर चेहरा है। एक सवर्ण होते हुए आप अपने विशेषाधिकार चाहते हुए भी नहीं छोड़ सकते लेकिन आप उन्हें पहचानते हुए न्यायिक रवैया ज़रूर अपना सकते हैं। इसीलिए जाति-विरोधी होने के लिए अपने विशेषाधिकार को छोड़ना या उसे पहचानते हुए समानता का भाव पैदा करना बहुत अहम है।

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3. जाति विरोधी आंदोलन में अस्मितावादी राजनीति का पक्षधर न होना

निजी अनुभवों से भी देखूं तो खासतौर से प्रगतिशील सवर्ण अस्मितावादी राजनीति के विरोध में खड़े नज़र आते हैं। जिनका पक्ष है कि बदलाव आदमी में हो सकता है इसीलिए एक सवर्ण भी जाति विरोधी आंदोलन का हिस्सा हो सकता है। यह ठीक है कि किसी भी व्यक्ति में बदलाव हो सकता है लेकिन जाति की वजह से जो विशेषाधिकार आपको मिले हैं, उसके बूते आपने कभी पहचान की वजह से गालियां नहीं खाई हैं, आपको पीटा या मारा नहीं गया है, पानी पीने से, घोड़ी पर चढ़ने से रोका नहीं गया है, हिंसा नहीं हुई है। इसीलिए यह बहुत ज़रूरी है कि जाति-विरोधी होने का दावा करते सवर्ण ये महसूस करें, स्वीकार करें कि जिन लोगों ने पहचान की वजह से सारा शोषण झेला है वही अपनी बात बेहतर तरीके से रख सकता है। इसीलिए आंदोलन को अस्मितावादी कहकर ख़ारिज करना और अपने तरीके से आंदोलन की रूपरेखा बताना एक तरह से आंदोलन को हाईजैक करने जैसे होगा। जिस आंदोलन में जिन शोषित लोगों की बात होनी चाहिए वे ही उस आंदोलन से गायब दिखेंगे तब वह आपकी सहभागिता नहीं बल्कि उदारता लगेगी जिससे आप ये सोचने लगेंगे कि सारा आंदोलन आपके बलबूते है और आपके बिना दलित,बहुजन,आदिवासी कुछ नहीं कर पाएंगे और यही भाव सवर्ण सेवियर कॉम्प्लेक्स है।

4. कार्यक्षेत्र में दलित, बहुजन व आदिवासी समुदाय का सुनिश्चित प्रतिनिधित्व 

जिस भी कार्यक्षेत्र में आप हो उनमें दलित,बहुजन,आदिवासी जिसमें महिलाएं भी शामिल हो, उनका प्रतिनिधित्व होना चाहिए। यह प्रतिनिधत्व सुनिश्चित करना कोई एहसान नहीं है ये भी जानना, समझना ज़रूरी है। ऐसा इसलिए क्योंकि पहला तो यह संवैधानिक है। दूसरा, यह पहचानना कि एक लंबे समय से हर जगह सवर्ण जातियों का आधिपत्य किसी और की जगह को खत्मकर, छीनकर रखा गया है, इसीलिए अगर आप जाति-विरोधी हैं, समानता के आधार पर सामाजिक व्यवस्था चाहते हैं तो फिर हर जगह समानता का पक्षधर होना होगा और ऐसा करना मूल मानवीय व्यवहार है न कि महान होने की कोई वजह। इसीलिए इस आधार पर आपकी प्रशंसा होना बिल्कुल गैर-ज़रूरी है।

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5. अपने निजी जीवन और समुदाय में बदलाव की पहल करना

किसी भी सवर्ण द्वारा किसी भी दलित,बहुजन,आदिवासी को उसकी बात सुने बगैर या कम सुने बगैर सिर्फ अपनी बात कहना, सिद्ध करना और मनवाना एक जातीय अहंकार है। जैसे यह कहा जाता है कि ब्राह्मण का काम ज्ञान देने का है। ठीक वैसे ही जब आप सवर्ण होते हुए किसी भी दलित,बहुजन,आदिवासी की बात नहीं सुनते बल्कि आपनी बात सर्वोपरि रखते हैं और तमाम कमियां गिनवाते हैं तब जब आपके पास तमाम विशेषाधिकार हैं तब ये आपकी जातीय श्रेष्ठता दिखाता है। इसीलिए किसी भी दलित,बहुजन,आदिवासी से ऐसा सब कहने या उम्मीद करने के बजाय अपने घर के लोगों की सोच बदलना, अपने समुदाय में विद्रोह करना ही आपको जाति विरोधी बनाएगा। जिस जगह से शोषण किया जा रहा है उस जगह को ध्वस्त करना। जाति विरोधी आंदोलन में पीछे खड़े रहना और दलित, बहुजन, आदिवासी समुदाय का नेतृत्व स्वीकार करना आपका जाति विरोधी आंदोलन में ठीक ठाक हिस्सा होगा और सवर्ण सेवियर कॉम्प्लेक्स से भी आप नहीं जूझेंगे।

ये कुछ तरीके हैं जिन्हें अपनाकर सवर्ण सेवियर कॉम्प्लेक्स में ना आएं और रोज़मर्रा के आधार पर जाति विरोधी बनें क्योंकि जाति विरोधी होना एक सोच भर नहीं है। वह पूरा एक प्रक्रिया है जो हर रोज़ करनी होती है ये पहचानते हुए कि आपकी जगह किसी और से छीनी गई जगह तो नहीं है। 

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तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

मेरा नाम आशिका शिवाँगी सिंह है, फिलहाल मिरांडा हाउस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातक कर रही हूँ। मैं उस साहित्य और राजनीति की पक्षधर हूँ जो शोषितों की पक्षधर है। रोज़मर्रा के जीवन में सवाल करना, नई-नई आर्ट सीखना, व्यक्तित्व में लर्निंग-अनलर्निंग के स्पेस को बढ़ाना पसंद है।

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